रविवार, 26 जून 2011

छत्तीसगढ़ की डायरी

सामंतीप्रवृत्तिवाले अफसरों का क्या किया जाए..?

छत्तीसगढ़ में सरकार निरंतर बेहतरी के काम करने की काशिशें कर रही है, मगर यहाँ के कुछ अफसर अपनी हरकतों से सरकार की छवि खराब करने की कोशिशों में लगे हैं। हर दूसरा अफसर करोड़ों की कमाई कर रहा है। जिसके यहाँ भी छापे मारो, वह अरबपति निकलता है। यह तो अलग मुद्दा है, इससे भी महत्वपूर्ण है अफसरों का जनता से व्यवहार। बहुत से अफसर जनप्रतिनिधयों को कुछ समझते ही नहीं, उन्हें लगता है वे ही इस व्यवस्था के भाग्यविधाता है। इसलिए उनकी हरकतें भी एकदम सामंती रहती है। हैं तो जनता के नौकर लेकिन आचरण ऐसा करेंगे, कि वे शाह है या राजा-महाराजा है। पिछले दिनों बस्तर में ऐसा ही वाकया देखने को मिला, जब दंतेवाड़ा के कलेक्टर ने दो चपरासियों को संडास में बंद करवा दिया। चपरासियों का कसूर यही था, कि वे अपनी ड्यूटी में विलंब से पहुँचे थे, इस कारण दोपहर के भोजन में विलंब हुआ था। कलेक्टर का गुस्सा जायज था, मगर उन्होंने जो हरकत की, वह यही दर्शाता है कि उन्होंने अपने आप को राजा ही समझ लिया था। आम लोगों का भी यही कहना है  कि ऐसी घटनाएँ तो सामंती दौर में हुआ करता था। लेकिन अब लोकतंत्र है। किसी को भी दंडित करने के भी नियम-कायदे हैं। ऐसी मनमानी नहीं चल सकती कि किसी को सजा देने के लिए संडास में ही बंद कर दिया जाए।
शराबबंदी की दिशा में बढ़ता छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' कहा जाता है लेकिन हालत यह हो गई है कि इसे कुछ लोग 'दारू की बोतल' भी कहने लगे हैं। अनेक गाँव ऐसे हैं, जहाँ स्कूल नजर नहीं आते मगर, दारू की दुकान जरूर मिल जाती है। दो रुपए किलो चावल खा कर और दारू पी कर बहुत से ग्रामीण टुन्न नजर आते हैं। छत्तीसगढ़ की यही स्थिति बनती जडा रही थी। इसे लेकर यहाँ की महिलाओं में गुस्सा था। वे लगातार प्रदर्शन भी करती रही। इन सब का असर अब जाकर हुआ है। पिछले दिनों प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने साफ-साफ कहा कि भले ही हमें राजस्व का नुसकान उठाना पड़े, लेकिन हम शराबबंदी कर के रहेंगे। हालांकि यह काम एकदम से नहीं होगा। धीरे-धीरे होगा, मगर होगा जरूर । वैसे पिछले दिनों सरकार ने निर्णय लेकर 239 शराब दुकानों को तो बंद ही कर दिया है। यह भी निर्णय किया है कि दो हजार से कम आबादी वाले गाँवों में शराब दुकानें नहीं खुलेंगी। सरकार धीरे-धीरे ही सही, अब छत्तीसगढ़ को शराबबंदी की दिशा में ले जा रही है। अगर ऐसा  हो गया तो कोई बड़ी बात नहीं कि देश-दुनिया में छत्तीसगढ़ का एक और खूबसूरत चेहरा सामने आएगा।  शराबबंदी हो जाए तो छत्तीसगढ़ प्रगति के पथ पर और तेजी केसाथ बढ़ेगा, इसमें दो राय नहीं।
पूर्व मुख्यमंत्री जोगी के बेटे की  पिटाई छत्तीसगढ़ हो या अन्य दूसरे कोई प्रांत,हर जगह राजनीति में माफियाओं को बोलबाला है। गुंडे बढ़ रहे हैं। वे लोकतंत्र में जीते हैं तो हैं मगर उन्हें बाहुबल पर ज्यादा यकीन रहता है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ के पूर्वमुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित को मध्यप्रदेश में कुछ गुंडों ने बुरी तरह पीट दिया। वहाँ भाजपा की  सरकार है. अमित प्रदेश हो रहे एक उपचुनाव में प्रचार करने गए थे। दमोह जिले की जबेरा सीट पर उपचुनाव हो रहा है, जहाँ से उनकी ममेरी बहन डा. तान्या चुनाव लड़ रही है। स्वाभाविक था कि अमित बहन के प्रचार के लिए जाते, लेकिन अब राजनीति में सहिष्णुता कम होती जा रही है। हिंसक लोग बढ़ रहे हैं। ये लोग डंडे के सहारे प्रचार करने पर यकीन रखते हैं। हिंसा के कारण अमित की आँखें में गंभीर चोट पहुँची। हाथ भी जख्मी हुआ है। कहते हैं, कि गुंडे लोग स्व. अर्जुन सिंह के बेट अजय सिंह पर हमले की तैयारी में थे। अमित अजय सिंह की कार में सवार थे, इसलिए गलतफहमी में पिट गए। लेकिन इस चक्कर में कुछ भी हो सकता था।
एक राज्य जहाँ पर्चे लीक हो जाते हैं...?
छत्तीसगढ़ शैक्षणिक नक्शे में अभी अपनी जगह नहीं बना सका है। और लगता है शिक्षा माफिया ऐसा होने भी नहीं देगा। पिछले दिनों पीएमटी के पेपर दूसरी लीक होने का मामला सामने आया। पाँच से ले कर बारह लाख रुपयों में ये पर्चे बिके थे। बिलासपुर के पास तखतपुर नामक कस्बे के धर्मशाला में फर्जीवाड़ा चल रहा था. वहाँ छापा मारा गया तो अनेक छात्र-छात्राएँ मिले। इस मामले में कुछ आरोपियों को पकड़ लिया गया है। यह बड़ी सफलता है मगर इन सब कारणों से दूसरे प्रतिभाशाली छात्र प्रभावित होते हैं। पिछले दिनों उस छात्र को पकड़ा गया, जिसने पिछले साल पीएमटी की परीक्षा में टॉप किया था। उसने फर्जी तरीके से परीक्षा दी थी। यानी मुन्नाभाई वाली फिल्म की शूटिंग छत्तीसगढ़ में लगातार चल रही है। व्यावसायिक परीक्षा मंडल की विफलता इस बात का सबूत है कि दाल में काला तो है। विभागीय लोग भी रैकेट में शामिल रहते हैं। प्रश्न यही है कि आखिर वह दिन कब आएगा, जब परीक्षा जैसे मामले में ईमानदारी के साथ काम होगा? फर्जीवाड़ा करके पीएमटी पास करने वाले लड़के कल मेडिकल की पढ़ाई भी फर्जी तरीके से ही करेंगे, और चकमा दे कर निकलते रहेंगे, तो प्रदेश के स्वास्थ्य का क्या अंजाम होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। इसके पहले पीएससी की परीक्षाएँ भी निरंतर खटाई में पड़ती रही है। स्कूलों में पैसे ले कर लोगों को टॉप करने के मामले सामने आ चुके हैं। 
हो गया 'व्हाइट हाउस' का लोकार्पण
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में नगर निगम कार्यालय अब अपने नये भवन में लगेगा। 25 जून को महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल जी ने इसको लोकार्पित किया। वास्तु के लिहाज  से यह भवन नयनाभिराम है। अपनी झक्क सफेदी के कारण लोग इसे 'व्हाइट हाउस' कहने लगे हैं। हालांकि यह शब्द चुभता है मगर अब अँगरेजी बहुत से लोगों की आत्मा का हिस्सा भी बनती जा रही है इसलिए किसी को अटपटा भी नहीं लगता। इसमें अनके तरह की आधुनिक सुविधाएँ भी हैं। वक्त-वक्त की बात है। भाजपा के महापौर सुनील सोनी के समय सेयह भवन बनना शुरू हुआ था, लेकिन जब उनके बैठने का समय आया तो चुनाव हो गया और भाजपा हार गई। निगम पर कांग्रेस का क ब्जा हो गया। महापौर डॉ. किरणमयी नायक को यह सौभाग्य मिला कि वे महापौर के रूप में इस नये भवन में विराजमान हो। राष्ट्रपति के हाथों भवन का शुभारंभ हुआ, यह और गौरव की बात रही। उद्गाटन समारोह में राष्ट्रपति ने बड़ी अच्छी बात कही कि हमें गरीबों को झुग्गीवासियों का हित भी ध्यान में रखना चाहिए। यह बात नगरनिगम के महापौर और पार्षदों को गाँठ  बाँध लेनी चाहिए। लोग यही कह रहे हैं कि जब आदमी महलजीवी हो जाता है तो गरीब उसे चुभने लगते हैं। रायपुर नगर निगम इसका अपवाद बने तो बेहतर होगा।

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

छत्तीसगढ़ की डायरी

छत्तीसगढ़ की पुलिस ने फिर दिखाई मर्दानगी..
अपनी गली में एक पशु भी शेर होता है। कुछ यही हाल है अपनी पुलिस का थाने में कोई चला जाए तो वर्दी धारी उस पर ऐसे पिल पड़ते हैं कि पता नहीं सामने वाला कितना बड़ा गुनाहगार है। गुनाहगार के साथ दुब्र्यवहार तो चलो समझ में भी आता है, मगर जिसकी कोई गलती नहीं, उसे जब पुलिस के लोग पीटते हैं, तो लगता है, ये लोग ही सबसे बड़े अपराधी हैं। पिछले दिनों औद्योगिक नगर कोरबा की पुलिस ने जो कोबरा रूप दिखाया, उसे सुनकर लोग दहल गए। एक महिला बेचारी अपने पति की गुशुदगी की रिपोर्ट लिखाने गई थी, मगर वह तो जैसे गुंडों के बीच ही फँस गई। पाँच शराबी पुलिस कर्मियों ने उसको मारा-पीटा, उसके साथ बदसलूकी की। पुलिस के आला अफसर बोल रहे हैं कि महिला के साथ मारपीट नहीं की गई। महिला के शरीर पर जो निशान धिख रहे हैं, क्या वह भूत ने बना दिए? नैतिकता तो यह कहती है, कि पुलिस के आला अफसर स्वीकार करें कि हाँ, गलती हुई हैं। दोषी लोगों पर कार्रवाई की जाएगी, लेकिन ऐसा करके शायद पुलिस छोटी हो जाएगी। इसलिए वो बड़ी बने रहना चाहती है? छत्तीसगढ़ में पुलिस अत्याचार के मामले तेजी के साथ बढ़ रहे हैं। पलिस निरंकुश हो रही है। लोग कहने लगे हैं, कि जिस प्रदेश का पुलिस-मुखिया लेखक हो, उसके समय में भी अगर पुलिस में करुणा-संवेदना-सहानुभूति आदि मानवीय तत्व नहीं जग सके, तो कब जगेंगे?
खुदकशी के बढ़ते मामले
छत्तीसगढ़ में पुलिस-अत्याचार के मामले बढ़ रहे तो लोगों में खुदकशी की प्रवृत्ति बढ़ रही है। और इसके पीछे भी दुभाग्यवश प्रशासनिक तंत्र ही कारण है। प्रशासन इतना निर्मम होता जा रहा है, कि वह जिंदा आदमी की मांग पर कोई विचार नहीं करता और जब वह त्रस्त होकर आत्महत्या कर लेता है तो मुआवजा देने सरकार पहुँच जाती है। पिछले दिनों एक किसान ने आत्महत्या कर ली थी, क्योंकि दस साल से उसकी जमीन का मुआवजा नहीं मिल पा रहा था। लेकिन सबसे दिल दहला देने वाली घटना घटी है भिलाई में। जहाँ एक परिवार के चार सदस्यों ने सामूहिक आत्महत्या कर ली। माँ, तीन बहनें मर गईं। एक युवक बच गया है। जहर उसने भी खाया था। उसे अस्पताल में भरती किया गया है। इस परिवार की मांग थी, कि परिवार के मुखिया जो कभी भिलाई इस्पात संयंत्र में काम करते थे, उनकी अकाल मौत होने के कारण उनके बेटे को अनुकम्पा नौकरी दी जाए। लेकिन नौकरी तो दूर प्रबंधन उन्हें घर से ही बेदखल करने की तैयारी कर रहा था। इस परिवार ने क्षेत्र की सांसद सेभी गुहार लगाई मगर वो हेमामालिनी के नृत्य कार्यक्रम में भिड़ी रहीं। आखिरकार इस परिवार ने खुदकशी कर ली। परिवार ने मरने के पहले तीन-तीन पत्र लिखे जिसमें उसने अपना पूरा दुखड़ा बयान किया है। अब बे युवक को नौकरी देने की बात की जा रही है। ऐसी नौकरी का क्या औचित्य जो चार-चार शहादतों के बाद मिलती हो? कांग्रेस इस मामले को लेकर मानवाधिकार आयोग जाने वाली है। अनेक सामाजिक संगठन इस हादसे की निंदा कर रहे हैं। मगर ये हादसे एक सबक की तरह आते हैं कि अगर दुखी लोग खुदकशीकी धमकी दे रहे हैं तो उसे हल्के से न लियाजाए। जब जीने का कोई आधार ही न बचे तो मरना अंतिम विकल्प होता है। बावजूद इसके कि आत्महत्या कमजोरी है, कायरता है, लेकिन मजबूर आदमी या परिवार अंतिम रास्ते के रूप में यही विकल्प चुनता है।
काँग्रेस में आई जान, पटेल को मिली कमान
छत्तीसगढ़ काँग्रेस में पहली बार जान लौटती दीख रही है। इस बार नए प्रदेशाध्यक्ष के रूप में नंदकुमार पटेल का हाईकमान ने चयन किया है। सही समय पर ओबीसी कार्ड खेला गया है। यही कारण है, कि पटेल की नियुक्ति को मोतीलाल वोरा, विद्याचरण शुक्ल और अजीत जोगी जैसे अलग-अलग गुट के नेताओं ने भी प्रसन्नता के साथ स्वीकार किया है। खुद श्री पटेल यह मान कर चल रहे हैं, कि छत्तीसगढ़ में अब विपक्ष मजबूत होगा। वे ऐसा नहीं कह रहे हैं, कि इसके पहले यहाँ विपक्ष कमजोर था, मगर जैसा भी था, या अभी है, वह सबके सामने हैं। आपस की गुत्थागुत्ती में उलझी पार्टी को नंदकुमार पटेल जोड़ सकें तो यह उनकी बड़ी सफलता होगी। कहने की जरूरत नहीं, कि विपक्ष अपनी सामाजिक छवि को बेहतर बनाने में बहुत पीछे हैं। लेकिन अब शायद ऐसा न हो। नंदकुमार पटेल प्रदेश के पहले गृह मंत्री रह चुके हैं। रायगढ़ जिले से आते हैं। सतह से उठ कर राजनीति करने वाले रहे हैं इसलिए काँग्रेस कार्यकर्ता बहुत आशावान है कि इस बार पटेल जी के अध्यक्ष बनने के बाद काँग्रेस शायद कुछ बेहतर प्रदर्शन कर सके।
भाजपा की सफल रैली...
राजधानी में शनिवार को भाजपा ने केंद्र सरकार के विरोध में सफल रैली निकाली और सप्रे शाला मैदान में सभा की। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी और राजनाथ सिंह जैसे बड़े नेताओं की उपस्थिति में प्रदेश भर से आए हजारों कार्यकर्ताओं को दिशा मिली। गड़करी ने केंद्र के भ्रष्टाचार पर जमकर चुटकिया लीं। उन्होनें कहा, कि काँग्रेस का भ्रष्टाचार सबसे बड़ा धारावाहिक हो गया है। श्री गड़करी और राजनाथ सिंह समेत मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाया । प्रदेश के कोने-कोने से कार्यकर्ता पहुँचे थेे। इसरैली से कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार हुआ। राष्ट्रीय नेताओं ने मुख्यमंत्री रमन सिंह की सराहना भी की। लेकिन इस सभा को ले कर काँग्रेसी काफी नाराज थे। न केवल काँग्रेसी वरन् खिलाड़ी भी। काली पट्टी बांधकर एनएसयूआई न विरोध करने की कोशिश की मगर उन्हें हिरासत में ले लिया गया।
प्रदूषण बनाम खरदूषण
प्रदेश में औद्योगिक विकास हो, इससे किसी को इंकार नहीं है। लेकिन यह विकास विनाश बन कर लोगों के जीवन को, स्वास्थ्य को ही निगलने लगे, तो विकास चुभने लगता है। रायपुर और आसपास अनेक उद्योग लगे हैं, उनके प्रदूषण के कारण आसपास की खेती चौपट हो रही है और लोगों का स्वास्थ भी गिर रहा है। यही हाल रायगढ़ के लोगों को है। रायगढ़ क्षेत्र भी औद्योगिक नक्शे में शुमार हो चुका है।  लेकिन इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ रहा है। वहाँ के एक संयंत्र के विरुद्ध लोगों को सड़कों पर उतरना पड़ा। लोग एलर्जी से, दमे से तथा अनेक बीमारियों से परेशान है। संयंत्र का प्रदूषण खरदूषण जैसे राक्षस की तरह जीना दूभर कर रहा है। पिछले दिनों लोग कलेक्टर से मिले। शिकायत की तो कलेक्टर ने कुछ पंप सील करवा दिए मगर बाद में पता चला कि संयंत्र प्रबंधन ने पंप को खोल लिया । यह गंभीर अपराध है।

रविवार, 27 फ़रवरी 2011

छत्तीसगढ़ की डायरी

सबको खुश करने वाला बजट
छत्तीसगढ़ की रमन सरकार का हर कदम इतना सधा हुआ रहता है,कि विपक्ष केवल कोसता ही रह जाता है। कोशिश करता है, कि आलोचना की कुछ गुंजाइश तो निकले लेकिन आमजन खुश तो सरकार गदगद.  चाहे एक-दो रुपया किलो चावल हो या सस्ती दाल। नमक, साइकल, चरणपादुका वितरण आदि अनेक योजनाएँ हैं जिससे आम गरीब आदमी खुश है। अभी २६ फरवरी को रमन सरकार ने अपना सालाना बजट पेश किया। इसमें भी रमन सरकार ने सबको खुश करने का फार्मूला निकाला। क्या किसान और क्या व्यापारी, हर कोई खुश हो गया। किसानों के हित की अनेक घोषणाएँ की तो चेक पोस्ट ही खत्म कर दिया। प्रोफेशनल टेक्स भी समाप्त। गोबर-गोमूत्र से बनी वस्तुओं को कर मुक्त कर दिया। सात और शहरों में पोलिटेक्निक कॉलेज खुलेंगे। बिलासपुर में एक विश्वविद्यालय भी खुलेगा। विकलांगों के लिए भी अनेक लाभकारी घोषणाएँ हुई हैं। बस्तर का भी खास ध्यान रखा है। वहाँ आदिवासियों को मुफ्त में एक किलो चना दिया जाएगा। एक नई हिंदस्वराज पीठ की स्थापना  होगी तो संस्कृत को प्रोत्साहन देने के लिए एक लखटकिया सम्मान भी शुरू करने की घोषणा की गई है। ऐसी अनेक घोषणाएँ की गई है, जिससे सरकार अंत्योदय के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रही है। ऐसी ही रणनीति पर सरकार चलती रही तो वोट बैंक इनके हाथ से भला कैसे फिसल सकता है?  
और इधर काँग्रेसी आपस में भिड़े हैं...
उधर रमन सरकार जनहित पर ध्यान केंद्रित करके लोगों का दिल जीतने में लगी है, वहीं काँग्रेसी बेचारे अभी आपस में ही भिड़े हुए हैं। पिछले दिनों हुए उपचुनाव में काँग्रेस हार गई। संजारी बालोद के उपचुनाव में पराजित प्रत्याशी इस बात से दुखी है कि वह अपने जिन वरिष्ठ नेताओं को चाचा और बाबू कहता था, उनसे पूरा सहयोग नहीं मिला। अजीत जोगी तो चुनाव प्रचार करने ही नहीं गए। जोगी जी ने भी मजेदार बात कही। उन्होंने कहा कि प्रत्याशी मेरे पास आया था, उसने धन माँगा तो उसे धन दे दिया गया। तन-मन का सहयोग मांगा होता तो वह भी दिया जाता। पराजित प्रत्याशी कह रहा है, कि बड़े नेता आपस में भिड़ते रहे और मैं बलि का बकरा बन गया। जो भी हो, इस चुना की पराजय से एक बार फिर काँग्रेस को आत्ममंथन का मौका मिला है, कि वह सोच कि छत्तीसगढ़ में धीरे-धीरे वह हाशिये पर क्यों जा रही है। हर बार की तरह इस उपचुनाव में भी काँग्रेस की आंतरिक गुटबाजी साफ नजर आ रही थी।
फिर शराबबंदी के खिलाफ आंदोलन
छत्तीसगढ़ में शराब की नदियाँ बह रही हैं,कहना गलत न होगा। अधिकांश गाँव और शहर इसकी चपेट में हैं। इसके विरुद्ध आंदोलन भी होते हैं, लेकिन शराब दूकान बंद कराने में सबको पसीना आ जाता है। आंदोलन की इस कड़ी में अब दुर्ग के पास के तीन गाँव जगे हैं। उन्होंने कलेक्टर को ज्ञाापन दिया है और चेताया है कि शराब भट्टी नहीं हटी तो उग्र आंदोलन किया जाएगा। धनोरा-खम्हरिया गाँव के बीच खुली शराब दूकान के कारण क्या महिलाएँ और क्या पुरुष सबका आना-जाना मुश्किल हो गया है। महिलाएँ ज्यादा परेशान न रहती है। और यह सिलसिला दस-पंद्रह वर्षों से चल रहा है। आखिर महिलाओं ने प्रेरित किया तो पुरुष भी उठ खड़े हुए। सरपंच भी जगे। देखना यह है कि अब जनता का प्रतिरोध जीतता है,कि शराब का मुनाफा  
चमत्कार को नमस्कार
इस देश में फरजी लोगों की भरमार है। फरजी तांत्रिक, फरजी भविष्यवक्ता लेकिन कुछ लोग आज भी अपनी सिद्धि के बल पर ऐसा प्रामाणिक प्रदर्शन करते हैं, कि लोगों की श्रद्धा के पात्र बन जाते हैं। पहले रायपुर में और अब राजिम में विराजमान पंडोखर बाबा की बड़ी चर्चा है। उनके पास जो कोई जाता है, प्रसन्न हो कर ही लौटता है। इनके पास पता नहीं क्या सिद्धि है कि एक-एक बात सही बता देते हैं। लोग जो समस्या ले कर उनके पास पहुँचते हैं, वहीं समस्या बाबा के पास पहले से ही कागज पर लिखी हुई रहती है। एक व्यक्ति को उन्होंने बताया कि तुम्हारे ऊपर इतने लाख और इतने रुपए का कर्ज है। वह आदमी चकरा गया। अनेक उदाहरण लोग बता रहे हैं। जो जा रहा है, वह हैरत से भर कर लौटता है। इसका मतलब साफ है, कि कोई न कोई ऐसी विद्या तो है जिसके सहारे कोई व्यक्ति मन की बात को पढ़ लेता है। दुर्भाग्यवश अब पंडोखर बाबा जैसे लोग नहीं के बराबर हैं। 
राजिम कुंभ के बहाने संस्कृति
रायपुर से चालीस किलोमीटर दूर महानदी के तट पर बसा कस्बा राजिम अब पूरे देश में जाना जाता है। यहाँ हर साल कुम्भ भरता है। पहले इस कुंभ शब्द पर अनेक लोगों पर आपत्ति हुआ करती थी,लेकिन धीरे-धीरे कुंभ ऐसा लोकप्रिय हुआ कि अब देश भर के साधु-संत यहाँ आ कर धूनी रमाते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे शुरू किया। वह दिल से सहयोग भी करती है। पूरी व्यवस्था करती है। राजिम कुंभ के बहाने अब यहाँ हर साल सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी होता है। छत्तीसगढ़ के कलाकारों को अपनी कला दिखाने का एक मंच मिल जाता है। बाहर के भी अनेक कलाकार यहाँ आते हैं। इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान से छत्तीसगढ़ की ख्याति दूर-दूर तक फैल रही है। देश की राजधानी दिल्ली तक राजिम कुंभ का प्रचार किया जाता है। उत्तरप्रदेश समेत अन्य राज्यों के अनेक प्रख्यात संत प्रतीक्षा करते हैं, कि कब राजिम कुंभ लगे और वे धूनी रमाने पहुँच जाएँ।
पारिवारिक सहिष्णुता का पतन...
क्या शहर क्या गाँव, आपसी सौहार्द धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। अनेक घटनाएँ इस बात का प्रमाण है। पिछले दिनों राजधानी में एक पति ने पत्नी के चेहरे पर तेजाब फेंक दिया और फिर खुद जहर खा लिया। दोनों की आपस में अनबन थी। सुलह कराने की कोशिशें भी हुई लेकिन आपसी अहम के कारण बात नहीं बनी। दोनों अलग-अलग रहने लगे। पिछले दिनों पति पत्नी के पास पहुँचा और घर चलने का आग्रह किया। पत्नी नहीं मानी तो पति ने गुस्से में आ कर उसपर तेजाब फेंक दिया। अपने आप में यह मूर्खता है, मगर गुस्से में बहुत से लोग तेजाब का सहारा ले लेते हैं। बाद में पति को ग्लानि हुई या पुलिस का भय, उसने भी जहर खा लिया। यह पहली घटना नहीं है, कि इस कालम में चिंता की जा रही है। आए दिन ऐसी घटनाएँ होती रहती है, जिसमें पारिवारिक असहिष्णुता के कारण लोग एक-दूसरे की जान  लेने पर हैं। राजधानी में ही एक पत्नी अपने पति से त्रस्त हो कर अपनी बेटी के साथ रेल से कट मरी। खुद की जान ले ली और और एक मासूम को भी मरने पर मजबूर कर दिया।

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

छत्तीसगढ़ की डायरी

ये छत्तीसगढ़ है... यहाँ तो 
नक्सलियों की 'भी' चलती है..

नक्सलियों ने अठारह दिन पहले जिन पाँच जवानों को अगवा किया था, उन्हें स्वामी अग्निवेश और सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार गौतम नवलखा आदि दो हजार लोगों की उपस्थिति में अंतत: रिहा कर दिया गया। बस्तर के घने जंगलों के बीच एक समारोह हुआ। जहाँ नक्सलियों ने बाजे-गाजे के बीच अगवा पुलिस जवानों को रिहा किया। इस शर्त के साथ, कि जवान पुलिस की नौकरी छोड़ देंगे। हालांकि बाद में इस शर्त का कोई कास असर दिखा नहीं। क्योंकि जवान उम्र के इस पड़ाव में अब नई नौकरी कहाँ से लाएँगे। इस रिहाई के बाद सोचने वाली बात यही है कि छत्तीसगढ़ में सरकार कहाँ है? नक्सलियोंकी ही चलती है। लगता है यहाँ एक तरह से नक्सलियों की ही सरकार चल रही है। सरकारतो मूक दर्शक बनने पर मजबूर हो गई है। यह एक तरह से विफलता ही है लेकिन अभी गेंद नक्सलियों के पाले में है। नक्सलियों को हीरो बनाने वाले स्वामी अग्निवेश की उपस्थिति में नक्सलियों ने जवानों को रिहा करके यह संदेश दे दिया है कि वे सरकार को कुछ नहीं समझते। ये अलग बात है कि मुख्यमंत्री ने नक्सलियों से बातचीत के लिए हामी भरी है, लेकिन क्या नक्सली हथियार छोड़ देंगे? क्या वे मुख्यधारा में शामिल होंगे? अगर ऐेेसा हो सके तो बड़ी बात है लेकिन ऐसा कुछ दीखता नहीं। एक ओर नक्सली अगवा जवानों को रिहा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ हिंसा और तोडफ़ोड़ का खेल भी खेल रहे हैं।
विनाश के विरुद्ध विकास की लड़ाई
नक्सली बस्तर में उत्पात मचाते ही रहते हैं। किसी भवन को उड़ा देना, किसी की हत्या कर देना उनके लिए बाएँ हाथ का खेल है। पाँच अगवा जवानों को छोड़ देने का मतलब यह नहीं है कि उनके भीतर करुणा का उदय हो गया है। इस बहाने मीडिया में वे छाए रहे। पिछले दिनों नक्सलियों ने बस्तर के एक रमणीय स्थल चित्रकोट में स्थित एक पुलिस चौकी को उड़ा दिया, लेकिन सबसे प्रेरक बात यह हुई कि चौबीस घंटे बाद ही चौकी शुरु कर दी गई। जनता ने ध्वस्त चौकी के निर्माण में अपना पसीना बहा दिया। यह घटना इस बात का सबूत है कि अगर विध्वंस अपना काम करता है तो सृजनधर्मी भी पीछे नहीं हटते। बस्तर के आम लोग नक्सलियों की गतिविधियों के पक्षधर नहीं है। इसके पहले भी अनेक गाँवों की महिलाओं एव लोगों ने नक्सलियों के विरुद्ध जुलूस निकाले, प्रदर्शन किए। यह उल्लेखनीय घटना है। आज जब नक्सली भय के पर्याय बन चुके हैं, तब ग्रामीण सामने आकर विध्वंस के विरुद्ध विकास का पसीना बहाते हैं, तो लगता है, कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाले लोग भी जिंदा हैं।
लूट सके तो लूट...
छत्तीसगढ़ सरकार के दो चेहरे सामने आते रहते हैं। एक तरफ वह जनविकास की बात करती है,तो दूसरी तरफ जनता के पैसों से अय्याशी के सामान भी जुटाने में संकोच नहीं करती। फिछले दिनों लोगों को यह जान कर बड़ा अचरज हुआ कि जनता के पैसों से विधायकों एवं मंत्रियों को वाशिंग मशीन, ओवन और डिनर सेट बाँटे गये। ये पैसे सीधे-सीधे जनता के पैसे थे। इनमें किसानों को पैसा था, सिंचाई का पैसा था और सड़क बनाने केलिए जो पैसे आए थे, उन पैसों से विधायकों केलिए उपहार खरीदे गए। सूचना के अधिकार के तहत लोगों ने जो जानकारियाँ हासिल की, उससे ये सब खुलासे हुए। इस पाप में पक्ष और विपक्ष दोनों समान रूप से भागीदार हैं। यानी जनता को लूटने में विपक्ष भी पीछे नहीं है। वैसे बीच यह चर्चा आम है कि विपक्ष बिका-बिका-सा लगता है क्योंकि सरकार के खिलाफ उसके उग्र तेवर नजर ही नहीं आते। एक कवि ने इस लूट पर कुछ इस तरह से तुकबंदी की है
जनता की ही माल है, लूट से तो लूट।
बाद में तू पछताएगा, जब कुरसी जाएगी छूट।।

वेलेंटाइन डे.....
14 फरवरी को वेलेंटाइन डे रहता है। लेकिन लगता है युवा पीढ़ी के कुछ बिगड़ैल प्रतिनिधि रोज वेलेंटाइन डे के ही मूड में रहते हैं। इसीलिए रायपुर, बिलासपुर और भिलाई के कुछ बड़े-बड़े बाग-बगीचों में युवक-युवतियाँ इश्क लड़ाते मिल जाते हैं। पुलिस का या कुछ सामाजिक संगठनों का दबाव न रहे तो ये लोग खुल्मखुल्ला प्यार (?)करने पर उतारू हो जाएँ। पिछले दिनों ऐसे ही कुछ प्यारातुर जोड़ों को राजधानी से तीस किलोमीटर दीर भिलाईनगर की पुलिस ने पकड़ा। एक-दो नहीं, पूरे बीच जोड़े। ये लोग शायद वेलेंटाइन डे का पूर्वाभ्यास कर रहे थेे। इन सबको पुलिस पकड़ कर थाने ले गई। वहाँ इनके माता-पिताओं को बुलाया गया। युवा जोड़ों ने माफी मांगी तब जा कर उन्हें छोड़ा गया। अब इतना सब होने के बाद युवकों ने माता-पिता की इज्जत की कितनी परवाह की, कितनी शर्मिंदगी महसूस की, इसका तो पता नहीं चल सका, लेकिन लोगों को विश्वास है कि ये जिस तरह की हवा बह रही है, उसे देखते हुए तो यही लगता है, कि ये लोग सुधरने से रहे और वेलेंटाइन डे के दिन एक बार फिर छिप कर ही सही, इश्क का इजहार करने से बाज नहीं आएंगे।
पीएससी है कि मजाक...?
छतत्तीसगढ़ बनने के बाद ही यहाँ लोक सेवा आयोग का गठन भी हो गया था। लेकिन इन दस सालों में एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि आयोग ने साफ-सुथरा काम किया हो। हर बार विवाद की नौबत आती रही। कभी रिश्वतखोरी, तो कभी अनियमितता, तो कभी कोई गंभीर त्रुटि। हर बार जब परीक्षा होती है, तो उसके साथ मामला हाईकोर्ट में पहुँच जाता है। कभी विज्ञापन में त्रुटि तो कभी कुछ और। त्रस्त छात्रों ने दो दिन पहले मोमबत्ती जुलूस निकाल कर आयोग के खिलाफ प्रदर्शन किया। छात्रों ने मांग की कि अगर आयोग को चला नहीं सकते तो इस भंग ही कर दिया जाए। अब छत्तीसगढ़ के छात्र परीक्षा देने केलिए मध्यप्रदेश या झारखंड जाने का मन बना रहे हैं। छात्रों का कहना है कि अगर सचमुच गंभीरता के साथ आयोग को संचालित करना है तो इसका एक वार्षिक कैलेंडर बनाया जाए। परीक्षा की तिथि घोषित की जाए। और सबसे बड़ी बाद ऐसे लोगों को बिठाया जाए, जिनमें कुछ समझ हो। अनुभव हो। अनुभवहीनता का ही नतीजा है कि पीएससी की हर परीक्षा विवादास्पद हुई है।

रविवार, 19 दिसंबर 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

मगरमच्छों को भी पकड़ो.....
महिला पटवारी को रिश्वत की सजा
पिछले दिनों भ्रष्टाचार विरोधी दस्ते ने एक महिला सरपंच को रिश्वतखोरी के आरोप में रंगे हाथों पकड़ा और जेल भेज दिया। जो रिश्वत लेता है, उसे सजा मिलनी ही चाहिए। मगर सवाल यही है कि बारह हजार रुपये रिश्वत लेनी वाली महिला सरपंच तो पकड़ में आ गई, वे लोग कब पकड़ में आएंगे,जो करोडों की रिश्वत लेते हैं और कभी पकड़े ही नहीं जाते। पिछले कुछ वर्षों में अनेक लोग पकड़े गये मगर वे शातिर लोग अपने-अपने प्रभावों का इस्तेमाल करके बेदाग निकल गए। करप्शन ब्यूरो को बधाई कि वह अच्छा काम कर रहा है। रिश्वतखोरों को सजा मिलनी ही चाहिए। मगर जनता को और अच्छा तब लगेगा,जब वह मछलियों के शिकार के साथ-साथ मगरमच्छों को भी पकड़े। छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचारी मगरमच्छ बढ़ते ही जा रहे हैं ।
कुछ की लालबत्ती जली तो कुछ की बुझी...
आखिर वही हुआ, जिसका अनुमान था। सरकार ने कुछ आयोगों, बोर्डों, निगम-मंडलों के अध्यक्षों की नियक्तियाँ कर दीं। इस बार कुछ पुराने लोगों का पत्ता साफ हो गया तो कुछ नये चेहरों को मौका मिला। पिछली बार कुछ लोगों के खिलाफ शिकायतें भी मिली थीं। इसलिए उन्हें दुबारा मौका नहीं मिला। तो कुछ लोगों को संगठन के काम के लिए उपयुुक्त समझा गया। इस बार पार्टी ने समझदारी से काम लिया। इसीलिए पूरी समर्पण के साथ पार्टी के लिए दिन-रात एक करने वाले कुछ नेताओं को मौका दिया गया। ये वे लोग हैं, जिनके बारे में हर बार यही कयास लगाये जाते थे, कि इन्हें राज्यमंत्री का दर्जा दिया जाएगा, लेकिन इनके चाहने वाले हर बार निराश होते थे, लेकिन इस बार पार्टा ने कोई चूक नहीं की। खरसिया, अंबिकापुर, धमतरी, बालोद, अभनपुर जैसे सुदूर इलाके में रहने वाले जुझारू लोगों को राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया गया। इससे उनके समर्थकों में उत्साह बढ़ा है। इसका लाभ पार्टी को ही मिलेगा। और इधर जिन लोगों को लालबत्ती नहीं मिल सकी है, उनका भी कहीं न कहीं उपयोग किया ही जाएगा। वैसे अभी भी कुछ और नियुक्तियाँ शेष हैं। यानी पार्टी के लिए समर्पित कुछ और जुझारू लोगों को प्रतिसाद मिलने वाला है। किसको क्या मिलेगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन अभी जिस तरह से कुछ लोगों को लालबत्ती का तोहफा दिया गया है, उसे देख कर लोगों का अनुमान है, कि दूसरे चरण में भी सुपात्रों का चयन होगा।
नक्सली के आत्मसमर्पण का अर्थ
पिछले दिनों बस्तर के एक नक्सली सोनसाय रावड़े ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। यह समर्पण इस बात को दर्शाता है,कि अब नक्सलियों के बीच में काम करने वाले संवेदनशील लोगों की मानसिकता में बदलाव आने लगा है। आना ही चाहिए। पिछले कुछ महीने से बस्तर के लोग नक्सलियों की हिंसक गतिविधियों के विरुद्ध सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करते रहे हैं। हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। समर्पण करने वाले सोनसाय ने भी यही माना है। अब वह चाहता है कि वह युवकों को सही दिशा दे और कोशिश करेगा कि वे राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़े न कि नक्सलियों के भरमाने में आएँ। प्रशासन ने सोनसाय के प्रति पूरी सहानुभूति दिखाई है। उसके पुनर्वास के लिए जितनी भी कोशिश हो सके, होनी चाहिए और यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, कि उसे पूरी तरह संरक्षण मिले। समर्पण के बाद जाहिर है नक्सली सोनसाय के शत्रु हो जाएंगे। यह सब जानते हुए भी सोनसाय ने खतरा उठाया है, इसलिए वह नि:संदेह बधाई का पात्र है।
आदिवासियों को आरक्षण
भाजपा सरकार इस वक्त फूँक-फूँक कर कदम रख रही है। जनता का दिल जीतने के अनेक उपायों में एक नया उपक्रम है आदिवासियों को तेईस प्रतिशत आरक्षण। आदिवासियों को बेहतर सुविधाएँ, अनुकूल अवसर देने का यही समय है। ऐसे वक्त में जबकि नक्सली आदिवासियों के हित के नाम पर उनका और दूसरे लोगों का लहू बहाने का काम कर रहे हैं, सरकार ने आदिवासियों को यह बता दिया है, कि यह सरकार उनकी चिंता करती है। आदिवासियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने की व्यवस्था से समाज के लोग भी खुश हैं। अब समय आ गया है, कि आदिवासी समाज को समाज की सक्रियधारा से जोड़ा जाए। उनकी शिक्षा,स्वास्थ्य, पेयजल जैसे बुनियादी मुद्दों के साथ उन्हें रोजगार के भी सम्मानजनक अवसर मिलेंगे, तभी उनका समग्र विकास होगा।
विकलांगों के बारे में सोचने की जरूरत
समाज में सकलांगों के बारे में सोचा ही जाता है। उनके लिए अनेक योजनाएं भी बनती है। लेकिन समाज में ऐसी संस्थाएँ इक्का-दुक्का ही हैं, जो विकलांगों के बारे में गंभीरतापूर्वक सोचती हैं। छत्तीसगढ़ की इकलौती संस्था अखिल भारतीय विकलांग चेतना परिषद इस दिशा में गंभीरता के साथ काम कर रही है। पिछले दिनों संस्था ने साहित्यकारों को विकलांगों के बारे में लिखने के लिए प्रेरित किया था। अब वे हर साल की तरह विकलांग युवक-युवतियों की शादी की तैयारी कर रहे हैं।26 दिसंबर को रायपुर में परिचय सम्मेलन रखा गया है। 13 फरवरी 2011 को सामूहिक विवाह का आयोजन किया जाएगा । सबसे अच्छी बात यह है, कि इस आयोजन में समाज के हर वर्ग के लोग सहयोग करते हैं। मारवाड़ी युवा मंच और ब्राह्मण समाज की कुछ ज्यादा उत्साह के साथ भागीदारी निभाता है। सरकार विवाहित जोड़ों को आर्थिक मदद करती है। समाज और सरकार साथ-साथ चले तो बहुत-सी समस्याएँ हल होती रहेगी।

शनिवार, 27 नवंबर 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

छत्तीसगढ़ की पुलिस को 
          मनुष्य बनाया जाए....
छत्तीसगढ़ की पुलिस पर एक आम आरोप यह लगाया जाता रहा है, कि वह फर्जी मुठभेड़ करती है और लोगों को किसी न किसी मामले में फँसाकर जेल भेजती रहती है। पुलिस ऐसे लोगों पर अंकुश लगाने की कोशिश करती है, जो अक्सर प्रतिरोध करते हैं। अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं। जिंदा कौमों को प्रतिकार करना ही चाहिए। प्रतिकार लोकतंत्र की ताकत है लेकिन अंगरेजों के समय की पुलिस आजाद देश में भी दमनकारी मानसिकता में है। बस्तर में पुलिस ऐसी ही हरकतें कर रही है। पिछले दिनों सीपीआइ ने जगदलपुर में जोरदार रैली निकाली। इसमें हजारों लोग शामिल हुए। इनमें आदिवासियों की संख्या भी कम नहीं थी। यह रैली अन्याय के खिलाफ थी। फिर चाहे अन्याय नक्सली करें, चाहे पुलिसवाले। पिछले दिनों पुलिस एक ग्रामीण को उठा कर ले गई, उसका आज तक पता नहीं। गाँववाले पूछने गए तो उन्हीं को धमकाया जाने लगा। यानी अत्याचार भी करो और दादागीरी भी? इन्हीं सब कारणों से पुलिस के प्रति समाज में घृणा की बावना भरती जा रही है। पुलिस को मनुष्य बनाने की कवायद आखिर कब शुरू होगी?
अपहरण का कारोबार
पूरे छत्तीसगढ़ के परिदृश्य को देखें तो लगता है, हर कहीं अपराध बढ़ता जा रहा है। जब छत्तीसगढिय़ा दुखी हो कर कहने पर मजबूर होता है, कि पुलिस बैठे-बैठे केवल रोटियाँ तोड़ रही है। राजधानी रायपुर से लेकर अंबिकापुर तक फैला है अपहरण का कारोबार। अपहरण और लापता होने की वारदातें बढ़ रही हैं. पिछले दिनों राजधानी में दो छात्र लापता हुए थे, वे आज तक लापता ही हैं। पता नहीं चल रहा कि कहाँ चले गए? अभी हाल ही में फिर दो स्कूली छात्राएँ लापता हो गई हैं। एक लापता किशोर की तो बाद में केवल लाश ही मिली।  पुलिस ने गुमशुदा दस्ता बनाया था। अब तो लगता है,उसे ही खोजने की बारी है कि वह कहाँ है? वैसे लोगों का कहना यही है, कि दस्ता सक्रिय भी हो जाएगा, तो क्या गारंटी है, कि वह सफल होगा। गृहमंत्री के दस्ते का हश्र सब देख रहे हैं। रायपुर में वाहनों में आगजनी और तोड़-फोड़ की वारदातें बढ़ती ही जा रही है। लोग हैरत में हैऔर एक-दूसरे से पूछते हैं, कि आखिर इस पुलिसतंत्र का सामाजिक औचित्य क्या है?
न्यायिक जाँच में दिक्कत क्या?
अंबिकापुर के छात्र ऋतिक का अपहरण हुआ और बाद में उसकी हत्या कर दी गई। इस मुद्दे पर सरगुजा भी बंद रहा। पूरा छत्तीसगढ़ उद्वेलित रहा। स्वाभाविक है,कि काँग्रेस के लिए यह एक अवसर था सरकार की खिंचाई का। काँग्रेस की माँग गलत नहीं है, कि हत्याकांड की न्यायिक जाँच होनी चाहिए। इसमें दिक्कत क्या है। जनभावनाओं का सम्मान होना ही चाहिए। लोगों को दु:ख तब होता है, और गुस्सा भी आता है, जब जनप्रतिनिधि- मंत्री महोदय पुलिस का पक्ष लेते हैं और कहते हैं हत्याकांड के लिए समाज जिम्मेदार है। कई बार लोगों को भी यही लगता है, कि समाज ऐसे लोगों को अपना प्रतिनिधि चुनने का जिम्मेदार है जो जनता के साथ नहीं, पुलिस के साथ खड़े नजर आते हैं : उस पुलिस के साथ जिसका चरित्र क्या है, क्या रहा है, वह सबके सामने है।
कितने करोड़पति अफसर है यहाँ...?
वैसे अब किसी का करोड़पति होना चौंकाने वाली बात नहीं हो सकती क्योंकि किसी का पुराना बड़ा मकान भी अब एकाध करोड़ की कीमत तक पहुँच जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के अनेक अफसरों के पास से जब मकान-दूकान और नकदी निकलते हैं, तब खबर बनती है, चर्चाएँ होती है। फिर चाहे अफसर रायपुर को हो, बिलासपुर का हो या और कहीं का। पिछले दिनों रायपुर नगरनिगम के एक अधिकारी के पास से करोड़ों की संपत्ति मिली और अब बिलासपुर नगरनिगम का इंजीनियर सपड़ में आया। आखिर ये लोग इतने श्रमवीर कहाँ से हो जाते हैं, कि रातों रात मालामाल हो गए? जाहिर है यह पाप की, हराम की कमाई है। जो सीधे-सीधे लूट के कारण अर्जित की गई ? ऐसे लोगों की संपत्ति हर हाल में राजसात होनी चाहिए। और दोषी लोगों को कड़ा दंड भी मिलना चाहिए। ताकि दूसरे सबक लें। हमारे यहाँ अकसर छापे पड़ते हैं बाद में सब चमत्कारिक रूप से  निर्दोष निकलते हैं। 
अफसरों पर लगाम की फिर कवायद
छत्तीसगढ़ में अफसरी का धंधा मंदा ही नहीं होता। अफसरों का स्वर्ग है यह राज्य। यहाँ अफसर लूटखसोटबी करतेहैं, अन्याय भी करते हैं और नायक बने घूमते हैं। क्योंकि बहुत-से लोग हीनबाव सेग्रस्त रहते हैं। वे अफसरों को कार्यक्रमों में बुलाते हैं, उनका सम्मान करते हैं। अपने स्वार्थ के लिए उन लोगों की प्रतिष्ठा की जाती है, जो किसी लायक नहीं है। जैसे किसी पुलिसवाले का सम्मान इसलिए कर दिया जाता है, कि उसने चोर या हत्यारे को पकड़ लिया। यह तो पुलिस का काम है, इसीलिए तो उसे नौकरी दी गई है। लेकिन नहीं, सबंध गाँठने के लिए उसे सम्मानति किया जाता है। जिसे जिस काम के लिए रखा गया है, उसे उसके काम के एवज में सम्मानति किया जाना अजीब लगता है,लेकिन यह हो रहा है। अब सरकार ने एक पुराने सिविलसेवा (आचरण) अधिनियम 1965 को फिर से लागू करके साफ-साफ निर्देश दिए हंै कि कोई भी अफसर उद्घाटन-शिलान्यास नहीं करेगा। किसी कार्यक्रम में अतिथि नहीं बनेगा। वैसे तीसरी बार यह अधिनियम लागू किया गया है, लेकिन कुछ बेशरम अफसर इसका पालन नहीं करते और आए दिन मंचों पर स्थापित नजर आते रहते हैं।
शिक्षामंत्री के महत्वपूर्ण सुझाव
शिक्षा में भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय एवं मानवीय मूल्यों को बढ़ाने वाले पाठ्यक्रम शामिल किए जाने चाहिए। महापुरुषों के पाठ पढ़ाए जाने चाहिए। प्रदेश के शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने पिछले दिनों दिल्ली में इस आशय के सुझाव दिए। एनसीइआरटी की बैठक में श्री अग्रवाल ने अपने सुझाव रखे। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता, कि वर्तमान दौर में हम अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। राष्ट्रीय मूल्य तो जैसे हाशिये पर ही फिंका गए हैं। मानवीय मूल्य भी बेमानी होते जा रहे हैं। स्कूलों में खेलकूद-बागवानी और सांस्कृतिक गतिविधियाँ कम होती जा रही हैं। आज पूरा ध्यान बच्चे के व्यावसायिक कैरियर पर ही केंद्रित है। उसे बेहतर मानव बनाने की बुनियादी चिंता कहीं नजर नहीं आती। बच्चे को अपने पैरों पर खड़ा होना है, उसे अच्छी नौकरी हासिल करनी है। अच्छा व्यवसाय करने लायक बनना है। मगर उसे अच्छा इंसान भी बनना है। इसका पाठ भी पढ़ाया जाना चाहिए।

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

राज्यपाल से भी बड़ा हो गया सलमान...? 
हे भगवान्.......
बॉलीवुड के कुख्यातकिस्म के विख्यात अभिनेता सलमान खान को राज्योत्सव में बुलाने की तो खूब आलोचनाएँ होती रहीं, मगर उसके आने के बाद जो कुछ हुआ, वह तो नहले पे दहले जैसी बात हो गई। राज्योत्सव के उद्घाटन के बाद मंच पर सलमान खान को बुलाया गया। दुखद पहलू यह रहा, कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री और अन्य जनप्रतिनिधियों को मंच पर बुला कर सलमान का स्वागत करवाया गया। सबने यह दृश्य देखा और चकित रह गए। राज्यपाल एक हीरो का स्वागत करने पर मंच पर जाए, यह राज्यपाल के पद की गरिमा के खिलाफ है। और वो भी ऐसे हीरो का स्वागत करे, जिसका आपराधिक रिकार्ड रहा हो। लोगों ने इसे  सांस्कृतिक भूल कहा, जो हो गई है। लेकिन यह एक सबक है। दस मिनट मंच पर रहा सलमान और व्यवस्था चरमरा गई। युवा दर्शक बेचारे जिस उत्साह के साथ आए थे, उन्हें निराशा हाथ लगी। सलमान ने कोई कार्यक्रम ही पेश नहीं किया। संस्कृति विभाग के निमंत्रण पत्र में उसका ऐसा गुनगान किया गया, कि मत पूछिए। सलमान की चार तस्वीरें कुछ इस अंदाज में छपी हैं गोया वो आकर कोई धमाल करने वाला है। सलमान की तस्वीरें  छापने से संस्कृति विभाग का पुलिसियापन ही जाहिर हुआ है। खैर, जो होना था, सो हो गया: भविष्य में इस विभाग की गरिमा का ख्याल रखा जाना चाहिए।
कमीशनखोरी से दुखी भाजपाई
भाजपा की सरकार है मगर भाजपा के कार्यकर्ता शासन-प्रशासन में व्याप्त कमीशनखोरी से दुखी हैं। पिछले दिनों राजधानी में भाजयुमो का सम्मेलन सम्पन्न हुआ। इसमें राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुराग ठाकुर पधारे। सम्मेलन में मुख्यनमंत्री डॉ. रमन सिंह भी थे। यहाँ अनेक कार्यकर्ताओं ने अपनी पीड़ा सामने रखी और यह आरोप लगाया कि जनप्रतिनिधि विकास के लिए दिए जाने वाले पैसों में कमीशनखोरी करते हैं। राज्य में बढ़ रही शराबखोरी पर भी चर्चा हुई। अनुराग ठाकुर ने कहा, ऐसे गलत लोगों को बेनकाब करना चाहिए। सबको यह संकल्प करना चाहिए कि वे चुनाव ने शराब बाँटेंगे और न पीएंगे। मुख्यमंत्री इस प्रवृत्ति की निंदा करते हुए दो टूक कहा,कि ठेकेदारी करने वाले नेताओं को जनता रिजेक्ट कर देती है। सम्मेलन के माध्यम से वैचारिक मंथन हुआ। अब वे नेता सावधान हो जाएँगे जो कमीशनखोरी में लिप्त रहते हैं। और जिनकी तरफ इशारा किया जा रहा था।
दस्ता बना सिरदर्द...
हमारे गृहमंत्री ईमानदार हैं। कुछ करना चाहते हैं। मगर उनके दाएँ-बाएँ रहने वाले लोग उनकी छवि धूमिल करने के पीछे पड़ गए हैं। उन्होंने शराबखारी, जुआ-सट्टा आदि सामाजिक बुराइयों से निपटने के लिए एक दस्ता बना दिया, लेकिन अब यह दस्ता सिरदर्द साबित हो रहा है। इस दस्ते पर मारपीट-गुंडागर्दी, वसूली आदि के गंभीर आरोप लग रहे हैं। खरोरा में इस दस्ते ने जो गुंडागर्दी की, उसके खिलाफ तो भाजपा के ही जुझारू विधायक देवजी पटेल ने मोर्चा खोल दिया था। अब सांसद चंदूलाल साहू भी सामने आ गए हैं। इसके अलावा भी कुछ भाजपाई सामने आ कर दस्ते की हरकतों का विरोध कर रहे हैं। बेहतर तो यही होगा, कि गृहमंत्री वर्तमान दस्ते को भंग करे और साफ-सुथरी छवि वाले लोगों को जोड़ कर फिर नया दस्ता बनाए।
करोड़ों की कमाईवाला वन अधिकारी
जब लोग कहते हैं कि जंगल कट रहे हैं, वहाँ निर्माण कार्य में घपले होते हैं, तो लोग गलत नहीं कहते। मनेंद्रगढ़ में भारतीय वन सेवा के अधिकारी रजक के खिलाफ करोड़ों के घोटाले के आरोप लगे। उसकी जाँच भी हुई। अधिकारी अपनी सफाई में कुछ ठीक-ठाक नहीं कह पाए, इसलिए सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया है। ऐसे अनेक अधिकारी है, जिनके कारण छत्तीसगढ़ की वन संपदा नष्ट हो रही है। पिछले कुछ दिनों से अनेक भ्रष्ट अधिकारी सरकार के निशाने पर आ रहे हैं। अगर यही रफ्तार रही तो उम्मीद की जा सकती है, कि भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी। बशर्ते अधिकारी सुधर जाएँ।
घूसखोरी के खिलाफ हेल्पलाइन...
एक दशक हो गए अपने राज्य को बने, लेकिन विकास के साथ-साथ भ्रष्टाचार भी लगातार फलता-फूलता रहा है। विकास एक कदम चलता है और भ्रष्टाचार दस कदम आगे बढ़ जाता है। कई अफसर लाल हो गए हैं। इनसे कैसे निपटा जाए, यह बड़ी समस्या है। लेकिन इस दिशा में अब पहल हो रही है। लड़कियों से छेडख़ानी को रोकने के लिए सरकार ने एक हेल्पलाइन शुरू की है। कुछ टेलीफोन नंबर दिए हैं, जिस पर लड़कियाँ फोन करती हैं और दोषी को पकड़ा जाता है। अब रिश्वतखोरी को पकड़ाने के लिए भी हेल्पलाइन शुरू कर दी गई है। लोगों को इसका उपयोग करना चाहिए और जो रिश्वतखोर हैं, भ्रष्ट हैं, उनकी जानकारी इन नंबरों पर देनी ही चाहिए। आप भी नोट कर लें ये नंबर- 800, 110180 और 01124651000। हो सकता है, कभी काम ही आएं।
बच के रहें नकली मिठाइयों से...
अगले हफ्ते दीपावली है। इस अवसर पर आप मिठाइयाँ खरीदेंगे। लोगबाग आप को खिलाएँगे भी, मगर सावधान रहने की जरूरत है। पैसे कमाने की धुन में अनैतिक हो चुके कुछ लोग त्योहारों के मौकों पर नकली खोवा बनाते हैं। इसकी बनी मिठाइयाँ खाकर आदमी की जान भी जा सकती है। जहरीली चीजें धीरे-धीरे असर दिखाती हैं। मगर मौत के सौदागरों को इससे कोई मतलब नहीं। वे तो यह मान कर चलते हैं, कि ईश्वर के सामने हाथ जोड़ेंगे और पाप खत्म हो जाएँगे। ऐसे पापी पूरे छत्तीसगढ़ में छाए हुए हैं। वे राजधानी में भी हैं, रायगढ़ में भी हैं, अंबिकापुर में भी है तो बस्तर में भी। कहीं भी मिल जाएँगे मिलावटखोर। सावधान तो हमें रहना है। बेहतर हो कि घर पर मिठाइयाँ बनाएँ। खुद भी खाएँ और पड़ोसियों को भी खिलाएँ।
अरुंधति का पुतला फूँका
अरुंधति राय एक लेखिका है। अब वह सामाजिक कार्यकर्ता है। लेकिन वह कुछ ज्यादा ही उत्साह में आ जाती है। नक्सलियों का खुलेआम समर्थन करती ही है। अब वह इसलिए चर्चा में है कि उसने पिछले दिनों कह दिया, कि कश्मीर भारत का अंग नहीं है। अब यह बयान देशद्रोह से कम नहीं है। लेकिन अरुंधति काकुछ नहीं हुआ। हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भयंकर दुरुपयोग होता है। होता रहा है। कायदे से अरुंधति पर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए, मगर नहीं चला। लेकिन इस देश में लोग अभी मुर्दा नहीं हुए हैं। राजधानी में भी लोग जिंदा हैं। इसलिए अभाविप ने अरुंधति राय का पुतला दहन कर अपना आक्रोश व्यक्त किया। कहीं तो कोई प्रतिक्रिया हुई,यह बड़ी बात है। 

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

हद है....सलमान के स्वागत में सरकार...?
 

छत्तीसगढ़  में २६ अक्टूबर से राज्योत्सव शुरू हो गया है. १ नवम्बर २००० को नया राज्य बना था. यह दसवां वर्ष है. उत्सव १ नवम्बर तक चलेगा. लेकिन कल उद्घाटन के ठीक बाद मंच पर जो नज़ारा दिखा, उसे देख कर उन लोगो को गहरी निराशा हुई, जो चीज़ों को, जीवन को गंभीरता से लेते है. बालीवुड के एक नायक सलमान खान का जिस तरह मंच पर पहुँच  कर राज्यपाल, मुख्यमंत्री समेत अन्य मंत्रियों और अफसरों ने सोत्साह स्वागत किया, उसे देख कम से कम मेरे जैसे नागरिक की आँखे तो शर्म से झुक ही गई. औरों की भी झुकी होंगी, क्योंकि सलमान का ऐसा कद नहीं है, कि उसके स्वागत के लिये राज्यपाल और मुख्मंत्री मंच पर जाये. ये हो सकता है, कि सलमान खान राजपाल और मुख्यमंत्री का स्वागत करता. मगर यहाँ तो उल्टी गंगा बह रही थी. सलमान खान भी अपनी किस्मत को सराह रहा होगा  कि अच्छा राज्य मिला, जो उसे इतनामहत्व दे रहा है.
आखिर सलमान खान का अवदान क्या है? चंद औसत दर्जे की फिल्में..? क्यों उसे इतना महत्त्व दिया गया? इसलिए कि वह उसकी देहयष्टि आकर्षक है? इसलिए कि वह काले हिरनों का शिकार कराने में माहिर है, या फिर इसलिए कि वह गाडी चलता है और लोगों को कुचल देता है? किस कारण एक सरकार सलमान कहाँ का स्वागत कराने उमड़ पडी? इसका कारण खोजा जाना चाहिए. बहुत पुरानी बात नहीं है, जब सलमान को काले हिरन के अविध शिकार के लिये गिरफ्तार कर के जेल मे ठूंसा  गया था. नशे की हालत में कार चला कर लोगों को कुचलने का आरोपी भी यही (खल) नायक है. अनेक किस्से है, इस हीरो के. किसी से मारपीट करना, हीरोइनों के साथ 'स्कैंडल' गाली -गलौज  करना आदि-आदि  ऐसे व्यक्ति का  राज्योत्सव के मंच पर महानायक बता कर स्वागत करना यह बताता है कि राज्य मे ऐसे कुछ सलाहकार है, जो सांसकृतिक शून्यता के शिकार हो चुके है. ठीक है, कि सलमान को एक निजी कंपनी ने बुलाया था. मगर राज्यपाल और मुख्यमंत्री द्वारा उसका पुष्पगुच्छ से स्वागत करना, किसी भी कोण से सही नहीं ठहराया जा सकता. नई पीढ़ी के युवकों मे किसी हीरो को देखने की दीवानगी स्वाभाविक है, मगर एक सरकार किसी हीरो का स्वागत कराने मंच पर चली आये, यह पहली बार देखा गया. कलाकार का सम्मान होनाचाहिए, मगर उसकी सामाजिक छवि भी तो हो. जो व्यक्ति गंभीर अपराध के मामले में सजायाफ्ता हो, उसके स्वागत मे काम से काम सरकार को तो उतरना ही नहीं चाहिए था. मगर ऐसा हुआ, यह देख कर अनेक लोगों को धक्का लगा. राजपाल और मुख्यमंत्री से यह चूक कैसे हो गई, यह  लोगों की समझ से परे है. बहुत संभव है, उन्हें सलमान खान के अतीत की जानकारी न रही हो. यह काम सलाहकारों का है. पता नहीं उनको सलाह देने वाले लोग कैसे है. बहुत संभव है, कि उन लोगों को भी यह पता न रहा हो, कि सलमान खान गंभीर अपराध के सिलसिले में जेल कि हवा खा चुका है.
लोग पुरानी घटनाओं को जल्दी भूल जाते है.  दरअसल  रजत-परदे की चमक ही ऐसी है,कि इसमें दिखाने वाला खलनायक भी नायक लगता है. सलमान की  नई फिल्म ''दबंग'' आई है. जिसमें उसने  भ्रष्ट पुलिस अधिकारी का किरदार  निभाया है. फिल्म  'मुन्नी ' बदनाम हुई...'' जैसे गाने के कारण खूब चली. इस फिल्म कि लोकप्रियता ने सलमान को ज्यादा लोकप्रिय बना दिया. इस देश का दर्शक भी अब खलनायक को ही नायक समझाने की भूल कर रहा है. जो भी  हो, मै तो सलमान को खुशकिस्मत मानता हूँ, कि महानायक की तरह उसका छत्तीसगढ़ में पूरी सरकार ने स्वागत किया. इस छत्तीसगढ़ में इन दिनों वैसे भी पुलिस वाले दबंगई दिखा रहे है. लोग ठीक कह रहे है, कि अगर बालीवुड़ के ही किसी नायक को बुलाना था, तो ऐसे किसी कलाकार को बुलाते, जिसकी सामाजिक छवि भी ठीकठाक हो. कई नाम हो सकते है. मगर अब किसी ने सलमान की तगड़ी ''मार्केटिंग'' कर ही दी तो दूसरा नाम सामने कैसे आ सकता था. मगर सलमान का स्वागत करके सरकार की  छवि धूमिल ही हुई है, इसमें दो राय नहीं हो सकती. लोग इस घटना को चमत्कार की  तरह ले रहे है,कि एक सरकार एक विवादस्पद फ़िल्मी नायक के स्वागत मे उपस्थित हो गई.

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

बस्तर : उम्मीद कायम है..
नक्सलवाद के विरुद्ध बस्तर में जिस तरह लोग लामबंद होते रहे हैं, उसे देख कर यह विश्वास दृढ़ होता है, कि अन्याय के विरुद्ध जीवत प्रतिकार का सिलसिला जारी है। सलवाजुडूम भले ही अब बंद हो गया हो मगर शांति के लिए लोग फिर भी एक जुट हो रहे हैं। पिछले दिनों बस्तर में बीजापुर और जगदलपुर में शांति के लिए सैकड़ों लोग जमा हुए और यह संकल्प दुहाराया कि जब तक बस्तर में शांति बहाल नहीं हो जाती, लोग हिंसा के विरुद्ध खड़े होते रहेंगे। गाँधी जयंती के दिन लोगों के मन में बड़ा उत्साह था। डर यही है कि यह उत्साह समय के साथ ठंडा न पड़ जाए। नक्सलियों के विरुद्ध पुलिस और दूसरे जवान अपने तरह से लड़ रहे हैं। लेकिन जनता कोभी साथ देना है।  उन्हें घबराना ही नहीं है। जगदलपुर में एक संस्था बनी है बस्तर शांति एवं विकास संघर्ष परिषद। इस संस्था के गठन के दिन मुख्य वक्ता के रूप में मैं शामिल हुआ था। वहाँ जमा सैकड़ों लोगों के उत्साह को देख कर लगा कि अभी भी उम्मीद कायम है। और रहनी चाहिए।
जोगी का आशावाद
पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को मानना पड़ेगा। एक मायने में वे सबके प्रेरणास्रोत है। शारीरिक दुर्घटना केकारण और कोई होता तो वह हताश हो गया होता । मगर जोगीजी उत्साह सेबरे रहते हैं। और आए दिन सरकार के नाक में दम किए रहते हैं। लोग घबराए रहते हैं, कि पता नहीं, कब क्या हो जाए। अभी पिछले दिनों जोगी जी ने कह दिया कि भाजपा के बारह विधायक उनके संपर्क में हैं। ये विधायक बेहद नाराज हैं क्योंकि इनकी उपेक्षा हो रही है। जोगी जी का संकेत यही है कि सरकार उनकी मुट्ठी में है। जब चाहे निपटा सकते हैं। जोगीजी के इस बयान से लोग सकते में हैं। जोगी जी यह भी कह रहे हैं कि वे बहुत कुछ कर सकते हैं, मगर जब तक हाइकमान तैयार नहीं होगा, वे कुछ नहीं करेंगे। और यह तय है कि हाईकमान ऐसा कुछ नहीं चाहेगा, कि सरकार गिरे। मतलब केवल हवाहवाई बात है। फिर भी जोगी जी के इस बयान से भाजपा में सुरसुरी तो जरूर छूटी होगी और यह भी देखा जा रहा होगा, कि वे बारह विधायक हैं कौन। हैं भी या नहीं?
राहुल का बचकाना बयान
राहुल गाँधी अब बच्चे नहीं रहे। वे सांसद भी बन गए हैं। इसलिए संभल कर बोलना चाहिए। वे पिछले दिनों कह गए किस संघ और सिमी एक जैसे हैं। कहाँ राष्ट्रविरोधी संस्था सिमी और कहाँ राष्ट्रवाद के लिए जीने-मरने वाली संस्था संघ। संघ कट्टर हो सकता है, लेकिन वह सिमी जैसा आतंकवादी नहीं है। राहुल को किसी ने गलत फीड कर दिया होगा। बेचारे ने कह दिया। स्वाभाविक है कि उनका पुतला जला। राजधानी ही नहीं अनके जगह। बिना सोच-समझे बोलने के कारण ही हमारे यहाँ विवाद पैदा होते हैं। राहुल का बयान कुछ ऐसा ही है जैसे कोई हत्यारे और पंडित को एक ही श्रेणी में रख दे।
प्रतीकों में भी हो सकती है बलि
कुछेक धर्मस्थलों में पशुबलि दी जाती है। पूरा प्रांगण लहूलहान न•ार आने लगता है। जो लोग बलि के पक्ष में होते हैं, उन्हें बुरा नहीं लगता मगर बहुत से ऐसे लोग भी होते हैं,जो खून देख कर ही घबरा जाते हैं। हमारा समाज हिंसा विरोधी रहा है। लेकिन धार्मिक परंपरा के नाम पर हिंसा के मामले में मौन हो जाता है। जबकि लोगों को इसका विरोध करना ही चाहिए। सभ्य समाज में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। अगर किसी की धार्मिक मान्यता है तो उसका रूप बदला जा सकता है। प्रतीकों में बलि ली जा सकती है। नारियल को भी लो प्रतीक बनाते रहे हैं। ईश्वर कभी भी बलि से प्रसन्न नहीं हो सकता। वह त्याग को पसंद करता है। करुणा से वह खुश होता है। सुशिक्षित आम लोगों को यह समझाया जा सकता है। मिल-जुल कर एक वातावरण बनाने की कोशिश करनी चाहिए।
शोर पर ऐतराज
हमारे यहाँ धार्मिकता की भी ऐसी उग्रता देखने में आती है कि मत पूछिए। धर्म-कर्म में लगे बहुत से लोग कई बार अभद्रता की हद से गुजर जाते हैं। लाउडस्पीकर बजाकर आसपास के लोगों को परेशान कर देते हैं। आजकल हर घर में पढऩे-लिखने वाले बच्चे होते हैं। पढ़ाई का कितना दबाव रहता है, यह किसी से छिपा नहीं। जब घर के बाहर फुलसाउंड में लाउडस्पीकर बजता है तो बच्चे पढ़ नहीं पाते। बहुत से लोग शोर के कारण तनावग्रस्त भी हो जाते हैं। अगर ऐसे समय में कोई पीडि़त व्यक्ति आयोजकों के पास जाए तो वे अन्यथा लेते हैं और लडऩे पर उतारू हो जाते हैं। तब लगता है, कि यह कैसी धार्मिकता है जो दूसरों का दिल दुखा कर ईश्वर को खुश करना चाहती है। जबकि ईश्वर तो लोगों के दिलों में भी रहता है। अब लोग आस्था कम और प्रदर्शन में ज्यादा विश्वास करने लगे हैं। इसीलिए वे केवल अपनी सुविधा का ध्यान रखते हैं, दूसरों का नहीं।
फिर वही शराब....
छत्तीसगढ़ इस वक्त नक्सलवाद के साथ-साथ नशावाद से भी पीडि़त है। ऐसा कोई गाँव या शहर नहीं होगा,जहाँ शराब के कारण हिंसक स्थितियाँ न बनती हों। आपस में मारपीट, वैमनस्यता के पीछे शराब भी एक बड़ा कारण है। हालत यह भी होती है कि शराब के कारण घर-परिवारों में मौतें भी होने लगी हैं। पिछले दिनों आरंग क्षेत्र की कुछ जागरूक महिलाएँ रायपुर आईं और शराब बंदी के लिए प्रदर्शन करके लौट गईं। इनमें एक ऐसी महिला भी शामिल थी, जिसके पति की मौत शराब पीने के कारण हुई। अनेक मौतें केवल शराब केकारण हुई हैं। फिर भी शराबखोरी पर अंकुश नहीं लग रहा। प्रशासन को केवल आय चाहिए। शराबविरोधी आंदोलन को चालाकी के साथ दबा दिया जाता है। लेकिन ऐसा करके प्रशासन खुद अपराध कर रहा है। शायद उसे इस बात का अहसास ही नहीं है। गनीमत है कि छत्तीसगढ़ मुर्दा नहीं है। यहाँ शराब के विरुद्ध लोग एकजुट होते रहते हैं। आज नहीं तो कल हो सकता है कोई ऐसी व्यवस्था आए जो शराबबंदी के खिलाफ ईमानदारी से कोई निर्णय ले।

रविवार, 26 सितंबर 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

छत्तीसगढ़ ; घपलेबाज अफसरों की संख्या बढ़ रही
छत्तीसगढ़ के बारे में यही कहा जाता है कि यह बाहर से आए अफसरों का स्वर्ग है। और यह दीख भी रहा है। आजकल हर दूसरे-तीसरे दिन किसी न किसी अफसर के यहाँ छापा पड़ रहा है। काफी माल बरामद हो रहा है। छोटे से छोटा अफसर भी करोडों में खेल रहा है। क्या आईएएस और क्या डिप्टी कलेक्टर, हर कोई नोट कलेक्ट कर रहा है। तरह-तरह के घोटाले हो रहे हैं। सबसे मज़े की बात यह है कि लोग पकड़ में तो आते हैं, अखबारों के माध्यम से इनकी मिट्टीपलीद  भी होती है, लेकिन चिकने घड़ों को कोई फर्क नहीं पड़ता। और सच्चाई भी यही है, कि छापे के बाद कुछ दिन तक हलचल रहती है। बाद में मामला शांत हो जाता है। तबाही के कहीं कोई निशान ही नजर नहीं आते। कितने ही मामले गिनाए जा सकते हैं। यही सब देख कर तो बाकी अफसरों के भी हौसले बुलंद हैं, कि डटकर करो कमाई। किसी का बाल भी बाँका नहीं होगा। कमाल हो रहा है, कमाल हो रहा है। अफसर तो अफसर, अब बाबू भी लाल हो रहा है। लोग समझ रहै हैं कि छत्तीसगढ़ खुशहाल हो रहा है।  
 छत्तीसगढ़ की पुलिस इतनी कमजोर नहीं....
नक्सल समस्या एक अंधेरी रात में तब्दील हो चुकी है, ऐसा लगता है। ऐसा कोई दिन नहीं,जब कोई वारदात न हो। वहाँ रहने वाले लोगों को दहशत के साये में जीना पड़ता है। पुलिस वाले वहाँ जाना नहीं चाहते तो उनको प्रशासनिक डंडा दिखाया जाता है। खैर, काम तो करना ही पड़ेगा। जो पुलिसवाले वहाँ जाने से बचते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि खतरा कहाँ नहीं है। जीवन ही खतरे का नाम है और पुलिस में जो आता है, वह खतरों का खिलाड़ी बन जाता है। वरदी का मतलब है कि सिर पर कफन बाँध कर निकल पड़े हैं। सुविधाएँ यहाँ नहीं है। यहाँ संघर्ष है। चुनौतियाँ हैं। नक्सलवाद सबसे बड़ी चुनौती है। उससे भागने का मतलब है हम यह बता रहे हैं कि हम कायर है। जबकि वरदी वहीं पहनता है जो हिम्मती होता है। अगर पुलिस वाले नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जाने से घबराएंगे तो नक्सलियों के हौसले तो और बढ़ेंगे। इसलिए हिम्मत से काम लें और नक्सलियों से लोहा लें। छत्तीसगढ़ की पुलिस कमजोर नहीं, बहादुर है। यह संदेश पूरे देश तक जाना चाहिए।
नक्सल -अंधेरा: कब होगी सुबह?
वैसे पुलिस के जवानों को बहादुरी का सबक तो सिखाना आसान है, लेकिन यथार्थ यही है, कि वहाँ सरकार नाकाम-सी हो रही है। अभी सात जवानों का अपहरण किया गया । तीन को तो हत्या ही कर दी गई। चार अभी बंधक हैं। यह सब नक्सली आतंकवाद को दर्शाने का एक तरीका है। बंधक बने लोगों के परिजन किन मानसिक दौरों से गुजर रहे हैं, यह उनके बयानों से समझा जा सकता है। वे लोग नक्सलियों से अनुरोध कर रहे हैं, कि हमारे घर वालों को छोड़ दो तो वे लोग पुलिस की नौकरी ही छोड़ देंगे। उनकी जान बख्श दो। आदि-आदि। छोटे-छोटे बच्चे अपील कर रहे हैं लेकिन क्या नक्सली कुछ रहम करेंगे? अगर वे रहम करना जान लें तो नक्सली ही क्यों रहते? आम लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर इस रात की सुबह कब होगी। लेकिन धैर्य रखना ही होगा। क्योंकि सुबह अवश्य आएगी। शांति का सूरज चमकेगा ही।
ओ आँखवाले डॉक्टर, देखकर काम करो
हद है लापरवाही की। पिछले दिनों विश्रामपुर की एक तीन वर्षीय बच्ची की आँख में चोट लगी तो परिजनों ने अंबिकापुर के डाक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने कुछ उपचार किया और आँख पर पट्टी    बाँध दी। दो दिन बाद छुट्टी भी दे दी। मगर आँख में दर्द बना रहा। बाद में पता चला कि अंबिकापुर के डॉक्टर ने तो बच्ची की आँख ही निकाल दी और डुप्लीकेट आँख लगा दी है। बच्ची की आँख में दर्द रहने लगा तो घर वाले बच्ची को लेकर रायपुर आए। एक जाने-माने डॉक्टर को दिखाया तब मामला सामने आया। घर वालों ने गैरजिम्मेदार डॉक्टर के खिलाफ विश्रामपुर थाने में रिपोर्ट लिखाई है। अब डॉक्टर महोदय सफाई में कह रहे हैं, कि घर वालों के कहने पर बच्ची की आँख निकाली थी। घर वालों की सहमति अगर थी तो घर वालों ने थाने में रिपोर्ट ही क्यों लिखाई? मामला गंभीर है। भयंकर किस्म की आपराधिक लापरवाही का है। डॉक्टर की लापरवाही केकारण एक नन्ही बच्ची की एक आँख चली गई, इसका दर्द बच्ची और उसके परिजन ही समझ सकते हैं।
वाह रे गांजा-तस्कर सरपंच....?
सरपंच मतलब गाँव का प्रधान ..राजा। लेकिन बहुत-से गाँवों में सरपंचों की लापरवाही और लालच के कारण शराब और तरह-तरह की नशाखोरी फल-फूल रही है। गाँव के गाँव तबाह हो रहे हैं। पिछले दिनों रायपुर जिले के सुदूर गाँव का एक सरपंच गांजा-तस्करी में लिप्ट मिला। दूसरे लोग तो पकड़े गए मगर सरपंच पुलिस की गिरफ्त में आने के पहले ही वह फरार हो गया। लेकिन इससे एक बात तो साफ हो गई कि सरपंच की शह में गाँजे का कारोबार चल रहा था। एक सरपंच पकड़ा गया। अभी कुछ पकड़ सेबाहर हैं। अनेक गाँव आज नशे के केंद्र बनते जा रहे हैं। पचं-सरपंचों की सहमति के चलते शराब दूकाने खुल रही है।
पुस्तक-मेले की परम्परा विकसित हो
बिलासपुर में पुुस्तक मेला शुरु हो गया है। 3 अक्टूबर तक चलेगा। रायपुर में लगने वाला है। लेकिन अनुभव यही आया है कि इन पुस्तक मेलों में बहुत अधिक खरीदी नहीं होती। ये पुस्तक मेले में केवल दर्शनीय बन कर रहा जाते हैं। लोग पुस्तकों के पास तो आते हैं। मगर बाजार से गुजरा हूँ खरीदार नहीं हूँ  जैसी पंक्ति को सार्र्थक करते हुए निकल लेते हैं। जबकि अन्य राज्यों में होने वाले पुस्तक मेलों के बारे में सुन-पढ़ कर बड़ा आश्चर्य होता है, कि वहाँ साधारण से साधारण आदमी अच्छी खरीदारी करता है। छत्तीसगढ़ में पुस्तक-मेले की संस्कृति अभी बन रही है। यह शुरुआत है। यह सिलसिला चलता रहेगा तो भविष्य में पुस्तकें भी खरीदी जाएँगी। अभी तो सरकारी खरीदी भर होती है। वह भी इसलिए कि कुछ अफसरों को खासा कमीशन मिल जाता है। वे लाल हो जाते हैं। फिर भी इन पुस्तक मेलों का दिल से स्वागत होना चाहिए और छत्तीसगढ़ के दूरदराज स्थानों में रहने वाले कभी रायपुर-बिलासपुर जाएं तो मेलों तक भी जाकर कुछ न कुछ पुस्तकें जरूर खरीदें।

शनिवार, 4 सितंबर 2010

हाय, ये बलात्कारी शिक्षक

हाय, ये बलात्कारी शिक्षक.................
शिक्षक दिवस के दिन लोग शिक्षकों की पूजा करते हैं, उनका सम्मान करते हैं। शिक्षक होते भी इस लायक हैं कि उनका आदर किया जाए, लेकिन कभी-कभी कुछ शिक्षक सकलकर्मी यानी कुकर्मी भी निकल जाते हैं। जिनसे उम्मीद करते हैं, कि वे संस्कार देंगे, वे पट्ठे बलात्कार करते हुए पकड़े जाते हैं। भिलाई के ज्ञानदीप स्कूल में एक अज्ञानी शिक्षक का मामला प्रकाश में आया है। यह नीच शिक्षक पाँचवीं कक्षा की एक छात्रा को अपनी वासना का शिकार बनाना चाहता था। उस पर मामला दर्ज हो गया है। अब तो उसे स्कूल से हटा भी दिया गया होगा। दुख की बात यह है कि कुछ शिक्षक गलती से शिक्षा के पेशे में आ जाते हैं। दरअसल उन्हें होना था अपराधी, बनना था माफिया मगर अध्यापक बन गए। मगर मानसिकता वहीं की वही। क्या करें? ऐसे घटिया शिक्षकों के कारण पूरी बिरादरी बदनाम होती है। सचमुच, एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है। ऐसे शिक्षकों को आजीवन जेल में ही सड़ाना चाहिए, ताकि उन्हें हर पल अपनी गलती का अहसास होता रहे।
लहू का रंग एक है....

पिछले दिनों फिर एक घटना प्रकाश में आई, कि एक घायल नक्सली को एक जवान ने अपना खून दिया। यानी उसकी जान ही बचाई। खून देने वाले जवान ने साबित कर दिया, कि मानवता सबसे ऊपर है। वह चाहता तोकून न भी देता। उन नक्सलियोंं को खून क्यों दें, जो बेकसूरों का खून बहाते हैं। यह निर्मम व्यावहारिक सोच है, मगर नैतिकता या जीवन-मूल्य यही कहते हैं, कि मानवता की रक्षा की जाए। हो सकता है, जवान के खून देने के बाद नक्सलियों का मन पसीजे।  वे सोचने पर विवश हों, कि जिनको हम मार डालते हैं, उनके ही लोग हमारे साथी की जान बचाने के लिए रक्तदान करते हैं। लहू का रंग एक हैं। मगर जब लहू की सोच हिंसक हो जाए, तो क्या किया जा सकता है। जवान ने अपना लहू दे कर पुण्य का काम किया है। उसका अभिनंदन होना चाहिए।
सबक है यह पुलिस के लिए..
पुलिस का मतलब यह नहीं है, कि किसी के साथ भी मनमानी कर ली जाए। डंडा हाथ में आने के बाद कुछ लोग रावणत्व के शिकार हो जाते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं, कि लोकतंत्र में कानून नाम की कोई चीज भी है। पुलिसवालों को कानून की रक्षा के लिए डंडा दिया जाता है, लेकिन भाई लोग उस डंडे से किसी का भी सिर फोडऩे लगते हैं। आरपीएफ के प्रभारी समेत सात पुलिस कर्मियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया गया है। हुआ यह कि किसी मामले में एक व्यक्ति को जेल हो गई थी, लेकिन पुलिस चालान नहीं पेश कर पाई। व्यक्ति को जमानत पर रिहा कर दिया गया। लेकिन पुलिस उसे फिर पकड़ कर ले गई। उसे मारा-पीटा। प्रताडि़त किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रट ने मामला दर्ज करने का आदेश दे दिया। शिकार करने वाले लोग खुद शिकार हो गए। प्रताडि़त व्यक्ति को,उसके परिवार को तब संतोष मिलेगा, जब दोषी पुलिस वालों को कड़ी सजा मिलेगी। और मिलेगी ही क्योंकि न्याय के घर देर है, अंधेर नहीं।
छत्तीसगढ़ में घसपैठिए....?
छत्तीसगढ़ ही क्या, पूरा भारत घुसपैठियों का घर बनता जा रहा है। यह एक बड़ी समस्या है, फिलहाल अगर छत्तीसगढ़ की बात करें, तो यहाँ भी बांग्लादेश और पाकिस्तान के लोग घसुपैठ की कोशिश करते रहते हैं। अपने देश से वीजा बना कर आते हैं और भारत में ही रह जाते हैं। क्योंकि यहाँ सुख-शांति है। आराम से अपना धंधा कर सकते हैं। अपने यहाँ भ्रष्टाचार इतना है कि थोड़े से पैसे मिलने के बाद संबंधित अधिकारी किसी भी किस्म का प्रमाणपत्र दे सकता है। ऐसा ही एक पाकिस्तानी भवनदास सचदेव दस -बारह से रायपुर में रह रहा था। मकान भी खरीद लिया था। अपना व्यवसाय भी कर रहा था। अचानक पोल खुली। पुलिस ने पाक नागरिक केविरुद्ध चार सौ बीसी का मामला दर्ज कर लिया। इसके बाद ही यही सोचा जा रहा है, कि ेेसे न जाने कितने लोग यहाँ होंगे। रायपुर ही नहीं, आसपास भी ऐसे विदेशी होंगे, जो चुपचाप रह रहे हैं। एक अभियान चलना चाहिए, ताकि संद्ग्धि लोग पकड़ में आ सकें।
स्वर्ग है राजधानी सेक्स-माफिया के लिए....
छत्तीसगढ़ में भू माफिया, शराब माफिया, उद्योग माफिया आदि-आदि सक्रिय हैं। एक और माफिया तेजी के साथ पैर पसार रहा है। यह है सेक्स-माफिया। यह माफिया बाहर से लड़कियाँ बुलवाता है और यहाँ के रईसजादों को सप्लाई करता है। ये रईस लोग रायपुर के ही नहीं होते। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से यहाँ आते हैं। पिछले दिनों ऐसे ही एक सेक्स रैकेट का भाँडा फूटा। जम्मू और दिल्ली की लड़कियों के साथ छत्तीसगढ़ के ही दो युवक पकड़ में आए। दलाल फरार हो गया।  पकड़ी गई लड़कियों के पास से अनेक बड़े शहरों की हवाई टिकटे मिली। यानी ये चलती-फिरती देह-मशीनें थी। आज यहाँ तो कल वहाँ। कोई बड़ी बात नहीं, कि ये धनलोलुप लड़कियाँ अपने अभिभावकों से छल करके घूमती रहती हैं। पकड़ में आने पर इनके माता-पिता लज्जित होते हैं। लेकिन आज पैसे कमाने की हवस के कारण पतन इतनी तेजी से फैला है कि कई लोग इस पतन को अपने मौलिक अधिकार की तरह देखने लगे हैं।
गाय मूक है मगर उसकी आँखें बोलती हैं
जन्माष्टमी धूमधाम से मनी। कुछ लोगों ने गायोंकी भी पूजा की। गौ माता की जय के नारे भी लगाए। लेकिन उसी दिन पूरे शहर में दिन के समय और रात को लावारिस-सी गायें घूमती रहीं। इधर-उधर बैठी भी मिलीं। जो गायें सड़कों पर यूँ ही बदहाल घूम रही थीं। उनके पालक भी गौ माता जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। हमारे यहाँ अजीब मानसिकता है। गायों का भरपूर दोहन करेंगे मगर उसकी देखभाल करने में कंजूसी करने लगेंगे। उसे चारा नहीं खिलाएंगे। उसकी सेवा नहीं करेंगे। केवल प्रणाम करेंगे, बस। गोया ऐसा करने से गौ माता प्रसन्न हो जाएगी। गाय मूक प्राणी है मगर उसकी आँखें बोलती हैं। जरा गौर से देखो। उसके आँसू भी बहते हैं।  उसे गोपालक गौर से देखे महसूस करे। जब वह गाय का दूध पीये या उसे बेच कर, उसमें पानी मिला कर कुछ कमाई करे, तो ध्यान रखे कि गाय को कुछ खिलाना-पिलाना भी है। उसे सड़कों पर मत छोड़ो। उसे मैदान में चरने भेजो।

शनिवार, 24 जुलाई 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

अब खेलों में राजनीति नहीं होगी ?
अब ऐसा मान कर चला जा रहा है, कि छत्तीसगढ़ में खेलों के मामले में कोई राजनीति नहीं होगी। यहाँ का ओलंपिक संघ अपने अच्छे कामों के लिए चर्चित भले न रहा हो, गुटबाजी के लिए जरूर कुख्यात रहा है। पदाधिकारी ही एक-दूसरे पर खुलेआम आरोप लगाते रहे हैं। हार कर संघ के लोगों ने तय किया कि अब इस संघ का अध्यक्ष मुख्यमंत्री को ही बना दिया जाए। मान-मनौवल के बाद मुख्यमंत्री राजी हो गए। अब उम्मीद की जाती है, कि सब कुछ ठीकठाक हो जाएगा। संघ के आजीवन संरक्षण विद्याचरण शुक्ल हैं। राजनीति के पुराने खिलाड़ी। उम्मीद की जा सकती है, कि विपरीत विचारधारा वाले दो दिग्गज मिलजुल कर छत्तीसगढ़ की खेल -संस्क ृति को शिखर तक ले जाएँगे। राजनीति में राजनीति उर्फ पॉलिट्किस होती रहती है तो कोई बात नहीं, कम से कम ओलंपिक संघ में यानी खेल में राजनीति न हो। सब यही कामना कर रहे हैं। डॉ. रमन सिंह आ गए हैं, तो यह बात पक्की है, कि वे खेल के मामले में राजनीति से ऊपर उठ कर ही सोचेंगे। वे ऐसा करते भी रहे हैं। उन्हें साफ भी किया है कि वे जितना हो सकेगा, बेहतर करने की कोशिश करेंगे।
क्या बात है, स्वागत है नड्डा जी का
छत्तीसगढ़ में नड्डा यहाँ के लोगों का प्रिय व्यंजन रहा है। चाय के साथ वाय के रूप में नड्डा खाने का प्रचलन रहा है। इसीलिए जब भाजपा ने जगतप्रसाद जी नड्डा को छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाया तो यहाँ के लोगों ने उनका अतिरिक्त उत्साह के साथ स्वागत किया है। लोग यह मान कर चल रहे हैं, कि उनके आने से भाजपा की लोकप्रियता में इजाफा होगा। जैसा पता चला है, कि व सिद्धांतवादी हैं। मिलनसार हैं। उनके प्रभारी बनने से पार्टी को लाभ ही मिलेगा। नड्डा जी यहाँ बहुत जल्दी ही लोकप्रिय हो जाएंगे, क्योंकि उनका सरनेम यहाँ वर्षों से लोकप्रिय है। स्वाद के लिए लोग यहाँ नड्डे का स्वाद चखते रहे हैं। अब भाजपा को नए प्रभारी मिलने के कारण संगठन की दृष्टि से नया स्वाद मिलेगा, पार्टी के लोगों को इसकी आशा है। छत्तीसगढ़ की दो भाजपा नेत्रियों को चंड़ीगढ़ और उत्तरप्रदेश का प्रभार मिला है। इससे एक बात यह भी साफ हुई है, कि यहाँ की स्त्री-शक्ति पर भाजपा ने भरोसा किया है। यह बड़ी बात है।
आखिर हो ही गए निलंबित?
यानी संस्पेंड। जी हाँ, स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी है डॉ. आदिले। उन पर आरोप है, कि उन्होंने जगदलपुर मेडिकल कॉलेज में अपनी लड़की की भर्ती फर्जी तरीके से कराई थी। बहुत दिन से मामला सुर्खियों में था। लोगों को आश्चर्य हो रहा था, कि अब तक इनका निलंबन क्यों नहीं हुआ। लेकिन देर आयद दुरुस्त आयद। आखिर हो ही गए निलंबित। मतलब यह कि गलत काम करने की सजा मिलती ही है। भले ही विलंब हो जाए। अब यह मुहावरा भी गढ़ा जा सकता है, कि सरकार के घर देर हैं अंधेर नहीं। वैसे यहाँ कुछ  सरकारी अफसर ऐसे हैं, जो भर्ती के मामलों में गोलमाल करते रहे हैं। पिछले दिनों फर्जी जाति प्रमाण पत्र के भी कुछ मामले सामने आए। अभी एक पार्षद भी इस लपेटे में आ चुके हैं। उनका हश्र क्या होगा, यह बाद में तय होगा ही।
छेड़ख़ानी की तो खैर नहीं....
राजधानी में जब से नए कप्तान ने कार्यभार संभाला है, पुलिस कुछ ही चुस्त-दुरुस्त न•ार आ रही है। यातायात व्यवस्था कुछ सुधरती तो दीख रही है। अगर यही हाल रहा तो सड़कों पर चलने से तनाव बढऩा कुछ कम हो जाएगा। अब ऐसा हो तो अच्छा है, वरना रायपुर में यह कहावत अकसर चरितार्थ होती है, कि चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात। खैर, अभी जो हो रहा है, उससे शहर सुधर ही रहा है। पिछले दिनों पुलिस ने स्कूलों के प्राचार्यों, समाजसेवियों और जनप्रतिनिधियों की बैठक की और कानून-व्यवस्था की स्थिति बहाल रखने के लिए क्या किया जाए, इस पर चर्चा भी हुई। राजधानी में छेडख़ानी की बढ़ती समस्या पर भी गंभीरता से विचार हुआ। हेल्पलाइन भी शुरू की गई है। उसका नंबर है-1091। उम्मीद की जा सकती है, कि राजधानी की लड़कियाँ, महिलाएँ इस नंबर को कंठस्थ कर लेंगी और जब कभी कोई उन्हें परेशान करने की कोशिश करे, इस नंबर पर शिकायत करके उसको सबक सिखाएँगी। शातिर लोगों के हौसले भी कुछ पस्त तो होंगे ही।
शराब से बड़ा लगाव है ...?
राजधानी में लोग आंदोलन करके शराब दूकानें बंद करवाते हैं मगर होता यह है, कि कुछ दिन बाद वही ढाक के वही तीन पात। यानी दूकानें फिर खुल जाती हैं। अभी पिछले दिनों टिकरापारा में स्कूल के सामने चल रही शराब दूकान को आंदोलन करने के बाद बंद कर दिया गया था। लोग खुश थे कि चलो, स्कूली बच्चों को शराबियों से मुक्ति मिली। लेकिन कुछ दिन बाद शराब दूकान फिर शुरू हो गई? यह बेशर्मी की हद है। इस बेशर्मी के विरु द्ध पार्षद एवं नागरिकों को फिर सड़क पर उतरना पढ़ा। समझ में नहीं आता, कि जब यह पता चल गया है, कि लोग शराब दूकान नहीं चाहते तो ठेकेदार ऐसी गुस्ताखी करता ही क्यों है? क्या उसे किसी का संरक्षण मिल जाता है। परदे के पीछे की कहानी साफ नहीं हो पाती। बहरहाल, स्वागत उस नागरिक चेतना का है जो मरी नहीं है। अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का साहस ही हमें मनुष्य बनाए रखता है।
वाह, पैंतीलीस पुस्तकालय खुलेंगे....
यह एक अच्छी खबर है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत प्रदेश के स्कूलों में अब पुस्तकालय खुलेंगे। पैंतालीस हजार स्कूलों में पुस्तकालय? सोचिए, क्या मंजर होगा। बच्चों को पाठ्य पुस्तक के बाहर भी झाँकने को सुअवसर मिलेगा। आज हिंदी में स्तरीय बाल साहित्य की कोई कमी नहीं लेकिन वह बच्चों तक पहुँच नहीं पा रहा है।  लेकिन पर स्कूल में अगर एक पुस्तकालय खुल जाए तो बाल साहित्य की कमी पूरी हो सकती है। लेकिन इसके लिए एक सावधानी भी बरतने की जरूरत है। बाल साहित्य के नाम पर बहुत कुछ कचरा साहित्य भी परोसा जाता है। इसलिए यह जरूरी है, कि खरीदी के लिए अच्छे जानकार बाल साहित्यकारों की एक टीम भी बनानी चाहिए। उनकी अनुशंसा के आधार पर ही बाल साहित्य खरीदना चाहिए। खैर, ऐसा होगा या नहीं, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन पुस्तकालय खुलने से बच्चों तक कुछ न कुछ सत्साहित्य तो पहुँचेगा ही। इस निर्णयके लिए शिक्षा विभाग की जितनी तारीफ की जाए कम है। 

रविवार, 11 जुलाई 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

छत्तीसगढ़ में घोटाले की सड़क...
निर्माण और घोटाले की पक्की दोस्ती होती है। दोनों साथ-साथ रहते हैं। पीते-खाते हैं। खाते-पीते भी है। राज्य बनने  के बाद यह सिलसिला यहाँ कुछ ज्यादा तेज हुआ है। पहले भोपाल के लोग (यानी नेता, अफसर और ठेकेदार की तिकड़ी)खाते-पीते थे, अब रायपुर में लोग खाते-पीते हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत घटिया सड़कें बनती हैं। मिली-जुली कुश्ती होती है। दिल्ली से आने वाला पैसा कुछ लोगों की जेबों में चला जाता है। घटिया सड़क बनाने के आरोप में कुछ ठेकेदारों को तो काली सूची में डाल दिया गया है, मगर कुछ अफसर साफ-साफ बच निकले हैं। खेल के सूत्रधार तो अफसर भी होते हैं। अकेले अफसर कुछ  नहीं कर सकते। हिस्सेदारी की बात गलत नहीं है। अब कहा जा रहा है, कि जो सड़के घटिया बनी हैं, उन्हें फिर बनाया जाएगा। सड़क फोकट में तो बनेगी नहीं, जाहिर है फिर वहीं चक्कर शुरू होगा। नए ठेकेदार सामने आएंगे। और अगर ईमानदारी से देखभाल नहीं की गई तो फिर घटिया सड़कों पर चलना पड़ेगा।
नक्सलियों से निपटने की तैयारी
यह ऐसी तैयारी नहीं है, कि अब सेना धावा बोल देगी। यह तैयारी है बौद्धिक। यह भी जरूरी काम होता है। 14 जुलाई को दिल्ली में नक्सल समस्या से पीडि़त राज्यों के मुख्यमंत्री केंद्र के साथ मिल-बैठ कर विचार करेगें, कि नक्सलियों से कैसे निबटा जाए। क्या सेना की मदद लें, अद्र्धसैनिक बल और बढ़ाएँ या सिपाहियों को और ज्यादा चुस्त करें। जो भी हो, कोई निर्णायक रणनीति बननी ही चाहिए। क्योंकि इधर अती हो रही है। नक्सलियों का एक नेता आजाद मारा गया है, तब से वे और अधिक बौखला गए है। एक दौर था जब जयपक्राश नारायण और विनोबा भावे जैसे महान नेताओं ने डकैतों का आत्म समर्पण करवा दिया था। आज भी यह काम हो सकता है। लेकिन दुख इस बात का है कि अब वैसे महान लोग हैं नहीं। खादी का कुरता पहन कर इधर-उधर डोलने वाले कुछ लोग संदिघ्ध हो गए हैं। कोई विदेशी मदद से अपना एनजीओ चला रहा है, तो कोई नक्सलियों के पक्ष में खड़ा है। बहरहाल, समझ में नहीं आ रहा, कि किया क्या जाए। लेकिन उम्मीद है, कि दिल्ली की बैठक कोई ठोस नतीजे के साथ खत्म होगी।
राजधानी के किशोर अपराधी
राजधानी में आए दिन लूटपाट, उठाईगीरी और हिंसक वारदातें हो रही हैं। कुछ लोग पकड़ में भी आ रहे हैं। दु:खद बात यह है कि बहुत-से मामले में किशोर और बिल्कुल युवा वर्ग के अपराधी सामने आ रहे हैं। अभी पिछले दिनों कुछ युवक पकड़े गए, इनमें एक राजनीतिक दल के सदस्य भी था। यह चिंतास्पद बात है। और ऐसा नहीं कि यह अभी इनकी संख्या बढ़ गई है। पिछले लंबे अरसे से किशोर-युवा ही पकड़ में आ रहे हैं। ये छोटे-मोटे अपराधी आने वाले समय के बड़े अपराधी हैं। सही शिक्षा का अभाव, नैतिक वातावरण की कमी और घर-परिवार का असर इन लड़कों को गुमराह बना ही देता है। इसलिए जरूरी हो जाता है, कि शालाओं में बच्चों के लिए नैतिक शिक्षा के पाठ जरूरी किए जाएं जो, जो अब लगभग समाप्त-से हो गए हैं।
बारिश में शहर
बारिश आती है और शहर के प्रशासन का असली चेहरा सामने आने लगता है। गड्ढे ही गड्ढे हो जाते हैं और इनमें पानी भरने और उसमें लोगों के धँसने का सिलसिला शुरू हो जाता है। गंदगी और उसके कारण होने वाली बीमारियाँ भी बढ़ जाती हैं। प्रशासन बारिश के पहले बड़े-बड़े वादे करता है, लेकिन वह कुछ कर नहीं पाता। और खामियाजा भुगतना पड़ता है सामान्यजन को। बारिश में शहर कई बार टापू-सा लगने लगता है। अनेक कालोनियों में कीचड़ ही कीचड़ नजर आता है। सूखे हुए तालाबों वाला शहर तालाबों में पट जाता है। जिधर देखो, उधर एक तालाब। दुर्घटनाएँ बढ़ती जाती हैं। शहर में बदबू और बीमारियों का साम्राज्य छाया रहता है। इस बार भी यही हो रहा है। महापौर खुद निकल रही है, नालियों से कचरे निकलवा रही है। लेकिन यह भी सच है कि  कोई कहाँ-कहाँ जाए? आम आदमी भी ग•ाब की शै है। नालियों को चोक आदमी ही करता है। घर का, दूकान का सारा कचरा नालियों में ही डालता है। जाहिर है बरसात में नालियाँ बजबजाने लगती हैं। इसलिए नागरिकों का भी दायित्व है कि वह शहर को साफ रखें। वरना भुगतना उन्हीं को है।
गोवंश को बचाने के लिए साधुवाद..
गौ माता भाजपा गोवंश विकास प्रकोष्ठ के सदस्यों को धन्यवाद दे रही है, जिन्होंने सौ से ज्यादा गायों को कटने से बचा लिया। पिछले दिनों राजधानी और आसपास के कुछ शहरों से गो प्रेमियों ने कत्लखानों के लिए लेजाई जा रही गायों को पकड़ लिया। तस्करों को पुलिस के हवाले भी किया। सच बात तो यह है कि गो वंश की तस्करी का सिलसिला जारी है। कभी-कभार गायें पकड़ में आ जाती है, ये अलग बात है। आए दिन गायों की तस्करी होती रहती है।  चोरी-छिपे गायें भी कटती रहती हैं। राजधानी में भी यह अपराध हाता है। गोवंश विकास प्रकोष्ठ के सदस्यों को सतत निगरानी रखनी चाहिए। संदिग्ध इलाकों में घूम-घूम कर जायजा लेना चाहिए। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो गो वंश कटता ही रहेगा।
लौकी के जूस का डर
पिछले दिनोंदिल्ली के एक वैज्ञानिक की मौत लौकी के जूस पीने से हो गई। रायपुर और छत्तीसगढ़ के लोग भी जागरूक हैं। वे भी लौकी और अन्य फलों के जूस पीते रहते हैं। दिल्ली में हुई मौत के पीछे कारण यह बताया जा रहा है, कि वैज्ञानिक ने जो जूस पीया, वह काफी कड़वा था। वह मर गया और उसकी पत्नी अस्पताल में भरती हो गई। लौकी अगर कड़वी हो तो उसका जूस नहीं पीना चाहिए। दूसरी बात यह भी है, कि आजकल फल-सब्जियों में आक्सीटोसिन का इंजेक्शन भी लगा दिया जाता है। इससेभी स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है। राजधानी में बाजार में बिकने वाली सब्जियाँ भी संद्ग्धि नजर आती है। दरअसल पैसे कमाने की हवस के कारण समाज के कुछ लोग इतना नीचे गिर गए हैं, कि उनके लिए नैतिकता जैसे शब्द बेमानी हो गए हैं। अब लोग ही समझदारी से काम लें और किसी भी फल-सब्जी का जूस सेवन करने से पहले उसकी गुणवत्ता परख लें। बेहतर तो यही है कि लोग बागवानी करें और अपनी जरूरत की फल-सब्जियाँ खुद उगाने की दिशा में भी विचार करें।

शनिवार, 22 मई 2010

ये नक्सलवाद नहीं, ना-अक्लवाद है....

बस्तर में नक्सलवाद का खूनी विस्तार हदें पार कर रहा है। विचारधारा अब हिंसाधारा बनती जा रही है। अब लोग नक्सलवाद को ना-अक्लवाद भी कहने लगे हैं। मासूमों के खून बहाना अक्लमंदी नहीं हो सकती। अपने ही लोगों की हत्याएँ करके हम किसी मुकाम तक नहीं पहुँच सकते। बस्तर में आए दिन हिंसा का तांडव हो रहा है। इसलिए अगर मुख्यमंत्री नक्सलवाद और आतंकवाद को एक ही सिक्के के दो पहलू कहते हैं तो गलत नहीं कहते। अचानक कहीं धमाका करके कुछ लोगों की जाने ले लेना। यही है आतंकवाद। अपनी उपस्थिति का हिंसक अहसास कराना ही आतंकवाद है। ऐसा करके माओवादी अपने प्रति लोगों की सहानुभूति खोते जा रहे हैं। हो सकता है, उनके लक्ष्य ऊँचे हों लेकिन लक्ष्य हासिल करने का रास्ता गलत है। हिंसा केवल हिंसा को जन्म देती है। और यह चक्र चलता रहता है। इस चक्कर में पिस रहे हैं वहाँ के आदिवासी। बेचारे दोनों तरफ से मारे जा रहे हैं। कभी नक्सली इसलिए मार देते हैं, कि इसने पुलिस की मुखबिरी की है, और पुलिस इसलिए मार देती है, कि यह नक्सलियों से मिला हुआ है। इसलिए अब समय आ गया है कि नक्सली ना-अक्ली नहीं अक्ल से काम लें और खून-खराबा बंद करके सरकार से बातचीत करें।
टेंशन-फ्री रमन का मन
और हो भी क्यों न? जब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री साथ हैं। नक्सल मामले में रमन सरकार को केंद्र का समर्थन मिला हुआ है। बस्तर के विकास को लेकर मुख्यमंत्री ने जो कार्य योजना रखी, उसे भी केंद्र से हरी झंडी मिल गई। और क्या चाहिए। अब छत्तीसगढ़ में काँग्रेस बेचारी सोनिया गाँधी को पत्र लिख रही है, राज्यपाल से सीधी कार्रवाई का आग्रह कर रही है, उससे क्या होगा? नक्सल समस्या अब एक राज्य की समस्या नहीं रही, वह देश की समस्या हो गई है। कई राज्य प्रभावित हैं। राज्य सरकार पूरी हिम्मत के साथ नक्सलियों से मुकाबला कर रही है। यह केंद्र भी देख रहा है। प्रदेश काँग्रेस रमन सरकार की लाख निंदा करे, राष्ट्रपति शासन लगाने की माँग करे, उनकी माँग पूरी नहीं हो पाएगी। क्योंकि दिल्ली मुख्यमंत्री केसाथ है। यही कारण है कि  से दिल्ली से लौटने के बाद डॉ. रमन सिंह टेंशन-फ्री नजर आ रहे हैं।
शराब के खिलाफ लामबंद होते लोग...
शराब ने छत्तीसगढ़ को काफी हद तक खराब किया है। आज अधिकांश गाँवों में विद्यालय हों न हों, मदिरालय जरूर मिल जाएंगे। लेकिन यह अच्छी बात है कि कुछ जागरूक लोगों नेछत्तीसगढ़ शराब विरोधी मंच बनाया है। संस्था कुछ अरसे से शराब के विरुद्ध जन जागरण अभियान चला रही है। इस मंच को एक बड़ी सफलता उस वक्त मिली जब इसने सरगाँव के पास स्थित किरना गाँव में खुलने वाली एक शराब फैक्ट्री बंद करवा दी। यहाँ एक कंपनी प्रतिदिन बत्तीस हजार लीटर शराब बनाने का कारखाना खोलने वाली थी। सरकार ने आम सहमति के लिए यहाँ जनसुनवाई रखी। मंच के लोग वहाँ पहले से पहुँच गए और गाँव वालों के साथ मिल कर शराब फैक्ट्री का विरोध किया। शराब फैक्ट्री के लिए प्रतिदिन पचास हजार लीटर पानी खर्च होता। इधर पीने का पानी नहीं, उधर शराब के लिए इतना पानी खर्च हो जाता। गाँव वालों ने दो टूक कहाँ कि गाँव में शराब फैक्ट्री नहीं खुलेगी। यह चेतना हर गाँव में नज़र आए तो कोई बड़ी बात नहीं कि छत्तीसगढ़ में शराब माफियाओं के हौसले पस्त होंगे।
आग लगी तो कुआँ खोदो...?
रायपुर में और अनेक शहरों में यही हो रहा है। भीषण गरमी के कारण पानी का संकट खड़ा हो गया है, तालाब-कुएँ सूख रहे हैं तो लोग जाग रहे हैं। कोई श्रम दान कर रहा है, कोई वाटर हार्वेस्टिंग के लिए रथयात्रा निकाल रहा है। यानी कि जितने कर्मकांड होने चाहिए, वो सब हो रहे हैं। लेकिन वे लोग कहाँ हैं, जिन्होंने विकास के नाम पर हमें विनाश का तोहफा दिया?देखते ही देखते  रायपुर और अनेक शहरों के तालाब पट गए, हरे-भरे पेड़ भी कट गए। कांक्रीट के जंगल उग आए। भू-जल स्तर घटता गया। लेकिन अब भी बहुत कुछ सँवारा जा सकता है। बशर्ते हम लोग मन से काम करें। दिखावा बहुत हो गया है। जरूरी यह है कि शहरों में, गाँवों मे नए तालाब बनें। उनका संरक्षण हो। अधिक से अधिक पेड़ लगें और वे पेड़ भी बचाए जाएँ। ग्लोबल वार्मिंग के इस भयावह दौर में छत्तीसगढ़ को हरितप्रदेश बनाए रखने के लिए केवल गर्मी में ही चिंता नहीं करनी चाहिए, यह हमारे साल भर का एजेंडा होना चाहिए।
गाय की हाय न लें....
गाय को पशु समझ कर बहुत से लोग उस पर गंभीरतापूर्वक ध्यान नहीं देते। छत्तीसगढ़ के अनेक शहरों में गायों की बुरी हालत देखी जा सकती है। जबकि गायको हम लोगों माँ मानते हैं। और वो माँ है। अपनी माँ का दूध हम दो साल तक पीते हैं मगर गौ माता का दूध जीवन भर पीते रहते हैं। लेकिन इस माँ को सड़कों पर बदहाल घूमते देखा जा सकता है। कभी वह किसी कचरे में भोजन तलाशती है तो कभी गली-मोहल्ले की खाक छानती है। लेकिन कुछ गायों के दिन फिरने वाले हैं। विभिन्न सेवाकार्यो में संलग्न राउतपुरा सरकार-आश्रम ने पिछले दिनों यह संकल्प किया कि वह एक हजार गायों को गोद लेगा। ऐसी गायें जो नि:शक्त हो चुकी हैं। यह बड़ी घोषणा है। गौ सेवकों को, गौशालाओं को इस निर्णय से सबक लेना चाहिए। बहुत-से गौ सेवक गायों का दूध पीते हैं, दूध बेचकर कमाई भी करते हैं, लेकिन गायों का ेदेखभाल नहीं करते। उनके लिए बस यही कहा जा सकता, है कि वे गाय से भरपूर आय तो लें, मगर उसकी हाय कतई न लें। वो भारी पड़ सकती है।
विकास में हड़बड़ी न हो...
छत्तीसगढ़ के पूर्व वित्त मंत्री रामचंद्र सिंहदेव के बारे में लोगों को पता है कि वे बेहद ईमानदार और समर्पित बौद्धिक जनप्रतिनिधि हैं। पिछले दिनों रायपुर के एक साहित्यिक कार्यक्रम में उन्होंने बड़ी अच्छी बात की, जिसका दूसरे बौद्धिक लोगों ने भी समर्थन किया। सिंहदेव जी ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में इस्पात संयंत्र आदि लग जाते हैं लेकिन वहाँ के लोग संयंत्र में केवल मजदूरी का काम करते हैं। ऐसा इसलिए कि वहाँ कोई इंजीनियर नहीं होता। इसलिए हमारा दायित्व यह है कि अपने गाँवों में, आदिवासी क्षेत्रों में पहले हम इंजीनियर तो पैदा करें। तब तक वहाँ संयंत्र आदि लगाने का काम स्थगित किया जाना चाहिए।  दिल्ली से आए प्रख्यात चिंतक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने भी सिंहदेव का समर्थन करते हुए कहा कि जब भी विकास की बात होती है तो आदिवासी क्षेत्र को ही उजाडऩे की कोशिश होती है, किसी पॉश इलाके को निशाना क्यों नहीं बनाया जाता। गोष्ठी में मौजूद लोग इस चिंतन से सहमत थे। अब समय आ गया है कि बस्तर या अन्य क्षेत्रों के आदिवासी या ग्रामीण क्षेत्रों में वहीं से अच्छे इंजीनियर तैयार करें ताकि कोई कारखाना लगे तो वहाँ के लोगों की सम्मानजनक भागीदारी बन सके। इस कार्य में समय लग सकता है लेकिन यह न्यायसंगत व्यवस्था ऐसी होगी, जिसके पीछे न तो नफरत होगी और न हिंसा।

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

मुख्यधारा का सवाल

राजधानी में 24-25 अप्रैल को ''अनुसूसिच जनजातियाँ ,कल आज और कल'' विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन हुआ। इसमें देश भर से वे लोग पधारे जिन्होंने जनजातियों पर गहन अध्ययन किया है। कुछ तथाकथित विद्वानों ने जब यह बात उठाई कि अनुसूचित जनजातियों को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोडऩा चाहिए तो उनके इस कथन की बधिया उधेड़ दी गई। शुरुआत तो राज्यपाल महोदय ने ही की। उन्होंने आदिवासी भाइयों की मुख्यधारा को शहरी मुख्यधारा से बेहतर बताया। बाद में कुछ जनजातीय विद्वानों ने इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मुख्यधारा क्या है, जो शहर का भ्रष्ट जीवन है, क्या वह मुख्यधारा है? या फिर मुख्यधारा वह है, जहाँ एक संस्कृति है, परम्परा है, जल-जंगल-जमीन को अपना समझने का संस्कार है? मुख्यधारा में शहरी लोगों को आना चाहिए, जनजातियों को नहीं। और भी अनेक बातें उठी, लगा कि जनजातियों को लेकर अब देश में गंभीर-विमर्श का समय आ गया है। विकास की धारा से उन्हें जोडऩा तो है, लेकिन यह भी ध्यान रखना है, कि वे अपनी जड़ों से ही न काट दिए जाए। यह बात भी सामने आई कि हर क्षेत्र की जनजातियों के अनुरूप ही योजनाएँ बननी चाहिए क्योंकि नागालैंड के आदिवासी की अपनी संस्कृति है, तो बस्तर के आदिवासी की अपनी सांस्कृतिक पहचान है।
दिग्विजय सिंह  पर भड़के मुख्यमंत्री
अनुसूचित जनजातियों पर आयोजित सेमिनार के समापन पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी पहुँचे। उन्होंने बस्तर के नक्सलवाद पर गंभीर विचार विमर्श करते हुए उनके समर्थक बुद्धिजीवियों को जम कर लताड़ा। उन्होंने कहा कि दिल्ली में बैठे ये बुद्धिजीवी अंगरेजी अखबारों में लिखते हैं, अंगरेजी वाले ही इन्हें पढ़ते हैं। असलियत से इनका कोई सरोकार नहीं है। माओवाद इनके लिए एक फैशन की तरह है। मुख्यमंत्री का इशारा मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह  की  ओर था. जिन्होंने एक अंगरेजी समाचार पत्र में नक्सलवाद के बहाने रमन-सरकार को कोसने की कोशिश कि है. आज बस्तर में विकास अवरुद्ध हो गया है, इसके दोषी नक्सली हैं। सड़कें नहीं बन पा रही, स्कूल नष्ट हो गए। सृजन की जगह विध्वंस पनप गया। इन सबको समझने की जरूरत है। मुख्यमंत्री के भाषण से सबको यही लगा कि उन्होंने दिल से अपनी बात कही, जिसमें जनजातियों के विकास न होने की पीड़ा साफ नजर आ रही थी। दिल्ली से पधारे चिंतक इंद्रेशकुमार ने भी जनजातियों के वैभव पर प्रकाश डाला और विस्तारपूर्वक समझा कि किस तरह दूसरे धर्मवालों ने उनके साथ छल किया।
कलेक्टरों को सिर चढ़ाना बंद हो
पिछले दिनों रायपुर के कलेक्टर के खिलाफ काँग्रेसी इतने उत्तेजित हुए कि राज्यपाल को जा कर शिकायत कर दी। कलेक्टर जनता का नौकर है। ये और बात है कि उसे नौकरशाह कह दिया जाता है। यानी नौकर तो है मगर शाही है। शाही होने का मतलब यह नहीं, कि  वह जनप्रतिनिधियों की अवहेलना कर दे। काँग्रेसी कुछ मुद्दों पर कलेक्टर से बात करना चाहते थे, कांग्रेसी समूह में गए थे, तो कलेक्टर ने कलेक्टरी दिखाते हुए फरमाया कि पाँच लोग आ कर चर्चा करें। कांग्रेसियों ने कहा हमारे साथ आए बाकी लोग भी मिलेंगे। कलेक्टर महोदय राजी नहीं हुए तो काँग्रेसी नाराज हो कर लौट गए। राज्यपाल से मिले और शिकायत की। अब राज्यपाल कलेक्टर को बुला कर समझाइश देते हैं, या नहीं, ये अलग बात है लेकिन मुद्दा यह है कि आखिर कलेक्टरों के हौसले इतने बुलंद क्यों रहते हैं। जनप्रतिनिधियों से उसे मिलना ही चाहिए । पाँच हो या पचास। लोकतंत्र में लोक ही ताकत है। लोक के बगैर कुछ नहीं। कलेक्टर कोई राजा-महाराजा तो है नहीं कि उसकी मर्जी चलेगी। दरअसल हमारा सिस्टम ही इतना लचर है, कि हमने कलेक्टर पद को सिर पर चढ़ा कर रखा है। जब तक ऐसा रहेगा, कोई भी कलेक्टर अपनी अकड़ दिखाएगा ही। जरूरत है, सिस्टम में बुनियादी परिवर्तन की। कलेक्टरों को भी यह समझना चाहिए के वे ब्रिटिशकाल में नहीं, स्वतंत्रकल में रह कर नौकरी कर रहे है।
ग्राम सुराज के सबक
ग्राम सुराज का पहला चरण समाप्त हो गया है लेकिन इसने सरकार को सोचने पर भी मजबूर किया है। अगर सरकार सोचे तो। इस बार अनेक जगहों पर सुराज दल का विरोध हुआ। कहीं-कहीं तो अधिकारियों को बंधक ही बना लिया गया।  दरअसल लोग त्रस्त हैं। घोषणाएं होती है, मगर उनको पूरा नहीं किया जाता । मुख्यमंत्री को भी कुछ जगह ग्रामीणों की नाराजगी झेलनी पड़ी। ग्राम सुराज में जो घोषणाएँ होती है, उन्हें निर्धारित समय में ही पूर्ण करना चाहिए, तभी तो गाँव वालों को भी लगेगा, कि सुराज आ गया है। मुख्यमंत्री घोषणा कर के चले जाए और ग्रामीण भाई अफसरों के पीछ-पीछे घूमते रहे, यह नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि के कहे की प्रतिष्ठा होनी चाहिए। अधिकांश अफसर बदमाशी करते हैं। वे सरकार की छवि को नुकसान पहुँचाने के लिए जनप्रतिनिधियों द्वारा की गई घोषणाओं को पूरा करने में जानबूझ कर विलंब करते हैं। इस बार ऐसा न हो। ग्राम सुराज के दौरान ग्रामीणों ने जो मुद्दे उठाए हैं, उन्हें पहली प्राथमिकता के साथ पूरा करना चाहिए।
मंत्रियों-अफसरों की विदेश यात्राओं पर लगाम
ये अच्छा निर्णय लिया मुख्यमंत्री ने । सरकारी खर्चे पर विदेश जाने की परम्परा-सी चल पड़ी थी। विदेश जा रहे हैं, किस लिए विकास का अध्ययन करने। कुछ जनपतिनिधि न तो ठीक से हिंदी बोल पाते हैं,न अंगरेजी, इस कमी को शातिर-चालाक अफसर समझते हैं। वे मंत्री को पटा कर उनके साथ लग जाते हैं। मंत्री की भी ऐश और अफसर की भी। ये लोग विदेश जाते हैं, और राज्य का करोड़ों रुपए स्वाहा कर देते हैं। जरा पता तो किया जाए कि पिछले कुछ वर्षो में विदेश जाने वाले मंत्री-अफसरों ने लौट कर आखिर सरकार को  कोई भावी योजना दी कि हम फलां देश की तरह यहाँ भी ये-ये काम करें? शायद नहीं। विदेश यात्रा का ज्यादातर मतलब करके ऐशोआराम ही होता है। इसलिए मुख्यमंत्री ने समझदारी से काम लिया। अभी सबकी विदेश यात्राएँ बंद। कम से कम तीन साल तो बंद ही रहनी चाहिए।

सुनिए गिरीश पंकज को