बुधवार, 21 सितंबर 2011

सुप्रिया रॉय को आलइंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ने सम्मानित किया.

आलोकजी की याद में पुरस्कार दिया जायेगा

मेरे दिवंगत बड़े भ्राता-तुल्य एक समूची पीढी के आइडियल बन चुके जंगजू पत्रकार आलोक तोमरजी के बारे में अब कुछ भी कहने-लिखने में जो तकलीफ होती रही है उसका बयान भी पीड़ा देता है. इसी साल 20 मार्च को उनके देहावसान के अकस्मात् घावों को भरने में समय लगेगा, यादें ही संबल बनेंगी. यादों के समंदर उफनते व बिछोह की हिलोरें जगाते है.

उनके बारे में आइसना के महासचिव विनय डेविड ने जो मेल भेजा है वह सराहनीय है. स्वागत योग्य है. संगठन के प्रांतीय अध्यक्ष अवधेश भार्गव ने आलोक तोमर की स्मृति में हर साल एक चयनित जांबाज पत्रकार को पच्चीस हजार रुपये का पुरस्कार देने की घोषणा की है. यह घोषणा भोपाल में की गयी जहां आलोकजी की पत्नी सुप्रिया रॉय को आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ने सम्मानित किया.
एक धूमकेतू की तरह हिन्दी बैल्ट पर छा जाने वाले पत्रकार आलोकजी ने अर्श से फर्श तक का सफ़र तय किया और वे गर्दिशों के दौर में भी वे कभी विचलित नही हुए. वे एक जंगजू की तरह पत्रकारिता की जद्दोजहद में जमे और डट कर चुनौतियों से लड़े. लेखक के रूप में आलोकजी एक रोल माडल बन बीमारी के दिनों में भी कीमोथेरेपी कराते हुए भी लिखते . खरा लिखते . तथ्यों के साथ लिखते और आख़िरी के दिनों में उन्होंने बड़े-बड़ों को उधेड़ डाला. सच बोलने के खतरे जिए . कार्टून विवाद में जेल भी गए मगर तन कर खड़े रहे . उनमें जोखिम लेने का जज्बा था. किसी ने लिखा अगर खबर है तो है ,चाहे वो बरखा दत्त हों वीर संघवी हों या उनके अभिन्न मित्र ओमपुरी हों या फिर कोई और. अगर खबर का वो हिस्सा हैं तो आप आलोक जी से पास-ओवर की उम्मीद बिलकुल न करें. वे छाप देते थे डंके की चोट पर. इस दौर में जहां पत्रकारिता की दुनिया बाजारु हो चुकी है, उस दौर में आलोक तोमरजी ने गंभीर सरोकारों वाली पत्रकारिता की. पत्रकारिता को लेकर उनके बारे में उनके शब्दों में ही कहूँ तो दो बार तिहाड़ जेल और कई बार विदेश हो आए और उन्होंने भारत में कश्मीर से ले कर कालाहांडी के सच बता कर लोगों को स्तब्ध भी किया . दिल्ली के एक पुलिस अफसर से पंजा भिडा कर जेल भी गए . झुकना तो सीखा ही नही. वे दाऊद इब्राहीम से भी मिले और सीधी-सपाट बात की जिसे सरेआम छापा. जब उनको एक कार्टून मामले में जेल जाना पड़ा तो साफ़ कहा एक सवाल है आप सब से और अपने आप से। जिस देश में एक अफसर की सनक अभिवक्ति की आजादी पर भी भरी पड़ जाए, जिस मामले में रपट लिखवाने वाले से ले कर सारे गवाह पुलिस वाले हों, जिसकी पड़ताल, 17 जांच अधिकारी करें और फिर भी चार्ज शीट आने में सालों लग जायें, जिसमें एक भी नया सबूत नहीं हो-सिवा एक छपी हुई पत्रिका के-ऐसे मामले में जब एक साथी पूरी व्यवस्था से निरस्त्र या ज्यादा से ज्यादा काठ की तलवारों के साथ लड़ता है तो आप सिर्फ़ तमाशा क्यों देखते हैं?

समर शेष है, नही पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ है, समय लिखेगा, उनका भी अपराध


जनसत्ता में अपनी मार्मिक खबरों से चर्चा में आये आलोक तोमरजी ने सिख दंगों से लेकर कालाहांडी की मौत को इस रूप में सामने रखा कि पढ़नेवालों का दिल हिल गया. कुछ वैसे ही जैसे हर खबर सिर्फ खबर नहीं होती ,कभी कभी ख़बरों को अखबारनवीस जीता भी है उन्हें खाता भी है उन्हें पीता भी है,ख़बरों को जीने वाले ही आलोक तोमर कहलाते हैं. मौत एक दिन सबको आनी है. अन्ना हजारे ने भी कहा है की उनको सुरक्षा नही चाहिए क्योंकि हार्ट अटैक तो कोई नही रोक सकता. आलोक कैंसर से लड़े ,लड़ते शेर ही हैं ,बाकी आत्मसमर्पण कर देते हैं ,एक ऐसे वक्त में जब लड़ने की बात पर है तो सब चाहते हैं इस देश में भगत सिंह पैदा तो हो मगर पड़ोसी के यहाँ हो. इस दौर में आलोक जी का ये जज्बा था कि संघर्ष में वे झुके नही, रुके नही., थके नही, लड़े आन बान शान से और मूल्यों के लिए लड़े. कलम की खातिर लड़े. ख़बरों की खतिर लड़े. पूछा जाए उन सिख परिवारों से जिनको न्याय दिलाने के लिए वे लड़े. जिनके खिलाफ एक शब्द भी लिखने से लोग कतराते थे ,लेकिन आलोक जी ने साहस के साथ उनके बारे में भी लिखा.
आलोक तोमरजी ने सत्रह साल की उम्र में एक छोटे शहर के बड़े अखबार से जिंदगी शुरू की. दिल्ली में जनसत्ता में दिल लगा कर काम किया और अपने संपादक गुरू प्रभाष जोशी के हाथों छह साल में सात पदोन्नतियां पा कर विशेष संवाददाता बन गए। फीचर सेवा शब्दार्थ की स्थापना 1993 में कर दी थी और बाद में इसे समाचार सेवा डेटलाइन इंडिया.कॉम बनाया।
11 मार्च को उन्होंने लिखा
मै डरता हूं कि मुझे
डर क्यो नहीं लगता
जैसे कोई कमजोरी है
निरापद होना..
वे जीवन भर जुझारू रहे.. आइसना (आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन) द्वारा महानतम लेखनी के धनी और हजारों पत्रकारों के प्रेरणा-स्रोत आलोक तोमर की स्मृति में हर साल किसी जांबाज पत्रकार को पच्चीस हजार रुपये का पुरस्कार दिए जाने की घोषणा वंदनीय और अभिनंदनीय है.
संयोजक आलोक मित्र मंच के डी दयाल और मेरी भी राय में भी दरअसल यह घोषणा तो मध्य प्रदेश सरकार को करनी चाहिए जिसे नाज होना चाहिए कि आलोकजी वहां जन्मे और देश-दुनिया में मध्य प्रदेश का मान बढ़ाया. एक तरफ हम यह भी देखते हैं, इंदौर प्रेस क्लब ने भी घोषणा कर दी कि वे लोग हर साल भाषाई महोत्सव में एक यशस्वी पत्रकार को आलोक तोमर की स्मृति में पुरस्कार देंगे ताकि आलोक तोमर के नाम व काम को जिंदा रखा जा सके. इस घोषणा की खबरें भी प्रकाशित हुई मगर आइसना ने कम से कम उनको सच्चे तौर पर याद तो किया है और आशा है आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन इस वायदे को निभाएगा.
                                                                       रमेश शर्मा 
                                                            (यायावर ब्लॉग)

रविवार, 26 जून 2011

छत्तीसगढ़ की डायरी

सामंतीप्रवृत्तिवाले अफसरों का क्या किया जाए..?

छत्तीसगढ़ में सरकार निरंतर बेहतरी के काम करने की काशिशें कर रही है, मगर यहाँ के कुछ अफसर अपनी हरकतों से सरकार की छवि खराब करने की कोशिशों में लगे हैं। हर दूसरा अफसर करोड़ों की कमाई कर रहा है। जिसके यहाँ भी छापे मारो, वह अरबपति निकलता है। यह तो अलग मुद्दा है, इससे भी महत्वपूर्ण है अफसरों का जनता से व्यवहार। बहुत से अफसर जनप्रतिनिधयों को कुछ समझते ही नहीं, उन्हें लगता है वे ही इस व्यवस्था के भाग्यविधाता है। इसलिए उनकी हरकतें भी एकदम सामंती रहती है। हैं तो जनता के नौकर लेकिन आचरण ऐसा करेंगे, कि वे शाह है या राजा-महाराजा है। पिछले दिनों बस्तर में ऐसा ही वाकया देखने को मिला, जब दंतेवाड़ा के कलेक्टर ने दो चपरासियों को संडास में बंद करवा दिया। चपरासियों का कसूर यही था, कि वे अपनी ड्यूटी में विलंब से पहुँचे थे, इस कारण दोपहर के भोजन में विलंब हुआ था। कलेक्टर का गुस्सा जायज था, मगर उन्होंने जो हरकत की, वह यही दर्शाता है कि उन्होंने अपने आप को राजा ही समझ लिया था। आम लोगों का भी यही कहना है  कि ऐसी घटनाएँ तो सामंती दौर में हुआ करता था। लेकिन अब लोकतंत्र है। किसी को भी दंडित करने के भी नियम-कायदे हैं। ऐसी मनमानी नहीं चल सकती कि किसी को सजा देने के लिए संडास में ही बंद कर दिया जाए।
शराबबंदी की दिशा में बढ़ता छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' कहा जाता है लेकिन हालत यह हो गई है कि इसे कुछ लोग 'दारू की बोतल' भी कहने लगे हैं। अनेक गाँव ऐसे हैं, जहाँ स्कूल नजर नहीं आते मगर, दारू की दुकान जरूर मिल जाती है। दो रुपए किलो चावल खा कर और दारू पी कर बहुत से ग्रामीण टुन्न नजर आते हैं। छत्तीसगढ़ की यही स्थिति बनती जडा रही थी। इसे लेकर यहाँ की महिलाओं में गुस्सा था। वे लगातार प्रदर्शन भी करती रही। इन सब का असर अब जाकर हुआ है। पिछले दिनों प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने साफ-साफ कहा कि भले ही हमें राजस्व का नुसकान उठाना पड़े, लेकिन हम शराबबंदी कर के रहेंगे। हालांकि यह काम एकदम से नहीं होगा। धीरे-धीरे होगा, मगर होगा जरूर । वैसे पिछले दिनों सरकार ने निर्णय लेकर 239 शराब दुकानों को तो बंद ही कर दिया है। यह भी निर्णय किया है कि दो हजार से कम आबादी वाले गाँवों में शराब दुकानें नहीं खुलेंगी। सरकार धीरे-धीरे ही सही, अब छत्तीसगढ़ को शराबबंदी की दिशा में ले जा रही है। अगर ऐसा  हो गया तो कोई बड़ी बात नहीं कि देश-दुनिया में छत्तीसगढ़ का एक और खूबसूरत चेहरा सामने आएगा।  शराबबंदी हो जाए तो छत्तीसगढ़ प्रगति के पथ पर और तेजी केसाथ बढ़ेगा, इसमें दो राय नहीं।
पूर्व मुख्यमंत्री जोगी के बेटे की  पिटाई छत्तीसगढ़ हो या अन्य दूसरे कोई प्रांत,हर जगह राजनीति में माफियाओं को बोलबाला है। गुंडे बढ़ रहे हैं। वे लोकतंत्र में जीते हैं तो हैं मगर उन्हें बाहुबल पर ज्यादा यकीन रहता है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ के पूर्वमुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित को मध्यप्रदेश में कुछ गुंडों ने बुरी तरह पीट दिया। वहाँ भाजपा की  सरकार है. अमित प्रदेश हो रहे एक उपचुनाव में प्रचार करने गए थे। दमोह जिले की जबेरा सीट पर उपचुनाव हो रहा है, जहाँ से उनकी ममेरी बहन डा. तान्या चुनाव लड़ रही है। स्वाभाविक था कि अमित बहन के प्रचार के लिए जाते, लेकिन अब राजनीति में सहिष्णुता कम होती जा रही है। हिंसक लोग बढ़ रहे हैं। ये लोग डंडे के सहारे प्रचार करने पर यकीन रखते हैं। हिंसा के कारण अमित की आँखें में गंभीर चोट पहुँची। हाथ भी जख्मी हुआ है। कहते हैं, कि गुंडे लोग स्व. अर्जुन सिंह के बेट अजय सिंह पर हमले की तैयारी में थे। अमित अजय सिंह की कार में सवार थे, इसलिए गलतफहमी में पिट गए। लेकिन इस चक्कर में कुछ भी हो सकता था।
एक राज्य जहाँ पर्चे लीक हो जाते हैं...?
छत्तीसगढ़ शैक्षणिक नक्शे में अभी अपनी जगह नहीं बना सका है। और लगता है शिक्षा माफिया ऐसा होने भी नहीं देगा। पिछले दिनों पीएमटी के पेपर दूसरी लीक होने का मामला सामने आया। पाँच से ले कर बारह लाख रुपयों में ये पर्चे बिके थे। बिलासपुर के पास तखतपुर नामक कस्बे के धर्मशाला में फर्जीवाड़ा चल रहा था. वहाँ छापा मारा गया तो अनेक छात्र-छात्राएँ मिले। इस मामले में कुछ आरोपियों को पकड़ लिया गया है। यह बड़ी सफलता है मगर इन सब कारणों से दूसरे प्रतिभाशाली छात्र प्रभावित होते हैं। पिछले दिनों उस छात्र को पकड़ा गया, जिसने पिछले साल पीएमटी की परीक्षा में टॉप किया था। उसने फर्जी तरीके से परीक्षा दी थी। यानी मुन्नाभाई वाली फिल्म की शूटिंग छत्तीसगढ़ में लगातार चल रही है। व्यावसायिक परीक्षा मंडल की विफलता इस बात का सबूत है कि दाल में काला तो है। विभागीय लोग भी रैकेट में शामिल रहते हैं। प्रश्न यही है कि आखिर वह दिन कब आएगा, जब परीक्षा जैसे मामले में ईमानदारी के साथ काम होगा? फर्जीवाड़ा करके पीएमटी पास करने वाले लड़के कल मेडिकल की पढ़ाई भी फर्जी तरीके से ही करेंगे, और चकमा दे कर निकलते रहेंगे, तो प्रदेश के स्वास्थ्य का क्या अंजाम होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। इसके पहले पीएससी की परीक्षाएँ भी निरंतर खटाई में पड़ती रही है। स्कूलों में पैसे ले कर लोगों को टॉप करने के मामले सामने आ चुके हैं। 
हो गया 'व्हाइट हाउस' का लोकार्पण
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में नगर निगम कार्यालय अब अपने नये भवन में लगेगा। 25 जून को महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल जी ने इसको लोकार्पित किया। वास्तु के लिहाज  से यह भवन नयनाभिराम है। अपनी झक्क सफेदी के कारण लोग इसे 'व्हाइट हाउस' कहने लगे हैं। हालांकि यह शब्द चुभता है मगर अब अँगरेजी बहुत से लोगों की आत्मा का हिस्सा भी बनती जा रही है इसलिए किसी को अटपटा भी नहीं लगता। इसमें अनके तरह की आधुनिक सुविधाएँ भी हैं। वक्त-वक्त की बात है। भाजपा के महापौर सुनील सोनी के समय सेयह भवन बनना शुरू हुआ था, लेकिन जब उनके बैठने का समय आया तो चुनाव हो गया और भाजपा हार गई। निगम पर कांग्रेस का क ब्जा हो गया। महापौर डॉ. किरणमयी नायक को यह सौभाग्य मिला कि वे महापौर के रूप में इस नये भवन में विराजमान हो। राष्ट्रपति के हाथों भवन का शुभारंभ हुआ, यह और गौरव की बात रही। उद्गाटन समारोह में राष्ट्रपति ने बड़ी अच्छी बात कही कि हमें गरीबों को झुग्गीवासियों का हित भी ध्यान में रखना चाहिए। यह बात नगरनिगम के महापौर और पार्षदों को गाँठ  बाँध लेनी चाहिए। लोग यही कह रहे हैं कि जब आदमी महलजीवी हो जाता है तो गरीब उसे चुभने लगते हैं। रायपुर नगर निगम इसका अपवाद बने तो बेहतर होगा।

रविवार, 27 फ़रवरी 2011

छत्तीसगढ़ की डायरी

सबको खुश करने वाला बजट
छत्तीसगढ़ की रमन सरकार का हर कदम इतना सधा हुआ रहता है,कि विपक्ष केवल कोसता ही रह जाता है। कोशिश करता है, कि आलोचना की कुछ गुंजाइश तो निकले लेकिन आमजन खुश तो सरकार गदगद.  चाहे एक-दो रुपया किलो चावल हो या सस्ती दाल। नमक, साइकल, चरणपादुका वितरण आदि अनेक योजनाएँ हैं जिससे आम गरीब आदमी खुश है। अभी २६ फरवरी को रमन सरकार ने अपना सालाना बजट पेश किया। इसमें भी रमन सरकार ने सबको खुश करने का फार्मूला निकाला। क्या किसान और क्या व्यापारी, हर कोई खुश हो गया। किसानों के हित की अनेक घोषणाएँ की तो चेक पोस्ट ही खत्म कर दिया। प्रोफेशनल टेक्स भी समाप्त। गोबर-गोमूत्र से बनी वस्तुओं को कर मुक्त कर दिया। सात और शहरों में पोलिटेक्निक कॉलेज खुलेंगे। बिलासपुर में एक विश्वविद्यालय भी खुलेगा। विकलांगों के लिए भी अनेक लाभकारी घोषणाएँ हुई हैं। बस्तर का भी खास ध्यान रखा है। वहाँ आदिवासियों को मुफ्त में एक किलो चना दिया जाएगा। एक नई हिंदस्वराज पीठ की स्थापना  होगी तो संस्कृत को प्रोत्साहन देने के लिए एक लखटकिया सम्मान भी शुरू करने की घोषणा की गई है। ऐसी अनेक घोषणाएँ की गई है, जिससे सरकार अंत्योदय के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रही है। ऐसी ही रणनीति पर सरकार चलती रही तो वोट बैंक इनके हाथ से भला कैसे फिसल सकता है?  
और इधर काँग्रेसी आपस में भिड़े हैं...
उधर रमन सरकार जनहित पर ध्यान केंद्रित करके लोगों का दिल जीतने में लगी है, वहीं काँग्रेसी बेचारे अभी आपस में ही भिड़े हुए हैं। पिछले दिनों हुए उपचुनाव में काँग्रेस हार गई। संजारी बालोद के उपचुनाव में पराजित प्रत्याशी इस बात से दुखी है कि वह अपने जिन वरिष्ठ नेताओं को चाचा और बाबू कहता था, उनसे पूरा सहयोग नहीं मिला। अजीत जोगी तो चुनाव प्रचार करने ही नहीं गए। जोगी जी ने भी मजेदार बात कही। उन्होंने कहा कि प्रत्याशी मेरे पास आया था, उसने धन माँगा तो उसे धन दे दिया गया। तन-मन का सहयोग मांगा होता तो वह भी दिया जाता। पराजित प्रत्याशी कह रहा है, कि बड़े नेता आपस में भिड़ते रहे और मैं बलि का बकरा बन गया। जो भी हो, इस चुना की पराजय से एक बार फिर काँग्रेस को आत्ममंथन का मौका मिला है, कि वह सोच कि छत्तीसगढ़ में धीरे-धीरे वह हाशिये पर क्यों जा रही है। हर बार की तरह इस उपचुनाव में भी काँग्रेस की आंतरिक गुटबाजी साफ नजर आ रही थी।
फिर शराबबंदी के खिलाफ आंदोलन
छत्तीसगढ़ में शराब की नदियाँ बह रही हैं,कहना गलत न होगा। अधिकांश गाँव और शहर इसकी चपेट में हैं। इसके विरुद्ध आंदोलन भी होते हैं, लेकिन शराब दूकान बंद कराने में सबको पसीना आ जाता है। आंदोलन की इस कड़ी में अब दुर्ग के पास के तीन गाँव जगे हैं। उन्होंने कलेक्टर को ज्ञाापन दिया है और चेताया है कि शराब भट्टी नहीं हटी तो उग्र आंदोलन किया जाएगा। धनोरा-खम्हरिया गाँव के बीच खुली शराब दूकान के कारण क्या महिलाएँ और क्या पुरुष सबका आना-जाना मुश्किल हो गया है। महिलाएँ ज्यादा परेशान न रहती है। और यह सिलसिला दस-पंद्रह वर्षों से चल रहा है। आखिर महिलाओं ने प्रेरित किया तो पुरुष भी उठ खड़े हुए। सरपंच भी जगे। देखना यह है कि अब जनता का प्रतिरोध जीतता है,कि शराब का मुनाफा  
चमत्कार को नमस्कार
इस देश में फरजी लोगों की भरमार है। फरजी तांत्रिक, फरजी भविष्यवक्ता लेकिन कुछ लोग आज भी अपनी सिद्धि के बल पर ऐसा प्रामाणिक प्रदर्शन करते हैं, कि लोगों की श्रद्धा के पात्र बन जाते हैं। पहले रायपुर में और अब राजिम में विराजमान पंडोखर बाबा की बड़ी चर्चा है। उनके पास जो कोई जाता है, प्रसन्न हो कर ही लौटता है। इनके पास पता नहीं क्या सिद्धि है कि एक-एक बात सही बता देते हैं। लोग जो समस्या ले कर उनके पास पहुँचते हैं, वहीं समस्या बाबा के पास पहले से ही कागज पर लिखी हुई रहती है। एक व्यक्ति को उन्होंने बताया कि तुम्हारे ऊपर इतने लाख और इतने रुपए का कर्ज है। वह आदमी चकरा गया। अनेक उदाहरण लोग बता रहे हैं। जो जा रहा है, वह हैरत से भर कर लौटता है। इसका मतलब साफ है, कि कोई न कोई ऐसी विद्या तो है जिसके सहारे कोई व्यक्ति मन की बात को पढ़ लेता है। दुर्भाग्यवश अब पंडोखर बाबा जैसे लोग नहीं के बराबर हैं। 
राजिम कुंभ के बहाने संस्कृति
रायपुर से चालीस किलोमीटर दूर महानदी के तट पर बसा कस्बा राजिम अब पूरे देश में जाना जाता है। यहाँ हर साल कुम्भ भरता है। पहले इस कुंभ शब्द पर अनेक लोगों पर आपत्ति हुआ करती थी,लेकिन धीरे-धीरे कुंभ ऐसा लोकप्रिय हुआ कि अब देश भर के साधु-संत यहाँ आ कर धूनी रमाते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे शुरू किया। वह दिल से सहयोग भी करती है। पूरी व्यवस्था करती है। राजिम कुंभ के बहाने अब यहाँ हर साल सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी होता है। छत्तीसगढ़ के कलाकारों को अपनी कला दिखाने का एक मंच मिल जाता है। बाहर के भी अनेक कलाकार यहाँ आते हैं। इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान से छत्तीसगढ़ की ख्याति दूर-दूर तक फैल रही है। देश की राजधानी दिल्ली तक राजिम कुंभ का प्रचार किया जाता है। उत्तरप्रदेश समेत अन्य राज्यों के अनेक प्रख्यात संत प्रतीक्षा करते हैं, कि कब राजिम कुंभ लगे और वे धूनी रमाने पहुँच जाएँ।
पारिवारिक सहिष्णुता का पतन...
क्या शहर क्या गाँव, आपसी सौहार्द धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। अनेक घटनाएँ इस बात का प्रमाण है। पिछले दिनों राजधानी में एक पति ने पत्नी के चेहरे पर तेजाब फेंक दिया और फिर खुद जहर खा लिया। दोनों की आपस में अनबन थी। सुलह कराने की कोशिशें भी हुई लेकिन आपसी अहम के कारण बात नहीं बनी। दोनों अलग-अलग रहने लगे। पिछले दिनों पति पत्नी के पास पहुँचा और घर चलने का आग्रह किया। पत्नी नहीं मानी तो पति ने गुस्से में आ कर उसपर तेजाब फेंक दिया। अपने आप में यह मूर्खता है, मगर गुस्से में बहुत से लोग तेजाब का सहारा ले लेते हैं। बाद में पति को ग्लानि हुई या पुलिस का भय, उसने भी जहर खा लिया। यह पहली घटना नहीं है, कि इस कालम में चिंता की जा रही है। आए दिन ऐसी घटनाएँ होती रहती है, जिसमें पारिवारिक असहिष्णुता के कारण लोग एक-दूसरे की जान  लेने पर हैं। राजधानी में ही एक पत्नी अपने पति से त्रस्त हो कर अपनी बेटी के साथ रेल से कट मरी। खुद की जान ले ली और और एक मासूम को भी मरने पर मजबूर कर दिया।

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

छत्तीसगढ़ की डायरी

ये छत्तीसगढ़ है... यहाँ तो 
नक्सलियों की 'भी' चलती है..

नक्सलियों ने अठारह दिन पहले जिन पाँच जवानों को अगवा किया था, उन्हें स्वामी अग्निवेश और सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार गौतम नवलखा आदि दो हजार लोगों की उपस्थिति में अंतत: रिहा कर दिया गया। बस्तर के घने जंगलों के बीच एक समारोह हुआ। जहाँ नक्सलियों ने बाजे-गाजे के बीच अगवा पुलिस जवानों को रिहा किया। इस शर्त के साथ, कि जवान पुलिस की नौकरी छोड़ देंगे। हालांकि बाद में इस शर्त का कोई कास असर दिखा नहीं। क्योंकि जवान उम्र के इस पड़ाव में अब नई नौकरी कहाँ से लाएँगे। इस रिहाई के बाद सोचने वाली बात यही है कि छत्तीसगढ़ में सरकार कहाँ है? नक्सलियोंकी ही चलती है। लगता है यहाँ एक तरह से नक्सलियों की ही सरकार चल रही है। सरकारतो मूक दर्शक बनने पर मजबूर हो गई है। यह एक तरह से विफलता ही है लेकिन अभी गेंद नक्सलियों के पाले में है। नक्सलियों को हीरो बनाने वाले स्वामी अग्निवेश की उपस्थिति में नक्सलियों ने जवानों को रिहा करके यह संदेश दे दिया है कि वे सरकार को कुछ नहीं समझते। ये अलग बात है कि मुख्यमंत्री ने नक्सलियों से बातचीत के लिए हामी भरी है, लेकिन क्या नक्सली हथियार छोड़ देंगे? क्या वे मुख्यधारा में शामिल होंगे? अगर ऐेेसा हो सके तो बड़ी बात है लेकिन ऐसा कुछ दीखता नहीं। एक ओर नक्सली अगवा जवानों को रिहा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ हिंसा और तोडफ़ोड़ का खेल भी खेल रहे हैं।
विनाश के विरुद्ध विकास की लड़ाई
नक्सली बस्तर में उत्पात मचाते ही रहते हैं। किसी भवन को उड़ा देना, किसी की हत्या कर देना उनके लिए बाएँ हाथ का खेल है। पाँच अगवा जवानों को छोड़ देने का मतलब यह नहीं है कि उनके भीतर करुणा का उदय हो गया है। इस बहाने मीडिया में वे छाए रहे। पिछले दिनों नक्सलियों ने बस्तर के एक रमणीय स्थल चित्रकोट में स्थित एक पुलिस चौकी को उड़ा दिया, लेकिन सबसे प्रेरक बात यह हुई कि चौबीस घंटे बाद ही चौकी शुरु कर दी गई। जनता ने ध्वस्त चौकी के निर्माण में अपना पसीना बहा दिया। यह घटना इस बात का सबूत है कि अगर विध्वंस अपना काम करता है तो सृजनधर्मी भी पीछे नहीं हटते। बस्तर के आम लोग नक्सलियों की गतिविधियों के पक्षधर नहीं है। इसके पहले भी अनेक गाँवों की महिलाओं एव लोगों ने नक्सलियों के विरुद्ध जुलूस निकाले, प्रदर्शन किए। यह उल्लेखनीय घटना है। आज जब नक्सली भय के पर्याय बन चुके हैं, तब ग्रामीण सामने आकर विध्वंस के विरुद्ध विकास का पसीना बहाते हैं, तो लगता है, कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाले लोग भी जिंदा हैं।
लूट सके तो लूट...
छत्तीसगढ़ सरकार के दो चेहरे सामने आते रहते हैं। एक तरफ वह जनविकास की बात करती है,तो दूसरी तरफ जनता के पैसों से अय्याशी के सामान भी जुटाने में संकोच नहीं करती। फिछले दिनों लोगों को यह जान कर बड़ा अचरज हुआ कि जनता के पैसों से विधायकों एवं मंत्रियों को वाशिंग मशीन, ओवन और डिनर सेट बाँटे गये। ये पैसे सीधे-सीधे जनता के पैसे थे। इनमें किसानों को पैसा था, सिंचाई का पैसा था और सड़क बनाने केलिए जो पैसे आए थे, उन पैसों से विधायकों केलिए उपहार खरीदे गए। सूचना के अधिकार के तहत लोगों ने जो जानकारियाँ हासिल की, उससे ये सब खुलासे हुए। इस पाप में पक्ष और विपक्ष दोनों समान रूप से भागीदार हैं। यानी जनता को लूटने में विपक्ष भी पीछे नहीं है। वैसे बीच यह चर्चा आम है कि विपक्ष बिका-बिका-सा लगता है क्योंकि सरकार के खिलाफ उसके उग्र तेवर नजर ही नहीं आते। एक कवि ने इस लूट पर कुछ इस तरह से तुकबंदी की है
जनता की ही माल है, लूट से तो लूट।
बाद में तू पछताएगा, जब कुरसी जाएगी छूट।।

वेलेंटाइन डे.....
14 फरवरी को वेलेंटाइन डे रहता है। लेकिन लगता है युवा पीढ़ी के कुछ बिगड़ैल प्रतिनिधि रोज वेलेंटाइन डे के ही मूड में रहते हैं। इसीलिए रायपुर, बिलासपुर और भिलाई के कुछ बड़े-बड़े बाग-बगीचों में युवक-युवतियाँ इश्क लड़ाते मिल जाते हैं। पुलिस का या कुछ सामाजिक संगठनों का दबाव न रहे तो ये लोग खुल्मखुल्ला प्यार (?)करने पर उतारू हो जाएँ। पिछले दिनों ऐसे ही कुछ प्यारातुर जोड़ों को राजधानी से तीस किलोमीटर दीर भिलाईनगर की पुलिस ने पकड़ा। एक-दो नहीं, पूरे बीच जोड़े। ये लोग शायद वेलेंटाइन डे का पूर्वाभ्यास कर रहे थेे। इन सबको पुलिस पकड़ कर थाने ले गई। वहाँ इनके माता-पिताओं को बुलाया गया। युवा जोड़ों ने माफी मांगी तब जा कर उन्हें छोड़ा गया। अब इतना सब होने के बाद युवकों ने माता-पिता की इज्जत की कितनी परवाह की, कितनी शर्मिंदगी महसूस की, इसका तो पता नहीं चल सका, लेकिन लोगों को विश्वास है कि ये जिस तरह की हवा बह रही है, उसे देखते हुए तो यही लगता है, कि ये लोग सुधरने से रहे और वेलेंटाइन डे के दिन एक बार फिर छिप कर ही सही, इश्क का इजहार करने से बाज नहीं आएंगे।
पीएससी है कि मजाक...?
छतत्तीसगढ़ बनने के बाद ही यहाँ लोक सेवा आयोग का गठन भी हो गया था। लेकिन इन दस सालों में एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि आयोग ने साफ-सुथरा काम किया हो। हर बार विवाद की नौबत आती रही। कभी रिश्वतखोरी, तो कभी अनियमितता, तो कभी कोई गंभीर त्रुटि। हर बार जब परीक्षा होती है, तो उसके साथ मामला हाईकोर्ट में पहुँच जाता है। कभी विज्ञापन में त्रुटि तो कभी कुछ और। त्रस्त छात्रों ने दो दिन पहले मोमबत्ती जुलूस निकाल कर आयोग के खिलाफ प्रदर्शन किया। छात्रों ने मांग की कि अगर आयोग को चला नहीं सकते तो इस भंग ही कर दिया जाए। अब छत्तीसगढ़ के छात्र परीक्षा देने केलिए मध्यप्रदेश या झारखंड जाने का मन बना रहे हैं। छात्रों का कहना है कि अगर सचमुच गंभीरता के साथ आयोग को संचालित करना है तो इसका एक वार्षिक कैलेंडर बनाया जाए। परीक्षा की तिथि घोषित की जाए। और सबसे बड़ी बाद ऐसे लोगों को बिठाया जाए, जिनमें कुछ समझ हो। अनुभव हो। अनुभवहीनता का ही नतीजा है कि पीएससी की हर परीक्षा विवादास्पद हुई है।

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

छत्तीसगढ़ अब गो-क्रांति की दिशा में

http://epaper.naidunia.com/नई दुनिया, रायपुर के२९-१२-२०१० के अंक में मेरा लेख देखें. गो-क्रांति को अलग तरीके से समझने की कोशिश की है.

शनिवार, 4 सितंबर 2010

हाय, ये बलात्कारी शिक्षक

हाय, ये बलात्कारी शिक्षक.................
शिक्षक दिवस के दिन लोग शिक्षकों की पूजा करते हैं, उनका सम्मान करते हैं। शिक्षक होते भी इस लायक हैं कि उनका आदर किया जाए, लेकिन कभी-कभी कुछ शिक्षक सकलकर्मी यानी कुकर्मी भी निकल जाते हैं। जिनसे उम्मीद करते हैं, कि वे संस्कार देंगे, वे पट्ठे बलात्कार करते हुए पकड़े जाते हैं। भिलाई के ज्ञानदीप स्कूल में एक अज्ञानी शिक्षक का मामला प्रकाश में आया है। यह नीच शिक्षक पाँचवीं कक्षा की एक छात्रा को अपनी वासना का शिकार बनाना चाहता था। उस पर मामला दर्ज हो गया है। अब तो उसे स्कूल से हटा भी दिया गया होगा। दुख की बात यह है कि कुछ शिक्षक गलती से शिक्षा के पेशे में आ जाते हैं। दरअसल उन्हें होना था अपराधी, बनना था माफिया मगर अध्यापक बन गए। मगर मानसिकता वहीं की वही। क्या करें? ऐसे घटिया शिक्षकों के कारण पूरी बिरादरी बदनाम होती है। सचमुच, एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है। ऐसे शिक्षकों को आजीवन जेल में ही सड़ाना चाहिए, ताकि उन्हें हर पल अपनी गलती का अहसास होता रहे।
लहू का रंग एक है....

पिछले दिनों फिर एक घटना प्रकाश में आई, कि एक घायल नक्सली को एक जवान ने अपना खून दिया। यानी उसकी जान ही बचाई। खून देने वाले जवान ने साबित कर दिया, कि मानवता सबसे ऊपर है। वह चाहता तोकून न भी देता। उन नक्सलियोंं को खून क्यों दें, जो बेकसूरों का खून बहाते हैं। यह निर्मम व्यावहारिक सोच है, मगर नैतिकता या जीवन-मूल्य यही कहते हैं, कि मानवता की रक्षा की जाए। हो सकता है, जवान के खून देने के बाद नक्सलियों का मन पसीजे।  वे सोचने पर विवश हों, कि जिनको हम मार डालते हैं, उनके ही लोग हमारे साथी की जान बचाने के लिए रक्तदान करते हैं। लहू का रंग एक हैं। मगर जब लहू की सोच हिंसक हो जाए, तो क्या किया जा सकता है। जवान ने अपना लहू दे कर पुण्य का काम किया है। उसका अभिनंदन होना चाहिए।
सबक है यह पुलिस के लिए..
पुलिस का मतलब यह नहीं है, कि किसी के साथ भी मनमानी कर ली जाए। डंडा हाथ में आने के बाद कुछ लोग रावणत्व के शिकार हो जाते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं, कि लोकतंत्र में कानून नाम की कोई चीज भी है। पुलिसवालों को कानून की रक्षा के लिए डंडा दिया जाता है, लेकिन भाई लोग उस डंडे से किसी का भी सिर फोडऩे लगते हैं। आरपीएफ के प्रभारी समेत सात पुलिस कर्मियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया गया है। हुआ यह कि किसी मामले में एक व्यक्ति को जेल हो गई थी, लेकिन पुलिस चालान नहीं पेश कर पाई। व्यक्ति को जमानत पर रिहा कर दिया गया। लेकिन पुलिस उसे फिर पकड़ कर ले गई। उसे मारा-पीटा। प्रताडि़त किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रट ने मामला दर्ज करने का आदेश दे दिया। शिकार करने वाले लोग खुद शिकार हो गए। प्रताडि़त व्यक्ति को,उसके परिवार को तब संतोष मिलेगा, जब दोषी पुलिस वालों को कड़ी सजा मिलेगी। और मिलेगी ही क्योंकि न्याय के घर देर है, अंधेर नहीं।
छत्तीसगढ़ में घसपैठिए....?
छत्तीसगढ़ ही क्या, पूरा भारत घुसपैठियों का घर बनता जा रहा है। यह एक बड़ी समस्या है, फिलहाल अगर छत्तीसगढ़ की बात करें, तो यहाँ भी बांग्लादेश और पाकिस्तान के लोग घसुपैठ की कोशिश करते रहते हैं। अपने देश से वीजा बना कर आते हैं और भारत में ही रह जाते हैं। क्योंकि यहाँ सुख-शांति है। आराम से अपना धंधा कर सकते हैं। अपने यहाँ भ्रष्टाचार इतना है कि थोड़े से पैसे मिलने के बाद संबंधित अधिकारी किसी भी किस्म का प्रमाणपत्र दे सकता है। ऐसा ही एक पाकिस्तानी भवनदास सचदेव दस -बारह से रायपुर में रह रहा था। मकान भी खरीद लिया था। अपना व्यवसाय भी कर रहा था। अचानक पोल खुली। पुलिस ने पाक नागरिक केविरुद्ध चार सौ बीसी का मामला दर्ज कर लिया। इसके बाद ही यही सोचा जा रहा है, कि ेेसे न जाने कितने लोग यहाँ होंगे। रायपुर ही नहीं, आसपास भी ऐसे विदेशी होंगे, जो चुपचाप रह रहे हैं। एक अभियान चलना चाहिए, ताकि संद्ग्धि लोग पकड़ में आ सकें।
स्वर्ग है राजधानी सेक्स-माफिया के लिए....
छत्तीसगढ़ में भू माफिया, शराब माफिया, उद्योग माफिया आदि-आदि सक्रिय हैं। एक और माफिया तेजी के साथ पैर पसार रहा है। यह है सेक्स-माफिया। यह माफिया बाहर से लड़कियाँ बुलवाता है और यहाँ के रईसजादों को सप्लाई करता है। ये रईस लोग रायपुर के ही नहीं होते। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से यहाँ आते हैं। पिछले दिनों ऐसे ही एक सेक्स रैकेट का भाँडा फूटा। जम्मू और दिल्ली की लड़कियों के साथ छत्तीसगढ़ के ही दो युवक पकड़ में आए। दलाल फरार हो गया।  पकड़ी गई लड़कियों के पास से अनेक बड़े शहरों की हवाई टिकटे मिली। यानी ये चलती-फिरती देह-मशीनें थी। आज यहाँ तो कल वहाँ। कोई बड़ी बात नहीं, कि ये धनलोलुप लड़कियाँ अपने अभिभावकों से छल करके घूमती रहती हैं। पकड़ में आने पर इनके माता-पिता लज्जित होते हैं। लेकिन आज पैसे कमाने की हवस के कारण पतन इतनी तेजी से फैला है कि कई लोग इस पतन को अपने मौलिक अधिकार की तरह देखने लगे हैं।
गाय मूक है मगर उसकी आँखें बोलती हैं
जन्माष्टमी धूमधाम से मनी। कुछ लोगों ने गायोंकी भी पूजा की। गौ माता की जय के नारे भी लगाए। लेकिन उसी दिन पूरे शहर में दिन के समय और रात को लावारिस-सी गायें घूमती रहीं। इधर-उधर बैठी भी मिलीं। जो गायें सड़कों पर यूँ ही बदहाल घूम रही थीं। उनके पालक भी गौ माता जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। हमारे यहाँ अजीब मानसिकता है। गायों का भरपूर दोहन करेंगे मगर उसकी देखभाल करने में कंजूसी करने लगेंगे। उसे चारा नहीं खिलाएंगे। उसकी सेवा नहीं करेंगे। केवल प्रणाम करेंगे, बस। गोया ऐसा करने से गौ माता प्रसन्न हो जाएगी। गाय मूक प्राणी है मगर उसकी आँखें बोलती हैं। जरा गौर से देखो। उसके आँसू भी बहते हैं।  उसे गोपालक गौर से देखे महसूस करे। जब वह गाय का दूध पीये या उसे बेच कर, उसमें पानी मिला कर कुछ कमाई करे, तो ध्यान रखे कि गाय को कुछ खिलाना-पिलाना भी है। उसे सड़कों पर मत छोड़ो। उसे मैदान में चरने भेजो।

शनिवार, 24 जुलाई 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

अब खेलों में राजनीति नहीं होगी ?
अब ऐसा मान कर चला जा रहा है, कि छत्तीसगढ़ में खेलों के मामले में कोई राजनीति नहीं होगी। यहाँ का ओलंपिक संघ अपने अच्छे कामों के लिए चर्चित भले न रहा हो, गुटबाजी के लिए जरूर कुख्यात रहा है। पदाधिकारी ही एक-दूसरे पर खुलेआम आरोप लगाते रहे हैं। हार कर संघ के लोगों ने तय किया कि अब इस संघ का अध्यक्ष मुख्यमंत्री को ही बना दिया जाए। मान-मनौवल के बाद मुख्यमंत्री राजी हो गए। अब उम्मीद की जाती है, कि सब कुछ ठीकठाक हो जाएगा। संघ के आजीवन संरक्षण विद्याचरण शुक्ल हैं। राजनीति के पुराने खिलाड़ी। उम्मीद की जा सकती है, कि विपरीत विचारधारा वाले दो दिग्गज मिलजुल कर छत्तीसगढ़ की खेल -संस्क ृति को शिखर तक ले जाएँगे। राजनीति में राजनीति उर्फ पॉलिट्किस होती रहती है तो कोई बात नहीं, कम से कम ओलंपिक संघ में यानी खेल में राजनीति न हो। सब यही कामना कर रहे हैं। डॉ. रमन सिंह आ गए हैं, तो यह बात पक्की है, कि वे खेल के मामले में राजनीति से ऊपर उठ कर ही सोचेंगे। वे ऐसा करते भी रहे हैं। उन्हें साफ भी किया है कि वे जितना हो सकेगा, बेहतर करने की कोशिश करेंगे।
क्या बात है, स्वागत है नड्डा जी का
छत्तीसगढ़ में नड्डा यहाँ के लोगों का प्रिय व्यंजन रहा है। चाय के साथ वाय के रूप में नड्डा खाने का प्रचलन रहा है। इसीलिए जब भाजपा ने जगतप्रसाद जी नड्डा को छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाया तो यहाँ के लोगों ने उनका अतिरिक्त उत्साह के साथ स्वागत किया है। लोग यह मान कर चल रहे हैं, कि उनके आने से भाजपा की लोकप्रियता में इजाफा होगा। जैसा पता चला है, कि व सिद्धांतवादी हैं। मिलनसार हैं। उनके प्रभारी बनने से पार्टी को लाभ ही मिलेगा। नड्डा जी यहाँ बहुत जल्दी ही लोकप्रिय हो जाएंगे, क्योंकि उनका सरनेम यहाँ वर्षों से लोकप्रिय है। स्वाद के लिए लोग यहाँ नड्डे का स्वाद चखते रहे हैं। अब भाजपा को नए प्रभारी मिलने के कारण संगठन की दृष्टि से नया स्वाद मिलेगा, पार्टी के लोगों को इसकी आशा है। छत्तीसगढ़ की दो भाजपा नेत्रियों को चंड़ीगढ़ और उत्तरप्रदेश का प्रभार मिला है। इससे एक बात यह भी साफ हुई है, कि यहाँ की स्त्री-शक्ति पर भाजपा ने भरोसा किया है। यह बड़ी बात है।
आखिर हो ही गए निलंबित?
यानी संस्पेंड। जी हाँ, स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी है डॉ. आदिले। उन पर आरोप है, कि उन्होंने जगदलपुर मेडिकल कॉलेज में अपनी लड़की की भर्ती फर्जी तरीके से कराई थी। बहुत दिन से मामला सुर्खियों में था। लोगों को आश्चर्य हो रहा था, कि अब तक इनका निलंबन क्यों नहीं हुआ। लेकिन देर आयद दुरुस्त आयद। आखिर हो ही गए निलंबित। मतलब यह कि गलत काम करने की सजा मिलती ही है। भले ही विलंब हो जाए। अब यह मुहावरा भी गढ़ा जा सकता है, कि सरकार के घर देर हैं अंधेर नहीं। वैसे यहाँ कुछ  सरकारी अफसर ऐसे हैं, जो भर्ती के मामलों में गोलमाल करते रहे हैं। पिछले दिनों फर्जी जाति प्रमाण पत्र के भी कुछ मामले सामने आए। अभी एक पार्षद भी इस लपेटे में आ चुके हैं। उनका हश्र क्या होगा, यह बाद में तय होगा ही।
छेड़ख़ानी की तो खैर नहीं....
राजधानी में जब से नए कप्तान ने कार्यभार संभाला है, पुलिस कुछ ही चुस्त-दुरुस्त न•ार आ रही है। यातायात व्यवस्था कुछ सुधरती तो दीख रही है। अगर यही हाल रहा तो सड़कों पर चलने से तनाव बढऩा कुछ कम हो जाएगा। अब ऐसा हो तो अच्छा है, वरना रायपुर में यह कहावत अकसर चरितार्थ होती है, कि चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात। खैर, अभी जो हो रहा है, उससे शहर सुधर ही रहा है। पिछले दिनों पुलिस ने स्कूलों के प्राचार्यों, समाजसेवियों और जनप्रतिनिधियों की बैठक की और कानून-व्यवस्था की स्थिति बहाल रखने के लिए क्या किया जाए, इस पर चर्चा भी हुई। राजधानी में छेडख़ानी की बढ़ती समस्या पर भी गंभीरता से विचार हुआ। हेल्पलाइन भी शुरू की गई है। उसका नंबर है-1091। उम्मीद की जा सकती है, कि राजधानी की लड़कियाँ, महिलाएँ इस नंबर को कंठस्थ कर लेंगी और जब कभी कोई उन्हें परेशान करने की कोशिश करे, इस नंबर पर शिकायत करके उसको सबक सिखाएँगी। शातिर लोगों के हौसले भी कुछ पस्त तो होंगे ही।
शराब से बड़ा लगाव है ...?
राजधानी में लोग आंदोलन करके शराब दूकानें बंद करवाते हैं मगर होता यह है, कि कुछ दिन बाद वही ढाक के वही तीन पात। यानी दूकानें फिर खुल जाती हैं। अभी पिछले दिनों टिकरापारा में स्कूल के सामने चल रही शराब दूकान को आंदोलन करने के बाद बंद कर दिया गया था। लोग खुश थे कि चलो, स्कूली बच्चों को शराबियों से मुक्ति मिली। लेकिन कुछ दिन बाद शराब दूकान फिर शुरू हो गई? यह बेशर्मी की हद है। इस बेशर्मी के विरु द्ध पार्षद एवं नागरिकों को फिर सड़क पर उतरना पढ़ा। समझ में नहीं आता, कि जब यह पता चल गया है, कि लोग शराब दूकान नहीं चाहते तो ठेकेदार ऐसी गुस्ताखी करता ही क्यों है? क्या उसे किसी का संरक्षण मिल जाता है। परदे के पीछे की कहानी साफ नहीं हो पाती। बहरहाल, स्वागत उस नागरिक चेतना का है जो मरी नहीं है। अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का साहस ही हमें मनुष्य बनाए रखता है।
वाह, पैंतीलीस पुस्तकालय खुलेंगे....
यह एक अच्छी खबर है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत प्रदेश के स्कूलों में अब पुस्तकालय खुलेंगे। पैंतालीस हजार स्कूलों में पुस्तकालय? सोचिए, क्या मंजर होगा। बच्चों को पाठ्य पुस्तक के बाहर भी झाँकने को सुअवसर मिलेगा। आज हिंदी में स्तरीय बाल साहित्य की कोई कमी नहीं लेकिन वह बच्चों तक पहुँच नहीं पा रहा है।  लेकिन पर स्कूल में अगर एक पुस्तकालय खुल जाए तो बाल साहित्य की कमी पूरी हो सकती है। लेकिन इसके लिए एक सावधानी भी बरतने की जरूरत है। बाल साहित्य के नाम पर बहुत कुछ कचरा साहित्य भी परोसा जाता है। इसलिए यह जरूरी है, कि खरीदी के लिए अच्छे जानकार बाल साहित्यकारों की एक टीम भी बनानी चाहिए। उनकी अनुशंसा के आधार पर ही बाल साहित्य खरीदना चाहिए। खैर, ऐसा होगा या नहीं, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन पुस्तकालय खुलने से बच्चों तक कुछ न कुछ सत्साहित्य तो पहुँचेगा ही। इस निर्णयके लिए शिक्षा विभाग की जितनी तारीफ की जाए कम है। 

बुधवार, 7 जुलाई 2010

श्रद्धांजलि...

रामशंकर अग्निहोत्री , अब ऐसे लोग कहाँ से लायेंगे?                                                                                       
वरिष्ठतम पत्रकार और लेखक रामशंकर अग्निहोत्री जी का अचानक यूं चला जाना हजारों लोगों को दुःख में  डुबो गया. आज (७ जुलाई) सुबह उनका निधन हो गया. संध्या देवेन्द्रनगर स्थित श्मशान घाट में सैकड़ों लोगो ने उन्हें अश्रुपूरित विदाई दी. उनके अंतिम संस्कार में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री समेत अनेक मंत्री, सांसद एवं विधायक शामिल हुए. उनको अंतिम विदाई देने के लिये मीडिया जगत के भी अनेक नामचीन चेहरे मौजूद थे. 
अभी पाँच दिन पहले की बात है. उनसे मेरी मुलाकात  हुई थी. उन्होंने बताया था, कि  वे राममनोहर लोहिया पर एक पुस्तक सम्पादित कर रहे हैं. मानव अध्ययन शोधपीठ, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर के अध्यक्ष के रूप में वे गाँधी,लोहिया और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के विचारों पर एक बड़ा सेमीनार भी करने की तैयारी में थे. उनका उत्साह देख कर हर कोई दंग रह जाता था. वे पचासी साल के हो चुके थे और  बेहद स्वस्थ और फुर्तीले नज़र आते थे. इस अवस्था में भी किसी युवक की तरह सक्रिय रहते थे. मैंने उनका बहुत नाम सुन रखा था. उनके अनेक राष्ट्रवादी लेख भी इधर-उधर पढ़ता रहता था. लेकिन पिछले  कुछ सालों से उनका रायपुर आना-जाना कुछ बढ़ गया था, इसलिए किसी न किसी  कार्यक्रम में उनसे  भेंट हो जाती थी.
मैंने उन्हें हमेशा एक विनम्र एवं नैतिक व्यक्ति के रूप में ही पाया. वे अनुभव की आंच में तप कर खरे हुए थे. अनेक समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने के बात वे पंडित दीनदयाल उपाध्याय मानव अध्ययन शोधपीठ के अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे थे. आज जब विश्वविद्यालय के कुलपति सच्चिदानंद जोशी से उनके बारें में चर्चा होने लगी, तो उन्होंने बताया, कि  वे विश्वविद्यालय में भी बेहद सक्रिय रहते थे. अखबारों में कोई महत्वपूर्ण खबर छपती थी तो वे कटिंग काट कर सन्दर्भ सामग्री के रूप में सहेज कर रखने लिये हमलोगों को दे दिया करते थे. तीन दिन पहले जब अग्निहोत्री जी अस्पताल में भरती हुए तो कृत्रिम साँस  के लिये उन्हें मास्क लगाया गया था. लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति उन्हें देखने पहुंचता, वे मास्क निकलकर भावी कार्यक्रमों के बारे में बात करने लग जाते थे. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंग, और संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल आदि भी  उन्हें देखने पहुंचे. सभी से उन्होंने कहा, कि अब मै स्वस्थ हो कर फिर सक्रिय होना चाहता हूँ. प्रदेश के मंत्री राजेश मूणत ने चर्चा के दौरान मुझे बताया कि, पिछले दिनों उन्होंने लगा कि उनका स्वास्थय  कुछ ज्यादा खराब हो रहा है, तो उन्होंने कहा था, ''मैं भोपाल जाऊँगा चेकअप कराने'', तो राजेश मूणत ने उनसे कहा, था कि ''वहां क्यों जायेंगे. यही आपका बढ़िया इलाज़ हो जाएगा''. इस पर मुसकरा कर चुप हो गए.
अग्निहोत्री जी भाजपा के थिंक टैंक की तरह थे. इसलिए भाजपा के हर छोटे-बड़े नेता से उनके जावन और आत्मीय सम्बन्ध थे. यही कारण है, कि आज जैसे ही उनके निधन का दुखद समाचार मिला, लोग शोक में डूब गए. उन्हें श्रद्धांजलि देने लगभग पूरा मंत्रिमंडल ही डा. राजेंद्र दुबे के निवास पर उमड़ पडा था. रायपुर में उनका कोई निकट का  रिश्तेदार नहीं था. लेकिन जब मै उनको श्रद्धांजलि देने डा. दुबे के निवास पर पहुंचा तो देख कर दंग रह गया, कि अनेक मंत्री और अनेक महत्वपूर्ण भाजपा नेता वहां मौजूद है, और उनके अंतिम संस्कार की  तैयारियों में व्यस्त है. ऐसा बहुत कम होता है, कि किसी के निधन के बाद इतने लोग एकत्र हों, मगर अग्निहोत्री जी इतने महान व्यक्ति थे, कि उनके अंतिम दर्शन के लिये सैकड़ों लोग लालायित थे. भाजपा के लोग तो खैर थे ही, मेरे जैसे अनेक पत्रकार और अन्य  दूसरे लोग भी पहुँच गए थे. भाजपा के लोगो को उन्होंने बहुत कुछ दिया है, लेकिन हम जैसे पत्रकारों को भी उन्होंने बहत कुछ दिया. आज जब पत्रकारिता अपने मूल्य से गिर रही है, तब अग्निहोत्री जी ने समझाया कि विपरीत स्थितियों में भी खड़े रहना पत्रकार  का कर्तव्य है.
अग्निहोत्री जी  ने आपातकाल और रामजन्‍मभूमि आंदोलन से जुडी खबरों को वैश्विक क्षितिज पर प्रसारित करने में उन्‍होंने उल्‍लेखनीय भूमिका निभाई। शायद इसीलिए वे संघ और भाजपा के चहेते थे. विचारधारा से वे भले ही किसी एक वर्ग के चहेते बन गए थे, मगर उनकी राष्ट्रवादी पत्रकारिता के कारण हम जैसे लोग भी उनसे सीखते रहते थे. छोटो को स्नेह देना, उनकई तारीफ करना कोई अग्निहोत्री जी से सीखे. पिछले दिनों एक कार्यक्रम में मैंने ''दासबोध'' के हिंदी अनुवाद के सौ साल होने पर आयोजित कार्यक्रम में अपने विछार व्यक्त किये थे. अग्निहोत्री जी श्रोता के रूप में सामने विराजमान थे.उनके सामने बोलने में संकोच हो रहा था, फिर भी मैंने  अपनी बात कही. कार्यक्रम के बाद उन्होंने मेरी तारीफ करते हए कहा, कि आज ऐसे ही सोच की ज़रुरत है. इसके पहले भी कुछ अवसरों पर आपने मुझे प्रोत्साहित ही किया. बड़े लोग सचमुच बड़े होते है. मगर सामने वाले को अपने बड़प्पन का अहसास  नहीं होने देते.
पाँच दिन पहले जब उन्होंने मुझसे कहा, कि गाँधी, लोहिया, और दीनदयाल जी पर कार्यक्रम करनाहै, तो मैंने कहा, मेरे पास दीनदयाल जी से सम्बंधित जानकारियाँ नहीं है, तो वे फ़ौरन बोले, एक मिनट रुकिए. फिर वे बाहर गए और कर में रखी एक पुस्तक ले आये.यह पुस्तक दीनदयाल उपाध्याय जी पर केन्द्रित थी. उनका एक उपन्यास अम्बेडकर जी पर है. उसकी तारीफ सुनी है. पढ़ नहीं पाया हूँ. अब पढ़ना चाहूँगा, ताकि उनके औपन्यासिक शिल्प  के भी रूबरू हो सकूं. उनकी कुछ कविताये मैंने पढ़ी है. वे देश के नवनिर्माण में बेचैन रहने वाले राष्ट्रवादी लोगों में थे. अपना तन-मन-धान राष्ट्र की सेवा को समर्पित करने के लिये तैयार रहने वाले. वे अक्सर कहा करते थें कि अब अंतिम साँस तक रायपुर  में रह  कर राष्ट्र की सेवा करना चाहता हूँ. उन्होंने अपना वचन निभाया और रायपुर में ही अंतिम  साँस ली. उनके अवदान-सम्मान की बात करुँ तो श्री अग्निहोत्री 1975 से 1977 तक एकीकृत समाचार न्यूज एजेंसी नई दिल्ली (आपातकाल) के उप समाचार संपादक रहे। वर्ष 1978 से 1980 तक उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार ( महाराष्ट्र-गुजरात ) मुंबई के क्षेत्रीय व्यवस्थापक रहे । 1981 से 1983 तक हिन्दुस्थान समाचार के विशेष संवाददाता के रूपमें  काठमांडूमें भी रहे।  आप  हिन्दुस्थान समाचार, नई दिल्ली के प्रधान संपादक भी रह चुके थे.  श्री अग्निहोत्री 1986 से 1989 तक पांचजन्य साप्ताहिक, दिल्ली के प्रबंध संपादक भी थे.  1989 से 1990 तक श्री राम कार सेवा समिति, सूचना केन्द्र, नई दिल्ली के निदेशक तथा 1992 में श्री रामजन्म भूमि मीडिया सेंटर, रामकोट, अयोध्या के निर्देशक थे। उन्होंने 1991 से 1998 तक मीडिया फोर फीचर्स लखनऊ का प्रकाशन और संपादन किया। वे 1999 से 2002 तक भारतीय जनता पार्टी के केन्द्रीय मीडिया प्रकोष्ठ, नई दिल्ली में रहे। उन्होंने 2002 से 2004 तक मीडिया वाच का संपादन और प्रकाशन किया।सन् २००८ के लिए माणिकचन्द्र वाजपेयी राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार से सम्‍मानित  रामशंकर 14 अप्रैल, 1926 को मध्य प्रदेश के सिवनी मालवा में जन्मे श्री अग्निहोत्री जी ने  सागर विश्वविद्यालय से  बी.ए. करने के बाद उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा प्राप्त किया।  आप 1949 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, महाकौशल के संगठन मंत्री नियुक्त हुए। वे  दैनिक युगधर्म, नागपुर के सह संपादक रहे। सांध्य दैनिक आकाशवाणी (दिल्ली) केभी आप  संपादक रह चुके थे।  कश्मीर सत्याग्रह में भी उनकी अहम् भूमिका थी।  आप पांचजन्य (मध्य भारत संस्करण) के भी संपादक रहे। मासिक राष्ट्रधर्म, लखनऊ का सम्पादन भी आपने किया । युगवार्ता, फीचर्स सर्विस, नई दिल्ली के संपादक थे। 1970 से 1975 तक आप  हिन्दुस्तान समाचार न्यूज एजेंसी के ब्यूरो प्रमुख रहे। 1971 में आप ने एक और जौहर दिखाया. आपने युद्ध-संवाददाता के रूप में भी कार्य कर अपनी जांबाजी का परिचय दिया था. आप 2004 में हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी संवाद समिति के अध्यक्ष रहे।
एक साहित्यकार  के रूप में उनके अवदान को देखें तो उन्होंने बहुत अधिक रचनाएँ भले ही न की हों,   लेकिन उन्होंने जितना लिखा, उत्कृष्ट ही लिखा. उनका एकमात्र काव्य संग्रह सत्यम एकमेव काफी चर्चित रहा है। अम्बेडकर परकेन्द्रित  उपन्यास ''मसीहा'  को पढ़ चुके लोगो का मानना है, कि किसी व्यक्ति के जीवन पर केन्द्रित ऐसे उपन्यास कम ही देखने में आते है. अनेक  देशों का भ्रमण कर चुके अग्निहोत्री जी को  इन्द्रप्रस्थ साहित्य भारती द्वारा डा. नगेन्द्र पुरस्कार, राष्ट्रीय पत्रकारिता कल्याण न्यास द्वारा स्व. बापूराव लेले स्मृत्ति पत्रकारिता पुरस्कार तथा माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान भोपाल द्वारा लाला बलदेव सिंह सम्मान प्रदान किया गया था. श्री अग्निहोत्री एक तरह से एकांत साहित्य साधक थे और एकनिष्ठ पत्रकार थे. उनके अनेक शिष्य आज पत्रकारिता जगत में अपना डंका बजा रहे है. उनके साथ के लोगों के उनके निधन पर गहरा दुःख हुआ. देश के कोने-कोने में उनके चाहने वाले आज फोन कर-कर के सम्बंधित जनों से बातें करते रहे. शवयात्रा में मंत्रीमंडल के अनेक लोग शामिल हुए. श्मशानघाट में मुख्यमंत्री  भी पहुँच गए थे. सब ग़मगीन थे. उन सबके बीच से ऐसा व्यक्ति चला गया  था, जिसके जाने की कोई उम्मीद ही नहीं थी. सब इस बात को लेकर भी दुखी थें कि उनको सही वैचारिक राह अब कौन दिखाएगा. पत्रकारिता की नैतिक मूल्य की परम्परा अब ख़त्म हो रही है, लेकिन जब मै अग्निहोत्री जी को देखता तो सुकून मिलता था, संतोष होता था, कि एक परम्परा अभी ज़िंदा है. आज वे हमारे बीच नहीं है, उनके जाने के बाद चिंता हो रही है, कि अब ऐसे लोग हम कहाँ से लायेंगे, जो बरगद होते हुए भी पौधों को पनपने का मौका देते  थे.

सोमवार, 24 मई 2010

''हिन्द स्वराज'' के बहाने इस नए बनते समाज पर चर्चा

कुंवारियों के माँ बनने की रफ्तार बढ़ी है, अगर यही 
नयी सभ्यता है तो मुझे कुछ भी नहीं कहना
''हिन्द स्वराज'' का हर पाठ हमें नित नए अर्थ-लोक तक ले जाता है। ''हिंद स्वराज'' की शताब्दी केवल एक पुस्तक की शताब्दी (२००९) ख़त्म होने के बाद भी उस पर चर्चा होती रहे. 'हिंद स्वराज' के विचार अभी भी व्यवहार में नहीं उतर पाए हैं। जब हम गाँधी जी के हिंद स्वराज में वर्णित सभ्यता को समझ सकेंगे, तभी हम महामानवता के स्वप्न को भी साकार कर सकेंगे।गाँधीजी का यह लघु-कृति एक शताब्दी के बाद भी विचारों का जो बड़ा शिखर रचती है, वह चमत्कृत करने वाला है। मैं कह सकता हूँ, कि नए भारत के पुनर्निर्माण के लिए जो आधुनिक चिंतन पिछली शताब्दी में शुरू हुए, ''हिन्द स्वराज'' उनका प्रस्थान बिंदु है। बीसवीं सदी में जब भारत गुलामी का दंश झेल रहा था और आजादी के संघर्षरत था, तब गाँधी जी मानों एक नए अवतार की तरह भारत आते हैं और यह बताने-समझाने की कोशिश करते हैं, कि हमारा देश आजाद कैसे हो और आजा़द भारत का स्वरूप कैसा हो। गाँधीजी केवल स्वतंत्रता नहीं चाहते थे, वरन ऐसा समाज भी चाहते थे जहाँ सभ्यता हो, स्वदेशीपन हो, जहाँ अपनी भाषा-बोली की प्रतिष्ठा हो, जहाँ मनुष्य यंत्रों का गुलाम न बन कर श्रम के सम्मान के लिए प्रतिबद्ध रहे। वर्तमान यांत्रिक सभ्यता और तद्जनित पतन को देखते हुए साफ लगता है, कि हिंद में गाँधी का स्वराज्य पराजित हो रहा है और आधुनिकता की अंधी दौड़ में पश्चिम से प्रभावित नया इंडिया भारत या हिंदुस्तान को पीछे छोड़ता चला जा रहा है।
हिंद स्वराज्य की अधिकांश बातें समकालीन निकष पर सौ टंच खरी उतर रही हैं। आज भी अगर हम गाँधीजी के हिंद स्वराज्य की बातों पर चल सकें तो पुनर्निमाण की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है। हिंद स्वराज्य के बीस अध्याय मुझे आधनिक विचारों की गीता बीस अध्याय सरीखे लगते हैं। इन्हें आत्मसात करके ही भारत भारत बन सकता है लेकिन अब जैसे अधिकांश जीवन-मूल्य, नैतिकता, परम्पराएँ बहिष्कृत-सी होती जा रही हैं। ठीक उसी तरह गाँधी को भी अप्रासंगिक करार देने की साजिशें हो रही है। अपने काल से काफी आगे की प्रगतिशील सोच रखने वाले गाँधी के बगैर भारत सच्चा विकास नहीं कर सकता। गाँधी के बगैर बढऩा आतमघाती कदम हो सकता है।'
हिन्द स्वराज' के बारे में गाँधी पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं, कि  ''यह पुस्तक द्वेष धर्म की जगह प्रेम सिखाती है, हिंसा की जगह आत्म बलिदान को रखती है। पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है।''आज गाँधी की इन्हीं बातों को अमल में लाने की जरूरत है। फिर चाहे वह यंत्रोन्मुखी होने का मसला हो, राष्ट्रभाषा का सवाल हो, गो हत्या का मामला हो या हिंदू-मस्लिम एकता का प्रश्न। जब तक समाज आत्म बलिदान के लिए प्रवृत्त नहीं होगा, ऐसे तमाम मुद्दों पर सफलता नहीं मिल सकती जो हमारी अस्मिता के पर्याय हैं। यांत्रिक सभ्यता से ग्रस्त समाज निर्मम-मन का स्वामी हो जाता है। वह करुणाविहीन हो कर स्वार्थसिद्धि के लिए हिंसा का, छल का, लूट का, बलात्कार का यानी कि हर अनैतिक कार्यों का सहारा लेता है जो कि किसी भी शिष्ट समाज के विरुद्ध नज़र आते हैं। सौ साल पहले गाँधी जी जिन तमाम मुद्दों पर हिंद स्वराज्य में गंभीरतापूर्वक विमर्श किया है, वे तमाम मुद्दे अब और गहनतम होते गए हैं। इन पर सोचने-विचारने और बेहतर समाज कैसे बन सके, इस पर ही चिंतन की जरूरत है।
आजकल जिस यांत्रिक सभ्यता का एक तरह से (चलताऊ जुमले में कहूँ, तो)जो 'बूम' नजर आ रहा है, और जिसके कारण नैतिकता हाशिये पर दम तोड़ रही है, उसकी जालिम पदचाप तो गाँधी ने सौ साल पहले ही सुन ली थी। इसीलिए तो उन्होंने मशीनों पर आश्रित होने की बढ़ती ललक पर जो तल्ख टिप्पणियाँ की हैं, वे आज सार्थक हो रही हैं। कपड़ा मिलों के बढ़ते दुष्प्रभाव आज हमारे सामने हैं। खादी जो कभी वस्त्र नहीं विचार था, अंगरेजों से लडऩे का कारगर हथियार था, आज कहाँ हैं? सरकारें तक खादी की उपेक्षा कर रही हैं। गाँधी जी ने उस वक्त भारतीयों की मानसिकता समझ ली थी इसीलिए उन्होंने कहा था, कि  ''मिल मालिक यकायक मिलें छोड़ दें, यह मुमकिन नहीं है लेकिन हम उनसे ऐसी विनती कर सकते हैं कि वे अपने इस साहस को बढ़ाएँ नहीं। अगर वे देश का भला चाहें तो खुद अपना काम धीरे-धीरे कम कर सकते हैं। वे ''खुद पुराने, प्रौढ़ पवित्र चरखे देश के हजारों घरों में दाखिल कर सकते हैं और लोगों का बुना कपड़ा लेकर उसे बेच सकते हैं।''
आज मिलें तो स्वदेशी हैं, लेकिन हमारी मानसिकता विदेशी हो गई है। जो खादी घर-घर में तैयार होती थी, जो चरखा पूजा की थाल से कम नहीं माना जाता घ्था, जिस चरखे की आवाज मंत्र सरीखी प्रतीत होती थी, वह चरखा कहाँ है? खादी अब खद्दर बन कर बुजुर्गों की तरह घर से निकाल बाहर कर दी गई है। गाँधी के देश में खादी की इतनी दुर्गति की कल्पना खुद गाँधी जी ने उस वक्त नहीं की होगी। इसका एक कारण है यांत्रिकता के प्रति हमारी गहरी अनुरक्ति। मिलों के बने चिकने कपड़ें के बरअक्स खादी की हालत ऐसी हो गई है, जैसे किसी अर्धवसना आधुनिका के सामने सिर पर पल्लू लेने वाली ठेठ भारतीयता की प्रतीक कोई संस्कारित नारी। ऐसी नारियों की ओर अब देखता ही कौन है? अब तो नग्नता ही प्रगतिशीलता है। ऐसी मानसिकता के कारण चरखे से उपजी खादी-गंगा मैली हो कर लुप्त होती जा रही है। खादी की दुर्गति यांत्रिक सभ्यता का ही दुष्परिणाम है। अगर गाँवों को खुशहाल रखना है तो हमें यंत्रजनित उत्पादों की जगह कुटीर उद्योगों एवं हस्तशिल्पों को बढ़वा देना होगा। हमारे गाँव तो वैसे भी तबाह हो रहे हैं। डायनासोर बनते जा रहे शहर गाँवों को निगलते जा रहे हैं। ऐसे संक्रमण-काल में गाँधी जी का स्वदेशी-चिंतन ही भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तार-तार होने से बचा सकता है।
गाँधीजी अगर यांत्रिक सभ्यता के विरुद्ध थे तो इसका मतलब यह नहीं कि वे विकास विरोधी थे। दरअसल वे विकास को ग्रामीण अर्थशास्त्र से जोड़कर देखते थे। हिंद स्वराज्य को बहुत से तथाकथित विचारक अब तक ठीक से समझ ही नहीं सके हैं। या तो उन्होंने हिंद स्वराज्य को सरसरी तौर पर ही पढ़ा है, अथवा वे जानबूझ कर गाँधी के विचारों को नकार रहे हैं। यह संतोष की बात है कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से लेकर नोबेल पुरस्कार विजेता भारतीय अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन जैसे अनके लोग हैं, जो गाँधी के विचारों का आदर करते हैं। अमत्र्य सेन ने हिंद स्वराज्य की तमाम बातों से अपनी सहमति जताई है।
यंत्रों के बारे गाँधी जी के विचारों को पढऩे के बाद जब रामचंद्रन ने उनसे पूछा था कि 'क्या आप तमाम यंत्रों के खिलाफ हैं'', तो गाँधी जी ने मुस्कराते हुए कहा था, कि ''वैसा मैं कैसे हो सकता हूँ, जब मैं जानता हूँ कि यह शरीर भी एक बहुत नाजुक यंत्र ही है। खुद चरखा एक यंत्र है, छोटी दाँत कुरेदनी भी यंत्र है।'' गाँधी जी यहाँ बिल्कुल साफ कर दिया कि  'मेरा विरोध यंत्रों से नहीं है बल्कि यंत्रों के पीछे जो पागलपन चल रहा है, उसके लिए हैं। आज तो जिन्हें मेहनत बचाने वाले यंत्र कहते हैं, उनके पीछे लोग पागल हो गए हैं। उनसे मेहनत जरूर बचती है लेकिन लाखों लोग बेकार हो कर भूखों मरते हुए रास्तों पर भटकते हैं। समय और श्रम की बचत तो मैं भी चाहता हूँ  परंतु वह किसी खास वर्ग की नहीं, बल्कि सारी मानव जाति की होनी चाहिए। कुछ गिने-चुने लोगों के पास संपत्ति जमा हो ऐसा नहीं, बल्कि सबके पास जमा हो, ऐसा मैं चाहता हूँ। आज तो करोड़ों की गरदन पर कुछ लोग सवार हो जाने में यंत्र मददगार हो रहे हैं। यंत्रों के उपयोग के पीछे जो प्रेरक कारण है, वह श्रम की बचत नहीं है बरन धन का लोभ है। आज की चालू अर्थव्यवस्था के खिलाफ मैं अपनी ताकत लगा कर युद्ध चला रहा हूँ।'' गाँधी जी का यह कथन बताता है कि वे यंत्रों के खिलाफ नहीं थे लेकिन यंत्रों के पीछे छिपे षडयंत्रों के खिलाफ जरूर थे। वे तब समझ चुके थे कि यंत्र चंद लोगों के शोषण के औजार और विलासता के विकास के उपकरण बन चुके हैं। अगर यही रफ्तार रही तो भविष्य में मेहनतकश समाज के भविष्य पर प्रश्नच्न्हि लग जाएगा।
हिन्द स्वराज  को ध्यान से पढ़ें । यंत्रों के उपयोग का पीछे की मानसिकता पर बापू कहते हैं कि  ''मैं इतना जोडऩा चाहता हूँ, कि सबसे पहले यंत्रों की खोज और विज्ञान लोभ के साधन नहीं रहने चाहिए। फिर मजदूरों से उनकी ताकत से ज्यादा काम नहीं लिया जाएगा और यंत्र रुकावट बनने की बजाय मददगार हो जाएँगे। मेरा उद्देश्य तमाम यंत्रों का नाश करने का नहीं है बल्कि उनकी हद बाँधने का है।'' गाँधी जी ने अपनी बात को और साफ करते हुए कहा, कि  ''हम जो कुछ भी करें, उसमें मुख्य विचार इंसान के भले का होना चाहिए। ऐसे यंत्र नहीं होने चाहिए जो काम न रहने के कारण आदमी के अंंगों को जड़ और बेकार बना दे। इसीलिए यंत्रों को मुझे परखना होगा। जैसे सिंगर की सीने की मशीन का मैं स्वागत करूँगा। आज की सब खोजों में जो बहुत काम की थोड़ी खोजें हैं, उनमें से यह सीने की मशीन है। इस मशीन की खोज के पीछे मनुष्य की जो करुणा की भावना है, उसके बारे में भी गाँधी जी ने घटना बताई कि सिंगर ने अपनी पत्नी का सीने और बखिया लगाने का उकताने वाला काम देखा। पत्नी के प्रति उसके प्रेम ने गैर जरूरी मेहनत से उसे बचाने के लिए मशीन बनाने की प्रेरणा दी। ऐसी खोज करके उसने न सिर्फ अपनी पत्नी का ही श्रम बचाया, बल्कि जो भी ऐसी मशीन खरीद सकते हैं उन सबको हाथ से सीने के उबाने वाले श्रम से छुड़ाया। इस उदाहरण से तो बिल्कुल साफ हो जाता है कि गाँधी मशीनों के कतई खिलाफ नहीं थे। इसलिए गाँधी को यंत्र विरोधी करार देने की भूल नहीं की जानी चाहिए।
हिंद स्वराज्य में गाँधी जी ने सभ्यता के मसले पर भी लिखा है। वे उस सभ्यता के विरोधी थे जो मनुष्य को निर्मम बनाती है। इस इक्कीसवीं सदी की हालत क्या है? यांत्रिकता ने हमें पूरी तरह से यंत्रवत ही बना कर रख दिया है। रोबोट होते जा रहे हैं लोग। यंत्रों में संवेदनाएँ नहीं होतीं। यंत्र यंत्र होते हैं। बटन या प्रोग्रामिंग से चलते हैं। यंत्र में तब्दील मनुष्य की संवेदनाएँ क्षरित होती जा रही हैं। यही कारण है कि आज सुदूर गाँवों में बड़े-बड़े कल-कारखाने लगाए जा रहे हैं तो वहाँ के माटी पुत्रों को बेदखल किया जा रहा है। उनको चालाकी के साथ या फिर डंडे-गोलियों का भय दिखा कर भगाया जा रहा है। खून से सनी मिट्टी में यंत्र लगाए जा रहे हैं। धन पिपासुओं के आगे समूची व्यवस्था जैसे घुटने टेकने पर विवश है। विकास की आड़ में आदिवासी या ग्रामीण उजड़ते जा रहे हैं। यही है निर्मम यांत्रिक सभ्यता जिसके विरोध में गाँधी सौ साल पहले खड़े थे, और हिंद स्वराज्य के माध्यम से आज भी खड़े हैं और शायद कल भी खड़े रहेंगे। सौ साल पहले कहा गया गाँधी का कथन जैसे लगता है कि आजकल में ही कहा गया है, कि  ''धन के पीछे आज जो पागल दौड़ चल रही है, वह रुकनी चाहिए। मजदूरों को सिर्फ अच्छी रोजी मिले, इतना ही बस नहीं है। उनसे हो सके, ऐसा काम उन्हें रोज मिलना चाहिए। ऐसी हालत में यंत्र जितना सरकार को या उसके मालिक को लाभ पहुँचाएगा, उतना ही लाभ उसके चलाने वाले मजदूरों को भी पहुँचाएगा। मेरी कल्पना में यंत्रों के बारे में कुछ अपवाद हैं उनमें यह है। सिंगर मशीन के पीछे प्रेम था इसमें मानव-सुख का विचार मुख्य था।''
यंत्रों में कोई बुराई नहीं है, यांत्रिकता बुरी है। जड़ में विकास है लेकिन जड़ता में अवरोध है। प्यार अच्छी चीज है, लेकिन मोह गलत है। विश्वास और श्रद्धा का सम्मान होना चाहिए लेकिन अंधविश्वास और अंधश्रद्धा उचित नहीं। यह विवेकहीनता है। गाँधी मनुष्य का विवेक जागृत करने का काम करते हैं। उनकी दृष्टि व्यापक है। वे सर्वजन हिताय सोचते थे। वंचितों को उन्होंने गले लगाने की कोशिश की। समाज में एक वातावरण बनाया। दलितों को उन्होंने हरि का जन कहा लेकिन हमारी मानसिकता ने गाँधी के महान अलंकरण में भी खोट देख लिया। वह अलंकरण ही प्रतिबंंधित कर दिया गया। यही कट्टरता है। यांत्रिकता से उपजी विचारशून्य सभ्यता है। गाँधी जी ऐसी कट्टरता के विरुद्ध थे। यांत्रिक सभ्यता कट्टरवाद को भी जन्म देती है। गाँधी को न समझ पाने वाला एक वर्ग आज भी नफरत से भरा हुआ है। वैचारिक अलगाव भारतीय-जीवन के केंद्र-सा बनता जा रहा है। गाँधी को गरियाने वाले आज भी मिल जाते हैं। इनमें अधिकतर वे लोग हैं जिनके जीवन में गाँधी-सा न कोई त्याग है, न कर्म। ये लोग का-पी कर अघाए हुए तथाकथित सभ्य लोग हैं, जो न तो समाज के बारे में सोचते हैं, न देश के बारे में। वे अपनी-अपनी सीमित अस्मिताओं के लिए लड़ते रहते हैं, बस। अगर हम यांत्रिक सभ्यता के शिकार न होते तो चिंतनशील होते, प्रेम-अहिंसा जैसे मानवीय-गुणधर्मों से लबरेज होते। देश में धार्मिक या जातीय-विद्वेष इतनी तेजी से नहीं फैलता। राष्ट्रभाषा और क्षेत्र को लेकर संकुचित दृष्टि भी इतना विकराल रूप धारण न करती। यांत्रिक सोच की दुखद परिणति ही है कि आज भारत की जगह हर तरफ इंडिया ही इंडिया नजर आने लगा है। हिंद स्वराज्य के  'स्वराज्य क्या है' नामक अध्याय में  गाँधी जी ने व्यंग्य करते हुए कहा है कि  ''हमें अंगरेजी राज्य तो चाहिए, पर अंगरेजों का शासन नहीं चाहिए। आप बाघ का स्वभाव तो चाहते हैं लेकिन बाघ नहीं चाहते। मतलब यह हुआ कि आप हिंदुस्तान को अंगरेज बनाना चाहते हैं और हिंदुस्तान जब अंगरेज बन जाएगा तब वह हिंदुस्तान नहीं कहा जाएगा। यह मेरी कल्पना का स्वराज्य नहीं है।'' सचमुच गाँधी की कल्पना का स्वराज्यअभी तक नहीं आ पाया है। आज अंगरेज तो नहीं है लेकिन सत्ता में बैठे लोग अंगरेजों के पिताश्री हैं। उनकी मानसिकता अंगरेजी है। वे अंगरेजी में सोचते हैं, अंगरेजी में लिखते-पढ़ते हैं, बोलते हैं और अँगरेजी में ही खाते-पीते हैं इसलिए उनका चरित्र आज भी अंगरेजियत से भरा है। वे राष्ट्रविरोधी हैं। सामंती है, मगरूर हैं, हिंसक है। प्रतिरोध में उठी आवाजें इन्हें पसंद नहीं, जैसे अंगरेजों को नहीं थीं। बड़ा आश्चर्य है कि फिर भी ये लोग अपने को सभ्य कहते हैं। अगर यह देश गाँधी जी के हिंद स्वराज्य को समझ कर अपनी नीतियाँ बनाता और उस पर अमल कर लेता तो देश में राजराज्य होता, इतनी सरकारी हिंसा भी नहीं होती। दिमाग के यंत्रवत कार्य करने के कारण ही करुणा और अहिंसा जैसी बुनियादी चरित्र से शासन से दिनोदिन दूर होता गया। तंत्र ने लोक को लोक नहीं समझा। यह सब गाँधीवाद के विरुद्ध है।
गाँधी जी ने इग्लैंड की पार्लियामेंट को बाँझ और वेश्या कहा था। बाद में उन्होंने  'वेश्या'' शब्द को विलोपित कर दिया था लेकिन उनका आरोप सही था। आज भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी ये दोनों शब्द अप्रासंगिक नही हैं। हमारी संसद जनहित में अनेक निर्णय तो करती है लेकिन वे कार्यरूप में परिणत नही हो पाते। पार्लियामेंट में अब जैसे लोग चुनकर जा रहे हैं, उसे देख कर हैरत होती है। अब आम आदमी संसद नही पहुँच सकता। या तो वंश-परंपरा से आने वाले लोग पहुँचते हैं या फिर करोड़पति-अरबपति। ब्रिटिश पार्लियामेंट के बारे में गाँधी जी ने लिखा था कि 'जितना समय और पैसा पार्लियामेंट खर्च करती है, उतना समय और पैसा अगर लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाए। ब्रिटिश पार्लियामेंट महज प्रजा का खिलौना है।' आज भी कमोबेश वही हालत है। पार्लियामेंट की व्यवस्था में करोड़ों खर्च होते हैं, लेकिन देश की जनता की बेहतरी कितनी हो पाती है? उल्टे संसद की कार्रवाइयों के जो दृश्य सामने आते हैं, वे कई बार नाट्य मंचों या टीवी चैनलों में प्रस्तुत होने वाले नाटकीय दृश्यों जैसे ही फूहड़ लगते हैं। हमारा संविधान लोकमंगल की भावना से भरा पड़ा है लेकिन व्यावहारिक धरातल पर अमल न हो पाने के कारण लोकतंत्र मजाक-सा लगने लगता है। बातें तो बड़ी अच्छी है, मगर वे सार्थक न हो सकें तो उसका औचित्य ही क्या? हमारी नई यांत्रिक सभ्यता का यही चरित्र है कि वह बातें बड़ी-बड़ी करती है, लेकिन काम फूटी कौड़ी का नहीं। यंत्रों में अगर संवेदनाएँ होती तो शायद वे कुछ करती भी। इसी तरह जो मनुष्य यंत्रवत हो चुके हैं, उनसे हम कल्याण की उम्मीद नहीं कर सकते। इसीलिए मेरा यही मानना है, कि इस नई यांत्रिक सभ्यता ने हमें हृदयहीन बना कर रख दिया है। अभी तो ये अँगड़ाई है, आगे और लड़ाई है। यह शुरुआत है। जो मंज़र अभी दीख रहे हैं, उससे भविष्य की विसंगतियों का अनुमान लगाया जा सकता है। अगर भारतीय समाज को बचाना है तो उसे गाँधी के रास्ते पर ही चलना होगा। बले ही वह  'गाँधीवाद' को पचा न पाए, 'गाँधीगीरी' जैसे हाजमोलाई शब्द ही काम चलाए लेकिन हमें गाँधी के निकट तो आना ही पड़ेगा क्योंकि गाँधी लाख दुखों की एक दवा है। इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है। इससे घबराने की जरूरत नहीं। हम आधुनिक बनें, यंत्रों की दुनिया के बीच जीएँ (मोबाइल और इंटरनेट से हमारा कितना गहरा रिश्ता बन चुका है) मगर गाँधी के उन वचनों को न भूल जाएँ जो उन्होंने मनुष्यता को बचाने के लिए हिंद स्वराज्य में कहे।
आज भारतीय समाज पश्चिम की ओर मुँह करके चल रहा है इसीलिए ठोकरें का रहा है। कदम-कदम पर गिर रहा है। संस्कृति की चुनरी उड़ कर कहाँ चली गई, पता ही नहीं चला। नैतिकता का जूता कब का फट चुका है। सभ्यता के वस्त्र तार-तार हो चुके हैं। सब कुछ दिखने लगा है खुल्लमखुल्ला। जो दैहिक उभार या जो चीजें ढँकी रहती थीं, अब उन्हें ही दिखाया जा रहा है। बर्बादी को जैसे पारिवारिक-सामाजिक स्वीकृति मिल गई है। हिंद स्वराज्य में जो दिशा दिखाई गई है, जो जीवन-सूत्र दिए गए हैं, उसके सहारे हम क्यों नहीं चल सकते? अगर ऐसा कर सकते तो एक नैतिक समाज की स्थापना में आसानी होती लेकिन अब ऐसा संभव नहीं दिखता। लगता है, कि हम लोग बहुत आगे निकल आए हैं। आज की नई सभ्यता में अराजकता है, असंकारिता है। निर्लज्जता है। गाँधी ने हिंद की सभ्यता को सबसे अच्छी सभ्यता निरूपित किया था। यूरोप की सभ्यता को उन्होंने चार दिन की चाँदनी कहा था। सौ साल पहले गाँधी ने भारतीय समाज की यूरोपीय संस्कृकि के प्रति अंधी आसक्ति देख कर कहा था, कि अँगरेजों की सभ्यता को बढ़ावा दे कर हमने जो पाप किया उसे धो डालने के लिए हमें मरने तक भी अंदमान में रहना पड़े तो वह कुछ ज्यादा नहीं होगा। सौ साल पहले गाँधी जी ने जिस पाप की ओर इशारा किया था, उस पाप का घड़ा तो कब का लबालब भर चुका है लेकिन फूटने का नाम नहीं ले रहा। उल्टे इस घड़े को बचाने की मुहिम-सी चल रही है। नए भारतीय मानल को देख कर हैरत होती है। सोचना पड़ता है, कि कया इसी देश में कभी महावीर, गौतम, नानक, विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, गाँधी, बिनोबा आदि महापुरुष जन्में थे? आने वाली पीढियों को यकीन ही नहीं होगा। वे समझेंगी कि ये सब मिथक है। काल्पनिक पात्र है। भविष्य में जैसा क्रूर समाज विकसित होगा, उसमें यह संभव है।
यह नई यांत्रिक सभ्यता हमें और पतित करेगी। रिश्तों के मामले में हम धीरे-धीरे कृपण होते जा रहे हैं। पशुवत आचरण की खबरें आए दिन छपती ही रहती हैं। सम्पत्ति-विवाद के कारण भाई ने भाई को मार डाला। बेटे ने पिता की हत्या कर दी..आदि-आदि। आधुनिक सभ्यता ने हमें शिक्षित तो किया है, सुशिक्षित नहीं। हिंद स्वराज्य में गाँधी ने इस बाबत अँगरेज विद्वान हक्सले के कथन का हवाला दिया हैं, जिसमें हक्सले कहते हैं कि उसी आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है जिसकी बुद्धि शुद्ध, शांत  और न्यायदर्शी है। उसने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसके मन की भावनाएँ बिल्कुल शुद्ध हैं। जिसे नीच कामों से नफरत है और जो दूसरे को अपने जैसा मानता है। हक्सले के इन कथनों के बरअक्स आज की शिक्षा और इसके फलितार्थों को देख लें। पढ़े-लिखे लोगों के न तो मन शुद्ध हैं, न शांत है और न प्रेम से भरे हुए हैं। वे लोग अपने ही लोगों से नफरत करते हैं। अपराध और अपराधी तक हाइटेक हो चुके हैं। ऐसा पढ़ा-लिखा समाज किस काम का जो हिंसा करता है और बेचैन नहीं होता? नफरत करता है और ग्लानि से नहीं भरता? किसी को नीचा दिखाने का उपक्रम करता है और दुखी नहीं होता? समकालीन शिक्षा हमें केवल सूचित करती है, सुशिक्षित नहीं करती। हमारा विवेक जागृत नहीं करती। यही इसकी सबसे बड़ी कमी है। विवेक जागरण के लिए विद्यालयीन शिक्षा की जरूरत नहीं। इसके लिए नैतिक शिक्षा अनिवार्य बने। समता-ममता के पाठ पढ़ाएँ जाएँ। अब जो नई शिक्षा व्यवस्था लादी जा रही है, उसमें मनुष्य को केवल यंत्र बनाने की व्यवस्था है। वेतन के पैकजों की ही भाषा है। पढ़ा-लिखा युवा रोबोट की तरह काम कर लेता है, तगड़ी कमाई कर लेता है,  ईष्र्या के लिए बाध्य करने वाला भौतिक वैभव प्राप्त कर लेता है लेकिन वह अपने माता-पिता से को वृद्धाश्रम में भेज देता है, अपने भाई-बंधुओं से तन और मन दोनों से ही दूर हो जाता है।
रिश्तों की, अपनत्व की हत्या करके भी हम सभ्य कहला रहे हैं तो यह बिल्कुल नई सभ्यता है, जिसकी आहट गाँधी ने सुन ली थी, और जिसक ी गहन चिंता उन्होंने हिंद स्वराज्य में की है। गाँधी ऐसी शिक्षा के कायल नहीं थे। वे चाहते थे, कि पढ़-लिख कर लोग मनुष्य भी बनें। लोग अपने नैतिक कर्तव्यों को भी समझें। लेकिन अब नया दौर है। अब  'गिव्ह एंड टेक' का जमाना है। 'यूज  एंड थ्रो'' की अप-संस्कृति जोरों पर है। यह नया समाज हैरत में डाल देने वाला है। आदिम युग से उठ कर मानव यहाँ तक पहँच गया है, लेकिन उसकी प्रवृत्तियाँ आदिम ही बनी हुई है। उसकी हरकतों में वे मूल्य दृष्टव्य नहीं होते जो यह साबित करें कि वह सभ्यता के नये आलोक में जी रहा है। विकास और विनाश में अंतर करना कठिन हो रहा है। इसका असली कारण यही है कि तमाम चिंताओं एवं प्रयासों के बावजूद पिछली शताब्दी में हम नैतिक मूल्यों की दृष्टि से निरंतर अवनति को ही प्राप्त हुए हैं। हिंद स्वराज्य को पढ़ कर उस दौर के भारत को भी समझा जा सकता है। जैसे पहले ही अध्याय में गाँधी जी एक जगह कहते हैं,कि स्वराज्य भुगतने वाली प्रजा अपने बुजुर्गां का तिरस्कार नहीं कर सकती। अगर दूसरों की इज्ज्त करने की आदत खो बैठेंगे तो हम निकम्मे हो जाएँगे। जो प्रौढ़ और तजुर्बेकार हैं, वे ही स्वराज्य को भुगत सकते हैं न कि बे-लगाम लोग। क्या यही सभ्यता है?
गाँधी जी ने सभ्यता का जो रूप बताया है, वह विचारणीय है। संवेदनशील पाठक आत्म-मंथन के लिए विवश होगा और सोचेगा, कि क्या सभ्यता के ये ही नए कँटीले शिखर हैं? गाँधी जी के विचारों को एक लम्बा अंश यहाँ प्रस्तुत करने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा हूँ, देखें, ''सौ साल पहले यूरोप के लोग जैसे घरों में रहते थे, उनसे ज्यादा अच्छे घरों में आज वे रहते हैं। यह सभ्यता की निशानी मानी जाती है। इनमें शरीर के सुख की बात है। इसके पहले लोग चमड़े के कपड़े पहनते थे और बालों का इस्तेमाल करते थे। अब वे पतलून पहनते हैं और शरीर को सजाने के लिए तरह-तरह के कपड़े बनवाते हैं। और बाले के बदले एक के बाद एक पाँच गोलियाँ छोड़ सके, ऐसी चक्कर वाली बंदूक इस्तेमाल करते हैं। यह सभ्यता की निशानी है। किसी मुल्क के लोग जो जूते वगैरा नहीं पहनते हों, जब यूरोप के कपड़े पहनना सीखते हैं, तो जंगली हालत में से सभ्य हालत में आये हुए माने जाते हैं। पहले यूरोप में लोग मामूली हल्की मदद से अपने लिए जात-मेहनत करके जमीन जोतते थे। उसकी जगह आज भाप के यंत्रों से हल चला कर एक आदमी बहुत सारी जमीन जोत सकता है और बहुत-सा पैसा जमा कर सकता है। यह सभ्यता की निशानी मानी जाती है। पहले लोग कुछ ही किताब लिखते थे और वे अनमोल मानी जाती थी। आज हर कोई चाहे जो लिखता और छपवाता है और लोगों के मन को भरमाता है (प्रकाशन के मामले में सौ साल बाद भी इसी तरह की बुरी स्थिति है-लेखक)यह सभ्यता की निशानी है।.. गाँधी जी ने बैलगाड़ी और रेलगाड़ी का और हवाई जहाज का भी उदाहरण दिया है कि लोग कुछ ही घंटे में लंबी दूरिया तय कर लेंगे। एक उदाहरण गाँधीजी ने त्रिकालदर्शी के रूप में कुछ इस तरह पेश किया है जो अब सार्थक हो रहा है। उन्होंने लिखा है, ''लोगों को हाथ-पैर हिलाने की जरूरत नहीं रहेगी। एक बटन दबाया कि आदमी के सामने पोशाक हाजिर हो जाएगी, दूसरा बटन दबाया कि उसे अखबार मिल जाएंगे, तीसरा दबाया कि उसके लिए गाड़ी तैयार हो जाएगी। हर हमेसा नये भोजन मिलेंगे, हाथ-पैर का काम नहीं करना पड़ेगा। सारा काम कल से हो जाएगा।...यह सभ्यता की निशानी है।... पहले लोगों को मारपीट कर गुलाम बनाया जाता था, आज पैसों का लालच देकर गुलाम बनाया जाता है। पहले जैसे रोग नहीं थे वैसे रोग आज लोगों में पैदा हो गए हैं और उसके साथ डॉक्टर खोजने में लगे हैंकि ये रोग कैसे मिटाए जाएँ। ऐसा करने से अस्पताल बढ़े हैं। यह सभ्यता की निशानी है।''
गाँधीजी ने और भी अनेक गहरे कटाक्ष किए हैं लेकिन उनके इतने विचार ही यह समझने के लिए पर्याप्त है कि सभ्यता को मनुष्य कितने हल्के से लेता है। कसाई खाने में अत्याधुनिक यंत्र लगा कर भी कहा जा सकता है कि हम सभ्य हो गए हैं। देखो, कितनी तत्परता के साथ पशुओं का कत्ल करते हैं और मानवश्रम बचाते हैं। दरअसल सभ्यता को कुछ लोगों ने गहराई से समझने की कोशिश ही नहीं की है। कुछ यांत्रिक सुविधाओं को सभ्यता समझ कर इतराने वाले समाज को सभ्यता का असली उत्स समझ में नहीं आता, जिसके लिए गाँधी जी बेचैन रहे। यूरोप की जिस सभ्यता और मानसिकता को गाँधी जी ने समझाने की कोशिश की थी, उस सभ्यता ने आज भारत को अपने कब्जे में बुरी तरह जकड़ लिया है। यह हास्यास्पद स्थिति नहीं है तो और क्या है कि भारत में भीषण गरमी के दौरान भी कुछ लोग सूट-बूट और टाई में नजर आते हैं, क्यों कि ऐसा पहरावा उन्हें सभ्य या कहें कि आधुनिक दर्शाता है। हद तो उस वक्त हो जाती है जब कुछ लोग अपने कुत्ते से भी अँगरेजी में बात करते हैं। सोचिए जरा, वह सभ्यता की किस ऊँचाई पर खड़ा है। पिज्जा-बर्गर या फास्ट फूड एवं ड्रिंक्स की नई संस्कृति को आत्मसात करके लोग खुद को माडर्न समझ रहे हैं। यह सभ्यता की सही निशानी नहीं है। कपड़े, भोजन और पेय आदि को सभ्यता नहीं समझा जा सकता। लोग खुद को सभ्य कहते हैं और अनेक घिनौने किस्म का माँसाहार भी करते हैं। सभ्यता की सीधी-सादी परिभाषा यही है कि आप का व्यवहार कैसा है। खास कर उस मानव से जो आर्थिक, सामाजिक एवं मानसिक रूप से आपसे कमजोर है। वंचितों, दलितों, पिछड़े एवं कमजोर लोगों से मनुष्य अगर नकारात्मक व्यवहार करता है तो वह जितना भी सुदर्शन हो, जितने भी अच्छे कपड़े पहनता हो, जितने भी भव्य घर में रहता हो, सभ्य नहीं कहा जा सकता। ये और बात है कि वह अपने को अकसर सभ्य बताने की काशिश करता होगा। हम खुद सोचें कि कितने सभ्य लोग हमारे इद-गिर्द सलामत हैं।
सच्ची सभ्यता आदमी को इन्सान बनाती है। यांत्रिक सभ्यता सच्ची सभ्यता नहीं हो सकती क्योंकि इसकी चपेट में आकर इंसान इंसानियत ही भूल जाता है। इस तरह नई सभ्यता एक तरह से शैतानी सभ्यता ही है। लोग धर्मस्थलों में जाते हैं और यंत्रवत सिर हिलाते हैं, झुकाते हैं, लोट-लोट जाते हैं, लेकिन मन के पाप जस के तस रहते हैं। माँसाहार सहज प्रवृत्ति बनी हुई है। कटते हुए माँस को लोग भूखे भेडिय़े की तरह देखते मिल जाते हैं। तमाम तरह के दुर्गुणों से भरा यह आधुनिक मनुष्य किस कोण से सभ्य हैं, यह तो मेरी भी समझ में नहीं आता। आज अगर गाँधीजी जीवित रहते तो 'हिंद स्वराज' के नए संस्करण में वे यही लिखते कि अरे, इन सब ने राह न पाई। सौ साल पहले मैंने जैसा भारत या समाज देखा था, वैसा और उससे भी बदतर समाज आज देख रहा हूँ। सभ्यता हमें अधम बना दे, निर्मम बना दे, जातिवादी, कट्टर धार्मिक बना दें, क्षेत्रवादी बना दे, भाषावादी बना दे, स्वार्थी बना दे तो ऐसी सभ्यता मानव जाति के किस काम की? गाँधी जी ने भी कहा है कि  ''मेरी पक्की राय है कि हिंदुस्तान अँगरेजों से नहीं, बल्कि आजकल की सभ्यता से कुचला जा रहा है। उसकी चपेट में फँस गया है।''
गाँधी जी धर्म विरोधी नहीं थे। लेकिन उनका धर्म विवेकशून्यता से भरा नहीं था। वे कहते हैं, कि  '' मुझे तो धर्म प्यारा है इसलिए पहला दु:ख मुझे यह है कि हिंदुस्तान धर्मभ्रष्ट होता जा रहा है। धर्म का अर्थ यहाँ मैं हिंदी, मुस्लिम या जरथोस्ती धर्म नहीं करता, इन सब धर्मों के अंदर जो धर्म है, वह हिंदुस्तान से जा रहा है। हम ईश्वर से विमुख होते जा रहे हैं।''
आज हालत यही है। हम असली धर्म भूल गए हैं। धर्म कहीं दिखता नहीं, बस पाखंड या आडंबर ही प्रधान है। ईश्वर के सामने पाप होते रहते हैं। हत्याएँ होती है, बलात्कार होते हैं, धोखाधड़ी होती है, ऊँच-नीच का खेल चलता है। भगवान के घर पर भी वीवीआइपी और गरीबों के साथ अलग-अलग व्यवहार होता है। ये कैसा धर्म, कैसी सभ्यता है? आराधना के नाम पर लोगों  की आँखों तो बंद रहती है, लेकिन भीतर ही भीतर नए-नए पापों को करने की योजनाएँ भी बनती रहती हैं। ईश्वर का डर खत्म हो गया है। या फिर ईश्वर को इतना सस्ता समझ लिया गया है, कि उसके सामने हाथ-पैर जोडऩे से सारे पाप धुल जाएँगे। मनुष्य जीवन नैतिकता और सदकर्मों की सतत तलाश है। यही सच्ची सभ्यता है। लेकिन अब ऐसी सभ्यता के दीदार कम ही होते हैं। मनुष्य यंत्र हो चुका है।
आधुनिकता या यांत्रिक सभ्यता की परमस्वीकृति का बिल्कुल ताजा उदाहरण यह भी है कि अब समलैंगिकता को सामाजिक स्वीकृति देने की दिशा में व्यवस्था कदम तक बढ़ा रही है। कुछ चीजों के लिए तो हमें समाज को जोर-जबर्दस्ती के साथ प्रतिबंधित करना होगा, लेकिन प्रगतिशीलता, और मानवाधिकार के चक्कर में अनैतिकता को भी हरी झंडी दिखाई जा रही है। अगर यही रफ्तार रही तो जिस यांत्रिक सभ्यता के खतरे को गाँधी से ने देखा और महसूस किया था, और हम सबको सावधान भी किया था, वह सभ्यता हमें खाक में मिला देगी। सौ सालों में हमारा समाज और ज्यादा पतित हुआ है। इक्कीसवीं सदी में के इस व्यामोह में और ज्यादा विनाश संभावित है। मंज़र सामने है। कुंवारी लड़कियों के माँ बनने की रफ्तार बढ़ी है। अगर यह सभ्यता है तो मुझे कुछ भी नहीं कहना और अगर यह सभ्यता नहीं है तो विचार किया जाना चाहिए, कि ऐसा क्यों हो रहा है। कारणों तक पहुँच कर उसे दूर करने की कोशिश होनी चाहिए। गाँधी जी के सपनों का महान भारत तभी बन सकेगा। यह संभव हो सकता है, बशर्र्ते हम सब मिल-जुल कर इस दिशा में वैचारिक प्रयास करें। गाँधी, खादी, नैतिकता, प्रेम, करुणा, त्याग जैसे मानवीय गुणों का विकास करके ही सभ्यता की सच्ची परिभाषा गढ़ी जा सकी है। इसके लिए जरूरी है कि हम यांत्रिकता से बाहर निकल और सही अर्थों में सभ्यता की उस दिशा की ओर कदम बढ़ाएँ, जिसकी ओर चलने का आग्रह गाँधी जी ने किया था।

सुनिए गिरीश पंकज को