सोमवार, 30 जनवरी 2012

छ्त्तीसगढ़ की डायरी

सौ बिस्तरों वाला कैंसर अस्पताल अंतिम चरण में 
वेदांता समूह ने छत्तीसगढ़ में किया कमाल 
एक करोड़ का एक बिस्तर....
यह चौंकाने वाली बात तो है मगर यह सच है कि छत्तीसगढ़ में सौ बिस्तरों वाला एक ऐसा कैंसर अस्पताल अंतिम चरण में हैं, जिसकी लागत तीन सौ करोड़ की है। टाटा मेमोरियल जैसा अंतरराष्ट्रीय स्तर का यह अस्पताल नये रायपुर में निर्माणाधीन है। वेदांता केंसर चिकित्सालय एवं अनुसंधान केंद्र के रूप में यह अस्पताल कैंसर-फ्री छत्तीसगढ़ के सपने के संकल्प के साथ शुरू हो रहा है। छत्तीसगढ़ में कैंसर के मरीज बढ़ रहे हैं। तम्बाखू, खैनी, बीड़ी-सिगरेट के बढ़ते सेवन के कारण राज्य में कैंसर की शिकायत बढ़ी है। इसीलिए बाल्को (वेदांता) कंपनी  के संचालक अनिल अग्रवाल ने पहल की और टाटा मेमोरियल अस्पताल जैसा विश्वस्तरीय अस्पताल बनाने का बीड़ा उठा लिया। राज्य सरकार ने उनको जमीन दे दी। पिछले दिनों पत्रकारों के एक दल ने नया रायपुर जा कर अस्पताल के निर्माण कार्य को देखा। सभी की यही राय थी कि यह अस्पताल न केवल छत्तीसगढ़ के लोगों की, वरन देश-विदेश के कैंसर मरीजों के उपचार का बड़ा केंद्र बन जाएगा। तीन सौ करोड़ की लागत वाले अस्पताल की अब लागत बढ़ कर साढ़े तीन सौ करोड़ रूपए तक पहुँच चुकी है, लेकिन जनहित को ध्यान में रखते हुए वेदांता समूह अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट से कोई समझौता नहीं कर रहा, यह संतोष की बात है।
कलेक्टर के 'घटिया' बयान पर भड़के जशपुर  के लोग
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले को वहाँ के एक बड़े अधिकारी ने अतिउत्साह में आ कर ' घटिया' कह दिया। अधिकारी की मंशा कुछ और रही होगी, लेकिन अतिउत्साह में विवेक को भी सक्रिय रखना चाहिए। अधिकारी के बयान से दु:खी  जशपुर जिले के लोगों ने प्रतिकार किया और जशपुर बंद करके दिखा दिया कि वे 'घटिया बयान' का गाँधीवादी तरीके से प्रतिकार कर सकते हैं। शालीन तरीका यही है। हालांकि जब मुख्यमंत्री ने हस्तक्षेप किया को उच्चाधिकारी महोदय को अपनी गलती का अहसास हुआ और स्वीकार किया की उन्हें ऐसा नहीं कहना था। दूसरे अफसर भी इस उच्चाधिकारी के बयान पर आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं। आदमी जितना ऊँचा उठे, उसे उतना ही विनम्र होना चाहिए, लेकिन इस सोच पर बहुत कम लोग टिक पाते हैं। फिर अगर आदमी कलेक्टर बन जाए तो बहुत कम लोग मनुष्यों जैसा आचरण करते हैं। यह पद की अपनी बुराई है, जिसके शिकार हो कर अनेक लेग बहक जाते हैं। बहरहाल घटिया बयान से आक्रोशित जशपुर जिले के बंद ने यह बात सिद्ध कर दी कि जशपुर जिले के लोग भालेभाले तो हैं, मगर उनकी अस्मिता को ललकारने पर 'भोले' लोग शालीनता के साथ ''भाले'' भी बन सकते हैं।
मिशनरियों की मदद...?
छत्तीसगढ़ के एक आईएएस अधिकारी पर मिशनरियों की मदद करने का आरोप लगा है। और यह आरोप भाजपा सरकार के एक वरिष्ठ नेता ने लगाया है। बनवारीलाल अग्रवाल विधानसभा के उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं। उनके बयान को हल्के से नहीं लिया जा सकता। उन्होंने अधिकारी का नाम ले कर खुलेआम यह बात कही है कि उनके संरक्षण में मिशनरियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसमें दो राय नहीं कि छत्तीसगढ़ में धर्म परिवर्तन का खेल चल रहा है। हालांकि धर्म परिवर्तन के लिए आदिवासियों की सेवा को माध्यम बनाया जाता है। मिशनरियों की सेवा भावना देख कर बाद में लोग धर्मपिरवर्तन कर लेते हैं। यही कारण है कि कल्याण आश्रम जैसी संस्तोँ सामने आई और वे आदिवासियों की सेवा में लगी हुई हैं।    
कुष्ठ रोगी महिला को गाँव से निकाला...
छत्तीसगढ़ में विकास की  गंगा बह रही है मगर पिछड़ेपन का नाला भी बजबजाते रहता है। अनेक तरह की बुराइयाँ समय-समय पर सामने आती रहती हैं। कैंसर की तरह कुष्ठ रोग भी राज्य की एक बड़ी समस्या है। सरकार इससे निपटने की काशिश तो कर रही है, मगर जन जागृति की कमी के कारण अनेक लोग कुष्ठ को छूत की बीमारी भी समझने की भूल कर बैठते हैं। यही कारण है कि पिछले दिनों एक गाँव में एक पति ने अपनी कुष्ठ-पीडि़त पत्नी को घर से निकाल दिया, न केवल पति ने निकाला वरन पूरे गाँव के लोगों ने महिला का गाँव से बाहर निकाल दिया। महिला अपने बच्चों के साथ दर-दर भीख मांगने पर मजबूर हो गई। कुष्ठ रोग साध्य है। यही कारण है कि महात्मा गाँधी ने अपने समय में एक कुष्ठ रोगी की सेवा करके संदेश दिया था कि उइस रोग से दूर भागने की जरूरत नहीं है। अब एक बार फिर यह अभियान चलना चाहिए ताकि गाँव के लोग जागरूक हों और कुष्ठ रोगी को सामान्य मरीज समझ कर उसकी सेवा करें। एमडीटी की गोली खाने से कुष्ठ रोग धीरेे-धीरे खत्म हो जाता है। इस बात का प्रचार जरूरी है।
पिता-पत्नी समेत अनेक लोगों की हत्या...
राजधानी में पिछले दिनों एक ऐसा व्यक्ति पुलिस की गिरफ्त में आया जिसने  अपने पिता की, पत्नी की, और मामा ससुर समेत कम से कम सात लोगों की निर्मम हत्याएँ कर दीं। पिता को चलती ट्रेन से धकेल दिया था। सिर्फ सनक में। अरुण चंद्राकर नामक यह युवक मनोरोगी नहीं है, स्वस्थ है। लेकिन स्वारथ के चक्कर में पिछले दो-चार सालों के भीतर उसने अपने ही लोगों को मौत के घाट उतार दिया। पिता मामा ससुर, साला, साली समेत अन्य लोगों की जानें ले ली। हत्या कारण ा कोई खास नहीं रहता था।  इस भयंकर हत्यारे को देख कर नहीं लगता कि इसने इतनी हत्याएँ की होंगी। हर हत्या के पीछे कहीं आर्थिक मामला था, तो कहीं अपना अहम। समाज में ऐसे लोग भी बढ़ रहे हैं जो असहिष्णुता के शिकार हो कर अपने सगों की जान लेने से भी नहीं पिचकते। इसके पहले बी कुछ मामले सामने आ चुके हैं, जब जमीन या पैसे के विवाद के कारण अपनों ने ही अपनों की जान ले ली।
नकलचोर डॉक्टर की उपाधि छीनी
पी-एच.डी  करने के मामले में कभी-कभी यह भी सुनने में आता है कि लोग इधर-उधर का मैटर जोड़-जाड़ कर उपाधि प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन पिछले दिनों रायपुर में एक ऐसा मामला सामने आया जिसमें एक प्राध्यापक ने एक नहीं अनेक पृष्ठ जस के तस उतार दिए और पीएचडी की उपाधि हसिल कर ली। बाद में जब पता चला तो लोगों की आँखें फटी की फटी रह गई। आखिर पं. रविशंकर शुुक्ल विश्वविद्यालय ने गुरुदास तोलानी नामक व्यक्ति की उपाधि वापस लेने का निर्णय किया। उस पर और भी मामले चलेंगे ही, मगर इस घटना से पीएचडी करने वालों की साख पर बट्टा लगा है। अपनी नौकरी में तरक्की, वेतनमान में बढ़ोत्तरी आदि के चक्कर में अनेक लोग पीएचडी करते हैं। उनकी मंशा शोध नहीं होती, इसीलिए ऐसे अपराध हो जाते हैं।
पत्रकार के हत्यार कहाँ छिपे बैठे हैं?
रायपुर के पास एक कस्बा है छुरा। एक साल पहले यहाँ के एक पत्रकार उमेश राजपूत को कुछ अज्ञात लोगों ने गोली मार दी थी। लेकिन हत्यारे अब तक लापता हैं। बिलासपुर के पत्रकार सुशील पाठक के हत्यारे भी पकड़ से बाहर हैं। इस मामले में पुलिस की अकर्मण्यता को पत्रकार ही नहीं आम लोग भी कोस रहे हैं, लेकिन इससे पुलिस की सेहत पर कोई असर नहीं पडऩे वाला। पिछले दिनों पत्रकारों ने छुरा में धरना बी दिया और पुलिस की लापरवाही की निंदा भी की। उमेश राजपूत की पत्रकारिता को याद भी किया। सच तो यही है कि पत्रकार या कोई भी केवल इतना ही कर सकता है। असली काम तो पुलिस को करना है हत्यारों तक पहुँचने का।

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

छत्तीसगढ़ में राजयोग-सा वैभव भोग रहे अफसर ....

 हर अफसर के कमरे में 'सीसी टीवी'-कैमरे लगाये, तब पूरा सिस्टम सुधार जाएगा
                                गिरीश पंकज
    पिछले दिनों गाँव से आये एक व्यक्ति को अपने काम के सिलसिले में कुछ ''बड़े'' अफसरों से मिलना पडा. उसे अफसरों के आलीशान चेम्बरों को निकट से देखने  का मौका मिला, तो वह हतप्रभ रह गया. उसने अपने मन की बात मुझसे शेयर की. उसका यही कहना था कि जनता की गाढ़ी कमाई किस तरह विलासिता में खर्च की जा रही है? मेरे मित्र की बातों पर मैं विचार करने लगा, वह ठीक कह रहा था.मैंने भी विलासितापूर्ण जीवन जीने के पक्षधर अफसरों को निकट से देखा है.  हमारे मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह का कक्ष भी मैंने देखा है. आप को आश्चर्य होगा कि वहाँ ऐसा कोई तामझाम नजर नहीं आता, जितना कुछ अफसरों के यहाँ नज़र आता है. मुख्यमंत्री के  कार्यालय में एक सादगी है. और सच तो यही है कि सादगी में ही सौन्दर्य है , लेकिन इस राज्य के कुछ छोटे-बड़े अफसर वैभव-विलासपूर्ण सुविधाए जुटाने में इतना आगे निकल गए है कि मत पूछिए. समझ में नहीं आता कि ये प्रशासन चलाने के लिये बैठे हैं या राज्य की जनता के पैसों पर ऐश करने ? चकाचक दीवारें, बेहद कीमती टेबल-कुर्सियां और भव्य दिखाने वाले सोफसेट्स, कमरे में लगा महंगा से महँगा एलसीडी टीवी. और भी अन्य सुविधाए. जैसे महंगे मोबाइल सेट, लेपटाप, और सरकारी पैसे से खरीदी गई बेशकीमती करें आदि..ऐसा  नवाबी ठाठ गुलामी के दौर में तो समझ में चल जाता, मगर लोकतंत्र में यह अफसरी- आडम्बर किसी भी देशप्रेमी को चुभ सकता है.  मगर यह कटुसत्य है कि अफसर छत्तीसगढ़ में राजयोग-सा वैभव  भोग रहे है. अफसर बड़े चालाक  होते है. ये जनप्रतिनिधियों को भी विलासिता का स्वाद चखाने की कोशिश करते है, इसलिये गाँव का सीधा-सदा नेता मंत्री बनाने के बाद सामंती मिजाज़ में आ जाता है. इसके पीछे अफसरों का षड्यंत्र  होता है. कुछ अफसर अपनी सुविधाओं को बटोरने के लिये पहले मंत्रियों को खुश करते हैं. अफसरों को विदेश घूमना हो, तो वे मंत्रियों के लिये कार्यक्रम बनाते हैं और खुद भी चिपक जाते हैं. एक दशक से यही हो रहा है. अफसरियत इतनी हावी है कि वह साफ़ नज़र आती है.

   आदमी जिस वातावरण में रहेगा उसका असर उसकी सोच पर भी पडेगा. लेकिन यहाँ के अफसर  'सादा जीवन को तुच्छ विचार' समझते है.  क्या छोटे, क्या बड़े, हर स्तर के अफसर जनता के पैसों का दुरुपयोग अपने-अपने दफ्तरों को चमकाने में कर रहे है. इस तरफ अगर मुख्यमंत्री ध्यान दे कर अफसरों पर लगाम कस दें, तो सब ठीक हो  जायेंगे. अब मंत्रालय और अन्य दफ्तर धीरे-धीरे नए रायपुर में शिफ्ट होंगे, वहाँ इस बात पर ध्यान देने की ज़रुरत है कि पुराने फर्नीचरों,  सोफासेटों आदि से ही काम चलाया जाये. तामझाम पर अतिरिक्त  खर्च न किया जाये. वैभव पूर्ण दफ्तर, कारों आदि से विकास नहीं होता, विकास के लिये त्वरित गति से कामकाज निपटाना ज़रूरी है. उस दिशा में हमारे अफसर बेहद ढीले हैं. जन प्रतिनिधियों के आदेशों को भी दरकिनार रख देने वाले अनेक अफसर स्वेच्छाचारिता के कारण बदनाम हैं. इन पर मुख्यमंत्री जी जब तक लगाम नहीं कसेंगे, प्रदेश का भला नहीं हो सकेगा. वरना इन अफसरों के कराण प्रदेश का बहुत-सा धन फिजूलखर्ची  में ही  नष्ट हो रहा है. इसे रोकना ज़रूरी है.
    इस चिंतन को समझने की ज़रुरत है कि  सरकारी दफ्तर, या मंत्रालय आदि ऐसे भव्य नहीं होने चाहिए कि गाँव के आदमी को घुसने में भी डर लगे. ये सबके लिये खुले रहने चाहिए. और बेहद सादगीपूर्ण भी होने चाहिए. . ''सादगी के साथ कार्य'' अपने राज्य का नारा होना चाहिए. सरकारी  कार्यालय जनता के काम के लिये होते है, तामझाम को दिखाने के लिये नहीं. अगर सूचना के अधिकार के तहत ब्योरे निकलवाएँ जाएँ तो असलियत सामने आ सकती है, कि एक-एक दफ्तर की साज-सज्जा पर कितना खर्च हुआ है. यह बर्बादी है और एक तरह का भ्रष्टाचार ही है. आज हर बड़े अफसर के भव्य कक्ष में महंगे से महंगा टीवी दीवार पर चस्पा है? लोग पूछते हैं कि ये अफसर दफ्तर में काम करना चाहते हैं या टीवी देखना ? लगना ही है तो सरकार हर अफसर के कमरे में 'सीसी टीवी' और कैमरे लगाये, तब पता चलेगा कि ये अफसर किस तरह काम करते हैं. ऐसा हो गया तो पूरा सिस्टम ही सुधार जाएगा. जैसे सूचना का अधिकार कानून के कारण अधिकारी  कुछ-कुछ डरने लगे हैं, उसी तरह अगर हर अफसर क्लोज़ सर्किट टीवी की जद में आ जाएगा, तो वह काम करने लगेगा. उसे अपनी छवि कि चिंता रहेगी. इसलिये कम से कम नए रायपुर में तो हर अधिकारी के कमरे में क्लोजसर्किट  लगाये जाएँ, ताकि पारदर्शिता बनी रहे. और द्र्तुगति से काम हो. और यह निर्देश तो अनिवार्य रूप से दियें जाएँ कि दफ्तर के वैभव को बढ़ाने की बजाय काम की  गति पर ध्यान दिया जाये. लगभग हर सरकारी दफ्तर महंगे से महंगे सामानों  के इस्तेमाल कि कोशिश में लगे रहते है. सभी की यही मानसिकता  नज़र आती है कि जितना भव्य  दफ्तर होगा, उतना नाम होगा, लेकिन नाम काम से होता है. यह बात समझ में पता नहीं कब आयेगी? व्यावसायिक घराने या निजी कंपनियों के दफ्तर भव्य रखने की प्रथा चला पडी है, अब उसी रास्ते पर सरकारी दफ्तर भी चलाने की कोशिश करेंगे, तो यह जनता के पैसों का दुरुपयोग ही कहलायेगा. इस दिशा में मुख्यमंत्री ही कुछ संज्ञान लेंगे तो बात बनेगी, क्योंकि वे सादगी के साथ रहने वाले नेता हैं. अगर फिजूलखर्ची न रोकी गई तो यह सिलसिला चलता रहेगा. नियम तो यही बनाना चाहिए कि कोई भी अफसर अपने दफ्तर को संवारने से पहले उचित कारण बताये, वरना जनता के पैसों का दुरुपयोग इसी तरह जारी रहेगा. विकासशील राज्य का एक-एक पैसा महत्वपूर्ण है. यह अफसरों या जनप्रतिनिधि किसी की भी  विलासिता पर खर्च नहीं होना चाहिए.

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

बस्तर : उम्मीद कायम है..
नक्सलवाद के विरुद्ध बस्तर में जिस तरह लोग लामबंद होते रहे हैं, उसे देख कर यह विश्वास दृढ़ होता है, कि अन्याय के विरुद्ध जीवत प्रतिकार का सिलसिला जारी है। सलवाजुडूम भले ही अब बंद हो गया हो मगर शांति के लिए लोग फिर भी एक जुट हो रहे हैं। पिछले दिनों बस्तर में बीजापुर और जगदलपुर में शांति के लिए सैकड़ों लोग जमा हुए और यह संकल्प दुहाराया कि जब तक बस्तर में शांति बहाल नहीं हो जाती, लोग हिंसा के विरुद्ध खड़े होते रहेंगे। गाँधी जयंती के दिन लोगों के मन में बड़ा उत्साह था। डर यही है कि यह उत्साह समय के साथ ठंडा न पड़ जाए। नक्सलियों के विरुद्ध पुलिस और दूसरे जवान अपने तरह से लड़ रहे हैं। लेकिन जनता कोभी साथ देना है।  उन्हें घबराना ही नहीं है। जगदलपुर में एक संस्था बनी है बस्तर शांति एवं विकास संघर्ष परिषद। इस संस्था के गठन के दिन मुख्य वक्ता के रूप में मैं शामिल हुआ था। वहाँ जमा सैकड़ों लोगों के उत्साह को देख कर लगा कि अभी भी उम्मीद कायम है। और रहनी चाहिए।
जोगी का आशावाद
पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को मानना पड़ेगा। एक मायने में वे सबके प्रेरणास्रोत है। शारीरिक दुर्घटना केकारण और कोई होता तो वह हताश हो गया होता । मगर जोगीजी उत्साह सेबरे रहते हैं। और आए दिन सरकार के नाक में दम किए रहते हैं। लोग घबराए रहते हैं, कि पता नहीं, कब क्या हो जाए। अभी पिछले दिनों जोगी जी ने कह दिया कि भाजपा के बारह विधायक उनके संपर्क में हैं। ये विधायक बेहद नाराज हैं क्योंकि इनकी उपेक्षा हो रही है। जोगी जी का संकेत यही है कि सरकार उनकी मुट्ठी में है। जब चाहे निपटा सकते हैं। जोगीजी के इस बयान से लोग सकते में हैं। जोगी जी यह भी कह रहे हैं कि वे बहुत कुछ कर सकते हैं, मगर जब तक हाइकमान तैयार नहीं होगा, वे कुछ नहीं करेंगे। और यह तय है कि हाईकमान ऐसा कुछ नहीं चाहेगा, कि सरकार गिरे। मतलब केवल हवाहवाई बात है। फिर भी जोगी जी के इस बयान से भाजपा में सुरसुरी तो जरूर छूटी होगी और यह भी देखा जा रहा होगा, कि वे बारह विधायक हैं कौन। हैं भी या नहीं?
राहुल का बचकाना बयान
राहुल गाँधी अब बच्चे नहीं रहे। वे सांसद भी बन गए हैं। इसलिए संभल कर बोलना चाहिए। वे पिछले दिनों कह गए किस संघ और सिमी एक जैसे हैं। कहाँ राष्ट्रविरोधी संस्था सिमी और कहाँ राष्ट्रवाद के लिए जीने-मरने वाली संस्था संघ। संघ कट्टर हो सकता है, लेकिन वह सिमी जैसा आतंकवादी नहीं है। राहुल को किसी ने गलत फीड कर दिया होगा। बेचारे ने कह दिया। स्वाभाविक है कि उनका पुतला जला। राजधानी ही नहीं अनके जगह। बिना सोच-समझे बोलने के कारण ही हमारे यहाँ विवाद पैदा होते हैं। राहुल का बयान कुछ ऐसा ही है जैसे कोई हत्यारे और पंडित को एक ही श्रेणी में रख दे।
प्रतीकों में भी हो सकती है बलि
कुछेक धर्मस्थलों में पशुबलि दी जाती है। पूरा प्रांगण लहूलहान न•ार आने लगता है। जो लोग बलि के पक्ष में होते हैं, उन्हें बुरा नहीं लगता मगर बहुत से ऐसे लोग भी होते हैं,जो खून देख कर ही घबरा जाते हैं। हमारा समाज हिंसा विरोधी रहा है। लेकिन धार्मिक परंपरा के नाम पर हिंसा के मामले में मौन हो जाता है। जबकि लोगों को इसका विरोध करना ही चाहिए। सभ्य समाज में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। अगर किसी की धार्मिक मान्यता है तो उसका रूप बदला जा सकता है। प्रतीकों में बलि ली जा सकती है। नारियल को भी लो प्रतीक बनाते रहे हैं। ईश्वर कभी भी बलि से प्रसन्न नहीं हो सकता। वह त्याग को पसंद करता है। करुणा से वह खुश होता है। सुशिक्षित आम लोगों को यह समझाया जा सकता है। मिल-जुल कर एक वातावरण बनाने की कोशिश करनी चाहिए।
शोर पर ऐतराज
हमारे यहाँ धार्मिकता की भी ऐसी उग्रता देखने में आती है कि मत पूछिए। धर्म-कर्म में लगे बहुत से लोग कई बार अभद्रता की हद से गुजर जाते हैं। लाउडस्पीकर बजाकर आसपास के लोगों को परेशान कर देते हैं। आजकल हर घर में पढऩे-लिखने वाले बच्चे होते हैं। पढ़ाई का कितना दबाव रहता है, यह किसी से छिपा नहीं। जब घर के बाहर फुलसाउंड में लाउडस्पीकर बजता है तो बच्चे पढ़ नहीं पाते। बहुत से लोग शोर के कारण तनावग्रस्त भी हो जाते हैं। अगर ऐसे समय में कोई पीडि़त व्यक्ति आयोजकों के पास जाए तो वे अन्यथा लेते हैं और लडऩे पर उतारू हो जाते हैं। तब लगता है, कि यह कैसी धार्मिकता है जो दूसरों का दिल दुखा कर ईश्वर को खुश करना चाहती है। जबकि ईश्वर तो लोगों के दिलों में भी रहता है। अब लोग आस्था कम और प्रदर्शन में ज्यादा विश्वास करने लगे हैं। इसीलिए वे केवल अपनी सुविधा का ध्यान रखते हैं, दूसरों का नहीं।
फिर वही शराब....
छत्तीसगढ़ इस वक्त नक्सलवाद के साथ-साथ नशावाद से भी पीडि़त है। ऐसा कोई गाँव या शहर नहीं होगा,जहाँ शराब के कारण हिंसक स्थितियाँ न बनती हों। आपस में मारपीट, वैमनस्यता के पीछे शराब भी एक बड़ा कारण है। हालत यह भी होती है कि शराब के कारण घर-परिवारों में मौतें भी होने लगी हैं। पिछले दिनों आरंग क्षेत्र की कुछ जागरूक महिलाएँ रायपुर आईं और शराब बंदी के लिए प्रदर्शन करके लौट गईं। इनमें एक ऐसी महिला भी शामिल थी, जिसके पति की मौत शराब पीने के कारण हुई। अनेक मौतें केवल शराब केकारण हुई हैं। फिर भी शराबखोरी पर अंकुश नहीं लग रहा। प्रशासन को केवल आय चाहिए। शराबविरोधी आंदोलन को चालाकी के साथ दबा दिया जाता है। लेकिन ऐसा करके प्रशासन खुद अपराध कर रहा है। शायद उसे इस बात का अहसास ही नहीं है। गनीमत है कि छत्तीसगढ़ मुर्दा नहीं है। यहाँ शराब के विरुद्ध लोग एकजुट होते रहते हैं। आज नहीं तो कल हो सकता है कोई ऐसी व्यवस्था आए जो शराबबंदी के खिलाफ ईमानदारी से कोई निर्णय ले।

रविवार, 4 जुलाई 2010

छ्त्तीसगढ़ की डायरी

ये है छत्तीसगढ़ की पुलिस की डंडागीरी... 
राजधानी रायपुर में डॉन शब्द से पुलिस इतनी नाराज है कि मत पूछो। इस चक्कर में एक स्कूली छात्र को पीट कर एक पुलिस अधिकारी ने अपनी डंडागीरी दिखाने की शर्मनाक कोशिश कर डाली। पिछले दिनों राजधानी में वाहनों में आग लगने की अनेक घटनाएँ हुईं। ये हरकतें किसी डॉन ग्रुप की हैं। पुलिस के कुछ अति होशियार लोगों ने कुछ लड़कों को पकड़ा और उन्हें डॉन ग्रुप  बताकर जेल भी भिजवा दिया। फिर भी शहर में वाहनों के जलने का सिलसिला चलता रहा। अब पुलिस के एक जिम्मेदार अधिकारी खुद कह रहे हैं, जो लड़के पहले पकड़े गए थे, वे डॉन ग्रुप के नहीं थे। आखिर पुलिस ऐसा करती क्यों है? फर्जी मामले क्यों बनते हैं? पिछले दिनों एक स्कूली छात्र को एक पुलिस अधिकारी ने पकड़ा और डंडे से पीटना शुरू कर दिया। लड़के का कुसूर इतना ही था कि उसकी बाइक पर डॉन लिखा था। लोग इस हादसे से दुखी भी हुए और पुलिस  अफसर की मूर्खता पर हँसे भी। अरे भाई, पहले समझ तो लो। कल को डॉन फिल्म रायपुर में लगेगी तो क्या सिनेमा मालिक की सुटाई शुरू कर दोगे कि डॉन क्यों लगाई? कुछ लोग शरारत कर रहे हैं, तो डॉन शब्द से खुन्नस निकालना कहाँ की बुद्धिमानी है?

नक्सलियों की अंतहीन हरकतें...
बस्तर में लाशें गिनने का काम जारी है। आए दिन नक्सली हत्याएँ कर रहे हैं। वे खुद भी मर रहे हैं। लेकिन वे तो विचारधारा के नाम पर संघर्ष कर रहे हैं। दो मरते हैं सौ को मारते हैं। सिलसिला जारी है। पिछले दिनों सीआरपीएफ के जवानों की हत्या के पीछे उनका तर्क था, कि हमने इसलिए हत्या की, कि  इन लोगों ने कुछ निर्दोष ग्राणीणों की जानें लगी थीं। इस आरोप का कोई सबूत उनके पास नहीं है। अगर कुछ है तो पेश करना चाहिए। इसके पहले भी नक्सलियों ने अनेक हत्याएँ की हैं, उसका क्या कारण बताएँगे? कुल मिलाकर हत्याओं के लिए बहाने चाहिए। लोग तंग आ चुके हैं। इसीलिए अब आमजन मांग करने लगे हैं कि बस्तर में सेना बुलानी चाहिए। वह दिन दुर्भाग्यपूर्ण ही होगा,जब बस्तर में सेना का प्रवेश होगा। सेना आग की तरह फैलेगी और बहुत कुछ नष्ट होगा। नक्सली भी समझ लें कि वे साफ होंगे ही, और बहुत-से आम नागरिक भी चपेट में आ जाएँगे। अब यह बात समझ में भी तो आए, फिलहाल इस आहत समय से हर कोई उबरना चाहता है।
गाय बर्बाद, मटन मार्केट आबाद..?
मटन... आमजीवन में बटन की तरह जरूरी हो गया है। गाय पालने वाले शहर से बाहर भेज दिए गए हैं मगर माँस बेचनेवालों को शहर में सुव्यवस्थित करने की काशिशें हो रही हैं। कुछ अंिहसा प्रेमी इस दृश्य को देख कर चकित हैं। गौ पालन से गंदगी होती है तो क्या माँस के व्यापार से शहर का माहौल शुद्ध हो जाता है? जहाँ माँस कटता है, वहाँ जाकर तो देखें। किस तरह से बदबू फैली रहती है। गंदगी का कैसा आलम रहता है। गाय के गोबर और मूत्र से तो खाद बनती है। गाय आक्सीजन छोड़ती है। वातावरण को शुद्ध बनाने में गाय की बड़ी भूमिका होती है। मगर राजधानी में उल्टा हो रहा है। गायें बाहर भेजी जा रही हैं और शहर में माँस के व्यापार के लिए सुविधाएँ दी जा रही हैं। आखिर क्यों? शायद इसीलिए कि अब माँस खाने और दारू पीने वाले बढ़ रहे हैं और दूध पीने वाले कम होते जा रहे हैं? 
 गजगामिनी की तरह चलते सरकारी काम
सरकारी काम भी नौ दिन चले अढ़ाई कोस की तरह चलते रहते हैं। धीरे-धीरे, हौल-हौले। इसे  ही कहते हैं हाथी-चाल। जो काम समय पर हो सकते हैं, उन्हें लम्बा खींचने के पीछे  एक ही कारण होता है, कमाई...ऊपरी कमाई। जितने दिन काम होता है, उतने दिन तक कमाई का सिलसिला बना रहता है। मिलजुल कर खाने का भी अपना सुख होता है। लेकिन कुछ लोगों के इस सुखार्जन के कारण लोग दुखी हो जाते हैं। शहर में बनने वाले अधिकांश पुल अपने निर्माण की अवधि पार कर चुके हैं। काम चल ही रहा है। लोगों को आना-जाना प्रभावित होता है। लोग आंदोलन करते हैं। धरना देते हैं। लेकिन व्यवस्था को कोई फर्क नहीं पड़ता। वह अपने हिसाब से चलती है। तभी तो वह व्यवस्था है। निर्माण कार्य में लगे लोगों को शहर की सुविधाओं का ख्याल रहना चाहिए, आखिर वे भी नागरिक हैं। लेकिन इतनी बात वे समझ लेते तो लोग परेशान ही क्यों होते?
महँगाई पर घमासान
महँगाई एक मुद्दा है। जिस पर अभी भाजपा गर्म है तो काँग्रेस भी। दोनों तरफ से बयानबाजी चल रही है। अभी भाजपा की सुषमा स्वराज राजधानी आई थीं। उनके नेतृत्व में भाजपा ने धरना दिया। फिर भाकपा का भारत बंद। अब काँग्रेस की छवि का सवाल है तो वह भाजपा पर पिल पड़ी है। उसे भी कुछ कर के दिखाना होगा। इसलिए उनके नेता भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं, कि वह धरना-प्रदर्शन करके लाखों रुपए खर्च कर रही है। यह पैसे की बर्बादी है। अरे भाई प्रदेश भर से लोग आएँगे तो क्या उनके लिए कुछ व्यवस्था ही न हो। बरसात का मौसम है। अगर पानी से बचने की व्यवस्था कर ली गई तो इसे फिजूलखर्ची नहीं कहा जा सकता। सच्चाई तो यही है कि काँग्रेसी भी बेचारे असहज महसूस कर रहे हैं। पेट्रोल,डीजल और यहाँ तक कि केरोसीन के भाव बढ़ गए। इसका असर तो हर चीज पर दीख रहा है।  काँगे्रसी बेबस हैं। करें तो क्या करें?
और चलते-चलते..
डीजीपी के बयान से बवाल....
छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन कवि भी हैं। लोग यह मान कर चलते हैं, कि वे एक लेखक हैं, तो संतुलित व्यवहार करेंगे। लेकिन नक्सली हिंसा के कारण उनका तनाव कुछ ज्यादा  बढ़ गया है इसलिए उनके बयानों पर असर पडऩे लगा है। फिर भी उन्हें धैर्य से काम लेना चाहिए। ऐसा लोगों का कहना है। आखिर वे पुलिस के मुखिया है। पिछले दिनों उन्होंने सीआरपीएफ वालों के लिए कह दिया कि हम उन्हें चलना थोड़े न सिखाएँगे। फिर मीडियावाले बात करना चाह रहे थे, तो वे बोले, नहीं, मैं पहले सिगरेट पीऊँगा। लोगों को आश्चर्य हुआ कि ये क्या हो रहा है। इसके पहले भी डीजीपी महोदय अपने बयानों के कारण सुर्खियों में रहे हैं। बहरहाल, सीआरपीएफ के खिलाफ डीजीपी के बयान को गृह मंत्रालय ने गंभीरता से लिया है। वह नाराज है। डीजीपी की संवेदनशीलता के अनेक उदाहरण भी हैं लेकिन इस बार उनके एक-दो बयान नकारात्मक नंबर वाले हो गए। उनके चहेते लोग यही चाहते हैं, कि भविष्य में फूँक-फूँकर चलें, संभल-संभल कर बोलें ताकि वे विश्वरंजन ही रहें, लोग उन्हें विवादरंजन न बनाएँ।

शनिवार, 26 जून 2010

छ्त्तीसगढ़ की डायरी

छत्तीसगढ़ में नम्बर दो के पैसेवाले नेताओं की बाढ़....
छत्तीसगढ़ में पैसे वाले नेताओं की बाढ़-सी आई है। और लोगबाग कहते हैं,कि यह ठीक भी है। राजनीति अब निर्धनों की चीज भी नहीं रही। बिन पैसा सब सून। अनेक राजनीतिक दलों में धनपतियों की संख्या बढ़ रही है। सामान्य कार्यकर्ता इनके जिंदाबाद में लगा रहता है। इसलिए अब पैसेवाले अनेक नेता धंधे के साथ-साथ राजनीति भी कर रहे हैं। इसका फायदा पार्टी को और बड़े नेताओं को मिलता है। कुछ निर्धन कार्यकर्ताओं का भी भला हो जाता है। बिना फायनेंस के अब कोई काम सधता नहीं। राजनीति भी ऐसा काम है,जहाँ पैसा लगता है। या यूँ कहें कि लोग इन्वेस्ट करते हैं। जैसे धंधे में किया जाता है। पहले राजनीति खाली पेट और खाली जेब से भी होती थी। इसलिए यह जरूरी है, कि अब पेट भरा हो और जेब भी। तब देखिए, कितनी जोरों से नारे लगते हैं। पिछले दिनों लोगों ने यही देखा। राजधानी में जब महंगाई विरोधी रैली निकली तो इसमें अनेक भयंकर धनवान नेता भी शामिल हुए जिनका महंगाई से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं रहा।  इस दृश्य को लोगों ने एक प्रहसन की तरह भी लिया। दुखी जनता का मनोरंजन ऐसी घटनाएँ करती रहती हैं.
छत्तीसगढ़ की शान, ये धनवान...
जी हाँ, छत्तीसगढ़ की शान बनते जा रहे हैं यहाँ के धनवान। और इसमें शामिल हो रहे हैं, यहाँ के प्रशासनिक अफसर, रेलवे के बड़े अफसर, बिल्डरर्स, फायनेंसर, व्यापारी और नेता आदि-आदि। इन सब लोगों के घर लगातार छापे पड़ रहे हैं और करोड़ों की अघोषित संपत्ति सामने आ रही है। अब ग्लोबल मीडिया का दौर है। कोई भी बड़ी खबर देखते ही देखते दूर-दूर तक फैल जाती है। अभी कुछ दिनों से रायपुर में आयकर छापों का सिलसिला जारी है। बाहर रहने वाले लोग छत्तीसगढ़ फोन करके बधाइयाँ दे रहे हैं,कि भाई, छत्तीसगढ़ में तो बड़ी दौलत है। नक्सल समस्या तो खैर अपनी जगह है लेकिन यह धनवालों की भी भरमार है। कौन कहता है, कि छत्तीसगढ़ गरीब है। अमीर धरती में अब अमीर लोग बढ़ रहे हैं। अब बाहर वालों को यह बात कौन समझाए कि यह कमाई उन गरीबों के जेब से ही निकल कर तिजोरियों तक पहुँच रही है, जिसके हिस्से केवल यही एक नारा बचा है-छत्तीसगढिय़ा, सबले बढिय़ा।
नक्सलगीरी के विरुद्ध विकास की लड़ाई
यह बहुत जरूरी है कि विनाश के विरुद्ध विकास का ढाँचा खड़ा किया जाए। बस्तर में नक्सलगीरी के चलते काफी बर्बादी हुई है। जन-धन और अमन-चैन की भयंकर हानि हुई है। इसकी भरपाई बंदूकें कभी भी नहीं कर सकतीं। केवल विकास योजनाएँ और विकास कार्य ही क्षतिपूर्ति कर सकते हैं। योजना आयोग ने अभी हाल ही में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए करोड़ों की विकास योजनाएँ मंजूर की हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने भी बस्तर के लिए जरूरी प्रकल्पों का प्रारूप तैयार कर लिया है। अब विनाश से निपटने के लिए विकास की गंगा बहनी चाहिए। ऐसा करके ही हम नक्सलगीरी का मुँहतोड़ जवाब दे सकते हैं। हिंसा को हिंसा से दबाने की कोशिश अपनी जगह हो सकती है, लेकिन हिंसा और विनाश से मुकाबला करने के लिए विकास योजनाएँ ज्यादा ारगर हो सकती हैं। बस्तर में जिस ईमानदारी के साथ विकास कार्य होनें थे, नहीं हो सके। अब अगर तंत्र जागा है तो उसका स्वागत होना चाहिए।
एकजुट होते आदिवासी...
आदिवासी अब अपनी महत्ता, अपनी ताकत को समझने लगे हैं इसलिए कभी गोष्ठी करके, कभी सम्मेलन कर के तो कभी रैली निकाल कर अपनी एकजुटता और ताकत का भी प्रदर्शन कर रहे हैं। बहुत हो गया आदिवासियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार। अब विकास की धारा के साथ बहने का समय आ गया है। आदिवासी भी बेचैन है। बस्तर में उद्योग लगाए जा रहे हैं, लेकिन वहाँ के आदिवासियों के पुनर्वास की दिशा में कोई ध्यान नहीं दिया जाता। यह एक बड़ी समस्या है। उद्योगपतियों की नजर भी आदिवासी क्षेत्रों में लगी रहती है। वे मान कर चलते हैं, कि वहाँ के लोगों को ेबहला-फुसला कर उद्योग लगाए जा सकते हैं। कुछ मामलों में वे सफल भी हुए हैं, लेकिन अब नहीं हो पाएँगे। इसी को बताने आदिवासी एकजुट हो रहे हैं। इसे अच्छे संकेत के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
औद्योगिक अशांति का विकल्प
पिछले दिनों राजधानी के पास एक कारखाने में एक मजदूर की मृत्यु हो गई। यह स्वाभाविक था,कि वहाँ कार्यरत कर्मियों में गुस्सा आता। उनके एक साथी की लापरवाही केकारण मौत हो गई। उन्होंने तोडफ़ोड़ कर के भारी नुकसान पहुँचाया। हालांकि  यह नहीं होना चाहिए था। शांति के साथ मुआवजे और अन्य माँगें रखी जा सकती थीं। लेकिन कई बार आक्रोश का फायदा कुछ गलत तत्व उठा लेते हैं। फिर भी उद्योगपतियों को सावधानियाँ बरतनी चाहिए। कारखाने में हादसे के बाद कारखाने के मालिक ने कुछ सकारात्मक निर्णय किए, उससे अच्छा संकेत गया है। मृत व्यक्ति के परविार को मुआवजे के साथ-साथ पत्नी को आजीवन पेंशन और बच्चे को नौकरी देने की घोषणा सराहनीय है। निजी क्षेत्रों में इसी तरह के निर्णय लिए जाने चाहिए। औद्योगिक अशांति से निपटने का एक यही विक्लप है जिसकी अब शुरूआत हुई है। श्रमिकों की एकजुटता और समाजिक दबाव के कारण भी ऐसा हुआ है।
फिर गौमाता की बात..
यह स्तंभकार अकसर गो माता की दुर्दशा पर लिखता ही रहा है क्योंकि मीडिया वातावरण बनाने का काम करता है। गाय कोअगर हम माँ का दर्जा देते हैं तो उसके साथ वैसा कुछ व्यवहार करके भी दिखाना चाहिए। यह सुखद संकेत है कि प्रदेश के राज्यपाल भी गौ माता की चिंता करते हुए उसकी सेवा की अपील कर रहे हैं। पिछले दिनों राज्यपाल महोदय एक धार्मिक कार्यक्रम में गए और वहाँ उपस्थित श्रद्धालुओं से यही अपील की कि गौ माता की रक्षा करें। उसे भरपूर चारा-सानी दे। राज्यपाल की अपील सामयिक है। गौपालक दूध बेचकर कमाई में तो काफी आगे रहता है मगर गाय की देखरेख वह शहर के भरोसे छोड़ देता है। यही कारण है कि बहुत-सी गायें राजधानी में इधर-उधर भटकती नजर आती हैं। किसी न किसी मुक्कड़ में गायें कचरे को खंगालती मिल जाएँगी। गो पालक को पता नहीं शर्म आती है, कि नहीं, मगर राज्यपाल महोदय को दुख जरूर हुआ, इसीलिए उनको अपील करनी पड़ी।

शुक्रवार, 18 जून 2010

छ्त्तीसगढ़ की डायरी

समाजसेवियों का नक्सल-प्रेम ?
नक्सलियों के पक्ष में हो जाना एक तरह का बौद्धिक फैशन-सा बन गया है। दिल्ली से लेकर रायपुर तक पहुत से बुद्धिजीवियों ने नक्सलियों के प्रति बड़ी सहानुभूति दिखाई देती हैं। इसका एक कारण यह है कि बुद्धिजीवी सामाजिक परिवर्तन चाहता है और नक्सली भी। लेकिन नक्सलियों का रास्ता हिंसक है इसलिए उनको समाज की मान्यता नहीं मिल पा रही। बुद्धिजीवी सीधे-सीधे नक्सल-समर्थक नहीं हो सकता इसलिए वह अप्रत्यक्ष रूप से खेल करता है। पिछले दिनों दिल्ली में रह कर सामाजिक कार्य करने वाले एक स्वामी रायपुर आए और जेल में बंद एक नक्सली नेता से मिले। इसके कुछ दिन पहले भी ये स्वामी रायपुर की एक शांति सभा में भाषण दे रहे थे। बीच एक उन्होंने एक लाइन यह भी बोली कि आपरेशन ग्रीनहंट बंद होना चाहिए। तभी लोगों का माथा ठनका था। यह ठीक है कि क्यों आदिवासी मरे या नक्सली भी क्यों मरें। सब जीवित रहें, लेकिन इस वक्त जो नक्सलीआम लोगों की निर्मम हत्याएँ कर रहे हैं, तब कोई समाजसेवी आपरेशन ग्रीन हंट बंद करने की बात करता है, तो समझ में आ जाता है, कि यह शख्स हिंसा के पक्ष में खड़ा है। 
पुलिस-बैठकों में राजनीतिक हस्तक्षेप...?
जी हाँ, इन दिनों इस बात को लेकर बहस हो रही है, कि पुलिस वाले जो बैठकें करते हैं, उनमें जनप्रतिनिधियों को बुलाया जाना चाहिए कि नहीं। गृह मंत्री ने पुलिस को आदेश दिया है, कि उनकी बैठकों में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए। इनके सुझाव से अपराधों पर नियंत्रण हो सकता है। गृहमंत्री ठीक फरमाते हैं। पुलिस पर दबाव बना रहे, वरना वह निरंकुश हो सकती है। इस दृष्टि से यह बहुत जरूरी है। लेकिन बहस तब शुरू होती है, जब हमंारे कुछ जनप्रतिनिधि अपने अधिकारों का दुुरुपयोग करने की कोशिशें करते हैं। अपराधियों को छुड़वाने की कोशिश एक बड़ा अपराध है। सब नहीं करते लेकिन कुछ नेता ऐसा करते हैं। बस, पुलिस इनकी आड़ में यह प्रचारित करती है, कि हम पर दबाव बनाया जाता है। पुलिस पर दबाव बना ही रहना चाहिए ताकि वह गलत काम न कर सके। लोकतंत्र में पुलिस पर लाके का अंकुश जरूरी है। किसी के साथ अन्याय न हो सके। इस दृष्टि से यह जरूरी है, कि पुलिस और राजनीति का तालमेल बना रहे। पुलिस स्वच्छ सामाजिक छवि के कार्यकर्ताओं को भी अपने साथ जोड़े ताकि उसे दिशा-निर्देश मिलता रहे।
आदिवासी अस्मिता की एकजुटता..
पिछले दिनों राजधानी में आदिवासियों का एक बड़ा सम्मेलन हुआ। किसने कराया, कितने लोग पहुँचे, किसके गुट का था यह सम्मेलन यह कुछ लोगों के लिए चर्चा का हो सकता है,लेकिन यह चर्चा इस बात की होगी कि अब आदिवासी अस्मिता जाग उठी है। खैर, जगी तो पहले भी थी, लेकिन अब वह हस्तक्षेप की स्थिति में भी है। सम्मेलन में पाँचवीं अनुसूची को लागू करने पर जोर दिया गया तो आदिवासियों के लिए आरक्षण बढ़ाने की मांग भी उठी। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से हजारों की संख्या में आदिवासी गायब है, इनका अता-पता नहीं चल रहा है। इस पर भी चिंता व्यक्त की गई। कुल मिला कर आदिवासियों ने अपने विरुद्ध हो रहे व्यवहार को लेकर नाराजगी भी व्यक्त की। यह सिलसिला जारी रहे और आदिवासी समाज राजनीतिज्ञों की हाथ की कठपुतली न बन कर अपने अधिकार के लिए इसी तरह आवाज बुलंद करते रहेतो आदिवासियों का कोई शोषण नहीं कर सकेगा।
बस्तर में एक और सत्याग्रह...
गाँधीजी ने आजादी की लड़ाई के दौरान जो प्रयोग किए, वे आज तक अपना असर दिखा रहे हैं। इनमें एक है सत्याग्रह। 19 जून से अमित जोगी अपना सत्याग्रह शुरू कर रहे हैं। अमित पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र हैं। इस अभियान से अमित की छवि को निखर सकती है। वे बस्तर की बदहाली के विरुद्ध सत्याग्रह शुरु कर रहे हैं। 19 जून महत्वपूर्ण तारीख है। सौ साल पहले आज ही के दिन महान सेनानी और मसीहा गुंडाधूर के धूमकाल ने आदिवासी अस्मिता को बचाने  के लिए इतिहास रचा था। अमित और उनके एक सौ आठ साथी पच्चीस जून तक दंतेवाड़ा से सुकुमा तक पद यात्रा करेंगे और लोगों से मिल कर नक्सलवाद एवं अन्य समस्याओं के विरुद्ध लोकजागरण का काम करेंगे। यह एक रचनात्मक एवं साहसिक पहल है। ऐसे दौर में जब नक्सलवाद का आतंक है, बस्तर में पदयात्रा करना निसंदेह सराहनीय पहल है।
गायों की तस्करी रोकना जरूरी
छत्तीसगढ़ में गो वध पर रोक है। यहाँ कोई कसाईखाना भी नहीं है। यहाँ गौ सेवा आयोग भी कार्यरत है। फिर भी चोरी-छिपे कुछ शातिर लोग गायों की तस्करी करते रहते हैं। आज भी गायों की तस्करी जारी है। लोग ज्यादा चालाक हो गए हैं। वे पत्थलगाँव और जशपुर आदि क्षेत्रों से गायों को चराते हुए राँची तक ले जाते हैं। फिर ये गायें कसाइयों को सौंप दी जाती हैं। इसलिए यह जरूरी है, कि रायगढ़ जिले की पुलिस और वहाँ काम करने वाले गौ भक्त सतर्क हो कर देखें कि गाय चराने के नाम पर गायों को कहाँ ले जाया जा रहा है। गायों को ट्रक में ले जाने से शक हो जाता है और गायें जब्त कर ली जाती हैं इसलिए गो माफियाओं ने एक रास्ता निकाला है, कि वे गायें चराते हुए सीमा पार कर जाते हैं। भले ही गाय भूखी-प्यासी रहे, उनको क्या फर्क पड़ता है। इसलिए यह जरूरी है कि राज्य की सीमा पर वनोपज की जाँच की तरह यह जाँच भी होनी चाहिए कि जो गायें दूसरी ओर ले जाई जा रही है, वे चराने के लिए ले जाई जा रही है, काटने के लिए।
स्वाद के मारे मनुष्य बेचारे...
स्वाद जो न कराए थोड़ा है। स्वाद के चक्कर में लोग गाय, बकरी, सुअर, मुर्गी, तीतर-बटेर, चूहा और न जाने क्या-क्या हजम कर जाते हैं। अब तो राजधानी के कुछ होटलों में जीव-जंतुओं को व्यंजनों की तरह परोसा जा रहा है। लोग-भाग अब केंकड़े भी स्वाद से खाने लगे हैं। दरअसल मनुष्य प्रयोगधर्मी है। उसे शाकाहार खाते-खाते बोरियत होने लगती है, तो वह मांसाहार की ओर लपकता है। और अपनी फितरत भूल कर माँसाहार चाव से करता है। मानव की इसी कमी का फायदा उठा कर होटल वाले भी एक कदम आगे बढ़ जाते हैं और केकड़े को भी एक डिश की तरह प्रचारित करके परोस देते हैं। बहुत से लोग नाक-भौं सिकोड़ सकते हैं, कि ये भी क्या डिश है। लेकिन नहीं, इस नए दौर में यह भी एक डिश है। इसे खाने के लिए लोग घर का स्वादिष्ट खाना छोड़ कर होटलों या ढाबों की ओर भागते हैं।

शनिवार, 12 जून 2010

छ्त्तीसगढ़ की डायरी

सेना के हवाले नहीं होगा बस्तर
बस्तर और अन्य राज्यों के लिए सेना के इस्तेमाल को लेकर आखिर दिल्ली में सहमति नहीं बन पाई। यह निर्णय किया गया, कि पुलिस और अर्ध सैनिक बलों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस निर्णय की सराहना ही की जानी चाहिए, क्योंकि सेना को बस्तर कोसेना के हवाले करने के बाद जो कुछ होता, वह भी अपने किस्म की एक नई समस्या ही हो जाती, जिसे लेकर अभी पूर्वोत्तर के कुछ राज्य जूझ रहे हैं। दरअसल सेना जब किसी अभियान में उतरती है, तो वह यह नहीं सोचती कि कम से कम नुकसान हो। उसका लक्ष्य तो होता है वह शत्रु, जिसको खलास करने के लिए वह आगे बढ़ती है। फिर रास्ते में कोई दोस्त आया, कि सामान्यजन आए, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता: सबका सफाया होता रहता है। इसलिए सेना के इस्तेमाल के पहले सौ बार सोचना चाहिए। बस्तर के लोग राहत की साँस ले रहे हैं, कि सैन्य कार्रवाई टल गई। अब पुलिस बल और अर्ध सैन्यबल प्रशिक्षित हो कर नक्सलियों से मुकाबला करे और बस्तर की शांति बहाल करने के धर्म का निर्वाह करें। यह हमारा आंतरिक मामला है, जिससे निपटने में हमारी पुलिस सक्षम है, लेकिन वह पहले दृढ़ संकल्पित तो हो।
अफसरों के आगे मंत्रियों की नहीं चलती?

आए दिन ऐसी बातें सामने आती रहती हैं। भुक्तभोगी यही चर्चा करते हैं, कि मंत्री ने कह दिया, आदेश कर दिया, लेकिन अफसर ने काम को लटका दिया। बेशक यह सब लोकतंत्र की सेहत के लिए अच्छे लक्षण नहीं हैं। लोग जनप्रतिनिधियों के पास जाते हैं। अपने काम के लिए उनका आदेश ले कर इधर-उधर भटकते रहते हैं, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी काम नहीं होता। अफसर नियम-कायदे में उलझा देते हैं। जबकि लोकतंत्र में मंत्री का आदेश ही कई बार नियम के रूप में दर्ज हो जाता है। लेकिन यह भी सच है कि जब जनप्रतिनिधि को कोई काम टालना होता है, तो वह अफसरों से साँठगाँठ करके आमजन को बुदधू बनाने का खेल करते हैं। नेता-अफसर एक-दूसरे पर आरोप लगा कर जनता को ठगने का काम करते रहते हैं। यह एक तरह का अपराध है,लेकिन यह अपराध निरंतर जारी है... क्योंकि अंतत: अफसर ही मंत्री पर... भारी है। लोग प्रतीक्षारत है, कि ये शातिर अफसर हल्के पड़ेंगे।
लुटेरे समान की रखवारी करेंगे ...?
सरकार जब पर्यावरण के संरक्षण के लिए उद्योपतियों से अपील करती नजर आती है, तो लोगों को यही लगता है, कि कोई लुटेरों से यह कहे कि भाई, हमारे सामान की हिफाजत करना। जो कारखाने हमारे पर्यावरण की हत्या कर रहे हैं, उनसे अपील करने से बात नहीं बन सकती। उनसे तो निर्देशित और दंडित करने की भाषा ही बोलनी होगी। आज रायपुर,बिलासपुर, कोरबा से लेकर रायगढ़ तक औद्योगीकरण का भयंकर असर देखा जा रहा है। इन इलाकों के साथ अन्य क्षेत्रों में भी पेड़ साफ हो गए, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं। इसलिए अब यह कड़े आदेश जारी हों कि उद्योगपति अपने आसपास पेड़ों की भरमार करे। पेड़ लगाए और उसे संरक्षित करने की जिम्मेदारी ले। वरना यहाँ पर्यावरण अभियान एक फैशन की तरह चलता है। लोग फोटू-शोटू खिंचवा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री करने में माहिर हैं।
समाजसेवा के पाखंड को भोगते हुए
समाजसेवा जब दिखावे और अपनी सामाजिक छवि चमकाने का सबब बन जाती है, तब ऐसा ही होता है। दो साल के शिशु के शव को उसके गंतव्य तक पहुँचाने के लिए कोई एंबुलेंस नहीं मिलती क्योंकि शिशु के परिजन के पास पर्याप्त पैसे नहीं होते। पिछले दिनों राजधानी में ऐसा ही हुआ। अंबेडकर अस्पताल में इलाज हेतु लाया गया एक शिशु मर गया। उसे गाँव ले जाना था, लेकिन माता-पिता के पास पाँच रुपए किलोमीटर दर से एंबुलेंस को देने के लिए पैसे ही नहीं थे। आखिर बेचारे बस से ले गए। यह नियम विरुद्ध था, फिर भी करना पड़ा। सामाजिक संस्थाओं का यह दायित्व है कि जब उन्होंने एंबुलेंस सेवा शुरू की है, तो ऐसी स्थिति आने पर वे नि:शुल्क सेवा दें। वरना अपने आप को समाजसेवी कहने का ढोंग न करें। वे साफ-साफ कहें,कि समाजसेवा हमाराधंधा है। जिसे परता पड़े वो आए, वरना नमस्ते... 
जेलों में सत्साहित्य..
गायत्री परिवार देश में युगनिर्माण योजना का काम वर्षों से कर रहा है। उनका नारा सबको अच्छा लगता है-हम बदलेंगे, युग बदलेगा। लोग बदलें या न बदलें, अभियान जारी है। अब गायत्री परिवार ट्रस्ट छत्तीसगढ़ की जेलों में अपना सत्साहित्य पहुँचा रहा है, ताकि वहाँ कैदी इन्हें पढ़ें और अपने जीवन को बेहतर बना कर बाहर निकलें। जेल में कैदी बेहतर बनें और जेल के बाहर रहने वाले अनेक बुराइयों की कैद में रहने वाले सामान्यजन तक भी ऐसे साहित्य को पहुँचाना चाहिए ताकि जेल जाने की नौबत ही क्यों आए। सचमुच इस दौर को भले साहित्य की जरूरत है। फिर चाहे वह लिखित साहित्य हो या फिर टीवी के चैनलों के माध्यम से पहुँचे। जिस तेजी के साथ राजधानी में या छत्तीसगढ़ में अपराध बढ़ रहे हैं, उन्हें देखकर लगता है, कि अब उत्कृष्ट साहित्य के जरिए ही समाज को जागृत किया जा सकता है लेकिन वैसे आधुनिक साहित्य से लोगों को बचाना चाहिए, जो आदमी को आधुनिक बनने के लिए कपड़े उतारने की सलाह देता है।
सुंदरीबाई पर हमें गर्व है..
सरगुजा की सुंदरीबाई ने पूरी दुनिया में अपना और अपने छत्तीसगढ़ का नाम रौशन करने का काम किया है। सुंदरीबाई भित्ति चित्रकला के जरिए छत्तीसगढ़ का नाम रौशन कर रही हैं। अभी उन्होंने फ्रांस में अपनी कला का प्रदर्शन किया। वे जब दीवारों को अपनी कला से जीवंत करती हैं, तो लोग अभिभूत हो जाते हैं। अनेक देशों में सुंदरी ने अपनी कला को पहुँचाया है,लेकिन अफसोस यही है, कि अपनी ही धरती पर उसे पूरा सम्मान नहीं मिला। उनके पहले सोनाबाई ने सरगुजा का सिर ऊँचा किया। उसी परम्परा को सुंदरी आगे बढ़ा रही है। छत्तीसगढ़ में ऐसी अनेक प्रतिभाएँ हैं। इन्हें प्रोत्साहित और संरक्षित करने की जरूरत है। अगर राज्य में ललित कला अकादेमी जैसी संस्था बन जाए तो उसके माध्यम से यहाँ के कलाकारों को आगे बढ़ाया जा सकता है। सुंदरीबाई जैसे लोगों को भरपूर सम्मान (और मानधन भी...) दे कर किसी पद पर बिठाया जाना चाहिए और उनकी देखरेख में भित्तिकला जैसी अनेक कलाओं को लोकव्यापी बनाने की पहल होनी चाहिए। 

शुक्रवार, 4 जून 2010

अरुंधती राय द्वारा खुलेआम हिंसा का समर्थन...?

मैं नक्सलियों और उनकी पैरोकार अरुंधती राय को अब क्या कहूं. दोनो की हरकतों पर रोना ही आता है. पहले नक्सलियों कि बात. इनके कारण पिछले दिनों ज्ञानेश्वरी रेल हादसा हुआ। इस हादसे में छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों के अनेक लोग मारे गए। नक्सलियों ने ट्रेन उड़ाई दी थी। अब कह रहे हैं कि भूल हो गई। माफी दई दो। हम मालगाड़ी को उड़ाना चाहते थे। अब हम खुद ट्रेनों की रक्षा करेंगे। हमें दुख है कि हमारे कारण सैकड़ों लोग मर गए। नक्सलियों की बात सुनकर लोग कह रहे हैं, वाह रे नक्सलियो, तुमने तो बड़ी मासूमियत के साथ खेद व्यक्त कर दिया, लेकिन उन परिवारों की भरपाई कैसे होगी, जिनके परिवार के लोग बेवजह जान गवाँ बैठे? और आखिर ऐसे काम करने ही क्यों जिससे बाद में दुख हो। ये रक्तपात, ये हिंसा,ये ब्लास्ट तुम लोग छोड़ क्यों नहीं देते? और उधर इन लोगों की खैरख्वाह लेखिका अरुंधती राय की हिम्मत देखो। डंके की चोट पर कह रही है, कि मैं नक्सली हिंसा की वकालत करती रहूँगी क्योंकि वर्तमान समय में गाँधीवादी तरीके से समस्याएँ नहीं सुलझ सकती। मुझे भले ही जेल में डाल दो, लेकिन मैं नक्सलियों के साथ हूँ। वाह रे अरुंधती, अकल से पैदल महिला...अगर बुद्धिजीवी भी बुद्धिहीन हो कर हिंसा का साथ देने लगेंगे तो देश का भगवान ही मालिक है। ये कैसा सामाजिक आंदोलन है,जिसमें मासूम बच्चों की भी हत्या कर दी जाती है.
आई पुलिस की जान में जान
रायपुर में पुलिस साइंस काँग्रेस के दो दिवसीय सम्मेलन ने लगता है, पुलिस में नई जान फूँक दी है। सम्मेलन के बहाने यहाँ की पुलिस को राष्ट्रव्यापी सपोट्र्र मिला है। लेकिन ऐसा भी न हो कि राज्य की पुलिस अपनी इस सफलता पर कुप्पा हो जो और केंद्र को ही हड़काने की कोशिश करने लगे। इसे हिम्मत ही कहेंगे न, कि हमारा केंद्रीय गृहमंत्री जो कहते हैं, उसको राज्य की पुलिस गंभीरता से नहीं लेती। राज्य की पुलिस केंद्र को समझा रही है कि वो नक्सली समस्या की गंभीरता को नहीं समझ रहा है। चिदंबर साहब तो हौसला बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन यहाँ की पुलिस पहले से ही हौसले में है। अगर यही रफ्तार रही तो केंद्र से हम किस आधार पर मदद माँगेंगे? अकड़ कर बात नहीं हो सकती। केंद्र की अनुशंसाओं को गंभीरतापूर्वक लिया जाना चाहिए, और उन्होंने जो निर्देश दिए हैं, उनके अनुपालन की कोशिश भी होनी चाहिए। जब यह मान लिया गया है, कि नक्सल समस्या राष्ट्रीय समस्या है तो केंद्र की बात सुननी चाहिए। केंद्र के मार्गदर्शन पर चलना ही पड़ेगा। केंद्र तो अब बस्तर में सब एरिया खोलने की मानसिकता भी बना रहा है। ऐसे समय में अगर यहाँ की पुलिस केंद्र को नासमझ करार दे तो यह उचित नहीं।
बाल न बाँका कर सके....
भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के बारे में अगर यह बात कही जाए तो गलत न होगा कि अकसर इनका बाल बाँका नहीं होता। भले ही जग बैरी हो जाए। ठीक है कि कभी-कभार ये बेचारे किसी घोटाले में, किसी बड़े भ्रष्टाचार में फँसते न•ार आते हैं, कभी-कभी फँस भी जाते हैं, लेकिन कुछ दिन बाद साफ-साफ बच निकलते हैं। कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ के एक आईएएस अधिकारी बाबूलाल अग्रवाल करोड़ों-अरबों रुपए के भ्रष्टाचार में फँसे, निलंबित भी किए गए लेकिन चार महीने बाद वे बहाल कर दिए गए। तर्क दिया गया कि आयकर विभाग ने पुख्ता दस्तावेज नहीं सौंपे। लोग चर्चा कर रहे हैं, कि आखिर ये पुख्ता दस्तावेज क्या होता है। जो कुछ था, पानी की तरह साफ तो था। कितने सबूत मिले थे। वैसे सरकार कह रही है, कि विभागीय जाँच चलती रहेगी। पता नहीं इस जाँच से इस अधिकारी को कोई आँच आएगी या नहीं लेकिन साँच तो यह है कि इस अधिकारी को राजस्व मंडल का सदस्य बनाया गया है। अब लोग उम्मीद कर रहे हैं कि इनके अनुभव से राज्य के राजस्व में कुछ न कुछ तो इजाफा होगा ही।
गर्भवती गाय की अकाल मौत
गाय की मौत हो जो तो वह कोई खबर नहीं बन पाती। पिछले दिनों एक गर्भवती गाय न्यू पंचशील इलाके में मर गई। सड़क में गहरा अंधेरा था। गाय का दूध पी कर मुटाने वाले गोपालक ने अपनी गाय को यूँ ही आवार घूमने के लिए छोड़ दिया था। खुद तो गाय के लिए चारा-पानी का बंदोबस्त नहीं करते, लोगों की दया पर छोड़ देते हैं। या तो लोग कुछ देदें या गाय कचरे में से कुछ खाने लायक खोज ले। तो ऐसे किसी महान गोपालक की गाय अंधेरे में देख नहीं पायी और एक गहरी नाली में जा गिरी। कुछ लोगोंने उसे जैसे-तैसे बाहर निकाला, लेकिन तब तक बेचारी की हालत खराब हो चुकी थी। उसकी टाँग टूट चुकी थी। उसके पेट का बच्चा भी मर चुका था। कुछ देर बाद गाय भी चल बसी। राजधानी में इन दिनों बहुत-सी गायें रात को घूमती फिरती हैं। अब यह बहुत जरूरी हो गया है कि नगर निगम का रात्रिकालीन उडऩ दस्ता ऐसी गायों को पकड़े और गौ शालाओं में भिजवा दे। और गोपालक से जुर्माने के रूप में मोटी रकम भी वसूले।
भू माफियाओं से बचाओ...
बहुत पहले एक गाना बजता था- मुझे मेरी बीवी से बचाओ। अब रायपुर शहर को गाना पड़ रहा है, मुझे भू माफियाओं से बचाओ। इनका बस चले तो पूरे रायपुर को उजाड़ कर एक नई टाउनशिप ही बसा दें। पेड़ काट दें, तालाब पाट दें। स्कूल गिरा दें। खेल मैदान पर मकान-दूकान या व्यावसायिक परिसर खड़ा करे दें। शॉपिंग मॉल बना दें। लेकिन बेचारों का जोर भी चल नहीं पा रहा है। वैसे कोशिश कर कर के अनेक तालाबों को पाट ही चुके हैं। और अब रायपुर के खो-खोपारा के तालाब को हजम करने की तैयारी कर रहे थे। उन्तीस एकड़ का तालाब सिमट कर नौ एकड़ का रह गया, तब नगर निगम और लोगों की आँखें खुलीं। इसी तरह सूरजबाँधा तालाब पर भी कब्जा करने की साजिश हो रही थी। लोगों की जागरूकता से ये तालाब कब्जामुक्त हुए। जरूरी है कि इन तालाबों का गहरीकरण हो ताकि बरसात में ये लबालब हो सके।
राजधानी में चिपको आंदोलन
मैं सुंदरलाल बहुगुणा के चिपको आंादेलन को याद कर रहा हूँ। उन्होंने टिहरी-गढ़वाल तरफ पेडों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन चलाया था। आज भी चला रहे हैं। अब कुछ लोगों ने यहाँ भी चिपकों आंदोलन शुरू किया है। रायपुर और आसपास जिस तेजी के साथ पेड़ कट रहे हैं, उसे देखकर लगता है, कि कुछ लोग पेड़ों से पिछले जनमम् का कोई बदला भँजा रहे हैं। सड़क चौड़ी करनी है तो पेड़ काट दो। अरे भाई, पेड़ों को सलामत रहने दो और पेड़ों के हिसाब से यातायात को एडजस्ट करने की कोशिश करो। अगर नहीं कर सकते और पेड़ काटना बहुत ही जरूरी है तो पेड़ को उठाकर शिफ्ट करने की कोशिश करो। यह भी नहीं कर सकते तो एक पेड़ काटो और बदले में सौ पौधे लगाओ और उसकी देखभाल करो। यह नहीं कर सकते तो घर बैठो। छुट्टी की जाए ऐसे अफसर की, जिसने पेड़ काटे और बदले में हमें धूप दी, गरमी दी। छाँव का एक टुकड़ा भी न दिया। चिपको आंदोलन वालों से आग्रह है कि वे इस आंदोलन से चिपके रहें, वरना होता यह है कि बहुत से आंदोलन शुरू होते हैं और अखबारों में छपने के बाद दम तोड़ देते हैं।

शनिवार, 29 मई 2010

छ्त्तीसगढ़ की डायरी

यह गुंडई तो न करे पुलिस...
बिलासपुर जिले के मस्तूरी में पुलिस के दो सिपाहियों ने जो गुंडागर्दी की है, उसे देख कर राजधानी में लोगों को उस उपन्यास की याद ताजा हो आई जिसक नाम था वर्दीवाला गुंडा। वर्दी का मतलब गुंडागर्दी तो न हो। भगवानदास नामक एक खेतिहर मजदूर को सबेरे-सबेरे दो पुलिस वाले पूछताछ के लिए रोकते और थाने चलने के लिए कहते हैं। भगवानदास कारण पूछता है तो वर्दी के पीछे छिपा गुंडा जाग जाता है। बस गालियाँ-मारपीट शुरू। दो दिन तक उसे बुरी तरह पीटा जाता है। उसे पानी भी नहीं पीने दिया जाता। भाई खाना लेकर आता है तो उसे भगा दिया जाता है। दो दिन बाद बेचारा जमानत पर छूटता है और एसपी से मिल कर शिकायत करता है। एसपी उसका मुलाहिजा कराते हैं। इसके बाद होना तो यह चाहिए कि दोनों सिपाही निलंबित हों। उन पर और कड़ी कार्रवाई हो। वर्दी का मतलब यह नहीं कि किसी को भी राह चलते रोक दिया और पिटाई सुरू कर दी। ऐसी शिकायतें मिलने पर दोषी लोगों पर फौरन कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन ऐसा कम होता है। किसी पुलिस का कोई अपराध सामने आता है तो पुलिस विभाग लीपापोती करने में भिड़ जाता है। और यहीं से लोगों के मन में आक्रोश पनपता और सीधा-सादा आदमी भी अपराध की दिशा में मुड़ जाता है। अगर भगवानदास जैसे मजदूर अगर प्रतिशोध लेने के लिए कल को अपराधी या जंगल जा कर नक्सली बनते हैं, तो दोष किसका है, यह सोचने की बात है।
ये काले कारनामे वाले लेखक...
पिछले दिनों रायपुर में एक साहित्यिक कार्यक्रम में दिल्ली से पधारे एक लेखक जो जन्मजात ही शोक-मुक्त है, यानी 'अशोक' हैं, ने भाषण देते-देते कहा कि मुझे एक व्यक्ति का नाम नहीं याद आ रहा था तो मैं उस दिन कुछ ज्यादा ही दारू पी गया। उनके भाषण के इस अंश की जमकर चर्चा हुई। हो भी क्यों न। आजकल बहुत-से लेखकों की यह बीमारी हो गई है, कि वे अपने गलत-सलत कारनामों को इस तरह पेश करते हैं गोया उन्होंने बहादुरी का काम कर दिया है या फिर वे गाँधी की तरह सत्य के प्रयोग कर रहे हैं। अपनी लम्पटताओं को बताना सत्य का प्रयोग नहीं होता। एक लेखक ने एक बार एक तथाकथित बड़ी पत्रिका में अपने पापों का शान से जिक्र किया करते हुए बताया था, कि कैसे उसने बस्तर, रायपुर और बिलासपुर में औरतों के साथ मुँह काला किया। अपने घटिया कारनामों को उजागर करके ये लेखक सोचते हैं, कि हमने बड़े साहस का काम किया लेकिन वे भूल जाते हैं, कि उनकी इन गलत हरकतों को नये लेखक एक परम्परा की तरह भी लेते हैं, कि वो कर रहा है, तो हम क्यों नहीं कर सकते।
ये लाल रंग कब हमें छोड़ेगा?
हर दूसरे-चौथे दिन नक्सलियों द्वारा खून बहाने का सिलसिला जारी है। सामान्य जन की हत्याएँ भी ये लोग करने लगे हैं। आखिर ये कैसी क्रांति है जो लगातार खून माँग रही है। निरीह लोगों का खून बह रहा है और क्रांति करने वाले लोग अंधेरे में कहीं छिप कर अट्टहास कर रहे हैं। सरकार की विफलता पर हँस रहे हैं। म•ााक उड़ा रहे हैं। उन्हें चुनौती दे रहे हैं। हम अपने तंत्र को आखिर कब इतना मजबूत करेंगे कि नक्सली नाकाम हो जाएँ। पिछले दिनों पुलिस ने एक नक्सली को पकड़ा। इसी तरह सक्रियता के साथ काम करें तो और भी गिरफ्त में आएँगे। जरूरत इस बात की है कि पुलिस और अर्धसैनिक बल जुझारू तरीके से काम करे। बस्तर को एक चुनौती के रूप में लें, सजा के तौर पर नहीं। वहाँ जाने का मतलब है कि हम एक मिशन में जा रहे हैं। सरकार नक्सलियों से जूझने वाले लोगों के लिए और बेहतर पैकेज लाए। मनुष्यता विरोधी नक्सलियों की हरकतें देख कर लगता नहीं कि ये इतनी आसानी से लाल रंग को छोड़ेंगे। हमें ही उनसे मुकाबला करने के लिए तैयार रहना होगा।
महिला मुक्ति का ये चेहरा..
पिछले दिनों एक गाँव की एक महिला सरपंच को पिछले दिनों सिर्फ इसीलिए सरेराह पीटा गया, कि वह अवैध कब्जे हटा कर अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रही थी। ऐसी कुछ और घटनाएँ सामने आई हैं, जब महिला सरपंच या अध्यक्ष के कार्यों को लोगों ने पसंद नहीं किया और महिला पदाधिकारी का अपमान करने की कोशिश की। दरअसरल पुरुषप्रधान समाज व्यवस्था में स्त्री को अधिकार सम्पन्न देखना बहुत-से पुरुषों को अब भी नागवार गुजरता है। जबकि सच्चाई यह है कि अब स्त्री को कोई रोक नहीं सकता। उसके हाथों में अधिकार देने ही होंगे। तभी वह कुछ काम कर सकती है। बराबरी का दर्जा भी तभी मिलेगा। अब समय आ गया है कि लोगों में यह जागृति भी लाई जाए कि वे अधिकारसम्पन्न औरतें की कार्रवाई से निपटने के लिए कानून का सहारा लें न कि बाहुबल का।
तरणताल बनाम मरणताल
गरमी के कारण लोगों का बुरा हाल है। जो लोग साधनसम्पन्न हैं, वे वातानुकूलित क क्षों में रह लेते हैं लेकिन अभी भी एक बड़ा वर्ग तपती दोपहरी में पसीना बहाते हुए काम करने पर विवश है। पैसे वाले लोग तो शाम को किसी महँगे तरणताल (स्वीमिंग पूल)में जाकर तैर कर शीतलता भी प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन गरीब कहाँ जाए? उसके हिस्से के सारे ताल मरणताल (सूखे तालाब)बन गए है। या तो सूख गए है, या इतने गंदे हैं कि उनमें तैरना भी एक चुनौती है। फिर भी वे काम तो चला ही लेते हैं। लेकिन इसी बहाने दो तरह का समाज राजधानी में साफ-साफ दिखता है। एक तरणताल वाला समाज, जिसके पास सारा वैभव सिमट गया है, और दूसरा है मरणताल वाला समाज, जिसके पास पीने का स्वच्छ पानी भी नही है। तरणताल में डुबकी लगाना तो दूर की बात है।
ये प्रहसन बंद हो...
तालाब गहरीकरण या अन्य किसी कार्य केलिए जब कोई नेता या अफसर हाथ में कुदाली या फावड़ा थामे फोटो खिंचवाता है तो लोगों को समझ में आ जाता है कि यह एक प्रहसन है। इस पर केवल हँसा जा सकता है। हमारे अभिजात्य वर्ग के लोग कुदाली-फावड़े को छू कर केवल धन्य ही न करें, वरन एक-दो फुट का गड्ढा भी करें। लोगों को यह भी तो दिखे कि उन्होंने कुछ पसीना भी बहाया है और सचमुच लोगों को प्रेरणा दी है। केवर कुदाली उठाकर एक-दो घाँव मार देने से से प्रहसन तो हो सकता है, किसी का प्रेरणा नहीं मिल सकती। जब कभी ऐसे अवसर आएँ तो अभिजात्य वर्ग के लोगों को सब कुछ भूलभाल कर भिड़ जाना चाहिए और सचमुच कुछ घंटे श्रमदान करके इतिहास रच देना चाहिए। बेशक वे ऐसा कर सकते हैं, लेकिन आसपास के चमचेनुमा लोग ऐसा करने ही नहीं देते। यही कारण है कि हमारे बहुत से काम केवल प्रहसन बन कर रह जाते हैं।

सोमवार, 17 मई 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

विकास के रास्ते की ओर सरकार...
सरकार बस्तर के विकास को ले कर अब ज्यादा चिंतित नजर आ रही है। ये अच्छे संकेत हैं। राजधानी रायपुर से लेकर दिल्ली तक अब नेता बस्तर के बारे में सोच रहे हैं। सोनिया गाँधी ने भी स्वीकार किया कि नक्सलवाद के पीछे कारण यही है, कि वहाँ ठीक से विकास कार्य ही नहीं हुुआ। राज्य सरकार अब विकास की दिसा में तेजी के साथ बढ़ रही है। बस्तर के जारों शिक्षित नवयुवकों के लिए सौ दिन में  नौकरी देने का एक पैकेज भी ला रही है। मुख्यमंत्री योजना आयोग को 9760 करोड़ की एक कार्ययोजना भी सौंपने वाले हैं। काश,ये सब काम बहुत पहले शुरू हो गए होते लेकिन अभी भी बहुत देर नहीं हुई है। सरकार की इस पहल के बाद उम्मीद की जा सकती है, कि बस्तर के युवक नक्सलवाद की ओर नहीं, विकासवाद की ओर आकर्षित होंगे। जब उन्हें काम मिलेगा तो वह मुख्यधारा में शामिल होंगे, जंगल की ओर क्यों भागेंगे?
नक्सलियों को एक प्रेरक -संदेश
हफ्ते भर पहले की ही बात है। सरगुजा में घायल हुए एक नक्सली को एक जवान ने ही खून दे कर उसकी जान बचाई। यह घटना एक प्रेरक-संदेश है नक्सलियों के लिए, कि समाज अगर तुम्हारे खिलाफ खड़ा है तो उसका कुछ कारण है,लेकिन वह तुम्हारी जान का दुश्मन नहीं है। नक्सलियों को भी समझ लेना चाहिए कि वे जवान जो समाज की रक्षा के लिए तैनात हैं, नक्सलियों के शत्रु नहीं हैं। वे अपना फर्ज निभा रहे हैं। जिस जवान ने नक्सली को खून दिया वह मना भी कर सकता था, कि मैं क्यों दूँ खून। नक्सली हमारे जवान भाइयों की हत्याएँ कर रहे हैं। लेकिन जवान ने ऐसा नहीं किया। उसने सदाशयता दिखाई। यही सदाशयता हमें मनुष्यता की ओर ले जाती है। जवान ने इंसानियत दिखाई, अब नक्सली भी दिखाएँ और मुख्यधारा से जुड़कर। पता नहीं, वो दिन कब आएगा, अभी तो वे किसी का गला रेत रहे हैं, जन अदालत लगा कर किसी को फाँसी पर लटका रहे हैं और अपने क्रूर सामंती चरित्र का ही सबूत दे रहे हैं।
साम्प्रदायिक सद्भावना की बात
गाय हमारी आस्था का केंद्र-बिंदु है। किसी भी समाज की आस्था को ठेस पहुँचे तो कटुता बढ़ती है। गाय को काटने की बातें जब सामने आती हैं, तो हिंदुओं को दुख होता है। वैसे सच्चाई यह भी है कि बहुत-से धनलोभी हिंदू ही अपनी कमजोर-बीमार गायों को कसाइयों को सौंप देते हैं। बहुत-सी गायें कसाईखानों को भेज दी जाती है। खैर, ये अलग मसला है। हर मुसलमान गाय का दुश्मन है, ऐसी बात नहीं है। कुछ हो सकते हैं, लेकिन वे मुसलमानों के प्रतिनिधि नहीं है। आदर्श मुसलमानों के प्रतिनिधि हैं पैगंबेरइस्लाम के वंशज बाबा हाशमी जी जैसे संत, जो साम्प्रदायिक सदभावना की दिशा में काम कर रहे हैं। पिछले दिनों वे रायपुर पधारे और अपनी तकरीर करते हुए उन्होंने मुसलिम भाइयों को समझाया कि हमें दूसरों की पसंद का खाना खाना चाहिए अगर हिंदुओं को गो की हत्या पसंद नहीं है, तो वह कार्य नहीं करना चाहिए। बाबा हाशमी जैसे संतों के उद्बोधन के बाद लोगों की सोच में बदलाव आएगा ही। बाबाजी ने संस्कृत के श्लोक सुनाए, गीता का हवाला दिया और पूरे प्रवचन के माध्यम से मानवता के विकास की बात की और कहा कि मिलजुल कर रहने में ही जीवन का सार है। ऐसेे प्रवचनों से समाज में शांति-सद्भावना कायम हो सकती है।
पानी की चिंता
रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून...चार सौ साल पहले रहीम कवि ने यह संदेश दिया था। अब हम इसे दुहरा रहे हैं और अपनी नादानी पर रो रहे हैं। पश्चाताप कर रहे हैं। विकास के तथाकथित ढाँचे ने हमारी नदियों को, तालाबों को,हरे-भरे पेड़ों को हमसे छीन लिया। अब हम हाय-हाय...पानी-पानी कर रहे हैं। सरकारी तंत्र के कारण, मूर्ख लोगों के कारण पर्यावरण का विनाश होता रहा। आज भी हो रहा है। गौरवपथ बना कर हमनें पेड़ों की निर्मम हत्याएँ कीं और खुश हुए कि देखो, सड़कें कैसी चौड़ी हो गई। लेकिन मूर्ख मन ने यह नहीं देखा कि हरी-भरी धरती का सत्यानाश कर दिया। अब जब तापमान की तपिश एसी को भी फेल करने लगी, हम घर के भीतर भी झुलसने लगे तो अपनी गलती समझ में आने लगी। खैर, अभी भी चेत जाना चाहिए। अब नेताश्रमदान कर के तालाबों को, नदियों को बचाने का उपक्रम कर रहे हैं। ये सब नाटक-नौटंकी न बने, हम गंभीरता के साथ हरियाली बचाएँ, पेड़ लगाएँ, तभी भविष्य के लिए पानी बचा सकेंगे। शहरों में, गाँवों में हरियाली को बचाने का उपक्रम हो, हमें शॉापिंग मॉल नहीं, हरे भरे मैदान और पेड़ चाहिए, यह अभियान चले तो हम ग्लोबल वार्मिंग के दैत्य से बच सकते हैं।
 विरोध का यह तरीका नहीं...
पिछले दिनों खरसिया के गाँव दर्रामुड़ा में जो कुछ हुआ, वह ठीक नहीं हुआ। प्रतिरोध का यह तरीका ठीक नहीं कि हम लोगों का मुँह काला करें, उनको उठक-बैठक लगाएँ, जूते की माला पहनाएँ। ये ठीक है कि गाँव की सहमति के बिना एक इंच जमीन भी कोई कंपनी नहीं ले सकती। गाँव के लोगों को इसके लिए तैयार रहना चाहिए। कंपनी के चालाक लोग धूर्तता का सहारा लेकर गाँवों में पावर प्लांट या अन्य कारखाने लगाने के लिए जमील हड़प लेते हैं। गाँव का सत्यानाश हो रहाहै। गाँव वालों के मन में आक्रोश स्वाभाविक है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम कानून अपने हाथ में  ले लें। हम शांतिपूर्वक प्रतिवाद करें, हिंसा का सहारा न लें। लेकिन जो भी हुआ उससे एक बात तो साफ हो गई कि गाँव के लोग अपने गाँव से प्यार करते हैं। वे अपने गाँव को बचाना चाहते हैं। एक बार कोई कारखाना लग गया तो गाँव उजडऩे लगता है। उसकी हरियाली, उसकी नदी-तालाब तबाह होने लगते हैं। उद्योगपति भी समझ लें कि गाँववालों को विश्वास में लिए बगैर कोई काम करने का दुष्परिणाम क्या हो सकता है। हमें  विकास चाहिए, लेकिन विनाश की कीमत पर नहीं। आपसी सदभावना के साथ विकास हो, यही समय की मांग है।
फुटपाथी चमत्कारों से सावधान..
अकसर यह खबर सुनने को मिल जाती है कि किसी ने चमत्कार का झाँसा देकर किसी महिला को ठग लिया। ऐसी खबरें छपती भी हैं, लेकिन हमारे अंदर का बैठा डर, लालच हमें झाँसों में आने पर मजबूर कर देता है। पिछले दिनों राजधानी में तीन महिलाएँ ठगी का शिकार हो गईं। एक चमत्कारी बाबा ने महिलाओं को रोका और कहा कि आप जो जेवर पहनी हुई हैं वे आपको बर्बाद कर सकते हैं. इसे मंत्रोपचार के जरिए ठीक किया जा सकता है। तभी बाबा को चमत्कारी सिद्ध करने के लिए उन्हीं के सिखाए-पढ़ाए लोग आ गए और बाबा को प्रणाम करके उसका गुणगान करने लगे। महिलाएँ झाँसे में आ गईं और अपने गहने उतार कर दे दिए। बाबा ने गहनों को पोटली में रखा, मंत्र फूँकने का नाटक किया और पोटली वापस कर दी और चलते बने। राह चलते चमत्कार दिखाने वाले किसी भी बाबा को फटकार देना चाहिए। महिलाएं रुक जाती हैं और बाबा लोग कुछ ऐसा सम्मोहन करते हैं कि वे जाल में फँस जाती हंै और अपने जेवर और धन लुटा कर ही होश में आती है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिए सावधान रहने की जरूरत है।

रविवार, 2 मई 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

हो रही है दो सिंहों की टक्कर
जी, हाँ, इन दिनों दो सिंहों की भिडंत जारी है। यह नूरा कुश्ती है, जिसका कोई खास अर्थ नही निकलता, लेकिन चलती रहती है। यह अखबारी कुश्ती है, जिसका मजा हम सब लेते हैं। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह को नक्सल समस्या के हल में विफल होने पर खरी-खोटी सुनाई तो डॉ.रमन सिंह ने भी उसी अखबार में जवाबी लेख भेज दिया। उसे पढ़ कर दिग्गी राजा बौखलाए तो उन्होंले फिर एक ळिख मारा और डॉ.रमन सिंह से दस तीखे सवाल पूछ डाले। उन्होंने कहा है कि नक्सलवाद पर मैं खुली बहस के लिए कहीं भी आमंत्रित हूँ। अब बारी है डॉ.रमन सिंह की। वे जवाब देंगे ही। डॉक्टर  साहब जल्दी जवाब दें और बेहतर तो यही होगा, कि दोनों आमने-सामने हो जाए। रायपुर में खुली बहस हो। अगर ऐसा हुआ तो हजारों लोग जमा हो जाएंगे। सुभाष स्टेडियम में ही बहस हो पाएगी। यह तो एक सुझाव भर है। अब ये इन दो सिंहों पर निभर करता है कि वे क्या सोचते हैं।  आमने-सामने होना है कि ऐसेही अखबारी लड़ाई जारी रहे। जो भी हो, सवाल-जवाब से एक वैचारिक जीवंतता तो भी है। और यह जिंदा लोकतंत्र का ही प्रतीक है।
काँग्रेस की वादीखिलाफी पर नगाड़े
राजधानी में भाजपाइयों को नगरनिगम कार्यालय के बाहर नगाड़े बजाने पड़े। यह जररूरी भी था। बहरी व्यवस्था को सुनाने के लिए नगाड़े ही बजाए जाते हैं। नगर निगम में काँग्रेसी महापौर बैठी है। काँग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा था, कि हम लोग आए तो संपत्ति कर नहीं बढ़ाया जाएगा। और अब दन्न से कर बढ़ा दिया। अग्निशमन कर भी कई गुना बढ़ा दिया गया है। महापौर कह रही है,कि राज्य सरकार के आदेश पर ऐसा किया गया है, जबकि भाजपा और दूसरे लोगों का कहना है कि यह नगर निगम का अधिकार क्षेत्र है। काँग्रेसी भी दुखी है। वे कह रहे हैं, कि जनता के बीच काँग्रेस की छवि खराब हो रही है। हमने जब वादा किया तो उसे निभाना ही पड़ेगा। अंदर की बात यह है कि अनेक काँग्रेसी तो महापौर के रवैये से भी दुखी चल रहे हैं। सबका दर्द यही है,कि वह हम लोगों की नहीं सुनती। महापौर मानती है कि मैंने अपनी छवि के कारण चुनाव जीता है। फिर भी उनकोसोचना तो होगा ही कि वे काँग्रेसी की महापौर हैं और काँग्रेस ने घोषणा पत्र में जो लिखा उसी के अनुरूप काम करना होगा, वरना स्वाभाविक है कि लोग कहेंगे, कि वादाखिलाफी हो रही है। कहीं ऐसा न हो कि भविष्य में महापौर के विरुद्ध काँग्रेसी ही सड़क पर उतर आएँ।
काँग्रेसी पार्षद ही चपेट में आ गए
जयस्तंभ और आसपास के इलाके को विज्ञापनमुक्त क्षेत्र बनाया गया है,इसका उल्लंघन करने पर काँग्रेस के पार्षद लखवंत सिंह गिल उर्फ गुड्डा भैया को दस हजार का जुर्माना पडऩा पड़ गया। उनकी एक होर्डिंग वहाँ लगी हुई थी। गुड्डा भैया ने जुर्माना पटा दिया। इससे दो संदेश समाज के बीच अच्छा गया, वो यह कि अभी भी कुछ सिद्धांत जिंदा हैं। गुड्डा भैया चाहते तो बहस कर सकते थे, लेकिन उन्होंने उदारता दिखाई और इसी बहाने दूसरे लोगों को भी आगाह कर दिया, कि होर्डिंग लगाई तो खैर नहीं। इन दिनों शहर में होर्डिंग्स लगाने का भूत-सा सवार हो गया है। पिछले दिनों आंधी चली तो एक होर्डिंग एक घर के ऊपर आ गिरी। गनीमत है, कि उस वक्त वहाँ कोई नहीं था, वरना बड़ी दुर्घटना हो जाती। बाजारबाद के दौर में अब छोटे-छाटे विज्ञापन से कंपनियों का मन नहीं भरता। उनका मानना है कि जितने बड़े विज्ञापन होंगे, उनका माल उतना ज्यादा बिकेगा।
बच्चे क्यों भागते हैं?
राजधानी के पास माना में बच्चों का संप्रेक्षण गृह है। इसमें वे बच्चे रखे जाते हैं, जो नाबालिग हैं, लावारिस-से है और किसी अपराध में संलिप्त थे। और पुलिस के हत्थे चढ़ गए। यहाँ उनकी देखरेख की जाती है लेकिन हो यह रहा है कि वहाँ रह कर बहुत-से बच्चे सुधरते ही नहीं और ज्यादा बिगड़ जाते हैं। पिछले दिनों संप्रेक्षण घर के ग्यारह बच्चे भाग निकले। उन्होंने वहाँ के प्रहरियों की आँखों में मिर्ची डाली, उन्हें घायल किया और  निकल भागे। यह गंभीर अपराध है। सारे लड़के नशे में थे। उनकी तलाश हो रही है। सोचने की बात यह है कि आखिर बच्चे इतने उद्दंड कैसे हो गए? मतलब साफ है कि वहाँ की व्यवस्था ठीक नहीं है। बच्चे बिगड़ रहे हैं, मुख्यधारा में नहीं आ पा रहे हैं, तो मौजूदा पशासन दोषी है। उन पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। बच्चे हमारा भविष्य हैं। किसी कारणवश अगर वे संप्रेक्षण घर में आ गए मतलब यही उनकी दुनिया नहीं है। इस दृष्टि से सोचने की जरूरत है और उन्हें बेहतर माहौल दिया जाना चाहिए ताकि वे सुधरे, और ज्यादा न बिगड़ जाएँ।
सबक लड़कियों के लिए
टीवी-सिनेमा की अनेक रूमानी कहानियाँ देख कर इन दिनों युवा पीढ़ी में स्वच्छाचारिता बढ़ती जा रही है। नई उम्र की नई फसल बहुत जल्दी बौरा जाती है। इसमें भावनाओं का ज्वार होता है, लेकिन विवेक की शक्ति कम होती है। एक-दूसरे को देखा, आकर्षण बढ़ा तो बात प्यार-मोहब्बत के गलियारे से होते-होते बहुत जल्दी शादी तक पहुँच जाती है। अभी ठीक से खड़े भी नहीं हो सके हैं, एक-दूसरे को समझ भी नहीं पाए हैं, बस शादी करेंगे। घर वाले विरोध करेंगे तो घर से भाग खड़े होंगे। पिछले दिनों एक लड़की ने ऐसी ही भूल कर दी। लड़के के बहलावे में जमशेदपुर चली गई। वहाँ शादी भी कर ली। बाद में लड़के ने लड़की को पैसे के लिए तंग करना शुरू किया। लड़की पर अत्याचार बढ़ा तो रायपुर लौट आई। अब लड़के के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई गई है। उस पर बलात्कार को मामला दर्ज किया गया है। यह नौबत नहीं आती अगर लड़की ने विवेक से काम लिया होता। राजधानी क्या बहुत से शहरों से लड़के-लड़कियाँ भागने लगे हैं। घर के संस्कार जब बच्चों पर ठीक से नहीं पड़ पाते, तब ऐसी नौबत आती है। माँ-बाप आत्ममंथन करें और बच्चों को समझाएँ कि अगर उन्हें कोई पसंद है तो घरवालों को बताएँ, उनको विश्वास में लें। घर वाले भी समय के साथ चलें और अंतरजातीय विवाह की नौबत आए तो अगर लड़का या लड़की ठीक हो तो अपनी सहमति दे ताकि बच्चे घर से भाग कर उनकी फजीहत न करवा सके।
जन्म दिन हो तो ऐसा
रायपुर के विधायक बृजमोहन अग्रवाल की शैली ही ऐसी है कि उनकी लोकप्रियता में कमी नहीं आती। सबकी मदद का भाव सच्चे जनप्रतिनिधि की विशेषता होनी चाहिए। एक मई को उन्होंने अपना जन्मदिन मनाया तो केवल मौज-मस्ती नहीं हुई, उन्होंने दान-पुण्य के अनके काम किए। नि:शक्तों को ट्राइसिकल, कैलिपर्स, बैसाखी, श्रवण यंत्र आदि बाँटे गए, भंडारा कर गरीबों का खाना खिलाया गया, स्वास्थ्य शिविर लगा। गरीब बस्ती में इक्यावन किलो का केट काटा गया। कार्यकर्ताओं ने रक्तदान किया, वृद्धाश्रम में फल वितरित किए गए। कहीं-कहीं शरबत-जूस भी बाँटे गए। इस तरह का जन्म दिन ही जन प्रतिनिधियों का मनाना चाहिए। इससे उनकी एक सही पहचान बनती है। आम लोगों को भी लगता है कि यह हमारा सच्चा नेता है। उम्मीद है कि दूसरे नेता भी इसी तरह का जन्म दिन बना कर लोगों का भला करते रहेंगे।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

राजधानी के रंग

डीजीपी का नक्सलवाद....
छत्तीसगढ़ के डीजीपी कवि भी हैं। कभी-कभार बोलते हैं और फँस जाते हैं। पिछले दिनों राँची गए और पत्रकारों से बात कहते हुए कह दिया कि नक्सलवाद कोई समस्या नहीं, यह एक विचारधारा है। अब जो कुछ छपा है, उसे लेकर काँग्रेसी हंगामा मचा रहे हैं। मांग कर रहे हैं कि डीजीपी को हटाया जाए क्योंकि ये नक्सल समस्या को लेकर गंभीर नहीं है। बात एक हद तक सही भी है। नक्सलवाद कभी रहा होगा एक विचारधारा। लेकिन अब तो यह केवल हत्याधारा है। इसे विचारधारा का नाम देना ही गलत है। यह एक समस्या है। और इसे मिटाने की ही बात होनी चाहिए। विचारधारा-फारा की बातें कह कर बौद्धिकता दिखाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। मीडिया से जब बात हो तो दो टूक कहना चाहिए, कि हम इस समस्या से पार पा लेंगे। आपरेशन ग्रीन हंट चल रहा है। अब इसे विचारधारा है,जैसे जुमलों के सहारे किनारे करने की कोशिश करने का दुष्परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा। उम्मीद है, वे भविष्य में फूँक-फूँक कर ही कदम रखेंगे। एक तो मीडिया कहाँ धँसा दो, उस पर विपक्ष तो बैठा ही रहता है, खिंचाई करने, इसलिए विश्वरंजन जी, सावधानी जरूरी है। क्योंकि जीवन और कविता में अंतर होता है।
चाटुकारिता की हद है....
सचमुच राजनति में चाटुकारिता की हद हो जाती है कभी-कभी। अब देखिए, पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को कुछ काँग्रेसी राज्यसभा में पहुँचा कर सीधे मंत्री भी बनाना चाहते हैं। राहुल गाँधी को फेक्स भी कर दिया भाई लोगों ने। ये तो अच्छा हुआ, कि खुद जोगी जी ने इस कृत्य की निंदा कर दी। वे समझदार हैं। लेकिन चमचों को कौन समझाए, कि कुछ करने के पहले सोच तो लो, कि क्या कर रहे हो। अभी जोगी-पुत्र पर आपराधिक मामला चला। अभी उसे लम्बी लड़ाई लडऩी है। संघर्ष करना है। आसानी से उपलब्धियाँ नहीं मिल जातीं। यह बात उनको और चाटुकारों को समझ लेना चाहिए। लेकिन जब चाटुकारिता ही करनी है, तो विवेक काम नहीं करता।
राजनीति राजधानी के विकास को न ले डूबे
राजधानी में काँगे्रेस का महापौर है और भाजपा का सभापति। अब दोनों दलों के लोग अपनी-अपनी पार्टी की राजनीति से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। उनको यह बात समझ में ही नहीं आ ही है, कि चुना तक राजनीति चलनी चाहिए। अब तो मिल-जुल कर विकास करने का समय आ गया है। लेकिन नहीं, किसी न किसी बहाने अपनी ताकत दिखाने का खेल चल रहा है। शर्म की बात है, कि नगर निगम की बैठक को शांतिपूर्वक संपन्न कराने के लिए पुलिस बुलानी पड़ती है। विकास के रास्ते में अगर राजनीति स्पर्धा आड़े आएगी, तो यह दोनों दलों के लिए ठीक बात नहीं, क्योंकि जनता दोनों को देख रही है। राजधानी को विकास की सख्त जरूरत है। ऐसे समय में आपसी झगड़े के कारण अनुदानों में दिक्कतें आ सकती हैं। कोई ठोस निर्णय नहीं हो पाएगा। इसका बुरा असर पड़ेगा विकास पर।
दारू के खिलाफ लामबंद राजधानी
एक अरसे बाद ऐसा हो रहा है कि इन दिनों राजधानी के कुछ हिस्से में दारूबंदी के खिलाफ मुहिम जारी है। यह जरूरी भी है। कहीं विद्यालय के पास, तो कहीं किसी धर्मस्थल के पास दारू की दूकानें खुल गई हैं। लोगों का आना-जाना प्रभावित होता है। बेहतर तो यही होगा कि सरकार ट्रांसपोर्ट नगर आदि की तरह शहर के बाहर कहीं दारूनगर ही बसा दे। शहर की सारी शराब दूकानें शहर से बाहर ही रहें। जिन्हें पीना-पिलाना है, वे बाहर जाएँ और  टुन्न-फुन्न हो कर वहीं गिरे-पड़े, गाली-गलौज करें। जो भी करना हो, शहर के बाहर करें। शहर में दारू दूकानें होनेके कारण कदम-कदम पर शराबी नजऱ आते हैं तो लगने लगता है, यह रायपुर नहीं दारूपुर है। उम्मीद है, कि प्रशासन जनता की सुनेगा और जहाँ-जहाँ लोग आंदोलित हैं, वहाँ-वहाँ की शराब दूकानें फौरन बंद होंगी। कुछ जगह दूकानें सीलबंद कर दी गई हैं, यह अच्छी बात है।
मंत्री के तमाचे की आवाज
प्रदेश के एक मंत्री ने एक अफसर को तमाचा क्या जड़ दिया, उसकी आवाज़ अब तक गूँज रही है। अफसर-कर्मचारी एकजुट हो कर मंत्री की निंदा कर रहे हैं, उसे हटाने की मांग भी कर रहे हैं। लेकिन क्या यह संभव हो पाएगा? कायदे से तो होना चाहिए। मंत्री को अपने किए पर खेद भी व्यक्त करना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में सामंती प्रवृत्ति नहीं चलेगी। न मंत्रियों की न अफसरों की । यहाँ के चंद अफसर भी ऐसे हैं जो अपने को सबसे ऊपर समझते हैं। खैर, तमाचाशुदा अफसर की बात करें तो कहा जा सकता है, कि उसने  अगर मंत्री का कहना नहीं माना तो वह बेशक अपराधी है, उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन दादागीरी दिखाना गलत है। अगर जनप्रतिनिधि इस तरह की हरकत करेंगे, तो उन्हें प्रशासन से सहयोग नहीं मिलेगा। वैसे भी बहुत से अफसर भयंकर भ्रष्ट और बदतमीज हो चुके हैं। उन्हें सुधारने की जरूरत है। लेकिन तमाचे से वे नहीं सुधरेंगे। उन पर लिखित रूप में कड़ी कार्रवाइयाँ की जानी चाहिए। तमाचा मार कर लोकतंत्र का अपमान नहीं करना चाहिए। रामविचार जी, विचार कीजिए और पद की गरिमा बनाए रखिए। 
भूमाफिया चरागान भी हजम कर रहे
राजधानी में वैसे भी गोचर भूमि नहीं बची। शहर के बाहर 327 एकड़ जमीन चरागान के लिए रखी गयी थी, अब इस जमीन पर कुछ नेतानुमा लोगों ने कब्जा कर लिया है। गो सेवक बेचारे मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी कोई सुने तब न। हार कर ये लोग राज्यपाल से मिले । अब देखना यह है कि राज्यपाल महोदय की अनुशंसा पर कब तक कार्रवाई होती है। अंतरराष्ट्रीय कृषि-गो पर्यावरण संरक्षण परिषद के वयोवृद्ध अध्यक्ष झूमरलाल टावरी ने भूमाफियाओं के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। वे गो संरक्षण के लिए समर्पित हैंं। ऐसे अनेक लोग हैं, जो गाय को माँ की तरह जीने का अवसर देना चाहते हैं। लेकिन मनुष्य इतना स्वार्थी हो चुका है, कि अब गाय केवल सड़कों पर भटकती रहती है। चारा नहीं मिलता तो बेचारी कचरा खाती है और पॉलीथिन हजम करके एक दिन मौत का शिकार हो जाती है।
जननायक के महाप्रयाण पर...
रायगढ़ जिले के गौरव और अपना पूरा जीवन वहाँ की खुशहाली के लिए लगा देने वाले जननायक रामकुमार अग्रवाल जी नहीं रहे तो राजधानी में भी उनके चाहने वाले दुखी हो गए। सर्वोदय विचारधारा से जुड़े लोगों ने पिछले दिनों एक बैठक कर श्री अग्रवाल के संघर्षों को याद किया। यह भी चिंता व्यक्त की गई कि उनके जाने के बाद अब उनकी तरह जुझारू तेवर वाले लोग सामने आएंगे कि नहीं? उम्मीद है, कि चार बार विधायक रह चुके श्री अग्रवाल ने रायगढ़ के विनाश पर तुली ताकतों के विरुद्ध जो अभियान छेड़ रखा था, उन्हें आगे बढ़ाया जाएगा। इन पंक्तियों के लेखक ने श्री अग्रवाल के व्यक्तित्व पर एक गीत लिखा है। (पूरा गीत तो आप एक-दो दिन बाद पढ़ सकेंगे) फिलहाल दो पंक्तियाँ पेश हैं-
अंधकार में जले हमेशा बनकर एक मशाल
अमर रहा है, अमर रहेगा, रायगढ़ का लाल।

मंगलवार, 2 मार्च 2010

छ्त्तीसगढ़ की डायरी

  राज्यपाल-मुख्यमंत्री भी आदिवासी मांग उठी.....
आदिवासी जब एक होते हैं तो क्या होता है?
क्या होता है, तो गैर आदिवासी नेताओं के मन में एक आशंका बलवती होने लगती है, कि कहीं वे सत्ता हथियाना तो नहीं चाहते। जी हाँ, पिछले दिनों जब राजधानी में आदिवासियों ने महारैली निकाली तो गैर आदिवासी नेता यही समझ रहे थे। लेकिन शायद ऐसा था नहीं। आदिवासी अपना अधिकार माँगने के लिए एकजुट थे। इस रैली में भाजपा और काँग्रेस के भी नेता शामिल हुए। सरकार के कुछ मंत्री- विधायक भी अगुवाई कर रहे थे। मांग यह थी कि सरकार आदिवासियों को बत्तीस फीसदी आरक्षण दे। एक वक्ता ने तो यह मांग भी रख दी कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री भी आदिवासी हों। नकली-असली आदिवासियों की भी चर्चा हुई और छठी अनुसूची को लागू करने की मांग भी उठी। कुल मिला कर आदिवासियों ने यह साबित कर दिया कि वे एक जुट हैं और अपने हक के लिए लडऩा जानते हैं। अगर इनकी ओर गंभीरतापूर्वक ध्यान नहीं दिया गया, तो कल को दृश्य कुछ और हो सकता है। आदिवासियों को भरपूर महत्व मिलना ही चाहिए। उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अब आदिवासी भी समय के साथ चल रहे हैं। रैली में शामिल कुछ आदिवासी मोबाइल फोन से गोठियाते पाए गये।
अब कैसे कह दें कि शराब है खराब.. ?
सरकार या प्रशासन भला कैसे कह दें कि शराब एकदम से खराब है। जब रायपुर जिले में ही शराब के ठेके देने के लिए जो फार्म बिके उसी से सरकार को एक सौ दस करोड़ रुपये की कमाई हो गई। लाइसेंस फीस से दो सौ पच्चीस करोड़ मिलेंगे वो अलग। ये तो एक जिले की कमाई है। शराब सेजो कमाई होती है, उसे देख कर किसी भी सरकार में यह साहस नहीं हो पाता कि वह शराब बंदी लागू कर। आखिर इतनी तगड़ी कमाई जो होती है। फिर भी यह मांग उठती रहती है, कि प्रदेश में शराबबंदी हो। पूर्ण शराबबंदी न होतो कम से कम जिस इलाके में मांग उठ रही है, वहाँ तो शराब दुकानें न खोली जाएँ। हालांकि शराब दूकानों के विरोध को भी बड़ी चालाकी से निबटा दिया जाता है। कुछ समय के लिए शराब दूकानें बंद होती है, फिर दूसरी जगह शुरू हो जाती हैं। बहरहाल, सरकार तो खुश है, कि उसकी कमाई हो रही है।
झुग्गीमुक्त राजधानी का सपना...
राजधानी में रायपुर विकास प्राधिकरण द्वारा बनाए गये 972 फ्लैट गरीबों को दे दिए गये। इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ रमन. सिंह ने कहा कि पाँच सालों में रायपुर को झुग्गीमुक्त कर दिया जाएगा। सचमुच..? अगर ऐसा हो सका तो वह स्वर्णिमकाल ही होगा। झुग्गियाँ शहर के गाल पर तमाचा हैं, बदनुमा दाग सरीखी हंै। असमता को दर्शाने वाली होती हैं। एक तरउ गगनचुंबी अट्टालिकाएँ और दूसरी तरफ गंदगी के बीच बजबजाती झुग्गियाँ..? इस लिहाज से रायपुर ही क्यों, पूरे छत्तीसगढ़ के शहरों को झुग्गियों से मुक्त करने का सपना देखा जाना चाहिए। हर गरीब को पक्के मकान मिले। केवल घर ही पक्के न हों, आस-पास स्वच्छता हो, सड़कें ठीक हों। मतलब यह कि गरीबों को भी जीने का हक है। और इस दिशा में अगर एक पहल शुरू हुई है तो उसका स्वागत ही किया जा सकता है।
लॉटरी के जाल में न फँसें..
जब से मोबाइल और इंटरनेट का ज़माना आया है, तब से ठगों ने इस माध्यम को भी अपना लिया है। अब मोबाइल पर एसएमएस आते हैं और ईमेल के जरिए संदेश कि आपको यूके लॉटरी या और और किसी कंपनी की ओर से एक- दो-तीन करोड़ की लॉटरी निकली है। बताया जाता है कि आपके मोबाइल नंबर या आपके ईमेल को हमने चयनित किया है। इन पंक्तियों के लेखक को भी पिछले छह महीने में अनेक मेल प्राप्त हो चुके हैं। उन सब का हिसाब लगाय जाए तो दस- बीस करोड़ मेरे पास भी आ जाते। लेकिन मैं इन ईमेलों को फौरन मिटा देता था। लेकिन कवर्धा का एक युवक फँस गया। उसे तीन लाख का चूना लग गया। अब तीन करोड़ मिले हैं, तो सामने वाली पार्टी अगर कस्टम शुल्क कोरियर, शुल्क और रजिस्ट्रेशन फीस आदि के लिए पैसे माँगेंगी तो  कोई भी सोचगा, कि चलो दे दो। तीन करोड़ मिल रहे हैं, तो तीन लाख न सही। लोग पैसे भेज देते हैं और बाद में पछताते हैं। इसलिए सावधान इन ईमेलों से। लालच बुरी बला...।
जन प्रतिनिधियों की अनदेखी
छत्तीसगढ़ के संदर्भ में अनके बार यह लिखा जाता रहा है कि, यहाँ जनप्रतिनिधियों को महत्व नहीं दिया जाता। अनेक  ऐसे उदाहरण गिनाए जा सकते हैं। ताजा उदाहरण माध्यमिक शिक्षा मंडल का है। इसमें कुछ विधायक भी सदस्य हैं। महत्वपूर्ण निर्णय लेने हों तो उनकी उपस्थिति भी होनी चाहिए, लेकिन माशिमं के अफसर इसकी जरूरत ही नहीं समझते। इसीलिए तो आठ महीने में एक बार भी किसी विधायक को न तो बुलाया गया, न उनसे कोई सलाह ही ली गई। निर्णय हो गये। जब विधायकों ने शिकायत की तो माशिमं के अफसर अध्यक्ष ने अधीनस्थों की खिंचाई की, गोया उन्हें कुछ पता ह न हो। यह चालाकियाँ बहुत हो रही हैं। इस मामले में विधायकों को ही सतर्क होना चाहिए। अपने हक के लिए वे खुद खड़े हों। और जो भी उनकी अनदेकी करे, उसको उसकी हैसियत दिखा दे। यहाँ लोकतंत्र है, अफसर तंत्र नहीं। क्या हमारे जनप्रतिनिधि जागरूक होंगे।
धंधा अपहरण-फिरौती का
जी हाँ, यह अब उद्योग की तरह विकसित हो रहा है। राजधानी में तो गाहेबगाहे इस धंधे की खबरें मिलती ही रहती हैं, अब आसपास भी ये वायरस फैल रहे हैं। पिछले दिनों धमतरी में एक छात्रा का अपहरण कर लिया गया। अपहर्ता लड़के हैं और जगदलपुर केहैं। उन्होंने फिरौती के रूप में दो लाख माँगे। नये-नये होंगे। सामने वाले की हैसियत का भी पता होगा, इसलिए केवल दो लाख की मांग की। अभी अपहर्ताओं का पता नहीं चल सका है लेकिन बच कर कहाँ जाएँगे। किंतु एक बात जो सामने आ रही है, कि अपहरण का धंधा अब फैलता जा रहा है। यह चिंता की बात है।

सुनिए गिरीश पंकज को