बुधवार, 21 सितंबर 2011

सुप्रिया रॉय को आलइंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ने सम्मानित किया.

आलोकजी की याद में पुरस्कार दिया जायेगा

मेरे दिवंगत बड़े भ्राता-तुल्य एक समूची पीढी के आइडियल बन चुके जंगजू पत्रकार आलोक तोमरजी के बारे में अब कुछ भी कहने-लिखने में जो तकलीफ होती रही है उसका बयान भी पीड़ा देता है. इसी साल 20 मार्च को उनके देहावसान के अकस्मात् घावों को भरने में समय लगेगा, यादें ही संबल बनेंगी. यादों के समंदर उफनते व बिछोह की हिलोरें जगाते है.

उनके बारे में आइसना के महासचिव विनय डेविड ने जो मेल भेजा है वह सराहनीय है. स्वागत योग्य है. संगठन के प्रांतीय अध्यक्ष अवधेश भार्गव ने आलोक तोमर की स्मृति में हर साल एक चयनित जांबाज पत्रकार को पच्चीस हजार रुपये का पुरस्कार देने की घोषणा की है. यह घोषणा भोपाल में की गयी जहां आलोकजी की पत्नी सुप्रिया रॉय को आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ने सम्मानित किया.
एक धूमकेतू की तरह हिन्दी बैल्ट पर छा जाने वाले पत्रकार आलोकजी ने अर्श से फर्श तक का सफ़र तय किया और वे गर्दिशों के दौर में भी वे कभी विचलित नही हुए. वे एक जंगजू की तरह पत्रकारिता की जद्दोजहद में जमे और डट कर चुनौतियों से लड़े. लेखक के रूप में आलोकजी एक रोल माडल बन बीमारी के दिनों में भी कीमोथेरेपी कराते हुए भी लिखते . खरा लिखते . तथ्यों के साथ लिखते और आख़िरी के दिनों में उन्होंने बड़े-बड़ों को उधेड़ डाला. सच बोलने के खतरे जिए . कार्टून विवाद में जेल भी गए मगर तन कर खड़े रहे . उनमें जोखिम लेने का जज्बा था. किसी ने लिखा अगर खबर है तो है ,चाहे वो बरखा दत्त हों वीर संघवी हों या उनके अभिन्न मित्र ओमपुरी हों या फिर कोई और. अगर खबर का वो हिस्सा हैं तो आप आलोक जी से पास-ओवर की उम्मीद बिलकुल न करें. वे छाप देते थे डंके की चोट पर. इस दौर में जहां पत्रकारिता की दुनिया बाजारु हो चुकी है, उस दौर में आलोक तोमरजी ने गंभीर सरोकारों वाली पत्रकारिता की. पत्रकारिता को लेकर उनके बारे में उनके शब्दों में ही कहूँ तो दो बार तिहाड़ जेल और कई बार विदेश हो आए और उन्होंने भारत में कश्मीर से ले कर कालाहांडी के सच बता कर लोगों को स्तब्ध भी किया . दिल्ली के एक पुलिस अफसर से पंजा भिडा कर जेल भी गए . झुकना तो सीखा ही नही. वे दाऊद इब्राहीम से भी मिले और सीधी-सपाट बात की जिसे सरेआम छापा. जब उनको एक कार्टून मामले में जेल जाना पड़ा तो साफ़ कहा एक सवाल है आप सब से और अपने आप से। जिस देश में एक अफसर की सनक अभिवक्ति की आजादी पर भी भरी पड़ जाए, जिस मामले में रपट लिखवाने वाले से ले कर सारे गवाह पुलिस वाले हों, जिसकी पड़ताल, 17 जांच अधिकारी करें और फिर भी चार्ज शीट आने में सालों लग जायें, जिसमें एक भी नया सबूत नहीं हो-सिवा एक छपी हुई पत्रिका के-ऐसे मामले में जब एक साथी पूरी व्यवस्था से निरस्त्र या ज्यादा से ज्यादा काठ की तलवारों के साथ लड़ता है तो आप सिर्फ़ तमाशा क्यों देखते हैं?

समर शेष है, नही पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ है, समय लिखेगा, उनका भी अपराध


जनसत्ता में अपनी मार्मिक खबरों से चर्चा में आये आलोक तोमरजी ने सिख दंगों से लेकर कालाहांडी की मौत को इस रूप में सामने रखा कि पढ़नेवालों का दिल हिल गया. कुछ वैसे ही जैसे हर खबर सिर्फ खबर नहीं होती ,कभी कभी ख़बरों को अखबारनवीस जीता भी है उन्हें खाता भी है उन्हें पीता भी है,ख़बरों को जीने वाले ही आलोक तोमर कहलाते हैं. मौत एक दिन सबको आनी है. अन्ना हजारे ने भी कहा है की उनको सुरक्षा नही चाहिए क्योंकि हार्ट अटैक तो कोई नही रोक सकता. आलोक कैंसर से लड़े ,लड़ते शेर ही हैं ,बाकी आत्मसमर्पण कर देते हैं ,एक ऐसे वक्त में जब लड़ने की बात पर है तो सब चाहते हैं इस देश में भगत सिंह पैदा तो हो मगर पड़ोसी के यहाँ हो. इस दौर में आलोक जी का ये जज्बा था कि संघर्ष में वे झुके नही, रुके नही., थके नही, लड़े आन बान शान से और मूल्यों के लिए लड़े. कलम की खातिर लड़े. ख़बरों की खतिर लड़े. पूछा जाए उन सिख परिवारों से जिनको न्याय दिलाने के लिए वे लड़े. जिनके खिलाफ एक शब्द भी लिखने से लोग कतराते थे ,लेकिन आलोक जी ने साहस के साथ उनके बारे में भी लिखा.
आलोक तोमरजी ने सत्रह साल की उम्र में एक छोटे शहर के बड़े अखबार से जिंदगी शुरू की. दिल्ली में जनसत्ता में दिल लगा कर काम किया और अपने संपादक गुरू प्रभाष जोशी के हाथों छह साल में सात पदोन्नतियां पा कर विशेष संवाददाता बन गए। फीचर सेवा शब्दार्थ की स्थापना 1993 में कर दी थी और बाद में इसे समाचार सेवा डेटलाइन इंडिया.कॉम बनाया।
11 मार्च को उन्होंने लिखा
मै डरता हूं कि मुझे
डर क्यो नहीं लगता
जैसे कोई कमजोरी है
निरापद होना..
वे जीवन भर जुझारू रहे.. आइसना (आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन) द्वारा महानतम लेखनी के धनी और हजारों पत्रकारों के प्रेरणा-स्रोत आलोक तोमर की स्मृति में हर साल किसी जांबाज पत्रकार को पच्चीस हजार रुपये का पुरस्कार दिए जाने की घोषणा वंदनीय और अभिनंदनीय है.
संयोजक आलोक मित्र मंच के डी दयाल और मेरी भी राय में भी दरअसल यह घोषणा तो मध्य प्रदेश सरकार को करनी चाहिए जिसे नाज होना चाहिए कि आलोकजी वहां जन्मे और देश-दुनिया में मध्य प्रदेश का मान बढ़ाया. एक तरफ हम यह भी देखते हैं, इंदौर प्रेस क्लब ने भी घोषणा कर दी कि वे लोग हर साल भाषाई महोत्सव में एक यशस्वी पत्रकार को आलोक तोमर की स्मृति में पुरस्कार देंगे ताकि आलोक तोमर के नाम व काम को जिंदा रखा जा सके. इस घोषणा की खबरें भी प्रकाशित हुई मगर आइसना ने कम से कम उनको सच्चे तौर पर याद तो किया है और आशा है आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन इस वायदे को निभाएगा.
                                                                       रमेश शर्मा 
                                                            (यायावर ब्लॉग)

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

ब्लाँग आँफ द मंथ...पुरस्कार

इस साल के मार्च ,अप्रैल और मई के लिए ब्लाँग आँफ द मंथ का पुरस्कार छीटेँ और बौछारेँ ,ग्यान दर्पण ,गिरीश पंकज को

हर महीने  की तरह इस बार भी ब्लाँग आँफ द मंथ के पुरस्कारो की घोषणा कर दी  गयी है । ब्लाँगर साथियो को उत्साहित करने के लिये पिछले साल शुरू  किये गये इस पुरस्कार के अन्तर्गत महीने  के सर्वश्रेठ ब्लाँग को चुनकर उन्हे पुरस्कृत किया जाता है । ईटिप्स ब्लाँग टीम आप लोगो की तरह ही कोई कमाई नही करती , अब तक हिन्दी टिप्स ब्लाग ,सलीम खान के ब्लाग ,उङनतश्तरी ,प्रोपर्टी संसार ,बेचैनी ब्लाग ,छम्मक छल्लो ब्लाग इत्यादि को ये पुरस्कार दिया जा चुका है । हमने ब्लाँग चयन के लिये एक समिति "BLOG OF THE MONTH FOUNDATION" बनाई है जो इस कार्य को बखूबी कर रही है । हम न तो कोई लाभ कमाते हैँ और ना ही पुरस्कार स्वरुप कोई राशि किसी को दी  जाती है ।
मार्च-2010 के लिये यह आनलाँईन पुरस्कार आपके अपने पसंदीदा ब्लाँग "छीटेँ और बोछारेँ" को दिया जा रहा है।
वहीँ अप्रैल-2010 के लिये यह पुरस्कार आपके अपने चहेते ब्लाँग "ग्यान दर्पण" को दिया जा रहा है । इसके सानदार लेखोँ और ब्लाँग जगत मे सक्रीय भागीदारी के लिये ग्यान दर्पण को यह पुरस्कार दिया जा रहा है ।
वहीँ मई-2010 के लिये यह पुरस्कार छत्तीसगढ के प्रमुख साहित्यकार गिरीश पंकज जी के दो ब्लागोँ "गिरीश पंकज","सदभावना दर्पण" को सामूहिक रुप से दिया जा रहा
है



ईटिप्स ब्लाँग टीम की खबर 

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित

प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित
मुक्तिबोध, परसाई और श्रीकांत वर्मा के समकालीन तथा हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक, कवि, नाटककार, विचारक और शिक्षाविद् श्री प्रमोद वर्मा की स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा वर्ष 2009 से दो राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार प्रारंभ किये गये हैं । यह सम्मान हिन्दी आलोचना की परंपरा में मौलिक और प्रभावशाली आलोचना दृष्टि को प्रोत्साहित करने के लिए 3 आलोचकों को दिया जाता है। वर्ष2010-11 के सम्मान हेतु निम्नानुसार प्रविष्टियाँ आमंत्रित हैः-

प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान-
इस सम्मान के अंतर्गत 40 वर्ष से अधिक आयु वाले आलोचक की ऐसी मौलिक आलोचनात्मक कृति जो पिछले पाँच वर्षों में प्रकाशित हुई हो, पर विचार किया जायेगा । सम्मान के अंतर्गत अप्रकाशित पांडुलिपि भी स्वीकार किये जायेंगे । पुरस्कार स्वरूप चयनित आलोचक को संस्थान द्वारा आयोजित राष्ट्र स्तरीय समारोह में 21 हज़ार रुपये नगद, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह आदि से सम्मानित किया जायेगा।

प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान (युवा) -
इस सम्मान के अंतर्गत 40 साल से कम आयु वाले युवा आलोचक के ऐसे मौलिक आलोचनात्मक लेखन, प्रकाशित कृति या अप्रकाशित पांडुलिपि पर विचार किया जायेगा जो आलोचना के प्रचलित प्रतिमानों से हटकर एवं प्रभावकारी हो । ऐसे आलोचकों की कृतियाँ पिछले 2 वर्षों के भीतर प्रकाशित हुई हो । सम्मानस्वरूप चयनित आलोचक को संस्थान द्वारा आयोजित राष्ट्र स्तरीय समारोह में 11 हज़ार रुपये नगद, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह आदि से सम्मानित किया जायेगा ।

प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान (राज्य स्तरीय) –
इस सम्मान के अंतर्गत छत्तीसगढ़ राज्य के आलोचकों को उनकी मौलिक आलोचनात्मक लेखन, प्रकाशन के लिए सम्मानित किया जायेगा । ऐसे आलोचकों की कृति पिछले एक वर्ष के भीतर प्रकाशित हुई हो । सम्मान चयनित आलोचक को संस्थान द्वारा 7 हज़ार रुपये नगद, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह आदि से सम्मानित किया जायेगा ।

निर्णायक मंडल –
श्री केदार नाथ सिंह, श्री गंगाप्रसाद विमल, डॉ. धनंजय वर्मा, श्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, श्री विश्वरंजन ।
निर्णायक मंडल (राज्य स्तरीय)-  
श्री प्रभात त्रिपाठी, डॉ. बलदेव, डॉ. सुशील त्रिवेदी, श्री गिरीश पंकज, श्री विश्वरंजन

नियमावली –
1.       प्रविष्टि के रूप में प्रकाशित कृति या पांडुलिपि की दो प्रतियाँ भेजना होगा ।
2.       प्रविष्टि के साथ आलोचक का संक्षिप्त बायोडेटा और छायाचित्र भेजना आवश्यक होगा ।
3.       प्रविष्टि कोई प्रकाशक, समीक्षक, प्रशंसक या स्वयं आलोचक भी भेज सकते हैं ।
4.       प्रविष्टि प्राप्त होने की अंतिम तिथि – 30 मार्च, 2011 ।
5.       प्रविष्टि भेजने का पता – जयप्रकाश मानस, कार्यकारी निदेशक, प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा, रायपुर, छत्तीसगढ़ – 492001
6.       अन्य जानकारी के लिए मोबाईल नंबर 94241-82664 या ई-मेल-pandulipipatrika@gmail.com  या हमारी वेबसाइट www.pramodvarma.com से संपर्क कर सकते हैं ।

जयप्रकाश मानस
कार्यकारी निदेशक
                                                 प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़
           एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा, रायपुर, छत्तीसगढ़-492001

सुनिए गिरीश पंकज को