शनिवार, 26 जून 2010

छ्त्तीसगढ़ की डायरी

छत्तीसगढ़ में नम्बर दो के पैसेवाले नेताओं की बाढ़....
छत्तीसगढ़ में पैसे वाले नेताओं की बाढ़-सी आई है। और लोगबाग कहते हैं,कि यह ठीक भी है। राजनीति अब निर्धनों की चीज भी नहीं रही। बिन पैसा सब सून। अनेक राजनीतिक दलों में धनपतियों की संख्या बढ़ रही है। सामान्य कार्यकर्ता इनके जिंदाबाद में लगा रहता है। इसलिए अब पैसेवाले अनेक नेता धंधे के साथ-साथ राजनीति भी कर रहे हैं। इसका फायदा पार्टी को और बड़े नेताओं को मिलता है। कुछ निर्धन कार्यकर्ताओं का भी भला हो जाता है। बिना फायनेंस के अब कोई काम सधता नहीं। राजनीति भी ऐसा काम है,जहाँ पैसा लगता है। या यूँ कहें कि लोग इन्वेस्ट करते हैं। जैसे धंधे में किया जाता है। पहले राजनीति खाली पेट और खाली जेब से भी होती थी। इसलिए यह जरूरी है, कि अब पेट भरा हो और जेब भी। तब देखिए, कितनी जोरों से नारे लगते हैं। पिछले दिनों लोगों ने यही देखा। राजधानी में जब महंगाई विरोधी रैली निकली तो इसमें अनेक भयंकर धनवान नेता भी शामिल हुए जिनका महंगाई से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं रहा।  इस दृश्य को लोगों ने एक प्रहसन की तरह भी लिया। दुखी जनता का मनोरंजन ऐसी घटनाएँ करती रहती हैं.
छत्तीसगढ़ की शान, ये धनवान...
जी हाँ, छत्तीसगढ़ की शान बनते जा रहे हैं यहाँ के धनवान। और इसमें शामिल हो रहे हैं, यहाँ के प्रशासनिक अफसर, रेलवे के बड़े अफसर, बिल्डरर्स, फायनेंसर, व्यापारी और नेता आदि-आदि। इन सब लोगों के घर लगातार छापे पड़ रहे हैं और करोड़ों की अघोषित संपत्ति सामने आ रही है। अब ग्लोबल मीडिया का दौर है। कोई भी बड़ी खबर देखते ही देखते दूर-दूर तक फैल जाती है। अभी कुछ दिनों से रायपुर में आयकर छापों का सिलसिला जारी है। बाहर रहने वाले लोग छत्तीसगढ़ फोन करके बधाइयाँ दे रहे हैं,कि भाई, छत्तीसगढ़ में तो बड़ी दौलत है। नक्सल समस्या तो खैर अपनी जगह है लेकिन यह धनवालों की भी भरमार है। कौन कहता है, कि छत्तीसगढ़ गरीब है। अमीर धरती में अब अमीर लोग बढ़ रहे हैं। अब बाहर वालों को यह बात कौन समझाए कि यह कमाई उन गरीबों के जेब से ही निकल कर तिजोरियों तक पहुँच रही है, जिसके हिस्से केवल यही एक नारा बचा है-छत्तीसगढिय़ा, सबले बढिय़ा।
नक्सलगीरी के विरुद्ध विकास की लड़ाई
यह बहुत जरूरी है कि विनाश के विरुद्ध विकास का ढाँचा खड़ा किया जाए। बस्तर में नक्सलगीरी के चलते काफी बर्बादी हुई है। जन-धन और अमन-चैन की भयंकर हानि हुई है। इसकी भरपाई बंदूकें कभी भी नहीं कर सकतीं। केवल विकास योजनाएँ और विकास कार्य ही क्षतिपूर्ति कर सकते हैं। योजना आयोग ने अभी हाल ही में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए करोड़ों की विकास योजनाएँ मंजूर की हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने भी बस्तर के लिए जरूरी प्रकल्पों का प्रारूप तैयार कर लिया है। अब विनाश से निपटने के लिए विकास की गंगा बहनी चाहिए। ऐसा करके ही हम नक्सलगीरी का मुँहतोड़ जवाब दे सकते हैं। हिंसा को हिंसा से दबाने की कोशिश अपनी जगह हो सकती है, लेकिन हिंसा और विनाश से मुकाबला करने के लिए विकास योजनाएँ ज्यादा ारगर हो सकती हैं। बस्तर में जिस ईमानदारी के साथ विकास कार्य होनें थे, नहीं हो सके। अब अगर तंत्र जागा है तो उसका स्वागत होना चाहिए।
एकजुट होते आदिवासी...
आदिवासी अब अपनी महत्ता, अपनी ताकत को समझने लगे हैं इसलिए कभी गोष्ठी करके, कभी सम्मेलन कर के तो कभी रैली निकाल कर अपनी एकजुटता और ताकत का भी प्रदर्शन कर रहे हैं। बहुत हो गया आदिवासियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार। अब विकास की धारा के साथ बहने का समय आ गया है। आदिवासी भी बेचैन है। बस्तर में उद्योग लगाए जा रहे हैं, लेकिन वहाँ के आदिवासियों के पुनर्वास की दिशा में कोई ध्यान नहीं दिया जाता। यह एक बड़ी समस्या है। उद्योगपतियों की नजर भी आदिवासी क्षेत्रों में लगी रहती है। वे मान कर चलते हैं, कि वहाँ के लोगों को ेबहला-फुसला कर उद्योग लगाए जा सकते हैं। कुछ मामलों में वे सफल भी हुए हैं, लेकिन अब नहीं हो पाएँगे। इसी को बताने आदिवासी एकजुट हो रहे हैं। इसे अच्छे संकेत के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
औद्योगिक अशांति का विकल्प
पिछले दिनों राजधानी के पास एक कारखाने में एक मजदूर की मृत्यु हो गई। यह स्वाभाविक था,कि वहाँ कार्यरत कर्मियों में गुस्सा आता। उनके एक साथी की लापरवाही केकारण मौत हो गई। उन्होंने तोडफ़ोड़ कर के भारी नुकसान पहुँचाया। हालांकि  यह नहीं होना चाहिए था। शांति के साथ मुआवजे और अन्य माँगें रखी जा सकती थीं। लेकिन कई बार आक्रोश का फायदा कुछ गलत तत्व उठा लेते हैं। फिर भी उद्योगपतियों को सावधानियाँ बरतनी चाहिए। कारखाने में हादसे के बाद कारखाने के मालिक ने कुछ सकारात्मक निर्णय किए, उससे अच्छा संकेत गया है। मृत व्यक्ति के परविार को मुआवजे के साथ-साथ पत्नी को आजीवन पेंशन और बच्चे को नौकरी देने की घोषणा सराहनीय है। निजी क्षेत्रों में इसी तरह के निर्णय लिए जाने चाहिए। औद्योगिक अशांति से निपटने का एक यही विक्लप है जिसकी अब शुरूआत हुई है। श्रमिकों की एकजुटता और समाजिक दबाव के कारण भी ऐसा हुआ है।
फिर गौमाता की बात..
यह स्तंभकार अकसर गो माता की दुर्दशा पर लिखता ही रहा है क्योंकि मीडिया वातावरण बनाने का काम करता है। गाय कोअगर हम माँ का दर्जा देते हैं तो उसके साथ वैसा कुछ व्यवहार करके भी दिखाना चाहिए। यह सुखद संकेत है कि प्रदेश के राज्यपाल भी गौ माता की चिंता करते हुए उसकी सेवा की अपील कर रहे हैं। पिछले दिनों राज्यपाल महोदय एक धार्मिक कार्यक्रम में गए और वहाँ उपस्थित श्रद्धालुओं से यही अपील की कि गौ माता की रक्षा करें। उसे भरपूर चारा-सानी दे। राज्यपाल की अपील सामयिक है। गौपालक दूध बेचकर कमाई में तो काफी आगे रहता है मगर गाय की देखरेख वह शहर के भरोसे छोड़ देता है। यही कारण है कि बहुत-सी गायें राजधानी में इधर-उधर भटकती नजर आती हैं। किसी न किसी मुक्कड़ में गायें कचरे को खंगालती मिल जाएँगी। गो पालक को पता नहीं शर्म आती है, कि नहीं, मगर राज्यपाल महोदय को दुख जरूर हुआ, इसीलिए उनको अपील करनी पड़ी।

2 Comments:

शहरोज़ said...

दिनों बाद आपका गद्य पढने को मिला. पोस्ट की शक्ल में.आप ने बिलकुल मौजूं सवालों से मुठभेड़ की है.और जिन उपायों की चर्चा की है उल्लेखनीय है.

पुनश्च: भैया शब्द पुष्टिकरण हटा दें .अनावश्यक समय बर्बाद होजाता है.

'उदय' said...

... सभी विषय सार्थक!!!

सुनिए गिरीश पंकज को