शुक्रवार, 4 जून 2010

अरुंधती राय द्वारा खुलेआम हिंसा का समर्थन...?

मैं नक्सलियों और उनकी पैरोकार अरुंधती राय को अब क्या कहूं. दोनो की हरकतों पर रोना ही आता है. पहले नक्सलियों कि बात. इनके कारण पिछले दिनों ज्ञानेश्वरी रेल हादसा हुआ। इस हादसे में छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों के अनेक लोग मारे गए। नक्सलियों ने ट्रेन उड़ाई दी थी। अब कह रहे हैं कि भूल हो गई। माफी दई दो। हम मालगाड़ी को उड़ाना चाहते थे। अब हम खुद ट्रेनों की रक्षा करेंगे। हमें दुख है कि हमारे कारण सैकड़ों लोग मर गए। नक्सलियों की बात सुनकर लोग कह रहे हैं, वाह रे नक्सलियो, तुमने तो बड़ी मासूमियत के साथ खेद व्यक्त कर दिया, लेकिन उन परिवारों की भरपाई कैसे होगी, जिनके परिवार के लोग बेवजह जान गवाँ बैठे? और आखिर ऐसे काम करने ही क्यों जिससे बाद में दुख हो। ये रक्तपात, ये हिंसा,ये ब्लास्ट तुम लोग छोड़ क्यों नहीं देते? और उधर इन लोगों की खैरख्वाह लेखिका अरुंधती राय की हिम्मत देखो। डंके की चोट पर कह रही है, कि मैं नक्सली हिंसा की वकालत करती रहूँगी क्योंकि वर्तमान समय में गाँधीवादी तरीके से समस्याएँ नहीं सुलझ सकती। मुझे भले ही जेल में डाल दो, लेकिन मैं नक्सलियों के साथ हूँ। वाह रे अरुंधती, अकल से पैदल महिला...अगर बुद्धिजीवी भी बुद्धिहीन हो कर हिंसा का साथ देने लगेंगे तो देश का भगवान ही मालिक है। ये कैसा सामाजिक आंदोलन है,जिसमें मासूम बच्चों की भी हत्या कर दी जाती है.
आई पुलिस की जान में जान
रायपुर में पुलिस साइंस काँग्रेस के दो दिवसीय सम्मेलन ने लगता है, पुलिस में नई जान फूँक दी है। सम्मेलन के बहाने यहाँ की पुलिस को राष्ट्रव्यापी सपोट्र्र मिला है। लेकिन ऐसा भी न हो कि राज्य की पुलिस अपनी इस सफलता पर कुप्पा हो जो और केंद्र को ही हड़काने की कोशिश करने लगे। इसे हिम्मत ही कहेंगे न, कि हमारा केंद्रीय गृहमंत्री जो कहते हैं, उसको राज्य की पुलिस गंभीरता से नहीं लेती। राज्य की पुलिस केंद्र को समझा रही है कि वो नक्सली समस्या की गंभीरता को नहीं समझ रहा है। चिदंबर साहब तो हौसला बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन यहाँ की पुलिस पहले से ही हौसले में है। अगर यही रफ्तार रही तो केंद्र से हम किस आधार पर मदद माँगेंगे? अकड़ कर बात नहीं हो सकती। केंद्र की अनुशंसाओं को गंभीरतापूर्वक लिया जाना चाहिए, और उन्होंने जो निर्देश दिए हैं, उनके अनुपालन की कोशिश भी होनी चाहिए। जब यह मान लिया गया है, कि नक्सल समस्या राष्ट्रीय समस्या है तो केंद्र की बात सुननी चाहिए। केंद्र के मार्गदर्शन पर चलना ही पड़ेगा। केंद्र तो अब बस्तर में सब एरिया खोलने की मानसिकता भी बना रहा है। ऐसे समय में अगर यहाँ की पुलिस केंद्र को नासमझ करार दे तो यह उचित नहीं।
बाल न बाँका कर सके....
भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के बारे में अगर यह बात कही जाए तो गलत न होगा कि अकसर इनका बाल बाँका नहीं होता। भले ही जग बैरी हो जाए। ठीक है कि कभी-कभार ये बेचारे किसी घोटाले में, किसी बड़े भ्रष्टाचार में फँसते न•ार आते हैं, कभी-कभी फँस भी जाते हैं, लेकिन कुछ दिन बाद साफ-साफ बच निकलते हैं। कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ के एक आईएएस अधिकारी बाबूलाल अग्रवाल करोड़ों-अरबों रुपए के भ्रष्टाचार में फँसे, निलंबित भी किए गए लेकिन चार महीने बाद वे बहाल कर दिए गए। तर्क दिया गया कि आयकर विभाग ने पुख्ता दस्तावेज नहीं सौंपे। लोग चर्चा कर रहे हैं, कि आखिर ये पुख्ता दस्तावेज क्या होता है। जो कुछ था, पानी की तरह साफ तो था। कितने सबूत मिले थे। वैसे सरकार कह रही है, कि विभागीय जाँच चलती रहेगी। पता नहीं इस जाँच से इस अधिकारी को कोई आँच आएगी या नहीं लेकिन साँच तो यह है कि इस अधिकारी को राजस्व मंडल का सदस्य बनाया गया है। अब लोग उम्मीद कर रहे हैं कि इनके अनुभव से राज्य के राजस्व में कुछ न कुछ तो इजाफा होगा ही।
गर्भवती गाय की अकाल मौत
गाय की मौत हो जो तो वह कोई खबर नहीं बन पाती। पिछले दिनों एक गर्भवती गाय न्यू पंचशील इलाके में मर गई। सड़क में गहरा अंधेरा था। गाय का दूध पी कर मुटाने वाले गोपालक ने अपनी गाय को यूँ ही आवार घूमने के लिए छोड़ दिया था। खुद तो गाय के लिए चारा-पानी का बंदोबस्त नहीं करते, लोगों की दया पर छोड़ देते हैं। या तो लोग कुछ देदें या गाय कचरे में से कुछ खाने लायक खोज ले। तो ऐसे किसी महान गोपालक की गाय अंधेरे में देख नहीं पायी और एक गहरी नाली में जा गिरी। कुछ लोगोंने उसे जैसे-तैसे बाहर निकाला, लेकिन तब तक बेचारी की हालत खराब हो चुकी थी। उसकी टाँग टूट चुकी थी। उसके पेट का बच्चा भी मर चुका था। कुछ देर बाद गाय भी चल बसी। राजधानी में इन दिनों बहुत-सी गायें रात को घूमती फिरती हैं। अब यह बहुत जरूरी हो गया है कि नगर निगम का रात्रिकालीन उडऩ दस्ता ऐसी गायों को पकड़े और गौ शालाओं में भिजवा दे। और गोपालक से जुर्माने के रूप में मोटी रकम भी वसूले।
भू माफियाओं से बचाओ...
बहुत पहले एक गाना बजता था- मुझे मेरी बीवी से बचाओ। अब रायपुर शहर को गाना पड़ रहा है, मुझे भू माफियाओं से बचाओ। इनका बस चले तो पूरे रायपुर को उजाड़ कर एक नई टाउनशिप ही बसा दें। पेड़ काट दें, तालाब पाट दें। स्कूल गिरा दें। खेल मैदान पर मकान-दूकान या व्यावसायिक परिसर खड़ा करे दें। शॉपिंग मॉल बना दें। लेकिन बेचारों का जोर भी चल नहीं पा रहा है। वैसे कोशिश कर कर के अनेक तालाबों को पाट ही चुके हैं। और अब रायपुर के खो-खोपारा के तालाब को हजम करने की तैयारी कर रहे थे। उन्तीस एकड़ का तालाब सिमट कर नौ एकड़ का रह गया, तब नगर निगम और लोगों की आँखें खुलीं। इसी तरह सूरजबाँधा तालाब पर भी कब्जा करने की साजिश हो रही थी। लोगों की जागरूकता से ये तालाब कब्जामुक्त हुए। जरूरी है कि इन तालाबों का गहरीकरण हो ताकि बरसात में ये लबालब हो सके।
राजधानी में चिपको आंदोलन
मैं सुंदरलाल बहुगुणा के चिपको आंादेलन को याद कर रहा हूँ। उन्होंने टिहरी-गढ़वाल तरफ पेडों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन चलाया था। आज भी चला रहे हैं। अब कुछ लोगों ने यहाँ भी चिपकों आंदोलन शुरू किया है। रायपुर और आसपास जिस तेजी के साथ पेड़ कट रहे हैं, उसे देखकर लगता है, कि कुछ लोग पेड़ों से पिछले जनमम् का कोई बदला भँजा रहे हैं। सड़क चौड़ी करनी है तो पेड़ काट दो। अरे भाई, पेड़ों को सलामत रहने दो और पेड़ों के हिसाब से यातायात को एडजस्ट करने की कोशिश करो। अगर नहीं कर सकते और पेड़ काटना बहुत ही जरूरी है तो पेड़ को उठाकर शिफ्ट करने की कोशिश करो। यह भी नहीं कर सकते तो एक पेड़ काटो और बदले में सौ पौधे लगाओ और उसकी देखभाल करो। यह नहीं कर सकते तो घर बैठो। छुट्टी की जाए ऐसे अफसर की, जिसने पेड़ काटे और बदले में हमें धूप दी, गरमी दी। छाँव का एक टुकड़ा भी न दिया। चिपको आंदोलन वालों से आग्रह है कि वे इस आंदोलन से चिपके रहें, वरना होता यह है कि बहुत से आंदोलन शुरू होते हैं और अखबारों में छपने के बाद दम तोड़ देते हैं।

6 Comments:

ललित शर्मा said...

अरुंधती राय के खिलाफ़ देशद्रोह का अपराध क्यों दर्ज नहीं किया जा रहा है?

पी.सी.गोदियाल said...

मैं नक्सलियों और उनकी पैरोकार अरुंधती राय को अब क्या कहूं.

जैचंद के पड्पोती को कुछ मत कहिये ! उसे सुर्खिया चाहिए जिसके लिए वह अपने पडदादा के रिकॉर्ड को भी तोड़ सकती है !

आचार्य जी said...

आईये जानें .... मैं कौन हूं!

आचार्य जी

'उदय' said...

...प्रभावशाली पोस्ट !!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत उम्दा पोस्ट ..विचारणीय

देवेन्द्र तिवारी said...

अरुंधती राय का बयान ही नक्सली हिंसा के मुख्या कारण

सुनिए गिरीश पंकज को