सोमवार, 17 मई 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

विकास के रास्ते की ओर सरकार...
सरकार बस्तर के विकास को ले कर अब ज्यादा चिंतित नजर आ रही है। ये अच्छे संकेत हैं। राजधानी रायपुर से लेकर दिल्ली तक अब नेता बस्तर के बारे में सोच रहे हैं। सोनिया गाँधी ने भी स्वीकार किया कि नक्सलवाद के पीछे कारण यही है, कि वहाँ ठीक से विकास कार्य ही नहीं हुुआ। राज्य सरकार अब विकास की दिसा में तेजी के साथ बढ़ रही है। बस्तर के जारों शिक्षित नवयुवकों के लिए सौ दिन में  नौकरी देने का एक पैकेज भी ला रही है। मुख्यमंत्री योजना आयोग को 9760 करोड़ की एक कार्ययोजना भी सौंपने वाले हैं। काश,ये सब काम बहुत पहले शुरू हो गए होते लेकिन अभी भी बहुत देर नहीं हुई है। सरकार की इस पहल के बाद उम्मीद की जा सकती है, कि बस्तर के युवक नक्सलवाद की ओर नहीं, विकासवाद की ओर आकर्षित होंगे। जब उन्हें काम मिलेगा तो वह मुख्यधारा में शामिल होंगे, जंगल की ओर क्यों भागेंगे?
नक्सलियों को एक प्रेरक -संदेश
हफ्ते भर पहले की ही बात है। सरगुजा में घायल हुए एक नक्सली को एक जवान ने ही खून दे कर उसकी जान बचाई। यह घटना एक प्रेरक-संदेश है नक्सलियों के लिए, कि समाज अगर तुम्हारे खिलाफ खड़ा है तो उसका कुछ कारण है,लेकिन वह तुम्हारी जान का दुश्मन नहीं है। नक्सलियों को भी समझ लेना चाहिए कि वे जवान जो समाज की रक्षा के लिए तैनात हैं, नक्सलियों के शत्रु नहीं हैं। वे अपना फर्ज निभा रहे हैं। जिस जवान ने नक्सली को खून दिया वह मना भी कर सकता था, कि मैं क्यों दूँ खून। नक्सली हमारे जवान भाइयों की हत्याएँ कर रहे हैं। लेकिन जवान ने ऐसा नहीं किया। उसने सदाशयता दिखाई। यही सदाशयता हमें मनुष्यता की ओर ले जाती है। जवान ने इंसानियत दिखाई, अब नक्सली भी दिखाएँ और मुख्यधारा से जुड़कर। पता नहीं, वो दिन कब आएगा, अभी तो वे किसी का गला रेत रहे हैं, जन अदालत लगा कर किसी को फाँसी पर लटका रहे हैं और अपने क्रूर सामंती चरित्र का ही सबूत दे रहे हैं।
साम्प्रदायिक सद्भावना की बात
गाय हमारी आस्था का केंद्र-बिंदु है। किसी भी समाज की आस्था को ठेस पहुँचे तो कटुता बढ़ती है। गाय को काटने की बातें जब सामने आती हैं, तो हिंदुओं को दुख होता है। वैसे सच्चाई यह भी है कि बहुत-से धनलोभी हिंदू ही अपनी कमजोर-बीमार गायों को कसाइयों को सौंप देते हैं। बहुत-सी गायें कसाईखानों को भेज दी जाती है। खैर, ये अलग मसला है। हर मुसलमान गाय का दुश्मन है, ऐसी बात नहीं है। कुछ हो सकते हैं, लेकिन वे मुसलमानों के प्रतिनिधि नहीं है। आदर्श मुसलमानों के प्रतिनिधि हैं पैगंबेरइस्लाम के वंशज बाबा हाशमी जी जैसे संत, जो साम्प्रदायिक सदभावना की दिशा में काम कर रहे हैं। पिछले दिनों वे रायपुर पधारे और अपनी तकरीर करते हुए उन्होंने मुसलिम भाइयों को समझाया कि हमें दूसरों की पसंद का खाना खाना चाहिए अगर हिंदुओं को गो की हत्या पसंद नहीं है, तो वह कार्य नहीं करना चाहिए। बाबा हाशमी जैसे संतों के उद्बोधन के बाद लोगों की सोच में बदलाव आएगा ही। बाबाजी ने संस्कृत के श्लोक सुनाए, गीता का हवाला दिया और पूरे प्रवचन के माध्यम से मानवता के विकास की बात की और कहा कि मिलजुल कर रहने में ही जीवन का सार है। ऐसेे प्रवचनों से समाज में शांति-सद्भावना कायम हो सकती है।
पानी की चिंता
रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून...चार सौ साल पहले रहीम कवि ने यह संदेश दिया था। अब हम इसे दुहरा रहे हैं और अपनी नादानी पर रो रहे हैं। पश्चाताप कर रहे हैं। विकास के तथाकथित ढाँचे ने हमारी नदियों को, तालाबों को,हरे-भरे पेड़ों को हमसे छीन लिया। अब हम हाय-हाय...पानी-पानी कर रहे हैं। सरकारी तंत्र के कारण, मूर्ख लोगों के कारण पर्यावरण का विनाश होता रहा। आज भी हो रहा है। गौरवपथ बना कर हमनें पेड़ों की निर्मम हत्याएँ कीं और खुश हुए कि देखो, सड़कें कैसी चौड़ी हो गई। लेकिन मूर्ख मन ने यह नहीं देखा कि हरी-भरी धरती का सत्यानाश कर दिया। अब जब तापमान की तपिश एसी को भी फेल करने लगी, हम घर के भीतर भी झुलसने लगे तो अपनी गलती समझ में आने लगी। खैर, अभी भी चेत जाना चाहिए। अब नेताश्रमदान कर के तालाबों को, नदियों को बचाने का उपक्रम कर रहे हैं। ये सब नाटक-नौटंकी न बने, हम गंभीरता के साथ हरियाली बचाएँ, पेड़ लगाएँ, तभी भविष्य के लिए पानी बचा सकेंगे। शहरों में, गाँवों में हरियाली को बचाने का उपक्रम हो, हमें शॉापिंग मॉल नहीं, हरे भरे मैदान और पेड़ चाहिए, यह अभियान चले तो हम ग्लोबल वार्मिंग के दैत्य से बच सकते हैं।
 विरोध का यह तरीका नहीं...
पिछले दिनों खरसिया के गाँव दर्रामुड़ा में जो कुछ हुआ, वह ठीक नहीं हुआ। प्रतिरोध का यह तरीका ठीक नहीं कि हम लोगों का मुँह काला करें, उनको उठक-बैठक लगाएँ, जूते की माला पहनाएँ। ये ठीक है कि गाँव की सहमति के बिना एक इंच जमीन भी कोई कंपनी नहीं ले सकती। गाँव के लोगों को इसके लिए तैयार रहना चाहिए। कंपनी के चालाक लोग धूर्तता का सहारा लेकर गाँवों में पावर प्लांट या अन्य कारखाने लगाने के लिए जमील हड़प लेते हैं। गाँव का सत्यानाश हो रहाहै। गाँव वालों के मन में आक्रोश स्वाभाविक है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम कानून अपने हाथ में  ले लें। हम शांतिपूर्वक प्रतिवाद करें, हिंसा का सहारा न लें। लेकिन जो भी हुआ उससे एक बात तो साफ हो गई कि गाँव के लोग अपने गाँव से प्यार करते हैं। वे अपने गाँव को बचाना चाहते हैं। एक बार कोई कारखाना लग गया तो गाँव उजडऩे लगता है। उसकी हरियाली, उसकी नदी-तालाब तबाह होने लगते हैं। उद्योगपति भी समझ लें कि गाँववालों को विश्वास में लिए बगैर कोई काम करने का दुष्परिणाम क्या हो सकता है। हमें  विकास चाहिए, लेकिन विनाश की कीमत पर नहीं। आपसी सदभावना के साथ विकास हो, यही समय की मांग है।
फुटपाथी चमत्कारों से सावधान..
अकसर यह खबर सुनने को मिल जाती है कि किसी ने चमत्कार का झाँसा देकर किसी महिला को ठग लिया। ऐसी खबरें छपती भी हैं, लेकिन हमारे अंदर का बैठा डर, लालच हमें झाँसों में आने पर मजबूर कर देता है। पिछले दिनों राजधानी में तीन महिलाएँ ठगी का शिकार हो गईं। एक चमत्कारी बाबा ने महिलाओं को रोका और कहा कि आप जो जेवर पहनी हुई हैं वे आपको बर्बाद कर सकते हैं. इसे मंत्रोपचार के जरिए ठीक किया जा सकता है। तभी बाबा को चमत्कारी सिद्ध करने के लिए उन्हीं के सिखाए-पढ़ाए लोग आ गए और बाबा को प्रणाम करके उसका गुणगान करने लगे। महिलाएँ झाँसे में आ गईं और अपने गहने उतार कर दे दिए। बाबा ने गहनों को पोटली में रखा, मंत्र फूँकने का नाटक किया और पोटली वापस कर दी और चलते बने। राह चलते चमत्कार दिखाने वाले किसी भी बाबा को फटकार देना चाहिए। महिलाएं रुक जाती हैं और बाबा लोग कुछ ऐसा सम्मोहन करते हैं कि वे जाल में फँस जाती हंै और अपने जेवर और धन लुटा कर ही होश में आती है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिए सावधान रहने की जरूरत है।

शुक्रवार, 7 मई 2010

जब्बार ढाकवाला को याद करते हुए...

मौत ने हमसे एक सार्थक लेखक छीन लिया...
नहीं...नहीं....यह खबर सच न हो....लेकिन खबर सच है. दुखी का देने वाली है. व्यंग्यकार और कवि जब्बार ढाकवाला नहीं रहे. सात मई को ऋषिकेश के पास सड़क हादसे में उनका निधन हो गया. उनके साथ उनकी धर्मपत्नी तरन्नुम भी चल बसीं. जैसे ही यह खबर मित्र रविन्द्र सिंह ने दी, मै सन्न रह गया. मन नहीं माना तो भोपाल के अपने मित्र राजुलकर राज से बात की. थोड़ी देर बाद जयप्रकाश मानस का एसएमएस आ गया. सुधीर शर्मा ने भी फोन किया. दिल्ली से ललित मंडोरा ने भी फोन कर के दुःख का इज़हार किया. उनके निधन की सूचना जिस किसी को मिली, वह विचलित हो गया. सब एक दूसरे को सूचित कर रहे थे और हादसे की पुष्टि भी चाहते रहे. भाव यही था कि काश..यह खबर गलत हो..लेकिन ऐसा न हो सका. खबर पक्की थी कि ऋषिकेश के पास ढाकवाला जी कि कर ४-५०० फुट गहरी खाई में जा गिरी. वे छुट्टी मनाने उधर गए थे. उनके साथ साथ-साथ जीने-मरनेकी कसम खाने वाली उनकी धर्मपत्नी तरन्नुम जी भी थी. वे भी ढाकवाला जी के साथ स्वर्गवासी हो गयी. कब, कहाँ मौतरूपी जहरीला सांप हमें डस लें, कहा नहीं जा सकता. आखिर मौत पर किसका बस चलता है?
मुझे तो अब तक यकीन नहीं हो रहा है, कि ढाकवाला जी नहीं रहे. लेकिन मन को कितना बहलायेंगे. सच से मुह मोड़ना ठीक नहीं.  अपने इस  परम मित्र को याद करता हूँ, तो बीस साल पहले के दिनों में  जाना पड़ता  है. रायपुर के दुर्गा कालेज से पढ़ाई करने वाले ढाकवाला प्रशासनिक सेवा में चयनित हो कर डिप्टी कलेक्टर बने, फिर आईएएस के रूप में भी पदोन्नत हुए. कुछ मध्यप्रदेश के कुछ जिलों में कलेक्ट्री की. जब वे छात्र थे.  तभी से साहित्य में उनकी रूचि विकसित होने लगी थी. उस वक्त रायपुर के सक्रिय समाजवादी लेखक गणपत साव 'बिलासपुरी' जी के साथ रह कर उन्होंने सामाजिक सरोकारों का पाठ सीखा था और व्यंग्य तथा नयी कविता की दुनिया में प्रवेश किया.  प्रशासनिक व्यस्तताओं के बावजूद वे  लेखन-कर्म में आजीवनसक्रिय रहे. जब वे बस्तर में थे, तब उन्होंने वहा एक साहित्यिक कार्यक्रम किया था और  मुझे भी बुलाया था. मेरे प्रति उनके मन में बड़ा स्नेह था. जब वे छत्तीसगढ़ बनाने के बाद भोपाल चले गए तो भी रायपुर से उनका रिश्ता बना रहा. यहाँ उनका घर अब भी है. बड़े मन से उन्होंने यहाँ एक घर बनाया था. एक बार जब वे आये तो अपना घर दिखाने ले गए थे. वे जब भी रायपुर आतेथे तो कुछ मित्रों से ज़रूर मिलते थे. उनमे एक मैं भी होता था. हम लोग एक-दूसरे को अपनी रचनाये सुनाया करते रहे.
बस्तर के आदिवासियों पर केन्द्रित कविताओं का एक संग्रह ''उदास गीत नहीं हैं उनके पास'' जब छप कर आया तो इस पर एक बड़ी गोश्ह्ती भोपाल में हुई थे. इस गोष्ठी में आलेख पढ़ने के लिए उन्होंने मुझे बुलवाया था. इस संग्रह को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिये. एक संवेदनशील कवि जनजातियों की संस्कृति को किस तरह हृदयंगम करता है, इस संग्रह की कविताओं से पता चलता है. कविता के साथ-साथ व्यंग्य में भी उनकी गहरी दिलचस्पी थी. ''बादलों का तबादलों से सम्बन्ध'' उनका महत्वपूर्ण संग्रह है. इसमे उनका एक व्यंग्य है  ''अफसरियत का अकाल''. इसमें उन्होंने अपनी ही बिरादरी यानी अफसरों की जम कर खिचाई की है. यह व्यंग्य वे अक्सर मंचों से भी सुनाया करते थे. यह उनका हिट व्यंग्य था. साहित्य में घुस पैठ करने  वाले शातिर अफसरों पर लिखे गए मेरे उपन्यास ''माफिया'' की उन्होंने तहेदिल से तारीफ़ की थी. जब बे मिले तो मुस्कराते हुए कहा था-पढ़ लिया भाई आपका उपन्यास..जो लिखा है, बिल्कुल सही लिखा है'' ऐसी  उदारता कितने लोगो के पास रह गयी है?
जब्बारभाई बहुआयामी रचनाकार  थे. नयी कविता और व्यंग्य दोनों ही विधाओं को वे साध चुके थे और ग़ज़ल को साधने की दिशा में तेज़ी के साथ बढ़ रहे थे. ग़ज़ल लेखन में भी उनकी गहरी रूचि थी. उन्होंने अनेक  श्रेष्ठ शेर कहे. कुछ अभी मुझे याद आ रहे है. इन्हें पढ़ कर ही सुधी पाठक समझ जायेंगे कि शेरोशाइरी में उनका मेयार क्या था. देखिये
गली से, गुलों से, नजारों से बातें
मै करने चला हूँ बहारों से बातें
खुदा मुझको परवाज़ दे मै करूंगा
ज़मी के सितम पर सितारों से बाते
जुबा कटते हो तो मगर याद रखना
मै करता रहूँगा इशारों से बातें
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मन में मेरे अदालत जिंदा है
क्या करुँ अन्दर छिपा परिंदा ज़िन्दा है..
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ज़िन्दगी के  हर लम्हे  का मज़ा लीजिये
यहाँ पर टेंशन की जेल में
उम्र कैद की  सजा लीजिये....
अभी अचानक ये पंक्तियाँ ज़ेहन में कौंध गयी. इन रचनाओं से ही हम समझ सकते है कि वे कितनी गहरे के साथ चिंतन करते थे. मुझको वे बहुत चाहते थे. इसका एक मात्र कारण यह थाई कि मैं भी उनकी तरह व्यंग्य लिखता हूँ और ग़ज़ले  कहता हूँ,  मेरे प्रति उनकी भावना क्या थी इसे समझाने के लिए एक उदहारण पर्याप्त है कि, जब मैंने सांप्रदायिक सद्भावना विषयक एक ग़ज़ल कही तो इसे उन्होंने नए वर्ष पर भेजे जाने वाले अपने ग्रीटिंग कार्ड पर छाप दिया था. मेरा नाम भी उन्होंने दिया था, जबकि ऐसी सदाशयता लोग दिखते ही नहीं. अपने ग्रीटिंग कार्ड पर किसी दूसरे अन्तरंग मित्र लेखक का शेर देना और उसका नाम भी, यह आजकल के एक दुर्लभ उदाहरण के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए.  ऐसी सदाशयता जब्बार भाई ही दिखा सकते थे, क्योंकि वे अफसर भर नहीं थे, वे एक संवेदनशील लेखक भी थे. जो केवल अफसर होते है, वे अक्सर मनुष्यता से काफी नीचे गिर जाते है. साहित्य उन्हें मनुष्य बनाये रखता  है.  साम्प्रदायिकता के खिलाफ भी उन्होंने अनेक शेर कहे. उनका एक बहुचर्चित शेर है, कुछ शब्द भूल रहा हूँ. भाव कुछ इस तरह है, कि -
 नफ़रत फ़ैलाने वालों के साथ देश सारा नहीं है
नफ़रत इस देश की मुख्यधारा नहीं है.
जब्बार ढाकवाला अगर संवेदनशील मनुष्य की तरह लेखकों के बीच आते थे तो इसके पीछे उनके लेखकीय संस्कार ही थे.  अभी उनको बहुत कुछ लिखना था. वे इसकी तैयारी भी कर रहे थे. पिछले दिनों जब उनसे फोन पर बात हुई तो उन्होंने  बताया था कि वे एक नयी पुस्तक पर काम कर रहे है. उसका शीर्षक भी उन्होंने बताया था- ''ज़िंदगी के हर लम्हे का मज़ा लीजिये''  मुझे पता नहीं कि इस किताब  की अभी क्या स्थिति है लेकिन इतना तो कह सकता हूँ कि वे जब तक जीए, सृजन कर के  ज़िन्दगी का मज़ा लेते रहे. वे अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन अपने रचनात्मक वैविध्य के साथ हमेशा बने रहेंगे. उनका अचानक चला  जाना हम लोगों को गहरी उदासी में डाल गया है.इनमे उनके मित्र है, लेखक बिरादरी है, प्रशासनिक सहयोगी भी होंगे. वे आज जीवित होते तो भी यही सब बातें मैं  कहता, या कही लिखना होता तो भी यही  बाते दुहराता,.क्योंकि वे ऐसे तथाकथित लेखक नहीं थे, जिनकी जीते जी तो आलोचना होती है, और उनके न रहने पर लोग तारीफों के पुल बाँध देते है. आज अगर मैं उन पर कुछ लिख रहा हूँ तो सिर्फ इसलिए कि वे अफसरियत का चोला उतार कर ही हम मित्रो के बीच आते थे. इसीलिए ही वे मुझे प्रिय थे क्योकि वे अंतिम साँस लेने तक भी मनुष्य बने रहे.
यह तो तय है कि बस्तर के आदिवासी भाईयों की ही तरह किसी भी किस्म के उदास गीत जब्बार ढाकवाला के पास नहीं थे, लेकिन उनका इंतकाल हमें गहरे उदास गीतों से भर गया है. अब केवल यादे है और इन्ही यादों और चंद रचनात्मक धरोहरों के सहारे हम सब को यह जीवन बिताना पड़ेगा.
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बुधवार, 5 मई 2010

अब शांति की बात खबर नहीं बनती,...खबर बनती है अशांति. हिंसा, तोड़फोड़..

आज रायपुर के टाउन हाल में देश के विभिन्न हिस्सों से आये बुद्धिजीवियों की एक सभा हुई. प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो. यशपाल, बुजुर्ग गांधीवादी नारायणभाई देसाई, सर्वोदयी अमरनाथजी, गाँधी शांति प्रतिष्ठान की राधा बहन, पूर्व सांसद-चिन्तक रामजी सिंह और छत्तीसगढ़ में जन्मे स्वामी अग्निवेश सहित देश के कोने-कोने से पधारे लगभग पचास शांतिकामी लोग जमा हुए. ये लोग बस्तर में हो रही हिंसा को लेकर चिंतित थे. कल ये लोग बस्तर भी जायेंगे. लोगो से बात करेंगे. बस्तर कैसे शांत हो इसका रास्ता तलाशेंगे.आज हर वक्ता ने देश के विकास पर अपनी बात रखी.लेकिन अचानक एक अप्रिय स्थिति उस वक्त निर्मित हो गयी, जब कुछ लोग सभा के बीच चले आये. इनके हाथों में तख्तियां, थी, जिन पर लिखा था. ''गो बैक'', ''शांतिवार्ता नहीं चलेगी'' ''नक्सलियों का समर्थन बंद करो'' आदि-आदि. पहले तो ये प्रदर्शनकारी मौन धारण कर आये. गांधीगीरी भी दिखाई. ये जब आये तो यशपाल जी बोल रहे थे.लगभग पचास प्रदर्शनकारी रहे होंगे. सबके सब मंच पर चढ़ गए. साथ में गुलाब के फूल लेकर आये थे. उन्होंने सबको फूल दिया, और अपनी बात रखते हुए कहा कि आप बुद्धिजीवी लोग बस्तर में जवानो की ह्त्या पर मौन रहते है,...अप नक्सलियों के समर्थक है''. यशपाल जी ने कहा-''बेटे, हमें गलत मत समझो. हम शांति के लिए आये है''. थोड़ी देर के लिए वातावरण तनावग्रस्त हो गया. तोरायपुर के गांधीवादी नेता केयूरभूषण भावुक हो कर चिल्लाने लगे कि ''तुम लोग मेरी जान ले लो, मगर जो अतिथि बाहर से आये है, उनको सुनो''. लोगों के समझाने पर प्रदर्शनकारी बाहर चले गए, लेकिन कुछ देर बाद वे फिर आ गए. इस बार वे जोर-जोर से नारे लगा रहे थे.इस बीच इलेक्ट्रानिक मीडिया के कैमरे काम करने लगे थे. तब बात समझ में आ गयी. अभी तो चले गए, थे, लेकिन जैसे ही कैमरे सक्रिय हुए तो ये भी सक्रिय हो गये. दरअसल आजकल मीडिया के कहने पर बहुत-से नेता खबर गढ़ने लगते है. कैमरे के सामने चीखने से वे हीरो बन जाते है और मीडिया का सनसनीवाला मामला भी जम जाता है. खबर हिट हो जाती है सवाल है टीआरपी का. अब शांति की बात खबर नहीं बनती, खबर बनती है अशांति. हिंसा, तोड़फोड़.. मंच पर बैठे तमाम बुद्धिजीवियों ने नवनिर्माण की बाते रखी. उस ओर किसी कि रूचि नहीं थी. मै पूरे समय तक इसीलिए बैठा रहा कि देखूं, ये लोग कहते क्या है. कहीं सचमुच नक्सलियों के पक्ष में तो बातें नहीं कर रहे हैं, अगर ऐसा होता तो मैं भी खड़े होकर हस्तक्षेप कर देता. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. वक्तागण प्रदर्शनकारियों से नाराज़ नहीं हुए, उलटे किसी ने उन्हें बेटा कहा तो किसी ने पोता. हमलोगों को दुःख इस बात का हुआ कि देश के जाने-माने बुद्धिजीवियों के साथ मेरे शहर में अभद्र व्यवहार हो गया. और वाह रे पुलिस..? वह तो मूकदर्शक बनी रही. लगा वह प्रदर्शनकारियों को ही संरक्षण दे रही है, जबकि संरक्षण मिलना था गांधीवादी लोगों को. बाहर से लोग आये हैं उन्हें सभा करने देते. खैर, कुछ देर बाद प्रदर्शनकारी चले गए तो मंच पर बैठे वक्ताओं ने शांति-सद्भावना पर अपने विचार रखे. अग्निवेश जी ने कहा- ''मै नक्सलियों की हिंसा का घोरविरोधी हूँ.'' उन्होंने अद्भुत भाषण दिया. लेकिन वक्ताओं की बात सुनाने के लिए प्रदर्शनकारी मौजूद नहीं थे. अगर वे लोग रुकते और सुनते तो समझ सकते कि बुद्धिजीवियों का दल शांति के लिए ही आया है, नक्सलियों के समर्थन के लिए नहीं. खैर जैसे-तैसे सभा तो हो गयी. अब ये शांति-दल कल बस्तर जाएगा. सभा से लौट कर मुझे लगा कि कुछ लिखना चाहिए. सो,आँखों देखा हाल लिख दिया. पूरा लिखना संभव नहीं. क्योकि पाठको के पढ़ाने की भी एक सीमाहोती है. इसलिए बस इतना ही. आग्रह यही है, कि आप मेरी कविताओं वाला ब्लॉग जरूर देखे. शांति को समर्पित एक गीत दिया है आज..

रविवार, 2 मई 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

हो रही है दो सिंहों की टक्कर
जी, हाँ, इन दिनों दो सिंहों की भिडंत जारी है। यह नूरा कुश्ती है, जिसका कोई खास अर्थ नही निकलता, लेकिन चलती रहती है। यह अखबारी कुश्ती है, जिसका मजा हम सब लेते हैं। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह को नक्सल समस्या के हल में विफल होने पर खरी-खोटी सुनाई तो डॉ.रमन सिंह ने भी उसी अखबार में जवाबी लेख भेज दिया। उसे पढ़ कर दिग्गी राजा बौखलाए तो उन्होंले फिर एक ळिख मारा और डॉ.रमन सिंह से दस तीखे सवाल पूछ डाले। उन्होंने कहा है कि नक्सलवाद पर मैं खुली बहस के लिए कहीं भी आमंत्रित हूँ। अब बारी है डॉ.रमन सिंह की। वे जवाब देंगे ही। डॉक्टर  साहब जल्दी जवाब दें और बेहतर तो यही होगा, कि दोनों आमने-सामने हो जाए। रायपुर में खुली बहस हो। अगर ऐसा हुआ तो हजारों लोग जमा हो जाएंगे। सुभाष स्टेडियम में ही बहस हो पाएगी। यह तो एक सुझाव भर है। अब ये इन दो सिंहों पर निभर करता है कि वे क्या सोचते हैं।  आमने-सामने होना है कि ऐसेही अखबारी लड़ाई जारी रहे। जो भी हो, सवाल-जवाब से एक वैचारिक जीवंतता तो भी है। और यह जिंदा लोकतंत्र का ही प्रतीक है।
काँग्रेस की वादीखिलाफी पर नगाड़े
राजधानी में भाजपाइयों को नगरनिगम कार्यालय के बाहर नगाड़े बजाने पड़े। यह जररूरी भी था। बहरी व्यवस्था को सुनाने के लिए नगाड़े ही बजाए जाते हैं। नगर निगम में काँग्रेसी महापौर बैठी है। काँग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा था, कि हम लोग आए तो संपत्ति कर नहीं बढ़ाया जाएगा। और अब दन्न से कर बढ़ा दिया। अग्निशमन कर भी कई गुना बढ़ा दिया गया है। महापौर कह रही है,कि राज्य सरकार के आदेश पर ऐसा किया गया है, जबकि भाजपा और दूसरे लोगों का कहना है कि यह नगर निगम का अधिकार क्षेत्र है। काँग्रेसी भी दुखी है। वे कह रहे हैं, कि जनता के बीच काँग्रेस की छवि खराब हो रही है। हमने जब वादा किया तो उसे निभाना ही पड़ेगा। अंदर की बात यह है कि अनेक काँग्रेसी तो महापौर के रवैये से भी दुखी चल रहे हैं। सबका दर्द यही है,कि वह हम लोगों की नहीं सुनती। महापौर मानती है कि मैंने अपनी छवि के कारण चुनाव जीता है। फिर भी उनकोसोचना तो होगा ही कि वे काँग्रेसी की महापौर हैं और काँग्रेस ने घोषणा पत्र में जो लिखा उसी के अनुरूप काम करना होगा, वरना स्वाभाविक है कि लोग कहेंगे, कि वादाखिलाफी हो रही है। कहीं ऐसा न हो कि भविष्य में महापौर के विरुद्ध काँग्रेसी ही सड़क पर उतर आएँ।
काँग्रेसी पार्षद ही चपेट में आ गए
जयस्तंभ और आसपास के इलाके को विज्ञापनमुक्त क्षेत्र बनाया गया है,इसका उल्लंघन करने पर काँग्रेस के पार्षद लखवंत सिंह गिल उर्फ गुड्डा भैया को दस हजार का जुर्माना पडऩा पड़ गया। उनकी एक होर्डिंग वहाँ लगी हुई थी। गुड्डा भैया ने जुर्माना पटा दिया। इससे दो संदेश समाज के बीच अच्छा गया, वो यह कि अभी भी कुछ सिद्धांत जिंदा हैं। गुड्डा भैया चाहते तो बहस कर सकते थे, लेकिन उन्होंने उदारता दिखाई और इसी बहाने दूसरे लोगों को भी आगाह कर दिया, कि होर्डिंग लगाई तो खैर नहीं। इन दिनों शहर में होर्डिंग्स लगाने का भूत-सा सवार हो गया है। पिछले दिनों आंधी चली तो एक होर्डिंग एक घर के ऊपर आ गिरी। गनीमत है, कि उस वक्त वहाँ कोई नहीं था, वरना बड़ी दुर्घटना हो जाती। बाजारबाद के दौर में अब छोटे-छाटे विज्ञापन से कंपनियों का मन नहीं भरता। उनका मानना है कि जितने बड़े विज्ञापन होंगे, उनका माल उतना ज्यादा बिकेगा।
बच्चे क्यों भागते हैं?
राजधानी के पास माना में बच्चों का संप्रेक्षण गृह है। इसमें वे बच्चे रखे जाते हैं, जो नाबालिग हैं, लावारिस-से है और किसी अपराध में संलिप्त थे। और पुलिस के हत्थे चढ़ गए। यहाँ उनकी देखरेख की जाती है लेकिन हो यह रहा है कि वहाँ रह कर बहुत-से बच्चे सुधरते ही नहीं और ज्यादा बिगड़ जाते हैं। पिछले दिनों संप्रेक्षण घर के ग्यारह बच्चे भाग निकले। उन्होंने वहाँ के प्रहरियों की आँखों में मिर्ची डाली, उन्हें घायल किया और  निकल भागे। यह गंभीर अपराध है। सारे लड़के नशे में थे। उनकी तलाश हो रही है। सोचने की बात यह है कि आखिर बच्चे इतने उद्दंड कैसे हो गए? मतलब साफ है कि वहाँ की व्यवस्था ठीक नहीं है। बच्चे बिगड़ रहे हैं, मुख्यधारा में नहीं आ पा रहे हैं, तो मौजूदा पशासन दोषी है। उन पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। बच्चे हमारा भविष्य हैं। किसी कारणवश अगर वे संप्रेक्षण घर में आ गए मतलब यही उनकी दुनिया नहीं है। इस दृष्टि से सोचने की जरूरत है और उन्हें बेहतर माहौल दिया जाना चाहिए ताकि वे सुधरे, और ज्यादा न बिगड़ जाएँ।
सबक लड़कियों के लिए
टीवी-सिनेमा की अनेक रूमानी कहानियाँ देख कर इन दिनों युवा पीढ़ी में स्वच्छाचारिता बढ़ती जा रही है। नई उम्र की नई फसल बहुत जल्दी बौरा जाती है। इसमें भावनाओं का ज्वार होता है, लेकिन विवेक की शक्ति कम होती है। एक-दूसरे को देखा, आकर्षण बढ़ा तो बात प्यार-मोहब्बत के गलियारे से होते-होते बहुत जल्दी शादी तक पहुँच जाती है। अभी ठीक से खड़े भी नहीं हो सके हैं, एक-दूसरे को समझ भी नहीं पाए हैं, बस शादी करेंगे। घर वाले विरोध करेंगे तो घर से भाग खड़े होंगे। पिछले दिनों एक लड़की ने ऐसी ही भूल कर दी। लड़के के बहलावे में जमशेदपुर चली गई। वहाँ शादी भी कर ली। बाद में लड़के ने लड़की को पैसे के लिए तंग करना शुरू किया। लड़की पर अत्याचार बढ़ा तो रायपुर लौट आई। अब लड़के के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई गई है। उस पर बलात्कार को मामला दर्ज किया गया है। यह नौबत नहीं आती अगर लड़की ने विवेक से काम लिया होता। राजधानी क्या बहुत से शहरों से लड़के-लड़कियाँ भागने लगे हैं। घर के संस्कार जब बच्चों पर ठीक से नहीं पड़ पाते, तब ऐसी नौबत आती है। माँ-बाप आत्ममंथन करें और बच्चों को समझाएँ कि अगर उन्हें कोई पसंद है तो घरवालों को बताएँ, उनको विश्वास में लें। घर वाले भी समय के साथ चलें और अंतरजातीय विवाह की नौबत आए तो अगर लड़का या लड़की ठीक हो तो अपनी सहमति दे ताकि बच्चे घर से भाग कर उनकी फजीहत न करवा सके।
जन्म दिन हो तो ऐसा
रायपुर के विधायक बृजमोहन अग्रवाल की शैली ही ऐसी है कि उनकी लोकप्रियता में कमी नहीं आती। सबकी मदद का भाव सच्चे जनप्रतिनिधि की विशेषता होनी चाहिए। एक मई को उन्होंने अपना जन्मदिन मनाया तो केवल मौज-मस्ती नहीं हुई, उन्होंने दान-पुण्य के अनके काम किए। नि:शक्तों को ट्राइसिकल, कैलिपर्स, बैसाखी, श्रवण यंत्र आदि बाँटे गए, भंडारा कर गरीबों का खाना खिलाया गया, स्वास्थ्य शिविर लगा। गरीब बस्ती में इक्यावन किलो का केट काटा गया। कार्यकर्ताओं ने रक्तदान किया, वृद्धाश्रम में फल वितरित किए गए। कहीं-कहीं शरबत-जूस भी बाँटे गए। इस तरह का जन्म दिन ही जन प्रतिनिधियों का मनाना चाहिए। इससे उनकी एक सही पहचान बनती है। आम लोगों को भी लगता है कि यह हमारा सच्चा नेता है। उम्मीद है कि दूसरे नेता भी इसी तरह का जन्म दिन बना कर लोगों का भला करते रहेंगे।

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

व्यंग्य / मूर्ति की 'एडवांस बुकिंग

मित्रो, ''सद्भावना दर्पण'' नामक इस चिट्ठे को मैंने बहुत पहले ही बना लिया, था, लेकिन मेरी लापरवाही के कारण ''चिट्ठाजगत'' में इसका विधिवत ''पंजीकरण'' नहीं हो पाया था. संयोगवश कल ही हुआ. आप कह सकते हैं, कि एक चिट्ठी मैंने बहुत पहले ही लिख ली थी,मगर उसे 'पोस्ट' कल ही किया. कल किया और देखिये कितनी जल्दी आप तक पहुँच भी गई. अब लगता है, कि 'सद्भावना दर्पण'' के माध्यम से मैं अपने गद्यकार को आप तक पहुंचा सकूंगा. इसमे मेरी पत्रकारिता और मेरा गद्य साहित्य दोनों रहेगा. साहित्य और पत्रकारिता दोनों क्षेत्र में सक्रिय रह कर समाज की सेवा करने का विनम्र प्रयास करता रहा हूँ, आप लोगों का प्रोत्साहन मिला तो सिलसिला चलता रहेगा. मेरी कविताओं वाले ब्लॉग को आपने प्यार-दुलार दिया. अब 'सद्भावना दर्पण'' को भी आपकी सद्भावना चाहिए.
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मूर्ति की 'एडवांस बुकिंग
मूर्ख लोग ईमानदारी के साथ समाज-सेवा करते हैं और बुद्धिमान लोग अपनी मूर्तियाँ बनवाने में लगे रहते हैं।
अनेक शोधों के बाद यही निष्कर्ष निकला है, कि ऐसा करने वाले कुछ अतिरिक्त किस्म के समझदार होते हैं। अपने जीवित रहते ही अपनी मूर्तियाँ बनवाने वाले लोग मरने के बाद की तैयारी कर लेते हैं। उनके जीते-जी मूर्ति बन जाने से यह फायदा होता है, कि वे इत्मीनान के साथ मरते हैं। बिल्कुल ही टेंशन-फ्री हो कर। वे तो बेचारे बस, इतना ही चाहते हैं, कि जब कभी वे मर-मुरा जाएँ तो किसी चौराहे पर उनकी मूर्ति-फूर्ति लग जाए।
ऐसे ही एक बुद्धिमान व्यक्ति से एक मूर्तिकार के घर में मुलाक़ात हो गयी। नाम था लतखोरीलाल।
हमने पूछा - ''लगता है, किसी महापुरुष की प्रतिमा बनवाने के लिए आए हुए हैं।''
वे हँस पड़े। बोले कुछ भी नहीं।
हमने पूछा - ''किसकी प्रतिमा बनवा रहे हैं ? भगत सिंह की ? चंद्रशेखर आजाद की ? सुभाषचंद्र बोस की ? या किसी और शहीद की ?''
वे फिर हँस पड़े। कुछ-कुछ शरमाए से। मेरे बहुत कुरदने पर बोले ''अरे, इतने बड़े-बड़े महापुरुषों के नाम लेकर आप मुझे धर्म संकट में क्यों डाल रहे हो भई!''
मैं चौंका। महापुरुष छोटा या बड़ा भी होता है क्या ? फिर भी मैंने पूछा - ''बड़ा महापुरुष नहीं तो क्या, कोई छोटा महापुरुष है क्या, जिसकी प्रतिमा बनवा रहे हैं आप!''
वे फिर भी लजाए-मुसकाए खड़े रहे।
मैंने कहा - ''अरे साब, बेसब्री बढ़ती जा रही है। जल्द ही खुलासा कीजिए न, कि आखिर किस महापुरुष की प्रतिमा बनवाने आए हैं ? अपनी तो बनवाने से रहे। प्रतिमाएँ हमेशा महापुरुषों की ही बनती है। फिर चाहे वह स्थानीय स्तर का,  या फिर राष्ट्रीय स्तर का। वैसे तो महापुरुष केवल महापुरुष ही होता है। वह किसी क्षेत्र के खूँटे से बँध ही नहीं सकता। बहरहाल, अब तो बता दीजिए उस महापुरुष का नाम ?''
वे इस बार बत्तीस दिखाते हुए बोले - ''लत.. खोरी..लाल की।''
मुझे चक्कर आने लगा। खुद को संभालते हुए बोला - ''क्या.. क्या कहा आपने ? लतखोरीलाल ? यानी कि आप ? बाप रे बाप! अपनी ही प्रतिमा बनवा रहे हैं आप!''
लतखोरीलाल तनिक गंभीर हो गए। कहने लगे - ''क्या हम इस लायक नहीं कि हमारी किसी जगह प्रतिमा लग सके?'' मैंने कहा - ''क्यों नहीं, आपके अपने घर में, घर के आंगन में तो लग ही सकती है। इसके लिए मरने की ज़रूरत ही नहीं है। जीते जी लग सकती है प्रतिमा। आप प्रतिमा लगाएं माला चढ़ाने हम आ जाया करेंगे।''
लतखोरी लाल बोले - ''अरे भई, घर में अपनी प्रतिमा लगवाए तो काहे के महापुरुष ? हम तो अपनी प्रतिमा शहर के किसी व्यस्त चौराहे पर ही लगवायेंगे। और वो भी जीते जी।''
''लेकिन अक्सर तो यही देखा गया है कि किसी के मरने के बाद ही प्रतिमा लगती है।''
मेरे प्रश्न पर लतखोरीलाल बोले - ''अरे ये जीना भी कोई जीना है साब! कोई घास ही नहीं डालता! पूछता तक नहीं।''
मैंने कहा - ''भई, पूछ-परख तो उनकी होती है जो कुछ काम् करके दिखाए। आपने कुछ ऐसे काम तो किए नहीं कि लोग आपको घास डालें।'' लतखोरीलाल बोले - ''वाह साहब, आप कहते हैं, हमने कुछ किया ही नहीं! देखिए, जोरदार धंधा किया, डटकर कमाई की। आलीशान घर बनवाया अपने सारे रिश्तेदारों को मालामाल कर दिाय। अभी शहीदों के परिवारों के लिए भी हमने बहुत बड़ी रकम दान की थी।''
''अच्छा, क्या एक लाख ?''
''नहीं, थोड़ा सा कम।''
''पचास हजार ?''
''नहीं, उससे भी थोड़ा सा कम।''
''पच्चीस हजार ?''
''नहीं इससे भी थोड़ा सा कम।''
मैं सोच में पड़ गया। फिर सोचकर बोला - '' इक्कीस हजार ?''
वे चुप हो गए। मैं समझ गया। मेरा अनुमान सही था। थोड़ी देर बाद इधर-उधर देखकर धीरे से बोले - ''ग्यारह हजार तो बहुत बड़ी रकम होती है। मैंने...''
बीच में ही टोक दिया मैंने - ''हाँ, पाँच हजार रुपये दिया होगा आपने। करोड़पति हैं। अपना नाम अमर करना चाहते हैं। फोकट में थोड़े न होगा नाम। फिर प्रतिमा लगाने की पिपासा है आपके मन में।''
वह फिर बोला - ''थोड़ा-सा कम कर लीजिए इस राशि को।''
मैंने कहा - ''दो हजार ?''
वह बोले - ''थोड़ा कम।''
''एक हजार एक ?''
''थोड़ा-सा कम।''
''पाँच सौ एक ?''
''थोड़ा और कम।''
''ओफ्फो, एक सौ एक।''
''बस, पहुँच रही हे हैं आप।''
''इक्यावन रुपये मात्र।''
''बस, बस पहुँचने ही वाले हैं।''
''अरे, हद हो गई भई, अब तो मैं गलत हो ही नहीं सकता। इक्कीस रुपये तो दिया ही होगा आपने।''
''हाँ, बिल्कुल ठीक अनुमान लगाया आपने।'' लतखोरीलाल बोले - ''आप बुद्धिजीवी हैं। गलत तो हो ही नहीं सकते। जानते हैं, इतनी बड़ी राशि हमने मोहल्ले के सेठों से दो-दो रुपये चंदा करके एकत्र की थी। अरे, इस देश के लिए हमारा भी कोई फर्ज बनता है। अब आप ही बताएँ,  इतनी सेवा करता हूँ देश की। क्या चौराहे पर मेरी प्रतिमा भी नहीं लग सकती ?''
लतखोरी की बातें सुनकर मैं बुरी तरह उखड़ चुका था। कहना पड़ा - ''हाँ भई, आप जैसे महापुरुषों की प्रतिमा अब पूजने को बची हैं। ऐसा करते हैं फाँसी पर झूल जाने वाले किसी शहीद की जगह आपकी प्रतिमा अभी से लगा देते हैं।'' वह खुश हो गये। कहने लगे - '' ऐसा ही हो जाए तो मजा आ जाए। लेकिन अभी रहने दें। मरने के बाद ही प्रतिमा लगे तो मजा आ जाएगा।''
मैंने कहा - ''तब आप मजे के लिए कहाँ रहेंगे ?'' वह बोले - ''स्वर्ग-लोक में।''
मैं हँस पड़ा - ''बड़ा कान्फीडेंस है आपको!''
वह बोले - ''हमारा सब कुछ एडवाँस बुकिंग में चलता है। मूर्ति एडवाँस में, होटलें एडवाँस बुकिंग में, टाकीजों में एडवाँस बुकिंग और दान-दक्षिणा, भजन-पूजन के सहारे स्वर्ग में एडवाँस बुकिंग।''
मुझे चक्कर आ ही गया। गिर पड़ा। होश में आया तो देखा घर में था। लतखोरीलाल छोड़ गए थे। घर वालों ने बताया कि वे पाँच रुपइये का चमकता हुआ सिक्का दे गये हैं। कह रहे थे कि किसी की प्रतिमा लगवानी है। उसी का एडवाँस है।
मुझे फिर से चक्कर आने लगा।

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

मुख्यधारा का सवाल

राजधानी में 24-25 अप्रैल को ''अनुसूसिच जनजातियाँ ,कल आज और कल'' विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन हुआ। इसमें देश भर से वे लोग पधारे जिन्होंने जनजातियों पर गहन अध्ययन किया है। कुछ तथाकथित विद्वानों ने जब यह बात उठाई कि अनुसूचित जनजातियों को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोडऩा चाहिए तो उनके इस कथन की बधिया उधेड़ दी गई। शुरुआत तो राज्यपाल महोदय ने ही की। उन्होंने आदिवासी भाइयों की मुख्यधारा को शहरी मुख्यधारा से बेहतर बताया। बाद में कुछ जनजातीय विद्वानों ने इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मुख्यधारा क्या है, जो शहर का भ्रष्ट जीवन है, क्या वह मुख्यधारा है? या फिर मुख्यधारा वह है, जहाँ एक संस्कृति है, परम्परा है, जल-जंगल-जमीन को अपना समझने का संस्कार है? मुख्यधारा में शहरी लोगों को आना चाहिए, जनजातियों को नहीं। और भी अनेक बातें उठी, लगा कि जनजातियों को लेकर अब देश में गंभीर-विमर्श का समय आ गया है। विकास की धारा से उन्हें जोडऩा तो है, लेकिन यह भी ध्यान रखना है, कि वे अपनी जड़ों से ही न काट दिए जाए। यह बात भी सामने आई कि हर क्षेत्र की जनजातियों के अनुरूप ही योजनाएँ बननी चाहिए क्योंकि नागालैंड के आदिवासी की अपनी संस्कृति है, तो बस्तर के आदिवासी की अपनी सांस्कृतिक पहचान है।
दिग्विजय सिंह  पर भड़के मुख्यमंत्री
अनुसूचित जनजातियों पर आयोजित सेमिनार के समापन पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी पहुँचे। उन्होंने बस्तर के नक्सलवाद पर गंभीर विचार विमर्श करते हुए उनके समर्थक बुद्धिजीवियों को जम कर लताड़ा। उन्होंने कहा कि दिल्ली में बैठे ये बुद्धिजीवी अंगरेजी अखबारों में लिखते हैं, अंगरेजी वाले ही इन्हें पढ़ते हैं। असलियत से इनका कोई सरोकार नहीं है। माओवाद इनके लिए एक फैशन की तरह है। मुख्यमंत्री का इशारा मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह  की  ओर था. जिन्होंने एक अंगरेजी समाचार पत्र में नक्सलवाद के बहाने रमन-सरकार को कोसने की कोशिश कि है. आज बस्तर में विकास अवरुद्ध हो गया है, इसके दोषी नक्सली हैं। सड़कें नहीं बन पा रही, स्कूल नष्ट हो गए। सृजन की जगह विध्वंस पनप गया। इन सबको समझने की जरूरत है। मुख्यमंत्री के भाषण से सबको यही लगा कि उन्होंने दिल से अपनी बात कही, जिसमें जनजातियों के विकास न होने की पीड़ा साफ नजर आ रही थी। दिल्ली से पधारे चिंतक इंद्रेशकुमार ने भी जनजातियों के वैभव पर प्रकाश डाला और विस्तारपूर्वक समझा कि किस तरह दूसरे धर्मवालों ने उनके साथ छल किया।
कलेक्टरों को सिर चढ़ाना बंद हो
पिछले दिनों रायपुर के कलेक्टर के खिलाफ काँग्रेसी इतने उत्तेजित हुए कि राज्यपाल को जा कर शिकायत कर दी। कलेक्टर जनता का नौकर है। ये और बात है कि उसे नौकरशाह कह दिया जाता है। यानी नौकर तो है मगर शाही है। शाही होने का मतलब यह नहीं, कि  वह जनप्रतिनिधियों की अवहेलना कर दे। काँग्रेसी कुछ मुद्दों पर कलेक्टर से बात करना चाहते थे, कांग्रेसी समूह में गए थे, तो कलेक्टर ने कलेक्टरी दिखाते हुए फरमाया कि पाँच लोग आ कर चर्चा करें। कांग्रेसियों ने कहा हमारे साथ आए बाकी लोग भी मिलेंगे। कलेक्टर महोदय राजी नहीं हुए तो काँग्रेसी नाराज हो कर लौट गए। राज्यपाल से मिले और शिकायत की। अब राज्यपाल कलेक्टर को बुला कर समझाइश देते हैं, या नहीं, ये अलग बात है लेकिन मुद्दा यह है कि आखिर कलेक्टरों के हौसले इतने बुलंद क्यों रहते हैं। जनप्रतिनिधियों से उसे मिलना ही चाहिए । पाँच हो या पचास। लोकतंत्र में लोक ही ताकत है। लोक के बगैर कुछ नहीं। कलेक्टर कोई राजा-महाराजा तो है नहीं कि उसकी मर्जी चलेगी। दरअसल हमारा सिस्टम ही इतना लचर है, कि हमने कलेक्टर पद को सिर पर चढ़ा कर रखा है। जब तक ऐसा रहेगा, कोई भी कलेक्टर अपनी अकड़ दिखाएगा ही। जरूरत है, सिस्टम में बुनियादी परिवर्तन की। कलेक्टरों को भी यह समझना चाहिए के वे ब्रिटिशकाल में नहीं, स्वतंत्रकल में रह कर नौकरी कर रहे है।
ग्राम सुराज के सबक
ग्राम सुराज का पहला चरण समाप्त हो गया है लेकिन इसने सरकार को सोचने पर भी मजबूर किया है। अगर सरकार सोचे तो। इस बार अनेक जगहों पर सुराज दल का विरोध हुआ। कहीं-कहीं तो अधिकारियों को बंधक ही बना लिया गया।  दरअसल लोग त्रस्त हैं। घोषणाएं होती है, मगर उनको पूरा नहीं किया जाता । मुख्यमंत्री को भी कुछ जगह ग्रामीणों की नाराजगी झेलनी पड़ी। ग्राम सुराज में जो घोषणाएँ होती है, उन्हें निर्धारित समय में ही पूर्ण करना चाहिए, तभी तो गाँव वालों को भी लगेगा, कि सुराज आ गया है। मुख्यमंत्री घोषणा कर के चले जाए और ग्रामीण भाई अफसरों के पीछ-पीछे घूमते रहे, यह नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि के कहे की प्रतिष्ठा होनी चाहिए। अधिकांश अफसर बदमाशी करते हैं। वे सरकार की छवि को नुकसान पहुँचाने के लिए जनप्रतिनिधियों द्वारा की गई घोषणाओं को पूरा करने में जानबूझ कर विलंब करते हैं। इस बार ऐसा न हो। ग्राम सुराज के दौरान ग्रामीणों ने जो मुद्दे उठाए हैं, उन्हें पहली प्राथमिकता के साथ पूरा करना चाहिए।
मंत्रियों-अफसरों की विदेश यात्राओं पर लगाम
ये अच्छा निर्णय लिया मुख्यमंत्री ने । सरकारी खर्चे पर विदेश जाने की परम्परा-सी चल पड़ी थी। विदेश जा रहे हैं, किस लिए विकास का अध्ययन करने। कुछ जनपतिनिधि न तो ठीक से हिंदी बोल पाते हैं,न अंगरेजी, इस कमी को शातिर-चालाक अफसर समझते हैं। वे मंत्री को पटा कर उनके साथ लग जाते हैं। मंत्री की भी ऐश और अफसर की भी। ये लोग विदेश जाते हैं, और राज्य का करोड़ों रुपए स्वाहा कर देते हैं। जरा पता तो किया जाए कि पिछले कुछ वर्षो में विदेश जाने वाले मंत्री-अफसरों ने लौट कर आखिर सरकार को  कोई भावी योजना दी कि हम फलां देश की तरह यहाँ भी ये-ये काम करें? शायद नहीं। विदेश यात्रा का ज्यादातर मतलब करके ऐशोआराम ही होता है। इसलिए मुख्यमंत्री ने समझदारी से काम लिया। अभी सबकी विदेश यात्राएँ बंद। कम से कम तीन साल तो बंद ही रहनी चाहिए।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

राजधानी के रंग

डीजीपी का नक्सलवाद....
छत्तीसगढ़ के डीजीपी कवि भी हैं। कभी-कभार बोलते हैं और फँस जाते हैं। पिछले दिनों राँची गए और पत्रकारों से बात कहते हुए कह दिया कि नक्सलवाद कोई समस्या नहीं, यह एक विचारधारा है। अब जो कुछ छपा है, उसे लेकर काँग्रेसी हंगामा मचा रहे हैं। मांग कर रहे हैं कि डीजीपी को हटाया जाए क्योंकि ये नक्सल समस्या को लेकर गंभीर नहीं है। बात एक हद तक सही भी है। नक्सलवाद कभी रहा होगा एक विचारधारा। लेकिन अब तो यह केवल हत्याधारा है। इसे विचारधारा का नाम देना ही गलत है। यह एक समस्या है। और इसे मिटाने की ही बात होनी चाहिए। विचारधारा-फारा की बातें कह कर बौद्धिकता दिखाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। मीडिया से जब बात हो तो दो टूक कहना चाहिए, कि हम इस समस्या से पार पा लेंगे। आपरेशन ग्रीन हंट चल रहा है। अब इसे विचारधारा है,जैसे जुमलों के सहारे किनारे करने की कोशिश करने का दुष्परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा। उम्मीद है, वे भविष्य में फूँक-फूँक कर ही कदम रखेंगे। एक तो मीडिया कहाँ धँसा दो, उस पर विपक्ष तो बैठा ही रहता है, खिंचाई करने, इसलिए विश्वरंजन जी, सावधानी जरूरी है। क्योंकि जीवन और कविता में अंतर होता है।
चाटुकारिता की हद है....
सचमुच राजनति में चाटुकारिता की हद हो जाती है कभी-कभी। अब देखिए, पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को कुछ काँग्रेसी राज्यसभा में पहुँचा कर सीधे मंत्री भी बनाना चाहते हैं। राहुल गाँधी को फेक्स भी कर दिया भाई लोगों ने। ये तो अच्छा हुआ, कि खुद जोगी जी ने इस कृत्य की निंदा कर दी। वे समझदार हैं। लेकिन चमचों को कौन समझाए, कि कुछ करने के पहले सोच तो लो, कि क्या कर रहे हो। अभी जोगी-पुत्र पर आपराधिक मामला चला। अभी उसे लम्बी लड़ाई लडऩी है। संघर्ष करना है। आसानी से उपलब्धियाँ नहीं मिल जातीं। यह बात उनको और चाटुकारों को समझ लेना चाहिए। लेकिन जब चाटुकारिता ही करनी है, तो विवेक काम नहीं करता।
राजनीति राजधानी के विकास को न ले डूबे
राजधानी में काँगे्रेस का महापौर है और भाजपा का सभापति। अब दोनों दलों के लोग अपनी-अपनी पार्टी की राजनीति से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। उनको यह बात समझ में ही नहीं आ ही है, कि चुना तक राजनीति चलनी चाहिए। अब तो मिल-जुल कर विकास करने का समय आ गया है। लेकिन नहीं, किसी न किसी बहाने अपनी ताकत दिखाने का खेल चल रहा है। शर्म की बात है, कि नगर निगम की बैठक को शांतिपूर्वक संपन्न कराने के लिए पुलिस बुलानी पड़ती है। विकास के रास्ते में अगर राजनीति स्पर्धा आड़े आएगी, तो यह दोनों दलों के लिए ठीक बात नहीं, क्योंकि जनता दोनों को देख रही है। राजधानी को विकास की सख्त जरूरत है। ऐसे समय में आपसी झगड़े के कारण अनुदानों में दिक्कतें आ सकती हैं। कोई ठोस निर्णय नहीं हो पाएगा। इसका बुरा असर पड़ेगा विकास पर।
दारू के खिलाफ लामबंद राजधानी
एक अरसे बाद ऐसा हो रहा है कि इन दिनों राजधानी के कुछ हिस्से में दारूबंदी के खिलाफ मुहिम जारी है। यह जरूरी भी है। कहीं विद्यालय के पास, तो कहीं किसी धर्मस्थल के पास दारू की दूकानें खुल गई हैं। लोगों का आना-जाना प्रभावित होता है। बेहतर तो यही होगा कि सरकार ट्रांसपोर्ट नगर आदि की तरह शहर के बाहर कहीं दारूनगर ही बसा दे। शहर की सारी शराब दूकानें शहर से बाहर ही रहें। जिन्हें पीना-पिलाना है, वे बाहर जाएँ और  टुन्न-फुन्न हो कर वहीं गिरे-पड़े, गाली-गलौज करें। जो भी करना हो, शहर के बाहर करें। शहर में दारू दूकानें होनेके कारण कदम-कदम पर शराबी नजऱ आते हैं तो लगने लगता है, यह रायपुर नहीं दारूपुर है। उम्मीद है, कि प्रशासन जनता की सुनेगा और जहाँ-जहाँ लोग आंदोलित हैं, वहाँ-वहाँ की शराब दूकानें फौरन बंद होंगी। कुछ जगह दूकानें सीलबंद कर दी गई हैं, यह अच्छी बात है।
मंत्री के तमाचे की आवाज
प्रदेश के एक मंत्री ने एक अफसर को तमाचा क्या जड़ दिया, उसकी आवाज़ अब तक गूँज रही है। अफसर-कर्मचारी एकजुट हो कर मंत्री की निंदा कर रहे हैं, उसे हटाने की मांग भी कर रहे हैं। लेकिन क्या यह संभव हो पाएगा? कायदे से तो होना चाहिए। मंत्री को अपने किए पर खेद भी व्यक्त करना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में सामंती प्रवृत्ति नहीं चलेगी। न मंत्रियों की न अफसरों की । यहाँ के चंद अफसर भी ऐसे हैं जो अपने को सबसे ऊपर समझते हैं। खैर, तमाचाशुदा अफसर की बात करें तो कहा जा सकता है, कि उसने  अगर मंत्री का कहना नहीं माना तो वह बेशक अपराधी है, उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन दादागीरी दिखाना गलत है। अगर जनप्रतिनिधि इस तरह की हरकत करेंगे, तो उन्हें प्रशासन से सहयोग नहीं मिलेगा। वैसे भी बहुत से अफसर भयंकर भ्रष्ट और बदतमीज हो चुके हैं। उन्हें सुधारने की जरूरत है। लेकिन तमाचे से वे नहीं सुधरेंगे। उन पर लिखित रूप में कड़ी कार्रवाइयाँ की जानी चाहिए। तमाचा मार कर लोकतंत्र का अपमान नहीं करना चाहिए। रामविचार जी, विचार कीजिए और पद की गरिमा बनाए रखिए। 
भूमाफिया चरागान भी हजम कर रहे
राजधानी में वैसे भी गोचर भूमि नहीं बची। शहर के बाहर 327 एकड़ जमीन चरागान के लिए रखी गयी थी, अब इस जमीन पर कुछ नेतानुमा लोगों ने कब्जा कर लिया है। गो सेवक बेचारे मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी कोई सुने तब न। हार कर ये लोग राज्यपाल से मिले । अब देखना यह है कि राज्यपाल महोदय की अनुशंसा पर कब तक कार्रवाई होती है। अंतरराष्ट्रीय कृषि-गो पर्यावरण संरक्षण परिषद के वयोवृद्ध अध्यक्ष झूमरलाल टावरी ने भूमाफियाओं के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। वे गो संरक्षण के लिए समर्पित हैंं। ऐसे अनेक लोग हैं, जो गाय को माँ की तरह जीने का अवसर देना चाहते हैं। लेकिन मनुष्य इतना स्वार्थी हो चुका है, कि अब गाय केवल सड़कों पर भटकती रहती है। चारा नहीं मिलता तो बेचारी कचरा खाती है और पॉलीथिन हजम करके एक दिन मौत का शिकार हो जाती है।
जननायक के महाप्रयाण पर...
रायगढ़ जिले के गौरव और अपना पूरा जीवन वहाँ की खुशहाली के लिए लगा देने वाले जननायक रामकुमार अग्रवाल जी नहीं रहे तो राजधानी में भी उनके चाहने वाले दुखी हो गए। सर्वोदय विचारधारा से जुड़े लोगों ने पिछले दिनों एक बैठक कर श्री अग्रवाल के संघर्षों को याद किया। यह भी चिंता व्यक्त की गई कि उनके जाने के बाद अब उनकी तरह जुझारू तेवर वाले लोग सामने आएंगे कि नहीं? उम्मीद है, कि चार बार विधायक रह चुके श्री अग्रवाल ने रायगढ़ के विनाश पर तुली ताकतों के विरुद्ध जो अभियान छेड़ रखा था, उन्हें आगे बढ़ाया जाएगा। इन पंक्तियों के लेखक ने श्री अग्रवाल के व्यक्तित्व पर एक गीत लिखा है। (पूरा गीत तो आप एक-दो दिन बाद पढ़ सकेंगे) फिलहाल दो पंक्तियाँ पेश हैं-
अंधकार में जले हमेशा बनकर एक मशाल
अमर रहा है, अमर रहेगा, रायगढ़ का लाल।

सुनिए गिरीश पंकज को