शनिवार, 27 नवंबर 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

छत्तीसगढ़ की पुलिस को 
          मनुष्य बनाया जाए....
छत्तीसगढ़ की पुलिस पर एक आम आरोप यह लगाया जाता रहा है, कि वह फर्जी मुठभेड़ करती है और लोगों को किसी न किसी मामले में फँसाकर जेल भेजती रहती है। पुलिस ऐसे लोगों पर अंकुश लगाने की कोशिश करती है, जो अक्सर प्रतिरोध करते हैं। अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं। जिंदा कौमों को प्रतिकार करना ही चाहिए। प्रतिकार लोकतंत्र की ताकत है लेकिन अंगरेजों के समय की पुलिस आजाद देश में भी दमनकारी मानसिकता में है। बस्तर में पुलिस ऐसी ही हरकतें कर रही है। पिछले दिनों सीपीआइ ने जगदलपुर में जोरदार रैली निकाली। इसमें हजारों लोग शामिल हुए। इनमें आदिवासियों की संख्या भी कम नहीं थी। यह रैली अन्याय के खिलाफ थी। फिर चाहे अन्याय नक्सली करें, चाहे पुलिसवाले। पिछले दिनों पुलिस एक ग्रामीण को उठा कर ले गई, उसका आज तक पता नहीं। गाँववाले पूछने गए तो उन्हीं को धमकाया जाने लगा। यानी अत्याचार भी करो और दादागीरी भी? इन्हीं सब कारणों से पुलिस के प्रति समाज में घृणा की बावना भरती जा रही है। पुलिस को मनुष्य बनाने की कवायद आखिर कब शुरू होगी?
अपहरण का कारोबार
पूरे छत्तीसगढ़ के परिदृश्य को देखें तो लगता है, हर कहीं अपराध बढ़ता जा रहा है। जब छत्तीसगढिय़ा दुखी हो कर कहने पर मजबूर होता है, कि पुलिस बैठे-बैठे केवल रोटियाँ तोड़ रही है। राजधानी रायपुर से लेकर अंबिकापुर तक फैला है अपहरण का कारोबार। अपहरण और लापता होने की वारदातें बढ़ रही हैं. पिछले दिनों राजधानी में दो छात्र लापता हुए थे, वे आज तक लापता ही हैं। पता नहीं चल रहा कि कहाँ चले गए? अभी हाल ही में फिर दो स्कूली छात्राएँ लापता हो गई हैं। एक लापता किशोर की तो बाद में केवल लाश ही मिली।  पुलिस ने गुमशुदा दस्ता बनाया था। अब तो लगता है,उसे ही खोजने की बारी है कि वह कहाँ है? वैसे लोगों का कहना यही है, कि दस्ता सक्रिय भी हो जाएगा, तो क्या गारंटी है, कि वह सफल होगा। गृहमंत्री के दस्ते का हश्र सब देख रहे हैं। रायपुर में वाहनों में आगजनी और तोड़-फोड़ की वारदातें बढ़ती ही जा रही है। लोग हैरत में हैऔर एक-दूसरे से पूछते हैं, कि आखिर इस पुलिसतंत्र का सामाजिक औचित्य क्या है?
न्यायिक जाँच में दिक्कत क्या?
अंबिकापुर के छात्र ऋतिक का अपहरण हुआ और बाद में उसकी हत्या कर दी गई। इस मुद्दे पर सरगुजा भी बंद रहा। पूरा छत्तीसगढ़ उद्वेलित रहा। स्वाभाविक है,कि काँग्रेस के लिए यह एक अवसर था सरकार की खिंचाई का। काँग्रेस की माँग गलत नहीं है, कि हत्याकांड की न्यायिक जाँच होनी चाहिए। इसमें दिक्कत क्या है। जनभावनाओं का सम्मान होना ही चाहिए। लोगों को दु:ख तब होता है, और गुस्सा भी आता है, जब जनप्रतिनिधि- मंत्री महोदय पुलिस का पक्ष लेते हैं और कहते हैं हत्याकांड के लिए समाज जिम्मेदार है। कई बार लोगों को भी यही लगता है, कि समाज ऐसे लोगों को अपना प्रतिनिधि चुनने का जिम्मेदार है जो जनता के साथ नहीं, पुलिस के साथ खड़े नजर आते हैं : उस पुलिस के साथ जिसका चरित्र क्या है, क्या रहा है, वह सबके सामने है।
कितने करोड़पति अफसर है यहाँ...?
वैसे अब किसी का करोड़पति होना चौंकाने वाली बात नहीं हो सकती क्योंकि किसी का पुराना बड़ा मकान भी अब एकाध करोड़ की कीमत तक पहुँच जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के अनेक अफसरों के पास से जब मकान-दूकान और नकदी निकलते हैं, तब खबर बनती है, चर्चाएँ होती है। फिर चाहे अफसर रायपुर को हो, बिलासपुर का हो या और कहीं का। पिछले दिनों रायपुर नगरनिगम के एक अधिकारी के पास से करोड़ों की संपत्ति मिली और अब बिलासपुर नगरनिगम का इंजीनियर सपड़ में आया। आखिर ये लोग इतने श्रमवीर कहाँ से हो जाते हैं, कि रातों रात मालामाल हो गए? जाहिर है यह पाप की, हराम की कमाई है। जो सीधे-सीधे लूट के कारण अर्जित की गई ? ऐसे लोगों की संपत्ति हर हाल में राजसात होनी चाहिए। और दोषी लोगों को कड़ा दंड भी मिलना चाहिए। ताकि दूसरे सबक लें। हमारे यहाँ अकसर छापे पड़ते हैं बाद में सब चमत्कारिक रूप से  निर्दोष निकलते हैं। 
अफसरों पर लगाम की फिर कवायद
छत्तीसगढ़ में अफसरी का धंधा मंदा ही नहीं होता। अफसरों का स्वर्ग है यह राज्य। यहाँ अफसर लूटखसोटबी करतेहैं, अन्याय भी करते हैं और नायक बने घूमते हैं। क्योंकि बहुत-से लोग हीनबाव सेग्रस्त रहते हैं। वे अफसरों को कार्यक्रमों में बुलाते हैं, उनका सम्मान करते हैं। अपने स्वार्थ के लिए उन लोगों की प्रतिष्ठा की जाती है, जो किसी लायक नहीं है। जैसे किसी पुलिसवाले का सम्मान इसलिए कर दिया जाता है, कि उसने चोर या हत्यारे को पकड़ लिया। यह तो पुलिस का काम है, इसीलिए तो उसे नौकरी दी गई है। लेकिन नहीं, सबंध गाँठने के लिए उसे सम्मानति किया जाता है। जिसे जिस काम के लिए रखा गया है, उसे उसके काम के एवज में सम्मानति किया जाना अजीब लगता है,लेकिन यह हो रहा है। अब सरकार ने एक पुराने सिविलसेवा (आचरण) अधिनियम 1965 को फिर से लागू करके साफ-साफ निर्देश दिए हंै कि कोई भी अफसर उद्घाटन-शिलान्यास नहीं करेगा। किसी कार्यक्रम में अतिथि नहीं बनेगा। वैसे तीसरी बार यह अधिनियम लागू किया गया है, लेकिन कुछ बेशरम अफसर इसका पालन नहीं करते और आए दिन मंचों पर स्थापित नजर आते रहते हैं।
शिक्षामंत्री के महत्वपूर्ण सुझाव
शिक्षा में भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय एवं मानवीय मूल्यों को बढ़ाने वाले पाठ्यक्रम शामिल किए जाने चाहिए। महापुरुषों के पाठ पढ़ाए जाने चाहिए। प्रदेश के शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने पिछले दिनों दिल्ली में इस आशय के सुझाव दिए। एनसीइआरटी की बैठक में श्री अग्रवाल ने अपने सुझाव रखे। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता, कि वर्तमान दौर में हम अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। राष्ट्रीय मूल्य तो जैसे हाशिये पर ही फिंका गए हैं। मानवीय मूल्य भी बेमानी होते जा रहे हैं। स्कूलों में खेलकूद-बागवानी और सांस्कृतिक गतिविधियाँ कम होती जा रही हैं। आज पूरा ध्यान बच्चे के व्यावसायिक कैरियर पर ही केंद्रित है। उसे बेहतर मानव बनाने की बुनियादी चिंता कहीं नजर नहीं आती। बच्चे को अपने पैरों पर खड़ा होना है, उसे अच्छी नौकरी हासिल करनी है। अच्छा व्यवसाय करने लायक बनना है। मगर उसे अच्छा इंसान भी बनना है। इसका पाठ भी पढ़ाया जाना चाहिए।

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

राज्यपाल से भी बड़ा हो गया सलमान...? 
हे भगवान्.......
बॉलीवुड के कुख्यातकिस्म के विख्यात अभिनेता सलमान खान को राज्योत्सव में बुलाने की तो खूब आलोचनाएँ होती रहीं, मगर उसके आने के बाद जो कुछ हुआ, वह तो नहले पे दहले जैसी बात हो गई। राज्योत्सव के उद्घाटन के बाद मंच पर सलमान खान को बुलाया गया। दुखद पहलू यह रहा, कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री और अन्य जनप्रतिनिधियों को मंच पर बुला कर सलमान का स्वागत करवाया गया। सबने यह दृश्य देखा और चकित रह गए। राज्यपाल एक हीरो का स्वागत करने पर मंच पर जाए, यह राज्यपाल के पद की गरिमा के खिलाफ है। और वो भी ऐसे हीरो का स्वागत करे, जिसका आपराधिक रिकार्ड रहा हो। लोगों ने इसे  सांस्कृतिक भूल कहा, जो हो गई है। लेकिन यह एक सबक है। दस मिनट मंच पर रहा सलमान और व्यवस्था चरमरा गई। युवा दर्शक बेचारे जिस उत्साह के साथ आए थे, उन्हें निराशा हाथ लगी। सलमान ने कोई कार्यक्रम ही पेश नहीं किया। संस्कृति विभाग के निमंत्रण पत्र में उसका ऐसा गुनगान किया गया, कि मत पूछिए। सलमान की चार तस्वीरें कुछ इस अंदाज में छपी हैं गोया वो आकर कोई धमाल करने वाला है। सलमान की तस्वीरें  छापने से संस्कृति विभाग का पुलिसियापन ही जाहिर हुआ है। खैर, जो होना था, सो हो गया: भविष्य में इस विभाग की गरिमा का ख्याल रखा जाना चाहिए।
कमीशनखोरी से दुखी भाजपाई
भाजपा की सरकार है मगर भाजपा के कार्यकर्ता शासन-प्रशासन में व्याप्त कमीशनखोरी से दुखी हैं। पिछले दिनों राजधानी में भाजयुमो का सम्मेलन सम्पन्न हुआ। इसमें राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुराग ठाकुर पधारे। सम्मेलन में मुख्यनमंत्री डॉ. रमन सिंह भी थे। यहाँ अनेक कार्यकर्ताओं ने अपनी पीड़ा सामने रखी और यह आरोप लगाया कि जनप्रतिनिधि विकास के लिए दिए जाने वाले पैसों में कमीशनखोरी करते हैं। राज्य में बढ़ रही शराबखोरी पर भी चर्चा हुई। अनुराग ठाकुर ने कहा, ऐसे गलत लोगों को बेनकाब करना चाहिए। सबको यह संकल्प करना चाहिए कि वे चुनाव ने शराब बाँटेंगे और न पीएंगे। मुख्यमंत्री इस प्रवृत्ति की निंदा करते हुए दो टूक कहा,कि ठेकेदारी करने वाले नेताओं को जनता रिजेक्ट कर देती है। सम्मेलन के माध्यम से वैचारिक मंथन हुआ। अब वे नेता सावधान हो जाएँगे जो कमीशनखोरी में लिप्त रहते हैं। और जिनकी तरफ इशारा किया जा रहा था।
दस्ता बना सिरदर्द...
हमारे गृहमंत्री ईमानदार हैं। कुछ करना चाहते हैं। मगर उनके दाएँ-बाएँ रहने वाले लोग उनकी छवि धूमिल करने के पीछे पड़ गए हैं। उन्होंने शराबखारी, जुआ-सट्टा आदि सामाजिक बुराइयों से निपटने के लिए एक दस्ता बना दिया, लेकिन अब यह दस्ता सिरदर्द साबित हो रहा है। इस दस्ते पर मारपीट-गुंडागर्दी, वसूली आदि के गंभीर आरोप लग रहे हैं। खरोरा में इस दस्ते ने जो गुंडागर्दी की, उसके खिलाफ तो भाजपा के ही जुझारू विधायक देवजी पटेल ने मोर्चा खोल दिया था। अब सांसद चंदूलाल साहू भी सामने आ गए हैं। इसके अलावा भी कुछ भाजपाई सामने आ कर दस्ते की हरकतों का विरोध कर रहे हैं। बेहतर तो यही होगा, कि गृहमंत्री वर्तमान दस्ते को भंग करे और साफ-सुथरी छवि वाले लोगों को जोड़ कर फिर नया दस्ता बनाए।
करोड़ों की कमाईवाला वन अधिकारी
जब लोग कहते हैं कि जंगल कट रहे हैं, वहाँ निर्माण कार्य में घपले होते हैं, तो लोग गलत नहीं कहते। मनेंद्रगढ़ में भारतीय वन सेवा के अधिकारी रजक के खिलाफ करोड़ों के घोटाले के आरोप लगे। उसकी जाँच भी हुई। अधिकारी अपनी सफाई में कुछ ठीक-ठाक नहीं कह पाए, इसलिए सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया है। ऐसे अनेक अधिकारी है, जिनके कारण छत्तीसगढ़ की वन संपदा नष्ट हो रही है। पिछले कुछ दिनों से अनेक भ्रष्ट अधिकारी सरकार के निशाने पर आ रहे हैं। अगर यही रफ्तार रही तो उम्मीद की जा सकती है, कि भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी। बशर्ते अधिकारी सुधर जाएँ।
घूसखोरी के खिलाफ हेल्पलाइन...
एक दशक हो गए अपने राज्य को बने, लेकिन विकास के साथ-साथ भ्रष्टाचार भी लगातार फलता-फूलता रहा है। विकास एक कदम चलता है और भ्रष्टाचार दस कदम आगे बढ़ जाता है। कई अफसर लाल हो गए हैं। इनसे कैसे निपटा जाए, यह बड़ी समस्या है। लेकिन इस दिशा में अब पहल हो रही है। लड़कियों से छेडख़ानी को रोकने के लिए सरकार ने एक हेल्पलाइन शुरू की है। कुछ टेलीफोन नंबर दिए हैं, जिस पर लड़कियाँ फोन करती हैं और दोषी को पकड़ा जाता है। अब रिश्वतखोरी को पकड़ाने के लिए भी हेल्पलाइन शुरू कर दी गई है। लोगों को इसका उपयोग करना चाहिए और जो रिश्वतखोर हैं, भ्रष्ट हैं, उनकी जानकारी इन नंबरों पर देनी ही चाहिए। आप भी नोट कर लें ये नंबर- 800, 110180 और 01124651000। हो सकता है, कभी काम ही आएं।
बच के रहें नकली मिठाइयों से...
अगले हफ्ते दीपावली है। इस अवसर पर आप मिठाइयाँ खरीदेंगे। लोगबाग आप को खिलाएँगे भी, मगर सावधान रहने की जरूरत है। पैसे कमाने की धुन में अनैतिक हो चुके कुछ लोग त्योहारों के मौकों पर नकली खोवा बनाते हैं। इसकी बनी मिठाइयाँ खाकर आदमी की जान भी जा सकती है। जहरीली चीजें धीरे-धीरे असर दिखाती हैं। मगर मौत के सौदागरों को इससे कोई मतलब नहीं। वे तो यह मान कर चलते हैं, कि ईश्वर के सामने हाथ जोड़ेंगे और पाप खत्म हो जाएँगे। ऐसे पापी पूरे छत्तीसगढ़ में छाए हुए हैं। वे राजधानी में भी हैं, रायगढ़ में भी हैं, अंबिकापुर में भी है तो बस्तर में भी। कहीं भी मिल जाएँगे मिलावटखोर। सावधान तो हमें रहना है। बेहतर हो कि घर पर मिठाइयाँ बनाएँ। खुद भी खाएँ और पड़ोसियों को भी खिलाएँ।
अरुंधति का पुतला फूँका
अरुंधति राय एक लेखिका है। अब वह सामाजिक कार्यकर्ता है। लेकिन वह कुछ ज्यादा ही उत्साह में आ जाती है। नक्सलियों का खुलेआम समर्थन करती ही है। अब वह इसलिए चर्चा में है कि उसने पिछले दिनों कह दिया, कि कश्मीर भारत का अंग नहीं है। अब यह बयान देशद्रोह से कम नहीं है। लेकिन अरुंधति काकुछ नहीं हुआ। हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भयंकर दुरुपयोग होता है। होता रहा है। कायदे से अरुंधति पर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए, मगर नहीं चला। लेकिन इस देश में लोग अभी मुर्दा नहीं हुए हैं। राजधानी में भी लोग जिंदा हैं। इसलिए अभाविप ने अरुंधति राय का पुतला दहन कर अपना आक्रोश व्यक्त किया। कहीं तो कोई प्रतिक्रिया हुई,यह बड़ी बात है। 

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

हद है....सलमान के स्वागत में सरकार...?
 

छत्तीसगढ़  में २६ अक्टूबर से राज्योत्सव शुरू हो गया है. १ नवम्बर २००० को नया राज्य बना था. यह दसवां वर्ष है. उत्सव १ नवम्बर तक चलेगा. लेकिन कल उद्घाटन के ठीक बाद मंच पर जो नज़ारा दिखा, उसे देख कर उन लोगो को गहरी निराशा हुई, जो चीज़ों को, जीवन को गंभीरता से लेते है. बालीवुड के एक नायक सलमान खान का जिस तरह मंच पर पहुँच  कर राज्यपाल, मुख्यमंत्री समेत अन्य मंत्रियों और अफसरों ने सोत्साह स्वागत किया, उसे देख कम से कम मेरे जैसे नागरिक की आँखे तो शर्म से झुक ही गई. औरों की भी झुकी होंगी, क्योंकि सलमान का ऐसा कद नहीं है, कि उसके स्वागत के लिये राज्यपाल और मुख्मंत्री मंच पर जाये. ये हो सकता है, कि सलमान खान राजपाल और मुख्यमंत्री का स्वागत करता. मगर यहाँ तो उल्टी गंगा बह रही थी. सलमान खान भी अपनी किस्मत को सराह रहा होगा  कि अच्छा राज्य मिला, जो उसे इतनामहत्व दे रहा है.
आखिर सलमान खान का अवदान क्या है? चंद औसत दर्जे की फिल्में..? क्यों उसे इतना महत्त्व दिया गया? इसलिए कि वह उसकी देहयष्टि आकर्षक है? इसलिए कि वह काले हिरनों का शिकार कराने में माहिर है, या फिर इसलिए कि वह गाडी चलता है और लोगों को कुचल देता है? किस कारण एक सरकार सलमान कहाँ का स्वागत कराने उमड़ पडी? इसका कारण खोजा जाना चाहिए. बहुत पुरानी बात नहीं है, जब सलमान को काले हिरन के अविध शिकार के लिये गिरफ्तार कर के जेल मे ठूंसा  गया था. नशे की हालत में कार चला कर लोगों को कुचलने का आरोपी भी यही (खल) नायक है. अनेक किस्से है, इस हीरो के. किसी से मारपीट करना, हीरोइनों के साथ 'स्कैंडल' गाली -गलौज  करना आदि-आदि  ऐसे व्यक्ति का  राज्योत्सव के मंच पर महानायक बता कर स्वागत करना यह बताता है कि राज्य मे ऐसे कुछ सलाहकार है, जो सांसकृतिक शून्यता के शिकार हो चुके है. ठीक है, कि सलमान को एक निजी कंपनी ने बुलाया था. मगर राज्यपाल और मुख्यमंत्री द्वारा उसका पुष्पगुच्छ से स्वागत करना, किसी भी कोण से सही नहीं ठहराया जा सकता. नई पीढ़ी के युवकों मे किसी हीरो को देखने की दीवानगी स्वाभाविक है, मगर एक सरकार किसी हीरो का स्वागत कराने मंच पर चली आये, यह पहली बार देखा गया. कलाकार का सम्मान होनाचाहिए, मगर उसकी सामाजिक छवि भी तो हो. जो व्यक्ति गंभीर अपराध के मामले में सजायाफ्ता हो, उसके स्वागत मे काम से काम सरकार को तो उतरना ही नहीं चाहिए था. मगर ऐसा हुआ, यह देख कर अनेक लोगों को धक्का लगा. राजपाल और मुख्यमंत्री से यह चूक कैसे हो गई, यह  लोगों की समझ से परे है. बहुत संभव है, उन्हें सलमान खान के अतीत की जानकारी न रही हो. यह काम सलाहकारों का है. पता नहीं उनको सलाह देने वाले लोग कैसे है. बहुत संभव है, कि उन लोगों को भी यह पता न रहा हो, कि सलमान खान गंभीर अपराध के सिलसिले में जेल कि हवा खा चुका है.
लोग पुरानी घटनाओं को जल्दी भूल जाते है.  दरअसल  रजत-परदे की चमक ही ऐसी है,कि इसमें दिखाने वाला खलनायक भी नायक लगता है. सलमान की  नई फिल्म ''दबंग'' आई है. जिसमें उसने  भ्रष्ट पुलिस अधिकारी का किरदार  निभाया है. फिल्म  'मुन्नी ' बदनाम हुई...'' जैसे गाने के कारण खूब चली. इस फिल्म कि लोकप्रियता ने सलमान को ज्यादा लोकप्रिय बना दिया. इस देश का दर्शक भी अब खलनायक को ही नायक समझाने की भूल कर रहा है. जो भी  हो, मै तो सलमान को खुशकिस्मत मानता हूँ, कि महानायक की तरह उसका छत्तीसगढ़ में पूरी सरकार ने स्वागत किया. इस छत्तीसगढ़ में इन दिनों वैसे भी पुलिस वाले दबंगई दिखा रहे है. लोग ठीक कह रहे है, कि अगर बालीवुड़ के ही किसी नायक को बुलाना था, तो ऐसे किसी कलाकार को बुलाते, जिसकी सामाजिक छवि भी ठीकठाक हो. कई नाम हो सकते है. मगर अब किसी ने सलमान की तगड़ी ''मार्केटिंग'' कर ही दी तो दूसरा नाम सामने कैसे आ सकता था. मगर सलमान का स्वागत करके सरकार की  छवि धूमिल ही हुई है, इसमें दो राय नहीं हो सकती. लोग इस घटना को चमत्कार की  तरह ले रहे है,कि एक सरकार एक विवादस्पद फ़िल्मी नायक के स्वागत मे उपस्थित हो गई.

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

बस्तर : उम्मीद कायम है..
नक्सलवाद के विरुद्ध बस्तर में जिस तरह लोग लामबंद होते रहे हैं, उसे देख कर यह विश्वास दृढ़ होता है, कि अन्याय के विरुद्ध जीवत प्रतिकार का सिलसिला जारी है। सलवाजुडूम भले ही अब बंद हो गया हो मगर शांति के लिए लोग फिर भी एक जुट हो रहे हैं। पिछले दिनों बस्तर में बीजापुर और जगदलपुर में शांति के लिए सैकड़ों लोग जमा हुए और यह संकल्प दुहाराया कि जब तक बस्तर में शांति बहाल नहीं हो जाती, लोग हिंसा के विरुद्ध खड़े होते रहेंगे। गाँधी जयंती के दिन लोगों के मन में बड़ा उत्साह था। डर यही है कि यह उत्साह समय के साथ ठंडा न पड़ जाए। नक्सलियों के विरुद्ध पुलिस और दूसरे जवान अपने तरह से लड़ रहे हैं। लेकिन जनता कोभी साथ देना है।  उन्हें घबराना ही नहीं है। जगदलपुर में एक संस्था बनी है बस्तर शांति एवं विकास संघर्ष परिषद। इस संस्था के गठन के दिन मुख्य वक्ता के रूप में मैं शामिल हुआ था। वहाँ जमा सैकड़ों लोगों के उत्साह को देख कर लगा कि अभी भी उम्मीद कायम है। और रहनी चाहिए।
जोगी का आशावाद
पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को मानना पड़ेगा। एक मायने में वे सबके प्रेरणास्रोत है। शारीरिक दुर्घटना केकारण और कोई होता तो वह हताश हो गया होता । मगर जोगीजी उत्साह सेबरे रहते हैं। और आए दिन सरकार के नाक में दम किए रहते हैं। लोग घबराए रहते हैं, कि पता नहीं, कब क्या हो जाए। अभी पिछले दिनों जोगी जी ने कह दिया कि भाजपा के बारह विधायक उनके संपर्क में हैं। ये विधायक बेहद नाराज हैं क्योंकि इनकी उपेक्षा हो रही है। जोगी जी का संकेत यही है कि सरकार उनकी मुट्ठी में है। जब चाहे निपटा सकते हैं। जोगीजी के इस बयान से लोग सकते में हैं। जोगी जी यह भी कह रहे हैं कि वे बहुत कुछ कर सकते हैं, मगर जब तक हाइकमान तैयार नहीं होगा, वे कुछ नहीं करेंगे। और यह तय है कि हाईकमान ऐसा कुछ नहीं चाहेगा, कि सरकार गिरे। मतलब केवल हवाहवाई बात है। फिर भी जोगी जी के इस बयान से भाजपा में सुरसुरी तो जरूर छूटी होगी और यह भी देखा जा रहा होगा, कि वे बारह विधायक हैं कौन। हैं भी या नहीं?
राहुल का बचकाना बयान
राहुल गाँधी अब बच्चे नहीं रहे। वे सांसद भी बन गए हैं। इसलिए संभल कर बोलना चाहिए। वे पिछले दिनों कह गए किस संघ और सिमी एक जैसे हैं। कहाँ राष्ट्रविरोधी संस्था सिमी और कहाँ राष्ट्रवाद के लिए जीने-मरने वाली संस्था संघ। संघ कट्टर हो सकता है, लेकिन वह सिमी जैसा आतंकवादी नहीं है। राहुल को किसी ने गलत फीड कर दिया होगा। बेचारे ने कह दिया। स्वाभाविक है कि उनका पुतला जला। राजधानी ही नहीं अनके जगह। बिना सोच-समझे बोलने के कारण ही हमारे यहाँ विवाद पैदा होते हैं। राहुल का बयान कुछ ऐसा ही है जैसे कोई हत्यारे और पंडित को एक ही श्रेणी में रख दे।
प्रतीकों में भी हो सकती है बलि
कुछेक धर्मस्थलों में पशुबलि दी जाती है। पूरा प्रांगण लहूलहान न•ार आने लगता है। जो लोग बलि के पक्ष में होते हैं, उन्हें बुरा नहीं लगता मगर बहुत से ऐसे लोग भी होते हैं,जो खून देख कर ही घबरा जाते हैं। हमारा समाज हिंसा विरोधी रहा है। लेकिन धार्मिक परंपरा के नाम पर हिंसा के मामले में मौन हो जाता है। जबकि लोगों को इसका विरोध करना ही चाहिए। सभ्य समाज में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। अगर किसी की धार्मिक मान्यता है तो उसका रूप बदला जा सकता है। प्रतीकों में बलि ली जा सकती है। नारियल को भी लो प्रतीक बनाते रहे हैं। ईश्वर कभी भी बलि से प्रसन्न नहीं हो सकता। वह त्याग को पसंद करता है। करुणा से वह खुश होता है। सुशिक्षित आम लोगों को यह समझाया जा सकता है। मिल-जुल कर एक वातावरण बनाने की कोशिश करनी चाहिए।
शोर पर ऐतराज
हमारे यहाँ धार्मिकता की भी ऐसी उग्रता देखने में आती है कि मत पूछिए। धर्म-कर्म में लगे बहुत से लोग कई बार अभद्रता की हद से गुजर जाते हैं। लाउडस्पीकर बजाकर आसपास के लोगों को परेशान कर देते हैं। आजकल हर घर में पढऩे-लिखने वाले बच्चे होते हैं। पढ़ाई का कितना दबाव रहता है, यह किसी से छिपा नहीं। जब घर के बाहर फुलसाउंड में लाउडस्पीकर बजता है तो बच्चे पढ़ नहीं पाते। बहुत से लोग शोर के कारण तनावग्रस्त भी हो जाते हैं। अगर ऐसे समय में कोई पीडि़त व्यक्ति आयोजकों के पास जाए तो वे अन्यथा लेते हैं और लडऩे पर उतारू हो जाते हैं। तब लगता है, कि यह कैसी धार्मिकता है जो दूसरों का दिल दुखा कर ईश्वर को खुश करना चाहती है। जबकि ईश्वर तो लोगों के दिलों में भी रहता है। अब लोग आस्था कम और प्रदर्शन में ज्यादा विश्वास करने लगे हैं। इसीलिए वे केवल अपनी सुविधा का ध्यान रखते हैं, दूसरों का नहीं।
फिर वही शराब....
छत्तीसगढ़ इस वक्त नक्सलवाद के साथ-साथ नशावाद से भी पीडि़त है। ऐसा कोई गाँव या शहर नहीं होगा,जहाँ शराब के कारण हिंसक स्थितियाँ न बनती हों। आपस में मारपीट, वैमनस्यता के पीछे शराब भी एक बड़ा कारण है। हालत यह भी होती है कि शराब के कारण घर-परिवारों में मौतें भी होने लगी हैं। पिछले दिनों आरंग क्षेत्र की कुछ जागरूक महिलाएँ रायपुर आईं और शराब बंदी के लिए प्रदर्शन करके लौट गईं। इनमें एक ऐसी महिला भी शामिल थी, जिसके पति की मौत शराब पीने के कारण हुई। अनेक मौतें केवल शराब केकारण हुई हैं। फिर भी शराबखोरी पर अंकुश नहीं लग रहा। प्रशासन को केवल आय चाहिए। शराबविरोधी आंदोलन को चालाकी के साथ दबा दिया जाता है। लेकिन ऐसा करके प्रशासन खुद अपराध कर रहा है। शायद उसे इस बात का अहसास ही नहीं है। गनीमत है कि छत्तीसगढ़ मुर्दा नहीं है। यहाँ शराब के विरुद्ध लोग एकजुट होते रहते हैं। आज नहीं तो कल हो सकता है कोई ऐसी व्यवस्था आए जो शराबबंदी के खिलाफ ईमानदारी से कोई निर्णय ले।

रविवार, 26 सितंबर 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

छत्तीसगढ़ ; घपलेबाज अफसरों की संख्या बढ़ रही
छत्तीसगढ़ के बारे में यही कहा जाता है कि यह बाहर से आए अफसरों का स्वर्ग है। और यह दीख भी रहा है। आजकल हर दूसरे-तीसरे दिन किसी न किसी अफसर के यहाँ छापा पड़ रहा है। काफी माल बरामद हो रहा है। छोटे से छोटा अफसर भी करोडों में खेल रहा है। क्या आईएएस और क्या डिप्टी कलेक्टर, हर कोई नोट कलेक्ट कर रहा है। तरह-तरह के घोटाले हो रहे हैं। सबसे मज़े की बात यह है कि लोग पकड़ में तो आते हैं, अखबारों के माध्यम से इनकी मिट्टीपलीद  भी होती है, लेकिन चिकने घड़ों को कोई फर्क नहीं पड़ता। और सच्चाई भी यही है, कि छापे के बाद कुछ दिन तक हलचल रहती है। बाद में मामला शांत हो जाता है। तबाही के कहीं कोई निशान ही नजर नहीं आते। कितने ही मामले गिनाए जा सकते हैं। यही सब देख कर तो बाकी अफसरों के भी हौसले बुलंद हैं, कि डटकर करो कमाई। किसी का बाल भी बाँका नहीं होगा। कमाल हो रहा है, कमाल हो रहा है। अफसर तो अफसर, अब बाबू भी लाल हो रहा है। लोग समझ रहै हैं कि छत्तीसगढ़ खुशहाल हो रहा है।  
 छत्तीसगढ़ की पुलिस इतनी कमजोर नहीं....
नक्सल समस्या एक अंधेरी रात में तब्दील हो चुकी है, ऐसा लगता है। ऐसा कोई दिन नहीं,जब कोई वारदात न हो। वहाँ रहने वाले लोगों को दहशत के साये में जीना पड़ता है। पुलिस वाले वहाँ जाना नहीं चाहते तो उनको प्रशासनिक डंडा दिखाया जाता है। खैर, काम तो करना ही पड़ेगा। जो पुलिसवाले वहाँ जाने से बचते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि खतरा कहाँ नहीं है। जीवन ही खतरे का नाम है और पुलिस में जो आता है, वह खतरों का खिलाड़ी बन जाता है। वरदी का मतलब है कि सिर पर कफन बाँध कर निकल पड़े हैं। सुविधाएँ यहाँ नहीं है। यहाँ संघर्ष है। चुनौतियाँ हैं। नक्सलवाद सबसे बड़ी चुनौती है। उससे भागने का मतलब है हम यह बता रहे हैं कि हम कायर है। जबकि वरदी वहीं पहनता है जो हिम्मती होता है। अगर पुलिस वाले नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जाने से घबराएंगे तो नक्सलियों के हौसले तो और बढ़ेंगे। इसलिए हिम्मत से काम लें और नक्सलियों से लोहा लें। छत्तीसगढ़ की पुलिस कमजोर नहीं, बहादुर है। यह संदेश पूरे देश तक जाना चाहिए।
नक्सल -अंधेरा: कब होगी सुबह?
वैसे पुलिस के जवानों को बहादुरी का सबक तो सिखाना आसान है, लेकिन यथार्थ यही है, कि वहाँ सरकार नाकाम-सी हो रही है। अभी सात जवानों का अपहरण किया गया । तीन को तो हत्या ही कर दी गई। चार अभी बंधक हैं। यह सब नक्सली आतंकवाद को दर्शाने का एक तरीका है। बंधक बने लोगों के परिजन किन मानसिक दौरों से गुजर रहे हैं, यह उनके बयानों से समझा जा सकता है। वे लोग नक्सलियों से अनुरोध कर रहे हैं, कि हमारे घर वालों को छोड़ दो तो वे लोग पुलिस की नौकरी ही छोड़ देंगे। उनकी जान बख्श दो। आदि-आदि। छोटे-छोटे बच्चे अपील कर रहे हैं लेकिन क्या नक्सली कुछ रहम करेंगे? अगर वे रहम करना जान लें तो नक्सली ही क्यों रहते? आम लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर इस रात की सुबह कब होगी। लेकिन धैर्य रखना ही होगा। क्योंकि सुबह अवश्य आएगी। शांति का सूरज चमकेगा ही।
ओ आँखवाले डॉक्टर, देखकर काम करो
हद है लापरवाही की। पिछले दिनों विश्रामपुर की एक तीन वर्षीय बच्ची की आँख में चोट लगी तो परिजनों ने अंबिकापुर के डाक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने कुछ उपचार किया और आँख पर पट्टी    बाँध दी। दो दिन बाद छुट्टी भी दे दी। मगर आँख में दर्द बना रहा। बाद में पता चला कि अंबिकापुर के डॉक्टर ने तो बच्ची की आँख ही निकाल दी और डुप्लीकेट आँख लगा दी है। बच्ची की आँख में दर्द रहने लगा तो घर वाले बच्ची को लेकर रायपुर आए। एक जाने-माने डॉक्टर को दिखाया तब मामला सामने आया। घर वालों ने गैरजिम्मेदार डॉक्टर के खिलाफ विश्रामपुर थाने में रिपोर्ट लिखाई है। अब डॉक्टर महोदय सफाई में कह रहे हैं, कि घर वालों के कहने पर बच्ची की आँख निकाली थी। घर वालों की सहमति अगर थी तो घर वालों ने थाने में रिपोर्ट ही क्यों लिखाई? मामला गंभीर है। भयंकर किस्म की आपराधिक लापरवाही का है। डॉक्टर की लापरवाही केकारण एक नन्ही बच्ची की एक आँख चली गई, इसका दर्द बच्ची और उसके परिजन ही समझ सकते हैं।
वाह रे गांजा-तस्कर सरपंच....?
सरपंच मतलब गाँव का प्रधान ..राजा। लेकिन बहुत-से गाँवों में सरपंचों की लापरवाही और लालच के कारण शराब और तरह-तरह की नशाखोरी फल-फूल रही है। गाँव के गाँव तबाह हो रहे हैं। पिछले दिनों रायपुर जिले के सुदूर गाँव का एक सरपंच गांजा-तस्करी में लिप्ट मिला। दूसरे लोग तो पकड़े गए मगर सरपंच पुलिस की गिरफ्त में आने के पहले ही वह फरार हो गया। लेकिन इससे एक बात तो साफ हो गई कि सरपंच की शह में गाँजे का कारोबार चल रहा था। एक सरपंच पकड़ा गया। अभी कुछ पकड़ सेबाहर हैं। अनेक गाँव आज नशे के केंद्र बनते जा रहे हैं। पचं-सरपंचों की सहमति के चलते शराब दूकाने खुल रही है।
पुस्तक-मेले की परम्परा विकसित हो
बिलासपुर में पुुस्तक मेला शुरु हो गया है। 3 अक्टूबर तक चलेगा। रायपुर में लगने वाला है। लेकिन अनुभव यही आया है कि इन पुस्तक मेलों में बहुत अधिक खरीदी नहीं होती। ये पुस्तक मेले में केवल दर्शनीय बन कर रहा जाते हैं। लोग पुस्तकों के पास तो आते हैं। मगर बाजार से गुजरा हूँ खरीदार नहीं हूँ  जैसी पंक्ति को सार्र्थक करते हुए निकल लेते हैं। जबकि अन्य राज्यों में होने वाले पुस्तक मेलों के बारे में सुन-पढ़ कर बड़ा आश्चर्य होता है, कि वहाँ साधारण से साधारण आदमी अच्छी खरीदारी करता है। छत्तीसगढ़ में पुस्तक-मेले की संस्कृति अभी बन रही है। यह शुरुआत है। यह सिलसिला चलता रहेगा तो भविष्य में पुस्तकें भी खरीदी जाएँगी। अभी तो सरकारी खरीदी भर होती है। वह भी इसलिए कि कुछ अफसरों को खासा कमीशन मिल जाता है। वे लाल हो जाते हैं। फिर भी इन पुस्तक मेलों का दिल से स्वागत होना चाहिए और छत्तीसगढ़ के दूरदराज स्थानों में रहने वाले कभी रायपुर-बिलासपुर जाएं तो मेलों तक भी जाकर कुछ न कुछ पुस्तकें जरूर खरीदें।

शनिवार, 4 सितंबर 2010

हाय, ये बलात्कारी शिक्षक

हाय, ये बलात्कारी शिक्षक.................
शिक्षक दिवस के दिन लोग शिक्षकों की पूजा करते हैं, उनका सम्मान करते हैं। शिक्षक होते भी इस लायक हैं कि उनका आदर किया जाए, लेकिन कभी-कभी कुछ शिक्षक सकलकर्मी यानी कुकर्मी भी निकल जाते हैं। जिनसे उम्मीद करते हैं, कि वे संस्कार देंगे, वे पट्ठे बलात्कार करते हुए पकड़े जाते हैं। भिलाई के ज्ञानदीप स्कूल में एक अज्ञानी शिक्षक का मामला प्रकाश में आया है। यह नीच शिक्षक पाँचवीं कक्षा की एक छात्रा को अपनी वासना का शिकार बनाना चाहता था। उस पर मामला दर्ज हो गया है। अब तो उसे स्कूल से हटा भी दिया गया होगा। दुख की बात यह है कि कुछ शिक्षक गलती से शिक्षा के पेशे में आ जाते हैं। दरअसल उन्हें होना था अपराधी, बनना था माफिया मगर अध्यापक बन गए। मगर मानसिकता वहीं की वही। क्या करें? ऐसे घटिया शिक्षकों के कारण पूरी बिरादरी बदनाम होती है। सचमुच, एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है। ऐसे शिक्षकों को आजीवन जेल में ही सड़ाना चाहिए, ताकि उन्हें हर पल अपनी गलती का अहसास होता रहे।
लहू का रंग एक है....

पिछले दिनों फिर एक घटना प्रकाश में आई, कि एक घायल नक्सली को एक जवान ने अपना खून दिया। यानी उसकी जान ही बचाई। खून देने वाले जवान ने साबित कर दिया, कि मानवता सबसे ऊपर है। वह चाहता तोकून न भी देता। उन नक्सलियोंं को खून क्यों दें, जो बेकसूरों का खून बहाते हैं। यह निर्मम व्यावहारिक सोच है, मगर नैतिकता या जीवन-मूल्य यही कहते हैं, कि मानवता की रक्षा की जाए। हो सकता है, जवान के खून देने के बाद नक्सलियों का मन पसीजे।  वे सोचने पर विवश हों, कि जिनको हम मार डालते हैं, उनके ही लोग हमारे साथी की जान बचाने के लिए रक्तदान करते हैं। लहू का रंग एक हैं। मगर जब लहू की सोच हिंसक हो जाए, तो क्या किया जा सकता है। जवान ने अपना लहू दे कर पुण्य का काम किया है। उसका अभिनंदन होना चाहिए।
सबक है यह पुलिस के लिए..
पुलिस का मतलब यह नहीं है, कि किसी के साथ भी मनमानी कर ली जाए। डंडा हाथ में आने के बाद कुछ लोग रावणत्व के शिकार हो जाते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं, कि लोकतंत्र में कानून नाम की कोई चीज भी है। पुलिसवालों को कानून की रक्षा के लिए डंडा दिया जाता है, लेकिन भाई लोग उस डंडे से किसी का भी सिर फोडऩे लगते हैं। आरपीएफ के प्रभारी समेत सात पुलिस कर्मियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया गया है। हुआ यह कि किसी मामले में एक व्यक्ति को जेल हो गई थी, लेकिन पुलिस चालान नहीं पेश कर पाई। व्यक्ति को जमानत पर रिहा कर दिया गया। लेकिन पुलिस उसे फिर पकड़ कर ले गई। उसे मारा-पीटा। प्रताडि़त किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रट ने मामला दर्ज करने का आदेश दे दिया। शिकार करने वाले लोग खुद शिकार हो गए। प्रताडि़त व्यक्ति को,उसके परिवार को तब संतोष मिलेगा, जब दोषी पुलिस वालों को कड़ी सजा मिलेगी। और मिलेगी ही क्योंकि न्याय के घर देर है, अंधेर नहीं।
छत्तीसगढ़ में घसपैठिए....?
छत्तीसगढ़ ही क्या, पूरा भारत घुसपैठियों का घर बनता जा रहा है। यह एक बड़ी समस्या है, फिलहाल अगर छत्तीसगढ़ की बात करें, तो यहाँ भी बांग्लादेश और पाकिस्तान के लोग घसुपैठ की कोशिश करते रहते हैं। अपने देश से वीजा बना कर आते हैं और भारत में ही रह जाते हैं। क्योंकि यहाँ सुख-शांति है। आराम से अपना धंधा कर सकते हैं। अपने यहाँ भ्रष्टाचार इतना है कि थोड़े से पैसे मिलने के बाद संबंधित अधिकारी किसी भी किस्म का प्रमाणपत्र दे सकता है। ऐसा ही एक पाकिस्तानी भवनदास सचदेव दस -बारह से रायपुर में रह रहा था। मकान भी खरीद लिया था। अपना व्यवसाय भी कर रहा था। अचानक पोल खुली। पुलिस ने पाक नागरिक केविरुद्ध चार सौ बीसी का मामला दर्ज कर लिया। इसके बाद ही यही सोचा जा रहा है, कि ेेसे न जाने कितने लोग यहाँ होंगे। रायपुर ही नहीं, आसपास भी ऐसे विदेशी होंगे, जो चुपचाप रह रहे हैं। एक अभियान चलना चाहिए, ताकि संद्ग्धि लोग पकड़ में आ सकें।
स्वर्ग है राजधानी सेक्स-माफिया के लिए....
छत्तीसगढ़ में भू माफिया, शराब माफिया, उद्योग माफिया आदि-आदि सक्रिय हैं। एक और माफिया तेजी के साथ पैर पसार रहा है। यह है सेक्स-माफिया। यह माफिया बाहर से लड़कियाँ बुलवाता है और यहाँ के रईसजादों को सप्लाई करता है। ये रईस लोग रायपुर के ही नहीं होते। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से यहाँ आते हैं। पिछले दिनों ऐसे ही एक सेक्स रैकेट का भाँडा फूटा। जम्मू और दिल्ली की लड़कियों के साथ छत्तीसगढ़ के ही दो युवक पकड़ में आए। दलाल फरार हो गया।  पकड़ी गई लड़कियों के पास से अनेक बड़े शहरों की हवाई टिकटे मिली। यानी ये चलती-फिरती देह-मशीनें थी। आज यहाँ तो कल वहाँ। कोई बड़ी बात नहीं, कि ये धनलोलुप लड़कियाँ अपने अभिभावकों से छल करके घूमती रहती हैं। पकड़ में आने पर इनके माता-पिता लज्जित होते हैं। लेकिन आज पैसे कमाने की हवस के कारण पतन इतनी तेजी से फैला है कि कई लोग इस पतन को अपने मौलिक अधिकार की तरह देखने लगे हैं।
गाय मूक है मगर उसकी आँखें बोलती हैं
जन्माष्टमी धूमधाम से मनी। कुछ लोगों ने गायोंकी भी पूजा की। गौ माता की जय के नारे भी लगाए। लेकिन उसी दिन पूरे शहर में दिन के समय और रात को लावारिस-सी गायें घूमती रहीं। इधर-उधर बैठी भी मिलीं। जो गायें सड़कों पर यूँ ही बदहाल घूम रही थीं। उनके पालक भी गौ माता जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। हमारे यहाँ अजीब मानसिकता है। गायों का भरपूर दोहन करेंगे मगर उसकी देखभाल करने में कंजूसी करने लगेंगे। उसे चारा नहीं खिलाएंगे। उसकी सेवा नहीं करेंगे। केवल प्रणाम करेंगे, बस। गोया ऐसा करने से गौ माता प्रसन्न हो जाएगी। गाय मूक प्राणी है मगर उसकी आँखें बोलती हैं। जरा गौर से देखो। उसके आँसू भी बहते हैं।  उसे गोपालक गौर से देखे महसूस करे। जब वह गाय का दूध पीये या उसे बेच कर, उसमें पानी मिला कर कुछ कमाई करे, तो ध्यान रखे कि गाय को कुछ खिलाना-पिलाना भी है। उसे सड़कों पर मत छोड़ो। उसे मैदान में चरने भेजो।

शनिवार, 14 अगस्त 2010

एक 'देश' में 'दो-दो'देश ...?

'एक' देश में 'दो-दो' देश ...?

दो-दो देश? जी हाँ, एक तरफ ''भारत'' है, या कहें कि ''हिन्दुस्तान'' है, तो दूसरी तरफ है ''इंडिया''. 
देश के वर्तमान हालात देख कर कई बार महसूस होता है, कि क्या इस देश में आजादी को बहुत हल्के-से लिया जाने लगा है? क्या नागरिक और क्या व्यवस्था, हर कहीं राष्ट्र की गरिमा का ख्याल रखने जैसी कोई बात नहीं आती। सरकारें देश को निजी कारोबारियों की तरह चला रही हैं तो नागरिक अपने स्वार्थ में पड़कर देश का नुकसान करने पर तुले हैं। ऐसे विषम समय में देश की हालत पर सोचने और एक बार फिर देश को नवजागरण की दिशा में ले जाने वाली रचनात्मक ताकतों के पक्ष में वातावरण बनाने की जरूरत है।
आजादी के साठ दशक बीत जाने के बावजूद देश आज भी देश के गाँव और और आदिवासी इलाके विकास की रौशनी से महरूम हैं: वंचित हैं। कहीं बिजली नहीं, कहीं, सड़क नहीं, कहीं पाठशालाएँ नहीं। कहीं स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं। यह कैसा नया भारत हैं, जहाँ शहरों में मॉल पर मॉल बनते चले जाएँ और गाँव बदहाल दर बदहाल होते चले जाएँ? दो तरह का समाज बनाते जा रहे हैं हम। एक गरीबों का, एक अमीरों का। शहरों की हालत देखता हूँ तो हैरत होती हैं। यहाँ दो तरह के स्कूल विकसित हो चुके हैं। एक गरीबों के स्कूल हैं, तो दूसरी तरफ अमीरों के स्कूल हैं। और स्कूल भी कैसे, गोया वे सितारा होटल हों। वातानुकूलित। जो बच्चे कभी मिट्टी से जुड़कर अध्ययन करते थे, स्वस्थ रहते थेे। खुली हवा में साँस लेते थे, आज कमजोर शरीर के स्वामी बन रहे हैं। अमीरी का ऐसा भद्दा दिखावा हो रहा है, कि मत पूछिए। यही कारण है, कि समाज में हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ रही है। शहरों में आपराधिक घटनाएँ कई गुना बढ़ी हैं। आदिवासी इलाकों में नक्सलवाद जैसी नई बीमारी का उदय हो चुका है। इससे मुक्ति पाने के लिए ईमानदार प्रयास नहीं हो रहे हैं। इस रोग के पीछे गरीबी, बदहाली, असमानता और विकास के प्रति बेरुखी ही मुख्य कारण है। अगर हम सब इस दिशा में सोचें और कदम उठाएँ तो एक खुशहाल भारत को विकसित करने में कोई दिक्कत नहीं होगी। लेकिन अब इस दिशा में सोचने वाले लोग हाशिये पर हैं। आईना दिखाने वाले चिंतकों को सरकार विरोधी समझने की भी भूल कर दी जाती है। मेरा तो छोटा-सा अनुभव यही है।
आज भी गाँव और आदिवासी इलाके विकास की मुख्यधारा से कटे लगते हैं। जैसे वे बेचारे बाढ़ से घिरे हुए टापू हों। जहाँ, बदहाली है,भूख है, प्यास है। विकास के नाम पर जहाँ केवल एक हड़पनीति है। सारा विकास शहरें के हिस्से आया और गाँवें को हमने अछूत की तरह देखा। उसे हमने चुनाव के समय ही नमन किया। यानी कि हमने उसे केवल ठगने का ही काम किया। यही कारण है कि आज एक तरफ इंडिया है, जो पूर्णत: विकसित दिखता है, अँगरेजी  बोलता है, अश्लील या ऊटपटाँग कपड़े पहनता है। मॉलों में जीता है : मालामाल है। आदर्श-नैतिकता जहाँ कोई मुद्दा नहीं हैं। वहीं दूसरी तरफ एक अदद हिंदुस्तान है, भारत है, जो प्रतीक्षा कर रहा है, कि कब विकास की किरण आएगी, और उसका अँधेरा भागेगा। अँधेरे को यहाँ व्याख्यायित करने की जरूरत नहीं है। अँधेरा एक ऐसा रूपक है, जो अनेकार्थ उपस्थित करता है। आज अगर गाँवों में या आदिवासी इलाकों से हिंसा की लपटें निकल रही हैं, तो उसके पीछे शोषण ही रहा है। यह अलग बात है, कि इन लपटों में कुछ शातिर हवाएँ भी शरीक कर राष्ट्र को जानबूझकर क्षति पहुँचाने की कोशिशें कर रही हैं। इसलिए अब यह बेहद जरूरी है कि तमाम तरह के खतरे उठाते हुए और उससे निपटने की तैयारी के साथ हम अपने विकास के एजेंडे में गाँवे और वनांचलों को शामिल करें। यह बात समझ ली जानी चाहिए कि गाँव और वनांचलों का विकास ही राष्ट्र का सच्चा विकास है। बिना इसके विकास पूर्णत: एकांगी है, बेमानी है। 
देश के सामने महँगाई भी एक बड़ा मुद्दा है। कह सकते हैं, कि महँगाई की डायन खा रही है, और भ्रष्टाचार का दैत्य हमें परेशान कर रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य भी कम अहम मुद्दा नहीं है। गाँवों का विकास अब तक अलक्षित-सा है। न जाने क्यूँ हमने गाँव पर समुचित ध्यान ही नहीं दिया। वैसे अब नई पंचवर्षीयोजना में गाँवों तक इंटरनेट पहुँचाने का लक्ष्य तो बन गया है, लेकिन उदुख की बात यही है, कि गावों को विकास की मुख्यधारा से जोडऩे के लिए किए जाने वाले उपाय भ्रष्टाचार की चपेट में आ जाते हैं। दिल्ली में होने वाले कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारियों जो भ्रष्टाचारी-खेल हो रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है। भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में भारत के लोगों का एक चेहरा सामने आया है। निर्माण के नाम पर भ्रष्टाचार एक जैसे सांस्कृतिक परम्परा-सी बन गई है। पूरे महादेश में यह रोग फैला हुआ है। एक ओर भ्रष्ट अफसर और नेता मालामाल हो रहे हैं, वहीं, देश की आम जनता गरीबी का दंश भोगने पर विवश है। दिल्ली से लेकर बस्तर तक विकास की गंगा को गटर-गंगा बनानेवाले चंद लोग ही होते हैं। अगर हमारे देश में अफसर और नेता ईमानदार हो जाएँ तो यह देश स्वर्ग बन सकता है। लेकिन अब कोई इस दिशा में सोचता नहीं। सबको यही लगता है, कि जब तक कुरसी है,कमाई कर लो और निकल लो। देश की स्वतंत्रता के सामने यह एक बड़ी चुनौती ही है कि जिनके हाथों में हमने विकास की बागडोर सौंपी है, वे दिशाहीन घोड़े की तरह भाग रहे हैं। देश को चारा या कहें, कि पिज्जा -बर्गर या चाउमीन समझ कर हजम तो कर रहे हैं। देश को अपना घर समझ कर उसे सँवारने की कोई कोशिश नहीं हो रही। यही कारण है कि देश में भ्रष्टाचार बढ़ा है। घर भरने की पाशविक मनोवृत्ति के कारण देश हाशिये पर चला गया है। अपना घर-परिवार, अपना भारी-भरकम बैंक-बैलेंस, महँगी कारें, अत्याधुनिक बँगले आदि की ललक ने लोगों को हद दर्जे का अपराधी बना दिया है। इस फितरत के शिकार दिखने वाली जमात को आसानी से पहचाना जा सकता है। मजे की बात है कि ये खलनायक ही हमारे नायक बने हुए हैं। राजनीति और समाज के दूसरे घटक भी भ्रष्ट हो कर विकास करने में विश्वास करते हैं। नतीजा सामने है कि इस समय देश में भ्रष्टाचार सबसे बड़े खेल के रूप में उभरा है। हमारा देश ओलंपिक खेलों में भले ही फिसड्डी रहे, लेकिन वह भ्रष्टाचार में नंबर वन रहने की पूरी कोशिश करता है। यही कारण है, कि विकासशील भारत भ्रष्टाचार का काला साया मंडरा रहा है। इसलिए आज हम देखें तो हमारे सामने भ्रष्टाचार एक राष्ट्रीय मुद्दा है। जैसे हम नक्सलवाद या आतंकवाद को देश की बड़ी समस्या मानते हैं, उसी तरह भ्रष्टाचार भी उससे कहीं ज्यादा बड़ी समस्या है। बाजारवाद एक दूसरे किस्म की समस्या है। इसकी चपेट में हमारी नैतिकता आ गई है। यह एक दूसरा मसला है,जिस पर फिर कभी लिखूँगा। फिलहाल चौंसठवें स्वतंत्रता दिवस पर अगर देश के सामने उभरने वाले कुछ मुद्दों की बात करें तो इस वक्त भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा है। इससे मु्क्ति के बगैर देश का सच्चा विकास असंभव है। विकास तोएक प्रक्रिया है। वह होगी ही, लेकिन नैतिकता, ईमानदारी, समर्पण,त्याग, या फिर कहें, कि राष्ट्रप्रेम  के बगैर किसी देश सुव्यवस्थित और स्थायी विकास संभव नहीं हो सकता। मेरा कवि-मन अपने भावें को निष्कर्षत: इन पंक्तियों में अभिव्यक्त करना चाहता है, कि-
मेहनतकश भारत तो दिनभर खटकर मेहनत करता है
मगर इंडिया शोषक बनकर यहाँ हुकूमत करता है।
जब तक एक देश में दो-दो देश यहाँ विकसाएँगे,
हिंसा के दानव को हम सब, कभी रोक ना पाएँगे।
वक्त आ गया है सब मिलकर भारत का उत्थान करें।
जहाँ समर्पण, त्याग खिले, उस बगिया का निर्माण करें।

सुनिए गिरीश पंकज को