मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

व्यंग्य / मूर्ति की 'एडवांस बुकिंग

मित्रो, ''सद्भावना दर्पण'' नामक इस चिट्ठे को मैंने बहुत पहले ही बना लिया, था, लेकिन मेरी लापरवाही के कारण ''चिट्ठाजगत'' में इसका विधिवत ''पंजीकरण'' नहीं हो पाया था. संयोगवश कल ही हुआ. आप कह सकते हैं, कि एक चिट्ठी मैंने बहुत पहले ही लिख ली थी,मगर उसे 'पोस्ट' कल ही किया. कल किया और देखिये कितनी जल्दी आप तक पहुँच भी गई. अब लगता है, कि 'सद्भावना दर्पण'' के माध्यम से मैं अपने गद्यकार को आप तक पहुंचा सकूंगा. इसमे मेरी पत्रकारिता और मेरा गद्य साहित्य दोनों रहेगा. साहित्य और पत्रकारिता दोनों क्षेत्र में सक्रिय रह कर समाज की सेवा करने का विनम्र प्रयास करता रहा हूँ, आप लोगों का प्रोत्साहन मिला तो सिलसिला चलता रहेगा. मेरी कविताओं वाले ब्लॉग को आपने प्यार-दुलार दिया. अब 'सद्भावना दर्पण'' को भी आपकी सद्भावना चाहिए.
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मूर्ति की 'एडवांस बुकिंग
मूर्ख लोग ईमानदारी के साथ समाज-सेवा करते हैं और बुद्धिमान लोग अपनी मूर्तियाँ बनवाने में लगे रहते हैं।
अनेक शोधों के बाद यही निष्कर्ष निकला है, कि ऐसा करने वाले कुछ अतिरिक्त किस्म के समझदार होते हैं। अपने जीवित रहते ही अपनी मूर्तियाँ बनवाने वाले लोग मरने के बाद की तैयारी कर लेते हैं। उनके जीते-जी मूर्ति बन जाने से यह फायदा होता है, कि वे इत्मीनान के साथ मरते हैं। बिल्कुल ही टेंशन-फ्री हो कर। वे तो बेचारे बस, इतना ही चाहते हैं, कि जब कभी वे मर-मुरा जाएँ तो किसी चौराहे पर उनकी मूर्ति-फूर्ति लग जाए।
ऐसे ही एक बुद्धिमान व्यक्ति से एक मूर्तिकार के घर में मुलाक़ात हो गयी। नाम था लतखोरीलाल।
हमने पूछा - ''लगता है, किसी महापुरुष की प्रतिमा बनवाने के लिए आए हुए हैं।''
वे हँस पड़े। बोले कुछ भी नहीं।
हमने पूछा - ''किसकी प्रतिमा बनवा रहे हैं ? भगत सिंह की ? चंद्रशेखर आजाद की ? सुभाषचंद्र बोस की ? या किसी और शहीद की ?''
वे फिर हँस पड़े। कुछ-कुछ शरमाए से। मेरे बहुत कुरदने पर बोले ''अरे, इतने बड़े-बड़े महापुरुषों के नाम लेकर आप मुझे धर्म संकट में क्यों डाल रहे हो भई!''
मैं चौंका। महापुरुष छोटा या बड़ा भी होता है क्या ? फिर भी मैंने पूछा - ''बड़ा महापुरुष नहीं तो क्या, कोई छोटा महापुरुष है क्या, जिसकी प्रतिमा बनवा रहे हैं आप!''
वे फिर भी लजाए-मुसकाए खड़े रहे।
मैंने कहा - ''अरे साब, बेसब्री बढ़ती जा रही है। जल्द ही खुलासा कीजिए न, कि आखिर किस महापुरुष की प्रतिमा बनवाने आए हैं ? अपनी तो बनवाने से रहे। प्रतिमाएँ हमेशा महापुरुषों की ही बनती है। फिर चाहे वह स्थानीय स्तर का,  या फिर राष्ट्रीय स्तर का। वैसे तो महापुरुष केवल महापुरुष ही होता है। वह किसी क्षेत्र के खूँटे से बँध ही नहीं सकता। बहरहाल, अब तो बता दीजिए उस महापुरुष का नाम ?''
वे इस बार बत्तीस दिखाते हुए बोले - ''लत.. खोरी..लाल की।''
मुझे चक्कर आने लगा। खुद को संभालते हुए बोला - ''क्या.. क्या कहा आपने ? लतखोरीलाल ? यानी कि आप ? बाप रे बाप! अपनी ही प्रतिमा बनवा रहे हैं आप!''
लतखोरीलाल तनिक गंभीर हो गए। कहने लगे - ''क्या हम इस लायक नहीं कि हमारी किसी जगह प्रतिमा लग सके?'' मैंने कहा - ''क्यों नहीं, आपके अपने घर में, घर के आंगन में तो लग ही सकती है। इसके लिए मरने की ज़रूरत ही नहीं है। जीते जी लग सकती है प्रतिमा। आप प्रतिमा लगाएं माला चढ़ाने हम आ जाया करेंगे।''
लतखोरी लाल बोले - ''अरे भई, घर में अपनी प्रतिमा लगवाए तो काहे के महापुरुष ? हम तो अपनी प्रतिमा शहर के किसी व्यस्त चौराहे पर ही लगवायेंगे। और वो भी जीते जी।''
''लेकिन अक्सर तो यही देखा गया है कि किसी के मरने के बाद ही प्रतिमा लगती है।''
मेरे प्रश्न पर लतखोरीलाल बोले - ''अरे ये जीना भी कोई जीना है साब! कोई घास ही नहीं डालता! पूछता तक नहीं।''
मैंने कहा - ''भई, पूछ-परख तो उनकी होती है जो कुछ काम् करके दिखाए। आपने कुछ ऐसे काम तो किए नहीं कि लोग आपको घास डालें।'' लतखोरीलाल बोले - ''वाह साहब, आप कहते हैं, हमने कुछ किया ही नहीं! देखिए, जोरदार धंधा किया, डटकर कमाई की। आलीशान घर बनवाया अपने सारे रिश्तेदारों को मालामाल कर दिाय। अभी शहीदों के परिवारों के लिए भी हमने बहुत बड़ी रकम दान की थी।''
''अच्छा, क्या एक लाख ?''
''नहीं, थोड़ा सा कम।''
''पचास हजार ?''
''नहीं, उससे भी थोड़ा सा कम।''
''पच्चीस हजार ?''
''नहीं इससे भी थोड़ा सा कम।''
मैं सोच में पड़ गया। फिर सोचकर बोला - '' इक्कीस हजार ?''
वे चुप हो गए। मैं समझ गया। मेरा अनुमान सही था। थोड़ी देर बाद इधर-उधर देखकर धीरे से बोले - ''ग्यारह हजार तो बहुत बड़ी रकम होती है। मैंने...''
बीच में ही टोक दिया मैंने - ''हाँ, पाँच हजार रुपये दिया होगा आपने। करोड़पति हैं। अपना नाम अमर करना चाहते हैं। फोकट में थोड़े न होगा नाम। फिर प्रतिमा लगाने की पिपासा है आपके मन में।''
वह फिर बोला - ''थोड़ा-सा कम कर लीजिए इस राशि को।''
मैंने कहा - ''दो हजार ?''
वह बोले - ''थोड़ा कम।''
''एक हजार एक ?''
''थोड़ा-सा कम।''
''पाँच सौ एक ?''
''थोड़ा और कम।''
''ओफ्फो, एक सौ एक।''
''बस, पहुँच रही हे हैं आप।''
''इक्यावन रुपये मात्र।''
''बस, बस पहुँचने ही वाले हैं।''
''अरे, हद हो गई भई, अब तो मैं गलत हो ही नहीं सकता। इक्कीस रुपये तो दिया ही होगा आपने।''
''हाँ, बिल्कुल ठीक अनुमान लगाया आपने।'' लतखोरीलाल बोले - ''आप बुद्धिजीवी हैं। गलत तो हो ही नहीं सकते। जानते हैं, इतनी बड़ी राशि हमने मोहल्ले के सेठों से दो-दो रुपये चंदा करके एकत्र की थी। अरे, इस देश के लिए हमारा भी कोई फर्ज बनता है। अब आप ही बताएँ,  इतनी सेवा करता हूँ देश की। क्या चौराहे पर मेरी प्रतिमा भी नहीं लग सकती ?''
लतखोरी की बातें सुनकर मैं बुरी तरह उखड़ चुका था। कहना पड़ा - ''हाँ भई, आप जैसे महापुरुषों की प्रतिमा अब पूजने को बची हैं। ऐसा करते हैं फाँसी पर झूल जाने वाले किसी शहीद की जगह आपकी प्रतिमा अभी से लगा देते हैं।'' वह खुश हो गये। कहने लगे - '' ऐसा ही हो जाए तो मजा आ जाए। लेकिन अभी रहने दें। मरने के बाद ही प्रतिमा लगे तो मजा आ जाएगा।''
मैंने कहा - ''तब आप मजे के लिए कहाँ रहेंगे ?'' वह बोले - ''स्वर्ग-लोक में।''
मैं हँस पड़ा - ''बड़ा कान्फीडेंस है आपको!''
वह बोले - ''हमारा सब कुछ एडवाँस बुकिंग में चलता है। मूर्ति एडवाँस में, होटलें एडवाँस बुकिंग में, टाकीजों में एडवाँस बुकिंग और दान-दक्षिणा, भजन-पूजन के सहारे स्वर्ग में एडवाँस बुकिंग।''
मुझे चक्कर आ ही गया। गिर पड़ा। होश में आया तो देखा घर में था। लतखोरीलाल छोड़ गए थे। घर वालों ने बताया कि वे पाँच रुपइये का चमकता हुआ सिक्का दे गये हैं। कह रहे थे कि किसी की प्रतिमा लगवानी है। उसी का एडवाँस है।
मुझे फिर से चक्कर आने लगा।

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

मुख्यधारा का सवाल

राजधानी में 24-25 अप्रैल को ''अनुसूसिच जनजातियाँ ,कल आज और कल'' विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन हुआ। इसमें देश भर से वे लोग पधारे जिन्होंने जनजातियों पर गहन अध्ययन किया है। कुछ तथाकथित विद्वानों ने जब यह बात उठाई कि अनुसूचित जनजातियों को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोडऩा चाहिए तो उनके इस कथन की बधिया उधेड़ दी गई। शुरुआत तो राज्यपाल महोदय ने ही की। उन्होंने आदिवासी भाइयों की मुख्यधारा को शहरी मुख्यधारा से बेहतर बताया। बाद में कुछ जनजातीय विद्वानों ने इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मुख्यधारा क्या है, जो शहर का भ्रष्ट जीवन है, क्या वह मुख्यधारा है? या फिर मुख्यधारा वह है, जहाँ एक संस्कृति है, परम्परा है, जल-जंगल-जमीन को अपना समझने का संस्कार है? मुख्यधारा में शहरी लोगों को आना चाहिए, जनजातियों को नहीं। और भी अनेक बातें उठी, लगा कि जनजातियों को लेकर अब देश में गंभीर-विमर्श का समय आ गया है। विकास की धारा से उन्हें जोडऩा तो है, लेकिन यह भी ध्यान रखना है, कि वे अपनी जड़ों से ही न काट दिए जाए। यह बात भी सामने आई कि हर क्षेत्र की जनजातियों के अनुरूप ही योजनाएँ बननी चाहिए क्योंकि नागालैंड के आदिवासी की अपनी संस्कृति है, तो बस्तर के आदिवासी की अपनी सांस्कृतिक पहचान है।
दिग्विजय सिंह  पर भड़के मुख्यमंत्री
अनुसूचित जनजातियों पर आयोजित सेमिनार के समापन पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी पहुँचे। उन्होंने बस्तर के नक्सलवाद पर गंभीर विचार विमर्श करते हुए उनके समर्थक बुद्धिजीवियों को जम कर लताड़ा। उन्होंने कहा कि दिल्ली में बैठे ये बुद्धिजीवी अंगरेजी अखबारों में लिखते हैं, अंगरेजी वाले ही इन्हें पढ़ते हैं। असलियत से इनका कोई सरोकार नहीं है। माओवाद इनके लिए एक फैशन की तरह है। मुख्यमंत्री का इशारा मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह  की  ओर था. जिन्होंने एक अंगरेजी समाचार पत्र में नक्सलवाद के बहाने रमन-सरकार को कोसने की कोशिश कि है. आज बस्तर में विकास अवरुद्ध हो गया है, इसके दोषी नक्सली हैं। सड़कें नहीं बन पा रही, स्कूल नष्ट हो गए। सृजन की जगह विध्वंस पनप गया। इन सबको समझने की जरूरत है। मुख्यमंत्री के भाषण से सबको यही लगा कि उन्होंने दिल से अपनी बात कही, जिसमें जनजातियों के विकास न होने की पीड़ा साफ नजर आ रही थी। दिल्ली से पधारे चिंतक इंद्रेशकुमार ने भी जनजातियों के वैभव पर प्रकाश डाला और विस्तारपूर्वक समझा कि किस तरह दूसरे धर्मवालों ने उनके साथ छल किया।
कलेक्टरों को सिर चढ़ाना बंद हो
पिछले दिनों रायपुर के कलेक्टर के खिलाफ काँग्रेसी इतने उत्तेजित हुए कि राज्यपाल को जा कर शिकायत कर दी। कलेक्टर जनता का नौकर है। ये और बात है कि उसे नौकरशाह कह दिया जाता है। यानी नौकर तो है मगर शाही है। शाही होने का मतलब यह नहीं, कि  वह जनप्रतिनिधियों की अवहेलना कर दे। काँग्रेसी कुछ मुद्दों पर कलेक्टर से बात करना चाहते थे, कांग्रेसी समूह में गए थे, तो कलेक्टर ने कलेक्टरी दिखाते हुए फरमाया कि पाँच लोग आ कर चर्चा करें। कांग्रेसियों ने कहा हमारे साथ आए बाकी लोग भी मिलेंगे। कलेक्टर महोदय राजी नहीं हुए तो काँग्रेसी नाराज हो कर लौट गए। राज्यपाल से मिले और शिकायत की। अब राज्यपाल कलेक्टर को बुला कर समझाइश देते हैं, या नहीं, ये अलग बात है लेकिन मुद्दा यह है कि आखिर कलेक्टरों के हौसले इतने बुलंद क्यों रहते हैं। जनप्रतिनिधियों से उसे मिलना ही चाहिए । पाँच हो या पचास। लोकतंत्र में लोक ही ताकत है। लोक के बगैर कुछ नहीं। कलेक्टर कोई राजा-महाराजा तो है नहीं कि उसकी मर्जी चलेगी। दरअसल हमारा सिस्टम ही इतना लचर है, कि हमने कलेक्टर पद को सिर पर चढ़ा कर रखा है। जब तक ऐसा रहेगा, कोई भी कलेक्टर अपनी अकड़ दिखाएगा ही। जरूरत है, सिस्टम में बुनियादी परिवर्तन की। कलेक्टरों को भी यह समझना चाहिए के वे ब्रिटिशकाल में नहीं, स्वतंत्रकल में रह कर नौकरी कर रहे है।
ग्राम सुराज के सबक
ग्राम सुराज का पहला चरण समाप्त हो गया है लेकिन इसने सरकार को सोचने पर भी मजबूर किया है। अगर सरकार सोचे तो। इस बार अनेक जगहों पर सुराज दल का विरोध हुआ। कहीं-कहीं तो अधिकारियों को बंधक ही बना लिया गया।  दरअसल लोग त्रस्त हैं। घोषणाएं होती है, मगर उनको पूरा नहीं किया जाता । मुख्यमंत्री को भी कुछ जगह ग्रामीणों की नाराजगी झेलनी पड़ी। ग्राम सुराज में जो घोषणाएँ होती है, उन्हें निर्धारित समय में ही पूर्ण करना चाहिए, तभी तो गाँव वालों को भी लगेगा, कि सुराज आ गया है। मुख्यमंत्री घोषणा कर के चले जाए और ग्रामीण भाई अफसरों के पीछ-पीछे घूमते रहे, यह नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि के कहे की प्रतिष्ठा होनी चाहिए। अधिकांश अफसर बदमाशी करते हैं। वे सरकार की छवि को नुकसान पहुँचाने के लिए जनप्रतिनिधियों द्वारा की गई घोषणाओं को पूरा करने में जानबूझ कर विलंब करते हैं। इस बार ऐसा न हो। ग्राम सुराज के दौरान ग्रामीणों ने जो मुद्दे उठाए हैं, उन्हें पहली प्राथमिकता के साथ पूरा करना चाहिए।
मंत्रियों-अफसरों की विदेश यात्राओं पर लगाम
ये अच्छा निर्णय लिया मुख्यमंत्री ने । सरकारी खर्चे पर विदेश जाने की परम्परा-सी चल पड़ी थी। विदेश जा रहे हैं, किस लिए विकास का अध्ययन करने। कुछ जनपतिनिधि न तो ठीक से हिंदी बोल पाते हैं,न अंगरेजी, इस कमी को शातिर-चालाक अफसर समझते हैं। वे मंत्री को पटा कर उनके साथ लग जाते हैं। मंत्री की भी ऐश और अफसर की भी। ये लोग विदेश जाते हैं, और राज्य का करोड़ों रुपए स्वाहा कर देते हैं। जरा पता तो किया जाए कि पिछले कुछ वर्षो में विदेश जाने वाले मंत्री-अफसरों ने लौट कर आखिर सरकार को  कोई भावी योजना दी कि हम फलां देश की तरह यहाँ भी ये-ये काम करें? शायद नहीं। विदेश यात्रा का ज्यादातर मतलब करके ऐशोआराम ही होता है। इसलिए मुख्यमंत्री ने समझदारी से काम लिया। अभी सबकी विदेश यात्राएँ बंद। कम से कम तीन साल तो बंद ही रहनी चाहिए।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

राजधानी के रंग

डीजीपी का नक्सलवाद....
छत्तीसगढ़ के डीजीपी कवि भी हैं। कभी-कभार बोलते हैं और फँस जाते हैं। पिछले दिनों राँची गए और पत्रकारों से बात कहते हुए कह दिया कि नक्सलवाद कोई समस्या नहीं, यह एक विचारधारा है। अब जो कुछ छपा है, उसे लेकर काँग्रेसी हंगामा मचा रहे हैं। मांग कर रहे हैं कि डीजीपी को हटाया जाए क्योंकि ये नक्सल समस्या को लेकर गंभीर नहीं है। बात एक हद तक सही भी है। नक्सलवाद कभी रहा होगा एक विचारधारा। लेकिन अब तो यह केवल हत्याधारा है। इसे विचारधारा का नाम देना ही गलत है। यह एक समस्या है। और इसे मिटाने की ही बात होनी चाहिए। विचारधारा-फारा की बातें कह कर बौद्धिकता दिखाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। मीडिया से जब बात हो तो दो टूक कहना चाहिए, कि हम इस समस्या से पार पा लेंगे। आपरेशन ग्रीन हंट चल रहा है। अब इसे विचारधारा है,जैसे जुमलों के सहारे किनारे करने की कोशिश करने का दुष्परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा। उम्मीद है, वे भविष्य में फूँक-फूँक कर ही कदम रखेंगे। एक तो मीडिया कहाँ धँसा दो, उस पर विपक्ष तो बैठा ही रहता है, खिंचाई करने, इसलिए विश्वरंजन जी, सावधानी जरूरी है। क्योंकि जीवन और कविता में अंतर होता है।
चाटुकारिता की हद है....
सचमुच राजनति में चाटुकारिता की हद हो जाती है कभी-कभी। अब देखिए, पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को कुछ काँग्रेसी राज्यसभा में पहुँचा कर सीधे मंत्री भी बनाना चाहते हैं। राहुल गाँधी को फेक्स भी कर दिया भाई लोगों ने। ये तो अच्छा हुआ, कि खुद जोगी जी ने इस कृत्य की निंदा कर दी। वे समझदार हैं। लेकिन चमचों को कौन समझाए, कि कुछ करने के पहले सोच तो लो, कि क्या कर रहे हो। अभी जोगी-पुत्र पर आपराधिक मामला चला। अभी उसे लम्बी लड़ाई लडऩी है। संघर्ष करना है। आसानी से उपलब्धियाँ नहीं मिल जातीं। यह बात उनको और चाटुकारों को समझ लेना चाहिए। लेकिन जब चाटुकारिता ही करनी है, तो विवेक काम नहीं करता।
राजनीति राजधानी के विकास को न ले डूबे
राजधानी में काँगे्रेस का महापौर है और भाजपा का सभापति। अब दोनों दलों के लोग अपनी-अपनी पार्टी की राजनीति से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। उनको यह बात समझ में ही नहीं आ ही है, कि चुना तक राजनीति चलनी चाहिए। अब तो मिल-जुल कर विकास करने का समय आ गया है। लेकिन नहीं, किसी न किसी बहाने अपनी ताकत दिखाने का खेल चल रहा है। शर्म की बात है, कि नगर निगम की बैठक को शांतिपूर्वक संपन्न कराने के लिए पुलिस बुलानी पड़ती है। विकास के रास्ते में अगर राजनीति स्पर्धा आड़े आएगी, तो यह दोनों दलों के लिए ठीक बात नहीं, क्योंकि जनता दोनों को देख रही है। राजधानी को विकास की सख्त जरूरत है। ऐसे समय में आपसी झगड़े के कारण अनुदानों में दिक्कतें आ सकती हैं। कोई ठोस निर्णय नहीं हो पाएगा। इसका बुरा असर पड़ेगा विकास पर।
दारू के खिलाफ लामबंद राजधानी
एक अरसे बाद ऐसा हो रहा है कि इन दिनों राजधानी के कुछ हिस्से में दारूबंदी के खिलाफ मुहिम जारी है। यह जरूरी भी है। कहीं विद्यालय के पास, तो कहीं किसी धर्मस्थल के पास दारू की दूकानें खुल गई हैं। लोगों का आना-जाना प्रभावित होता है। बेहतर तो यही होगा कि सरकार ट्रांसपोर्ट नगर आदि की तरह शहर के बाहर कहीं दारूनगर ही बसा दे। शहर की सारी शराब दूकानें शहर से बाहर ही रहें। जिन्हें पीना-पिलाना है, वे बाहर जाएँ और  टुन्न-फुन्न हो कर वहीं गिरे-पड़े, गाली-गलौज करें। जो भी करना हो, शहर के बाहर करें। शहर में दारू दूकानें होनेके कारण कदम-कदम पर शराबी नजऱ आते हैं तो लगने लगता है, यह रायपुर नहीं दारूपुर है। उम्मीद है, कि प्रशासन जनता की सुनेगा और जहाँ-जहाँ लोग आंदोलित हैं, वहाँ-वहाँ की शराब दूकानें फौरन बंद होंगी। कुछ जगह दूकानें सीलबंद कर दी गई हैं, यह अच्छी बात है।
मंत्री के तमाचे की आवाज
प्रदेश के एक मंत्री ने एक अफसर को तमाचा क्या जड़ दिया, उसकी आवाज़ अब तक गूँज रही है। अफसर-कर्मचारी एकजुट हो कर मंत्री की निंदा कर रहे हैं, उसे हटाने की मांग भी कर रहे हैं। लेकिन क्या यह संभव हो पाएगा? कायदे से तो होना चाहिए। मंत्री को अपने किए पर खेद भी व्यक्त करना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में सामंती प्रवृत्ति नहीं चलेगी। न मंत्रियों की न अफसरों की । यहाँ के चंद अफसर भी ऐसे हैं जो अपने को सबसे ऊपर समझते हैं। खैर, तमाचाशुदा अफसर की बात करें तो कहा जा सकता है, कि उसने  अगर मंत्री का कहना नहीं माना तो वह बेशक अपराधी है, उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन दादागीरी दिखाना गलत है। अगर जनप्रतिनिधि इस तरह की हरकत करेंगे, तो उन्हें प्रशासन से सहयोग नहीं मिलेगा। वैसे भी बहुत से अफसर भयंकर भ्रष्ट और बदतमीज हो चुके हैं। उन्हें सुधारने की जरूरत है। लेकिन तमाचे से वे नहीं सुधरेंगे। उन पर लिखित रूप में कड़ी कार्रवाइयाँ की जानी चाहिए। तमाचा मार कर लोकतंत्र का अपमान नहीं करना चाहिए। रामविचार जी, विचार कीजिए और पद की गरिमा बनाए रखिए। 
भूमाफिया चरागान भी हजम कर रहे
राजधानी में वैसे भी गोचर भूमि नहीं बची। शहर के बाहर 327 एकड़ जमीन चरागान के लिए रखी गयी थी, अब इस जमीन पर कुछ नेतानुमा लोगों ने कब्जा कर लिया है। गो सेवक बेचारे मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी कोई सुने तब न। हार कर ये लोग राज्यपाल से मिले । अब देखना यह है कि राज्यपाल महोदय की अनुशंसा पर कब तक कार्रवाई होती है। अंतरराष्ट्रीय कृषि-गो पर्यावरण संरक्षण परिषद के वयोवृद्ध अध्यक्ष झूमरलाल टावरी ने भूमाफियाओं के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। वे गो संरक्षण के लिए समर्पित हैंं। ऐसे अनेक लोग हैं, जो गाय को माँ की तरह जीने का अवसर देना चाहते हैं। लेकिन मनुष्य इतना स्वार्थी हो चुका है, कि अब गाय केवल सड़कों पर भटकती रहती है। चारा नहीं मिलता तो बेचारी कचरा खाती है और पॉलीथिन हजम करके एक दिन मौत का शिकार हो जाती है।
जननायक के महाप्रयाण पर...
रायगढ़ जिले के गौरव और अपना पूरा जीवन वहाँ की खुशहाली के लिए लगा देने वाले जननायक रामकुमार अग्रवाल जी नहीं रहे तो राजधानी में भी उनके चाहने वाले दुखी हो गए। सर्वोदय विचारधारा से जुड़े लोगों ने पिछले दिनों एक बैठक कर श्री अग्रवाल के संघर्षों को याद किया। यह भी चिंता व्यक्त की गई कि उनके जाने के बाद अब उनकी तरह जुझारू तेवर वाले लोग सामने आएंगे कि नहीं? उम्मीद है, कि चार बार विधायक रह चुके श्री अग्रवाल ने रायगढ़ के विनाश पर तुली ताकतों के विरुद्ध जो अभियान छेड़ रखा था, उन्हें आगे बढ़ाया जाएगा। इन पंक्तियों के लेखक ने श्री अग्रवाल के व्यक्तित्व पर एक गीत लिखा है। (पूरा गीत तो आप एक-दो दिन बाद पढ़ सकेंगे) फिलहाल दो पंक्तियाँ पेश हैं-
अंधकार में जले हमेशा बनकर एक मशाल
अमर रहा है, अमर रहेगा, रायगढ़ का लाल।

मंगलवार, 2 मार्च 2010

छ्त्तीसगढ़ की डायरी

  राज्यपाल-मुख्यमंत्री भी आदिवासी मांग उठी.....
आदिवासी जब एक होते हैं तो क्या होता है?
क्या होता है, तो गैर आदिवासी नेताओं के मन में एक आशंका बलवती होने लगती है, कि कहीं वे सत्ता हथियाना तो नहीं चाहते। जी हाँ, पिछले दिनों जब राजधानी में आदिवासियों ने महारैली निकाली तो गैर आदिवासी नेता यही समझ रहे थे। लेकिन शायद ऐसा था नहीं। आदिवासी अपना अधिकार माँगने के लिए एकजुट थे। इस रैली में भाजपा और काँग्रेस के भी नेता शामिल हुए। सरकार के कुछ मंत्री- विधायक भी अगुवाई कर रहे थे। मांग यह थी कि सरकार आदिवासियों को बत्तीस फीसदी आरक्षण दे। एक वक्ता ने तो यह मांग भी रख दी कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री भी आदिवासी हों। नकली-असली आदिवासियों की भी चर्चा हुई और छठी अनुसूची को लागू करने की मांग भी उठी। कुल मिला कर आदिवासियों ने यह साबित कर दिया कि वे एक जुट हैं और अपने हक के लिए लडऩा जानते हैं। अगर इनकी ओर गंभीरतापूर्वक ध्यान नहीं दिया गया, तो कल को दृश्य कुछ और हो सकता है। आदिवासियों को भरपूर महत्व मिलना ही चाहिए। उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अब आदिवासी भी समय के साथ चल रहे हैं। रैली में शामिल कुछ आदिवासी मोबाइल फोन से गोठियाते पाए गये।
अब कैसे कह दें कि शराब है खराब.. ?
सरकार या प्रशासन भला कैसे कह दें कि शराब एकदम से खराब है। जब रायपुर जिले में ही शराब के ठेके देने के लिए जो फार्म बिके उसी से सरकार को एक सौ दस करोड़ रुपये की कमाई हो गई। लाइसेंस फीस से दो सौ पच्चीस करोड़ मिलेंगे वो अलग। ये तो एक जिले की कमाई है। शराब सेजो कमाई होती है, उसे देख कर किसी भी सरकार में यह साहस नहीं हो पाता कि वह शराब बंदी लागू कर। आखिर इतनी तगड़ी कमाई जो होती है। फिर भी यह मांग उठती रहती है, कि प्रदेश में शराबबंदी हो। पूर्ण शराबबंदी न होतो कम से कम जिस इलाके में मांग उठ रही है, वहाँ तो शराब दुकानें न खोली जाएँ। हालांकि शराब दूकानों के विरोध को भी बड़ी चालाकी से निबटा दिया जाता है। कुछ समय के लिए शराब दूकानें बंद होती है, फिर दूसरी जगह शुरू हो जाती हैं। बहरहाल, सरकार तो खुश है, कि उसकी कमाई हो रही है।
झुग्गीमुक्त राजधानी का सपना...
राजधानी में रायपुर विकास प्राधिकरण द्वारा बनाए गये 972 फ्लैट गरीबों को दे दिए गये। इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ रमन. सिंह ने कहा कि पाँच सालों में रायपुर को झुग्गीमुक्त कर दिया जाएगा। सचमुच..? अगर ऐसा हो सका तो वह स्वर्णिमकाल ही होगा। झुग्गियाँ शहर के गाल पर तमाचा हैं, बदनुमा दाग सरीखी हंै। असमता को दर्शाने वाली होती हैं। एक तरउ गगनचुंबी अट्टालिकाएँ और दूसरी तरफ गंदगी के बीच बजबजाती झुग्गियाँ..? इस लिहाज से रायपुर ही क्यों, पूरे छत्तीसगढ़ के शहरों को झुग्गियों से मुक्त करने का सपना देखा जाना चाहिए। हर गरीब को पक्के मकान मिले। केवल घर ही पक्के न हों, आस-पास स्वच्छता हो, सड़कें ठीक हों। मतलब यह कि गरीबों को भी जीने का हक है। और इस दिशा में अगर एक पहल शुरू हुई है तो उसका स्वागत ही किया जा सकता है।
लॉटरी के जाल में न फँसें..
जब से मोबाइल और इंटरनेट का ज़माना आया है, तब से ठगों ने इस माध्यम को भी अपना लिया है। अब मोबाइल पर एसएमएस आते हैं और ईमेल के जरिए संदेश कि आपको यूके लॉटरी या और और किसी कंपनी की ओर से एक- दो-तीन करोड़ की लॉटरी निकली है। बताया जाता है कि आपके मोबाइल नंबर या आपके ईमेल को हमने चयनित किया है। इन पंक्तियों के लेखक को भी पिछले छह महीने में अनेक मेल प्राप्त हो चुके हैं। उन सब का हिसाब लगाय जाए तो दस- बीस करोड़ मेरे पास भी आ जाते। लेकिन मैं इन ईमेलों को फौरन मिटा देता था। लेकिन कवर्धा का एक युवक फँस गया। उसे तीन लाख का चूना लग गया। अब तीन करोड़ मिले हैं, तो सामने वाली पार्टी अगर कस्टम शुल्क कोरियर, शुल्क और रजिस्ट्रेशन फीस आदि के लिए पैसे माँगेंगी तो  कोई भी सोचगा, कि चलो दे दो। तीन करोड़ मिल रहे हैं, तो तीन लाख न सही। लोग पैसे भेज देते हैं और बाद में पछताते हैं। इसलिए सावधान इन ईमेलों से। लालच बुरी बला...।
जन प्रतिनिधियों की अनदेखी
छत्तीसगढ़ के संदर्भ में अनके बार यह लिखा जाता रहा है कि, यहाँ जनप्रतिनिधियों को महत्व नहीं दिया जाता। अनेक  ऐसे उदाहरण गिनाए जा सकते हैं। ताजा उदाहरण माध्यमिक शिक्षा मंडल का है। इसमें कुछ विधायक भी सदस्य हैं। महत्वपूर्ण निर्णय लेने हों तो उनकी उपस्थिति भी होनी चाहिए, लेकिन माशिमं के अफसर इसकी जरूरत ही नहीं समझते। इसीलिए तो आठ महीने में एक बार भी किसी विधायक को न तो बुलाया गया, न उनसे कोई सलाह ही ली गई। निर्णय हो गये। जब विधायकों ने शिकायत की तो माशिमं के अफसर अध्यक्ष ने अधीनस्थों की खिंचाई की, गोया उन्हें कुछ पता ह न हो। यह चालाकियाँ बहुत हो रही हैं। इस मामले में विधायकों को ही सतर्क होना चाहिए। अपने हक के लिए वे खुद खड़े हों। और जो भी उनकी अनदेकी करे, उसको उसकी हैसियत दिखा दे। यहाँ लोकतंत्र है, अफसर तंत्र नहीं। क्या हमारे जनप्रतिनिधि जागरूक होंगे।
धंधा अपहरण-फिरौती का
जी हाँ, यह अब उद्योग की तरह विकसित हो रहा है। राजधानी में तो गाहेबगाहे इस धंधे की खबरें मिलती ही रहती हैं, अब आसपास भी ये वायरस फैल रहे हैं। पिछले दिनों धमतरी में एक छात्रा का अपहरण कर लिया गया। अपहर्ता लड़के हैं और जगदलपुर केहैं। उन्होंने फिरौती के रूप में दो लाख माँगे। नये-नये होंगे। सामने वाले की हैसियत का भी पता होगा, इसलिए केवल दो लाख की मांग की। अभी अपहर्ताओं का पता नहीं चल सका है लेकिन बच कर कहाँ जाएँगे। किंतु एक बात जो सामने आ रही है, कि अपहरण का धंधा अब फैलता जा रहा है। यह चिंता की बात है।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

छत्तीसगढ़ के मीडिया का स्याह चेहरा....:

छत्तीसगढ़ में मीडिया का जो चेहरा बनाता जा रहा है, उसे देख कर रोना आता है.
अब सच को सच लिखना ही कठिन है, बाकी आप कंडोम के विज्ञापन छापे, लिंगवर्धक यंत्र के विज्ञापन भी छाप सकते है, अंधविश्वास फैलने वाली खबरे, हो या फ़िल्मी दुनिया कि नंगी सब चलेगा, लेकिन कडवी सच्चाइयां नहीं चलेंगी..पुलिस अत्याचार की  खबरे, दबा दी जायेंगी, नेता और अफसरों के भ्रष्टाचार की खबरे भी दबा कर दी जायेंगी. यह सब इसलिए लिखना पड़ रहा है, कि पिछले दिनों रायपुर के एक अफसर के यहाँ आयकर विभाग का छापा पडा, अरबों की दौलत का पता भी चला. यह भी पता चला कि बाबूलाल अग्रवाल नामक इस अफसर ने अनेक गुमनाम खाते खोल कर रखे थे. नौकर-चाकरों के नाम पर लाखो रुपये जमा थे. सब कुछ सामने आ रहा है, लेकिन यहाँ मीडिया- एक-दो को छोड़ दे तो-अधिकाँश की निर्लज्जता देखते ही बन रही है. अफसर के विरुद्ध आने वाली खबरों को दबाया जा रहा है. साफ़-साफ़ समझ में आ रहा है. ये टीवी चेनल....? दो कौड़ी की खामारों को दिन भर दिखाते रहेंगे, सरपंच ५० रुपये कि रिश्वतखोरी करते पकड़ा जाएगा, तो दिन भर खबर चलेगी, या डाग शो का आयोजन होगा तो सचित्र खबर दिखाई जाती रहेगी, लेकिन देश को खोखला करने वाले कलंकी अफसरों की काली करतूतों, का कोई विस्तृत समाचार नही दिखाया गया. हाँ, एक लाईन की खबर (स्ट्रिप्स) ज़रूर दिखाई जा रही है. गोया बहुत बड़ा काम किया जा रहा है. ऐसा क्यों...? एक ही कारण है कि पूरा अधिकाँश लोग बीके हुए है. यह भी आशंका व्यक्त की जा सकती है, कि जहाँ इस अफसर के खिलाफ ज़ोरदार ढंग से खबरें छाप रही है, उसका एक कारण यह भी हो सकता है, कि खबरें न छापने का  सौदा पता ही न हो.
छत्तीसगढ़ के मीडिया का निरंतर पतन मैंने देखा है. यह सुनी हुई बात नहीं, मेरे अनुभव की बातें है, मै ३० सालों से सक्रिय पत्रकारिता में हूँ. अनेक बार मेरे सामने भी प्रलोभनों के अवसर आये, लेकिन पत्रकारिता की शुचिता को घोल पी चुके हम लोग बिक नहीं सके, लेकिन अब की नई पीढ़ी आराम से बिक जाती है. (वैसे बिकने वाले होशियार लोग तो उस वक्त भी थे...) बिके भी क्यों न..? जब अखबार मालिक बिका हुआ है, अखंड धन्धेबाज़ है, सौ ठो मक्कारियां कर रहा है, तो पत्रकार बेचारा नैतिकता की लाश कब तक ढोयेगा...? वह भी '''मुख्यधारा'' में बहने लगता है. बस इसी का नतीजा है कि खबरें दबा दी जाती है. यहाँ छत्तीसगढ़ में यही हो रहा है. बाहर भी यही हो रहा है. यहाँ की सरकार भी कमाल की है. अब तक भ्रष्ट अफसर पर कर्रवाई नहीं की गई, यह भी दुखद है. ऐसी लेटलतीफी सरकार को भी कटघरे में खडा कर देती है.
अगर हम एक मजबूत लोकतंत्र को देखना चाहते है तो यह बेहद ज़रूरी है, कि भर्स्ट ताकतों पर तत्काल कार्रवाई हो. हैरत तो यह भी होती है, कि विपक्ष ने मुर्दा शांति से भरा प्रतिवाद ही किया, प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दे, निंदा कर दी, बस हो गया काम... धरना-प्रदर्शन होना था, रास्ता जाम की नौबत आनी चाहिए थी. जिस तेजी के साथ भ्रष्ट चेहरे सामने आ रहे है, उस हिसाब से छत्तीसगढ़ के लोगो को आंदोलित हो कर सामने आना चाहिए, लेकिन यहाँ पे सब शान्ति-शान्ति है. मैंने कभी लिखा था-
बहरें सुन लें इसीलिये तो शोर मचाना पड़ता है
रोज़ सुबह के लिए सूर्य को लहू बहाना पड़ता है.
कब तक मुर्दों जैसा हमको जीना होगा बस्ती में,
ज़िंदा है तो इन्कलाब का रूप दिखाना पड़ता है.
और भी कुछ शेर है इसमे . फिलहाल इतना ही काफी है. दरअसल ब्लॉग लेखन की त्रासदी यही है, कि लिखने का अंतत असर क्या होगा..?
कौन पढ़ेगा?
किसके लिए लिखें..?
होना-जाना तो कुछ नहीं है. फिर भी मन की पीड़ा को स्वर मिल जाता है. भड़ास ही सही शब्द है. चलिए, लोग पढ़े, समय के दर्द को समझे, कहीं कोई चेतना जगे, बर्बरता, बदमाशियां, भ्रस्टाचार आदि के खिलाफ लोग जगे, एक नैतिक लोकतंत्र बने, इसी कामना के साथ.... 

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी-3

छत्तीसगढ़ के घाट पर, भई अफसरन की भीर
रोज़ यहाँ रूपया घिसैं,घर सब खाए खीर..
अभी पिछले दिनों रायपुर में एक आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के यहाँ छापा मारा गया तो अरबों की संपत्ति का पता चला। इससे पता चलता है, कि हमारे अफसर कितने समृद्ध हैं। देश में एक अच्छा संदेश जाता है, कि जिस राज्य के अफसर अरबों की कमाई करने वाले हों, उस राज्य की जनता भी जरूर सुखी-सम्पन्न होगी। आईएएस के यहाँ छापे से पता चला कि उनके नौकर-चाकर के नाम पर भी लाखों रुपये जमा है। बताइए, ऐसा समाजवाद चल रहा है, और देश को पता ही नहीं, कि साहब तो मालामाल हो ही रहा है, उसके नौकर भी फल-फूल रहे हैं। (अब नौकर-नौकरानियों को इस बात की खबर न हो, तो कोइ क्या कर सकता है)छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से ही यहाँ पदस्थ अफसर समझ गए थे, कि ये तो स्वर्ग है। लूटे जाओ। अधिकांश आइएएस  या दीगर अफसरों ने इस राज्य को लूटगढ़ में तब्दील कर दिया है। एक छापे से अरबों की सम्पत्ति का खुलासा हुआ। अभी तो यह शुरुआत है। आयकर विभाग को अपना अभियान जारी रखना चााहिए। जनता को पता तो चले कि आखिर राज्य को चूसने वाले अफसर कितने हैं।
छत्तीसगढ़ के घाट पर, 
भई अफसरन की भीर,
रोज यहाँ रूपया घिसैं, 
घर सब खाए खीर..
भ्रष्टाचार का खेल....

छत्तीसगढ़ के भोलभालेपन को केवल बड़े अजगरों उर्फ अफसरों ने ही नहीं समझा है, छोटे-छोटे अफसर भी समझ चुके हैं, कि यहाँ तो भ्रष्टाचार की गंगोत्री बहाई जा सकती है। विभाग कोई भी हो, वहाँ खुला खेल फर्रुखाबादी चल रहा है? ऐसा राम-राज कहीं नहीं होगा। खरीदी में, निर्माण कार्यों में डट कर चल रहा है भ्रष्टाचार। लोग पकड़ में भी आ रहे हैं, कुछ फरार भी है, लेकिन प्यार  किया तो डरना क्या? अभी भी खेल जारी है। मौके का फायदा उठा कर काँग्रेस भी सामने आ गई(गोया उसके राज में सब कुछ ठीक-ठाक था। लोग जानते हैं कि उस दौर में भी भ्रष्टाचार चरम पर था) काँग्रेस ने मंत्रियों एवं अफसरों की सम्पत्ति सार्वजनिक करने की माँग की है। यह अच्छी पहल है। हालांकि यह भी सत्य है कि जो कुछ सार्वजनिक होता है, वह ऊँट के मुँह में जीरा की तरह होता है, लेकिन कुछ तो होता है। जनता इतने से ही संतुष्ट हो जाती है। बहरहाल करोड़ों की कमाई करने पर आमादा तंत्र से कौन ये सब काम करवा पाएगा, भगवान जाने। मुख्यमंत्री से ही उम्मीद है कि वे कुछ करेंगे।
स्वागतेय है यह घटना
 राजधानी के पास के शहर दुर्ग की घटना का स्वागत किया जाना चाहिए। वहाँ के मशहूर स्वतंत्रता सेनानी और छत्तीसगढ़ी साहित्यकार निरंजनलाल जी गुप्ता के निधन के बाद उनकी बेटी और बहुओं ने उनकी अर्थी को काँधा दिया। बेटी ने मुखाग्नि भी दी। यह बड़ी बात है। अमूमन ऐसा होता नहीं है। परम्परा भी नहीं है। लेकिन गुप्ता जी अंतिम इच्छा यही थी। उनके जाने के बाद एक नया इतिहास लिखा गया। ठीक बात है, आखिर नारियाँ अपने परिजन को कंधा क्यों नहीं दे सकती? वे भी तो अपने परिजन के लिए उतनी ही आत्मीय थी, जितने घर के दूसरे पुरुष? औरतों को भी हक मिलना चाहिए। इस दृष्टि से गुप्ताजी के परिवार ने जो कुछ किया उसका स्वागत हो रहा है। गुप्ताजी नारियों को आगे लाने की कोशिश किया करते थे। उनकी रचनाएँ इस बात का सबूत हैं। कब तक समाज में यह प्रवत्ति बनी रहेगी कि मृत्यु के समय अंतिम संस्कार से महिलाओं को ही दूर रखा जाए। महिलाएँ कमजोर नहीं होती।
ग्रामीण खेलों का भी संरक्षण हो
 आजकल क्रिकेट को क्रेज इतने जोरों पर है कि हाकी जैसे खेल तक हाशिये पर चले गए हैं, तब ग्रामीण या पारम्परिक लोक खेलों को पूछता ही कौन है लेकिन ऐसी बात नहीं है। राजधानी में पिछले दिनों लोक खेलों का  आयोजन किया गया। इसमें लोगों ने सोत्साह भाग लिया। लोक खेल एसोसिएशन के अध्यक्ष चंद्रशेखर चकोर इस आयोजन में आठ जिलों के दो-तीन सौ लोगों ने हिस्सा लिया। चकोर बरसों से ऐसे आयोजन करते रहे हैं। उन्होंने लोक खेलों पर पुस्तकें भी लिखी हैं। ऐसे आयोजन हर जिले में होने चाहिए। और सरकार का इसे पूर संरक्षण भी मिलना चाहिए। ऐसे आयोजनों में गाँव के ही लड़के भाग लेते हैं,ऐसा नहीं होना चाहिए। शहर के लोगों को भी परम्पराओं का पता चले। जींस और टॉप हपहन कर खुद को आधुनिक समझने की भूल करने वाली नई पीढ़ी को भी पता चले कि ग्रामीण खेलों में भी आनंद है। आनंद ही नहीं, परमानंद है। मनोरंजन भी है तो स्वास्थ्य भी है। सरकार और समाज के लोग पहल करेंगे तो वातावरण बन सकता है।
वेलेंटाइन डे के पहले ही...?
वेलेंटाइन डे(14 फरवरी)अभी आया नहीं है, लेकिन राजधानी रायपुर  में बजरंग दल वाले सक्रिय हो गए हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि इस दिन शालीनता बरती जाए। ठीक बात भी है। वेलेंटाइन डे पश्चिमी संस्कति की देन है। इस दिन पूरे देश में जैसी अराजकता, जैसी फूहड़ताएँ देखने को मिलती है, उसे े र हैरत होती है, कि भारतीय समाज कहाँ जा रहा है? पश्चिमी संस्कति अह लोगों को आर्षित कर रही है। यही कारण है कि अश्लीलता भी स्वीकार्य होती जा रही है। ऐसे समय में अगर बजरंग दल वाले चेतावनी देते हैं तो गलत नही करते। क्योंकि अकसर यही देखा गया है कि वेलेंटाइन डे पर लड़के-लड़कियों को कुछ ज्यादा ही मस्ती चढ़ जाती है। इतनी कि वे भूल जाते हैं कि वे भारतीय है। उन्हें मर्यादा में रहना चाहिए। हाँ, बजरंग दल वाले पूरे प्रदेश में इस दिन देखेंगे कि वेलेंटाइन डे की आड़ में कुछ मनचले अश्लील हरकतें न करें। लेकिन दल वाले भी सात्विक तरीके से ही विरोध करें। वे हिंसा का सहारा न लें।
लुभावने पैकेज..?
 ठीक बात भी है। लुभाना भी जरूरी है. तभी तो आकर्षण बनेगा। नक्सलियों के आतंक के कारण अब कोई बस्तर जा कर काम नहीं करना चाहता। जगदलपुर में मेडिकल कोलज तो बन गया है, लेकिन बहुत से विभाग खाली पड़े हैं। अब सरकार ने समझदारी का काम किया है। वहाँ के लिए आकर्षक पैकेज दिया है। अच्छा वेतनमान मिलेगा तो डॉक्टर जा सकते हैं। हर महीने एक लाख पैंसठ हजार रुपए वेतन ठीक है। अन्य सुविधाएँ भी हैं। उम्मीद है, कि अब जगदलपुर मेडिकल कालेज की ओर डॉक्टर जरूर आकर्षित होंगे।  लेकिन इन सब के साथ-साथ एक और महत्वपूर्ण बात का ध्यान रखना होगा, और वो है सुरक्षा का पैकेज। वेतन के साथ साथ तन की सुरक्षा भी जरूरी है।
नक्सली वारदातों में कमी?
 केंद्र का तो ऐसा ही मानना है कि छत्तीसगढ़ में नक्सल-वारदातों में कमी आई है। अब यहाँ नक्सली उत्पात जारी है तो कोई क्या करे? केंद्र के पास आँकड़े हैं। ये माना कि कोई बड़ी वारदात नहीं हुई है, लेकिन रोज कुछ न कुछ हरकतें तो हो ही रही हैं। फिर भी संतोष किया जा सकता है, कि बड़ी घटना नहीं हुई है। जैसे सामूहिक हत्या। विशेष पुलिस फोर्सों की तैनाती भी एक कारण है। हो सकता है, भविष्य में और दबाव बने और नक्सलियों को बोरिया-बिस्तर बाँधना पड़ जाए।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

छत्तीसगढ़ की डायरी

सच्चा पंचायती राज कब आएगा..?
छत्तीसगढ़ में पंचायत के चुनाव भी हो गए। अब जनता के लोग गाँव-गाँव में नए भारत के निर्माण के लिए अपना योगदान करेंगे। गाँधीजी यही चाहते थे। लेकिन पंचायती राज की जो असलियत है, वह किसी से छिपी नहीं है। राजधानी में पिछले दिनों कुछ बुद्धिजीवियों ने यही राय व्यक्त की, कि आज भी भाग्यविधाता कलेक्टर है। अफसर है। पंच-सरपंच अफसरों का मुँह ताकते हैं। अफसर अपना खेल करते हैं। धीरे-धीरे पंचायत व्यवस्था प्रशासन तंत्र के आगे घुटने टेक देती है और वही सब होता है, जो अफसर चाहते हैं, या फिर यूँ कहें कि जो यह व्यवस्था चाहती है। वह पंचायती राज बेमानी है, जो अफसरों के भरोसे चलती है। अफसर नहीं पंचायत पावरफुल होनी चाहिए। पंचायतें अफसर की कुंडली बनाए न कि अफसर। अभी उल्टा हो रहा है। अगर यही पंचायती राज है, तो एक छल है।  पंचायतीराज को ताकतवर बनाना है तो ग्राम सभा को भी मजबूत करना होगा और सरपंच को और अधिक अधिकार देने होंगे। मुख्यकार्यपालन अधिकारी पर सरपंच राज करे, न कि अधिकारी। बहरहाल, लोकतंत्र की यह शुरुआत है। कमिया हो सकती है  लेकिन ये दूर भी की जा सकती हैं।
महिला मजदूर बनी सरपंचयह भी एक अच्छी खबर आई है कि एक गाँव में एक मजदूर महिला सरपंच बन गई। इससे पता चलता है, कि हम लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में ही आगे बढ़ रहे हैं। पंचायत चुनाव में भी अब बाहुबल या धनबल का साम्राज्य चलता है। धन और शराब का खेल गाँवों में भी हो रहा है। ऐसे समय में गाँव में किसी मजदूर को सरपंच बनने का मौका मिले यह बड़ी बात है। गाँवों में भी शहर में बसने वाले धनपति चुन लिए जाते हैं। लेकिन एक मजदूर महिला, जिसके पास दो जून की रोटी का ठीक से जुगाड़ न हो, वह भी अगर सरपंच पद के लिए खड़ी कर दी जाए, और जीत भी जाए, तो इसे सुखद बात दूसरी नहीं हो सकती। इससे साफ -साफ यह बात समझ में आती है, कि कभी-कभार लोग पैसेवाला नहीं, काम करने वाला प्रत्याशी भी चुनते हैं।
घोटालेबाज  औरतें....घोटाले केवल आदमी ही नहीं करते, औरतें भी करने लगी हैं। औरतें यानी साधी-सादी, काम से काम रखने वाली, लेकिन जब नारी मुक्ति का दौर चला है, औरतें भी चालाक होने की कोशिश कर रही हैं। जब आदमी भ्रष्टाचार कर सकता  है, तो औरत क्यों नहीं? वह भी किसी से कम क्यों रहे? यही कारण है कि रायपुर के एक महिला बैंक में कुछ संचालक औरतों ने खुल कर घोटाले किए। लेकिन घोटाले एक दिन मल की तरह पानी के ऊपर आ ही जाते हैं। इस बैंक का घोटाला भी सामने आया तो सारी संचालिकाएँ भूमिगत हो गई, लेकिन एक-एक करके पकड़ी भी गई। (आखिर मुखबिर भी कोई चीज़ होती है)अभी हाल ही में रायपुर में दो तथाकथित प्रतिष्ठित संचालिकाएँ पुलिस के हत्थे चढ़ी। अब जेल में हैं। और लोगों को शायद यही संदेश दे रही है, कि बुरे काम का बुरा नतीजा। लेकिन गिरफ्तारी से भी बात नहीं बन रही। जिन लोगों के पैसे डूबे, उनके पैसों का क्या होगा? वे अभी तक नहीं मिले। छाटी-मोटी राशियाँ तो मिल गई, लेकिन बड़ी रकम अब तक अप्राप्त है। पैसे तो हजम हो गया है। अब एक ही तरीका है, कि जो दोषी है, उनकी सम्पत्ति को कुर्क किया जाए, और खातेदारों को उनके पैसे लौटा दिए जाएँ। प्रक्रिया तो यही होनी है, लेकिन अभी वक्त है। खैर, देर आयद दुरुस्त आयद ...
आनंद महोत्सव का दुखदायी पहलूपिछले दिनोंरायपुर में  ईसाई समाज ने तीन दिन का आनंद महोत्सव किया। ईसाई गुरू पाल दिनाकरन जी प्रवचन देने आए। लेकिन बजरंग दल, विहिप और शिव सेना के लोगों ने इनके खिलाफ प्रदर्शन किया? इनका आरोप था कि आनंद महोत्सव की आड़ में ये लोग धर्म परिवर्तन की कोशिश कर रहे हैं। ईसाई धर्म के लोग धर्मपरिवर्तन के लिए बदनाम कर दिए गए हैं। रायपुर में आनंद महोत्सव को धर्मांतरण महोत्सव समझ कर लगातार प्रदर्शन हुए, पुलिस ने गिरफ्तारियाँ भी की। आनंद महोत्सव हुआ और हजारों लोग इसमें शामिल हुए। पूरे महोत्सव के दौरान कहीं भी धर्म परिवर्तन की बात नहीं उठी। वक्ता ने केवल प्रभू यीशु की राह पर चलने का आह्वान किया। तटस्थ लोगों की यही राय थी, कि हिंदूवादी संगठनों को समझ लेना चाहिए कि हिंदू धर्म इतना कमजोर भी नहीं है, कि कोई धर्मगुरू आएगा और सभा करेगा तो लोग अपना धर्म ही छोड़ दें।
पेड़ से दूध...?जी हाँ, पेड़ से भी कभी-कभी दूध निकलता है। और जब ऐसा हो तो सचमुच चमत्कार ही है। फिर चमत्कार को अपने यहाँ नमस्कार करने की परम्परा भी रही है। राजधानी में एक पेड़ से जब अचानक दूध जैसा कुछ द्रव निकलता देखा गया तो कुछ धार्मिकों ने इसे चमत्कार समझा और पेड़ की पूजा होने लगी। धार्मिकजन बहुत जल्द पूजा-पाठ में भिड़ जाते है। लेकिन बाद में वैज्ञानिकों ने समझाया कि भाइयो, यह कोई ईश्वरीय चमत्कार नहीं है, ऐसा अकसर होता रहता है। जब पेड़ के बीच का भाग सूखता है, तो इसमें वैक्टीरिया आ जाते हैं। इसके कारण द्रव और गैस भी बनती है तो एक दबाव के चलते पेड़ से दूध जैसा द्रव निकलने लगता है। अच्छी बात है, कि लोगों को बात समझ में आ गई, लेकिन इससे एक फायदा हुआ कि पेड़ को पूजा गया। कम से कम यह पेड़ तो अवैध कटाई का शिकार नहीं होग।
गुरूजी स्कूल नहीं आते...अधिकांश सरकारी स्कूलों का यही दर्द है। गाँवों की हालत और खराब है। वहाँ काम करने वाले कुछ शिक्षक मुफ्तखोरी के शिकार हो गए हैं। वे शहर में रह कर अपने दस तरह के गोरखधंधे करते हैं और गाँव जाते ही नहीं। वेतन वृद्धि भी चाहिए और भत्ते-फत्ते भी, बस पढ़ाई नहीं। धरसींवा के पास स्थिति गाँव मोहदी के बच्चे भी कब तक बर्दाश्त करते? चले आए राजधानी। सीधे प्रेस क्लब ही पहुँच गये। बताया पत्रकारों को अपने गाँव का हाल। इस बात को शिक्षा मंत्री ने गंभीरता से लिया और चेतावनी दे दी कि अगर शिक्षक स्कूलों से अनुपस्थित पाए गए, तो उन्हें बर्खास्त कर दिया जाएगा। उम्मीद है, नौकरी बचाने के लिए यही सही, शिक्षक स्कूल तो आएँगे, अब पढ़ाएँ या न पढ़ाएँ उनकी मरजी है भाई।
यह पाँचवाँ  कुंभ भी बना रहेवैसे कुंभ तो चार ही है, लेकिन अब छत्तीसगढ़ में पाँचवाँ कुंभ बनाने की कोशिश हो रही है। राजिम में लगने वाले वार्षिक मेले को पाँचवाँ कुँभ कहा जाने लगा है। धार्मिक लोग इसका विरोध भी करते रहते हैं क्योंकि पुराणों में तो केवल चार ही कुंभ है। अब ब्रह्मा, विष्णु और महेश त्रिदेव है। कोई अचानक चौथा देव सामने ले आए, तो क्या होगा? वही बात है, लेकिन जो भी हो, राजिम कुंभ को इस दृष्टि से ही देखा जाना चाहिए कि इसी बहाने यहाँ देश भर के साधु-संत आते हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलता है। इस दृष्टि से यह कुंभ बुरा नहीं है। एक सांस्कृतिक-आध्यात्मिक मेला लोगों को आपस में जोड़ता है। यह जुड़ाव बना रहे, इसलिए यह पाँचवाँ  कुंभ भी बना रहे। सरकार इसे जारी रखे। इसी बहाने लोग छत्तीसगढ़ आते है। और पूरे देश में अपने राज्य का नाम होता है।

सुनिए गिरीश पंकज को