राज्यपाल-मुख्यमंत्री भी आदिवासी मांग उठी.....
आदिवासी जब एक होते हैं तो क्या होता है?
क्या होता है, तो गैर आदिवासी नेताओं के मन में एक आशंका बलवती होने लगती है, कि कहीं वे सत्ता हथियाना तो नहीं चाहते। जी हाँ, पिछले दिनों जब राजधानी में आदिवासियों ने महारैली निकाली तो गैर आदिवासी नेता यही समझ रहे थे। लेकिन शायद ऐसा था नहीं। आदिवासी अपना अधिकार माँगने के लिए एकजुट थे। इस रैली में भाजपा और काँग्रेस के भी नेता शामिल हुए। सरकार के कुछ मंत्री- विधायक भी अगुवाई कर रहे थे। मांग यह थी कि सरकार आदिवासियों को बत्तीस फीसदी आरक्षण दे। एक वक्ता ने तो यह मांग भी रख दी कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री भी आदिवासी हों। नकली-असली आदिवासियों की भी चर्चा हुई और छठी अनुसूची को लागू करने की मांग भी उठी। कुल मिला कर आदिवासियों ने यह साबित कर दिया कि वे एक जुट हैं और अपने हक के लिए लडऩा जानते हैं। अगर इनकी ओर गंभीरतापूर्वक ध्यान नहीं दिया गया, तो कल को दृश्य कुछ और हो सकता है। आदिवासियों को भरपूर महत्व मिलना ही चाहिए। उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अब आदिवासी भी समय के साथ चल रहे हैं। रैली में शामिल कुछ आदिवासी मोबाइल फोन से गोठियाते पाए गये।
अब कैसे कह दें कि शराब है खराब.. ?
सरकार या प्रशासन भला कैसे कह दें कि शराब एकदम से खराब है। जब रायपुर जिले में ही शराब के ठेके देने के लिए जो फार्म बिके उसी से सरकार को एक सौ दस करोड़ रुपये की कमाई हो गई। लाइसेंस फीस से दो सौ पच्चीस करोड़ मिलेंगे वो अलग। ये तो एक जिले की कमाई है। शराब सेजो कमाई होती है, उसे देख कर किसी भी सरकार में यह साहस नहीं हो पाता कि वह शराब बंदी लागू कर। आखिर इतनी तगड़ी कमाई जो होती है। फिर भी यह मांग उठती रहती है, कि प्रदेश में शराबबंदी हो। पूर्ण शराबबंदी न होतो कम से कम जिस इलाके में मांग उठ रही है, वहाँ तो शराब दुकानें न खोली जाएँ। हालांकि शराब दूकानों के विरोध को भी बड़ी चालाकी से निबटा दिया जाता है। कुछ समय के लिए शराब दूकानें बंद होती है, फिर दूसरी जगह शुरू हो जाती हैं। बहरहाल, सरकार तो खुश है, कि उसकी कमाई हो रही है।
झुग्गीमुक्त राजधानी का सपना...
राजधानी में रायपुर विकास प्राधिकरण द्वारा बनाए गये 972 फ्लैट गरीबों को दे दिए गये। इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ रमन. सिंह ने कहा कि पाँच सालों में रायपुर को झुग्गीमुक्त कर दिया जाएगा। सचमुच..? अगर ऐसा हो सका तो वह स्वर्णिमकाल ही होगा। झुग्गियाँ शहर के गाल पर तमाचा हैं, बदनुमा दाग सरीखी हंै। असमता को दर्शाने वाली होती हैं। एक तरउ गगनचुंबी अट्टालिकाएँ और दूसरी तरफ गंदगी के बीच बजबजाती झुग्गियाँ..? इस लिहाज से रायपुर ही क्यों, पूरे छत्तीसगढ़ के शहरों को झुग्गियों से मुक्त करने का सपना देखा जाना चाहिए। हर गरीब को पक्के मकान मिले। केवल घर ही पक्के न हों, आस-पास स्वच्छता हो, सड़कें ठीक हों। मतलब यह कि गरीबों को भी जीने का हक है। और इस दिशा में अगर एक पहल शुरू हुई है तो उसका स्वागत ही किया जा सकता है।
लॉटरी के जाल में न फँसें..
जब से मोबाइल और इंटरनेट का ज़माना आया है, तब से ठगों ने इस माध्यम को भी अपना लिया है। अब मोबाइल पर एसएमएस आते हैं और ईमेल के जरिए संदेश कि आपको यूके लॉटरी या और और किसी कंपनी की ओर से एक- दो-तीन करोड़ की लॉटरी निकली है। बताया जाता है कि आपके मोबाइल नंबर या आपके ईमेल को हमने चयनित किया है। इन पंक्तियों के लेखक को भी पिछले छह महीने में अनेक मेल प्राप्त हो चुके हैं। उन सब का हिसाब लगाय जाए तो दस- बीस करोड़ मेरे पास भी आ जाते। लेकिन मैं इन ईमेलों को फौरन मिटा देता था। लेकिन कवर्धा का एक युवक फँस गया। उसे तीन लाख का चूना लग गया। अब तीन करोड़ मिले हैं, तो सामने वाली पार्टी अगर कस्टम शुल्क कोरियर, शुल्क और रजिस्ट्रेशन फीस आदि के लिए पैसे माँगेंगी तो कोई भी सोचगा, कि चलो दे दो। तीन करोड़ मिल रहे हैं, तो तीन लाख न सही। लोग पैसे भेज देते हैं और बाद में पछताते हैं। इसलिए सावधान इन ईमेलों से। लालच बुरी बला...।
जन प्रतिनिधियों की अनदेखी
छत्तीसगढ़ के संदर्भ में अनके बार यह लिखा जाता रहा है कि, यहाँ जनप्रतिनिधियों को महत्व नहीं दिया जाता। अनेक ऐसे उदाहरण गिनाए जा सकते हैं। ताजा उदाहरण माध्यमिक शिक्षा मंडल का है। इसमें कुछ विधायक भी सदस्य हैं। महत्वपूर्ण निर्णय लेने हों तो उनकी उपस्थिति भी होनी चाहिए, लेकिन माशिमं के अफसर इसकी जरूरत ही नहीं समझते। इसीलिए तो आठ महीने में एक बार भी किसी विधायक को न तो बुलाया गया, न उनसे कोई सलाह ही ली गई। निर्णय हो गये। जब विधायकों ने शिकायत की तो माशिमं के अफसर अध्यक्ष ने अधीनस्थों की खिंचाई की, गोया उन्हें कुछ पता ह न हो। यह चालाकियाँ बहुत हो रही हैं। इस मामले में विधायकों को ही सतर्क होना चाहिए। अपने हक के लिए वे खुद खड़े हों। और जो भी उनकी अनदेकी करे, उसको उसकी हैसियत दिखा दे। यहाँ लोकतंत्र है, अफसर तंत्र नहीं। क्या हमारे जनप्रतिनिधि जागरूक होंगे।
धंधा अपहरण-फिरौती का
जी हाँ, यह अब उद्योग की तरह विकसित हो रहा है। राजधानी में तो गाहेबगाहे इस धंधे की खबरें मिलती ही रहती हैं, अब आसपास भी ये वायरस फैल रहे हैं। पिछले दिनों धमतरी में एक छात्रा का अपहरण कर लिया गया। अपहर्ता लड़के हैं और जगदलपुर केहैं। उन्होंने फिरौती के रूप में दो लाख माँगे। नये-नये होंगे। सामने वाले की हैसियत का भी पता होगा, इसलिए केवल दो लाख की मांग की। अभी अपहर्ताओं का पता नहीं चल सका है लेकिन बच कर कहाँ जाएँगे। किंतु एक बात जो सामने आ रही है, कि अपहरण का धंधा अब फैलता जा रहा है। यह चिंता की बात है।
मंगलवार, 2 मार्च 2010
छ्त्तीसगढ़ की डायरी
प्रस्तुतकर्ता girish pankaj पर 3:52 am 0 टिप्पणियाँ
सोमवार, 8 फ़रवरी 2010
छत्तीसगढ़ के मीडिया का स्याह चेहरा....:
प्रस्तुतकर्ता girish pankaj पर 9:19 am 1 टिप्पणियाँ
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शनिवार, 6 फ़रवरी 2010
छत्तीसगढ़ की डायरी-3
रोज़ यहाँ रूपया घिसैं,घर सब खाए खीर..
छत्तीसगढ़ के घाट पर,
भई अफसरन की भीर,
रोज यहाँ रूपया घिसैं,
घर सब खाए खीर..
भ्रष्टाचार का खेल....
छत्तीसगढ़ के भोलभालेपन को केवल बड़े अजगरों उर्फ अफसरों ने ही नहीं समझा है, छोटे-छोटे अफसर भी समझ चुके हैं, कि यहाँ तो भ्रष्टाचार की गंगोत्री बहाई जा सकती है। विभाग कोई भी हो, वहाँ खुला खेल फर्रुखाबादी चल रहा है? ऐसा राम-राज कहीं नहीं होगा। खरीदी में, निर्माण कार्यों में डट कर चल रहा है भ्रष्टाचार। लोग पकड़ में भी आ रहे हैं, कुछ फरार भी है, लेकिन प्यार किया तो डरना क्या? अभी भी खेल जारी है। मौके का फायदा उठा कर काँग्रेस भी सामने आ गई(गोया उसके राज में सब कुछ ठीक-ठाक था। लोग जानते हैं कि उस दौर में भी भ्रष्टाचार चरम पर था) काँग्रेस ने मंत्रियों एवं अफसरों की सम्पत्ति सार्वजनिक करने की माँग की है। यह अच्छी पहल है। हालांकि यह भी सत्य है कि जो कुछ सार्वजनिक होता है, वह ऊँट के मुँह में जीरा की तरह होता है, लेकिन कुछ तो होता है। जनता इतने से ही संतुष्ट हो जाती है। बहरहाल करोड़ों की कमाई करने पर आमादा तंत्र से कौन ये सब काम करवा पाएगा, भगवान जाने। मुख्यमंत्री से ही उम्मीद है कि वे कुछ करेंगे।
स्वागतेय है यह घटना
राजधानी के पास के शहर दुर्ग की घटना का स्वागत किया जाना चाहिए। वहाँ के मशहूर स्वतंत्रता सेनानी और छत्तीसगढ़ी साहित्यकार निरंजनलाल जी गुप्ता के निधन के बाद उनकी बेटी और बहुओं ने उनकी अर्थी को काँधा दिया। बेटी ने मुखाग्नि भी दी। यह बड़ी बात है। अमूमन ऐसा होता नहीं है। परम्परा भी नहीं है। लेकिन गुप्ता जी अंतिम इच्छा यही थी। उनके जाने के बाद एक नया इतिहास लिखा गया। ठीक बात है, आखिर नारियाँ अपने परिजन को कंधा क्यों नहीं दे सकती? वे भी तो अपने परिजन के लिए उतनी ही आत्मीय थी, जितने घर के दूसरे पुरुष? औरतों को भी हक मिलना चाहिए। इस दृष्टि से गुप्ताजी के परिवार ने जो कुछ किया उसका स्वागत हो रहा है। गुप्ताजी नारियों को आगे लाने की कोशिश किया करते थे। उनकी रचनाएँ इस बात का सबूत हैं। कब तक समाज में यह प्रवत्ति बनी रहेगी कि मृत्यु के समय अंतिम संस्कार से महिलाओं को ही दूर रखा जाए। महिलाएँ कमजोर नहीं होती।
ग्रामीण खेलों का भी संरक्षण हो
आजकल क्रिकेट को क्रेज इतने जोरों पर है कि हाकी जैसे खेल तक हाशिये पर चले गए हैं, तब ग्रामीण या पारम्परिक लोक खेलों को पूछता ही कौन है लेकिन ऐसी बात नहीं है। राजधानी में पिछले दिनों लोक खेलों का आयोजन किया गया। इसमें लोगों ने सोत्साह भाग लिया। लोक खेल एसोसिएशन के अध्यक्ष चंद्रशेखर चकोर इस आयोजन में आठ जिलों के दो-तीन सौ लोगों ने हिस्सा लिया। चकोर बरसों से ऐसे आयोजन करते रहे हैं। उन्होंने लोक खेलों पर पुस्तकें भी लिखी हैं। ऐसे आयोजन हर जिले में होने चाहिए। और सरकार का इसे पूर संरक्षण भी मिलना चाहिए। ऐसे आयोजनों में गाँव के ही लड़के भाग लेते हैं,ऐसा नहीं होना चाहिए। शहर के लोगों को भी परम्पराओं का पता चले। जींस और टॉप हपहन कर खुद को आधुनिक समझने की भूल करने वाली नई पीढ़ी को भी पता चले कि ग्रामीण खेलों में भी आनंद है। आनंद ही नहीं, परमानंद है। मनोरंजन भी है तो स्वास्थ्य भी है। सरकार और समाज के लोग पहल करेंगे तो वातावरण बन सकता है।
वेलेंटाइन डे के पहले ही...?
वेलेंटाइन डे(14 फरवरी)अभी आया नहीं है, लेकिन राजधानी रायपुर में बजरंग दल वाले सक्रिय हो गए हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि इस दिन शालीनता बरती जाए। ठीक बात भी है। वेलेंटाइन डे पश्चिमी संस्कति की देन है। इस दिन पूरे देश में जैसी अराजकता, जैसी फूहड़ताएँ देखने को मिलती है, उसे े र हैरत होती है, कि भारतीय समाज कहाँ जा रहा है? पश्चिमी संस्कति अह लोगों को आर्षित कर रही है। यही कारण है कि अश्लीलता भी स्वीकार्य होती जा रही है। ऐसे समय में अगर बजरंग दल वाले चेतावनी देते हैं तो गलत नही करते। क्योंकि अकसर यही देखा गया है कि वेलेंटाइन डे पर लड़के-लड़कियों को कुछ ज्यादा ही मस्ती चढ़ जाती है। इतनी कि वे भूल जाते हैं कि वे भारतीय है। उन्हें मर्यादा में रहना चाहिए। हाँ, बजरंग दल वाले पूरे प्रदेश में इस दिन देखेंगे कि वेलेंटाइन डे की आड़ में कुछ मनचले अश्लील हरकतें न करें। लेकिन दल वाले भी सात्विक तरीके से ही विरोध करें। वे हिंसा का सहारा न लें।
लुभावने पैकेज..?
ठीक बात भी है। लुभाना भी जरूरी है. तभी तो आकर्षण बनेगा। नक्सलियों के आतंक के कारण अब कोई बस्तर जा कर काम नहीं करना चाहता। जगदलपुर में मेडिकल कोलज तो बन गया है, लेकिन बहुत से विभाग खाली पड़े हैं। अब सरकार ने समझदारी का काम किया है। वहाँ के लिए आकर्षक पैकेज दिया है। अच्छा वेतनमान मिलेगा तो डॉक्टर जा सकते हैं। हर महीने एक लाख पैंसठ हजार रुपए वेतन ठीक है। अन्य सुविधाएँ भी हैं। उम्मीद है, कि अब जगदलपुर मेडिकल कालेज की ओर डॉक्टर जरूर आकर्षित होंगे। लेकिन इन सब के साथ-साथ एक और महत्वपूर्ण बात का ध्यान रखना होगा, और वो है सुरक्षा का पैकेज। वेतन के साथ साथ तन की सुरक्षा भी जरूरी है।
नक्सली वारदातों में कमी?
केंद्र का तो ऐसा ही मानना है कि छत्तीसगढ़ में नक्सल-वारदातों में कमी आई है। अब यहाँ नक्सली उत्पात जारी है तो कोई क्या करे? केंद्र के पास आँकड़े हैं। ये माना कि कोई बड़ी वारदात नहीं हुई है, लेकिन रोज कुछ न कुछ हरकतें तो हो ही रही हैं। फिर भी संतोष किया जा सकता है, कि बड़ी घटना नहीं हुई है। जैसे सामूहिक हत्या। विशेष पुलिस फोर्सों की तैनाती भी एक कारण है। हो सकता है, भविष्य में और दबाव बने और नक्सलियों को बोरिया-बिस्तर बाँधना पड़ जाए।
प्रस्तुतकर्ता girish pankaj पर 4:38 am 6 टिप्पणियाँ
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सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
छत्तीसगढ़ की डायरी
घोटालेबाज औरतें....घोटाले केवल आदमी ही नहीं करते, औरतें भी करने लगी हैं। औरतें यानी साधी-सादी, काम से काम रखने वाली, लेकिन जब नारी मुक्ति का दौर चला है, औरतें भी चालाक होने की कोशिश कर रही हैं। जब आदमी भ्रष्टाचार कर सकता है, तो औरत क्यों नहीं? वह भी किसी से कम क्यों रहे? यही कारण है कि रायपुर के एक महिला बैंक में कुछ संचालक औरतों ने खुल कर घोटाले किए। लेकिन घोटाले एक दिन मल की तरह पानी के ऊपर आ ही जाते हैं। इस बैंक का घोटाला भी सामने आया तो सारी संचालिकाएँ भूमिगत हो गई, लेकिन एक-एक करके पकड़ी भी गई। (आखिर मुखबिर भी कोई चीज़ होती है)अभी हाल ही में रायपुर में दो तथाकथित प्रतिष्ठित संचालिकाएँ पुलिस के हत्थे चढ़ी। अब जेल में हैं। और लोगों को शायद यही संदेश दे रही है, कि बुरे काम का बुरा नतीजा। लेकिन गिरफ्तारी से भी बात नहीं बन रही। जिन लोगों के पैसे डूबे, उनके पैसों का क्या होगा? वे अभी तक नहीं मिले। छाटी-मोटी राशियाँ तो मिल गई, लेकिन बड़ी रकम अब तक अप्राप्त है। पैसे तो हजम हो गया है। अब एक ही तरीका है, कि जो दोषी है, उनकी सम्पत्ति को कुर्क किया जाए, और खातेदारों को उनके पैसे लौटा दिए जाएँ। प्रक्रिया तो यही होनी है, लेकिन अभी वक्त है। खैर, देर आयद दुरुस्त आयद ...
आनंद महोत्सव का दुखदायी पहलूपिछले दिनोंरायपुर में ईसाई समाज ने तीन दिन का आनंद महोत्सव किया। ईसाई गुरू पाल दिनाकरन जी प्रवचन देने आए। लेकिन बजरंग दल, विहिप और शिव सेना के लोगों ने इनके खिलाफ प्रदर्शन किया? इनका आरोप था कि आनंद महोत्सव की आड़ में ये लोग धर्म परिवर्तन की कोशिश कर रहे हैं। ईसाई धर्म के लोग धर्मपरिवर्तन के लिए बदनाम कर दिए गए हैं। रायपुर में आनंद महोत्सव को धर्मांतरण महोत्सव समझ कर लगातार प्रदर्शन हुए, पुलिस ने गिरफ्तारियाँ भी की। आनंद महोत्सव हुआ और हजारों लोग इसमें शामिल हुए। पूरे महोत्सव के दौरान कहीं भी धर्म परिवर्तन की बात नहीं उठी। वक्ता ने केवल प्रभू यीशु की राह पर चलने का आह्वान किया। तटस्थ लोगों की यही राय थी, कि हिंदूवादी संगठनों को समझ लेना चाहिए कि हिंदू धर्म इतना कमजोर भी नहीं है, कि कोई धर्मगुरू आएगा और सभा करेगा तो लोग अपना धर्म ही छोड़ दें।
पेड़ से दूध...?जी हाँ, पेड़ से भी कभी-कभी दूध निकलता है। और जब ऐसा हो तो सचमुच चमत्कार ही है। फिर चमत्कार को अपने यहाँ नमस्कार करने की परम्परा भी रही है। राजधानी में एक पेड़ से जब अचानक दूध जैसा कुछ द्रव निकलता देखा गया तो कुछ धार्मिकों ने इसे चमत्कार समझा और पेड़ की पूजा होने लगी। धार्मिकजन बहुत जल्द पूजा-पाठ में भिड़ जाते है। लेकिन बाद में वैज्ञानिकों ने समझाया कि भाइयो, यह कोई ईश्वरीय चमत्कार नहीं है, ऐसा अकसर होता रहता है। जब पेड़ के बीच का भाग सूखता है, तो इसमें वैक्टीरिया आ जाते हैं। इसके कारण द्रव और गैस भी बनती है तो एक दबाव के चलते पेड़ से दूध जैसा द्रव निकलने लगता है। अच्छी बात है, कि लोगों को बात समझ में आ गई, लेकिन इससे एक फायदा हुआ कि पेड़ को पूजा गया। कम से कम यह पेड़ तो अवैध कटाई का शिकार नहीं होग।
गुरूजी स्कूल नहीं आते...अधिकांश सरकारी स्कूलों का यही दर्द है। गाँवों की हालत और खराब है। वहाँ काम करने वाले कुछ शिक्षक मुफ्तखोरी के शिकार हो गए हैं। वे शहर में रह कर अपने दस तरह के गोरखधंधे करते हैं और गाँव जाते ही नहीं। वेतन वृद्धि भी चाहिए और भत्ते-फत्ते भी, बस पढ़ाई नहीं। धरसींवा के पास स्थिति गाँव मोहदी के बच्चे भी कब तक बर्दाश्त करते? चले आए राजधानी। सीधे प्रेस क्लब ही पहुँच गये। बताया पत्रकारों को अपने गाँव का हाल। इस बात को शिक्षा मंत्री ने गंभीरता से लिया और चेतावनी दे दी कि अगर शिक्षक स्कूलों से अनुपस्थित पाए गए, तो उन्हें बर्खास्त कर दिया जाएगा। उम्मीद है, नौकरी बचाने के लिए यही सही, शिक्षक स्कूल तो आएँगे, अब पढ़ाएँ या न पढ़ाएँ उनकी मरजी है भाई।
यह पाँचवाँ कुंभ भी बना रहेवैसे कुंभ तो चार ही है, लेकिन अब छत्तीसगढ़ में पाँचवाँ कुंभ बनाने की कोशिश हो रही है। राजिम में लगने वाले वार्षिक मेले को पाँचवाँ कुँभ कहा जाने लगा है। धार्मिक लोग इसका विरोध भी करते रहते हैं क्योंकि पुराणों में तो केवल चार ही कुंभ है। अब ब्रह्मा, विष्णु और महेश त्रिदेव है। कोई अचानक चौथा देव सामने ले आए, तो क्या होगा? वही बात है, लेकिन जो भी हो, राजिम कुंभ को इस दृष्टि से ही देखा जाना चाहिए कि इसी बहाने यहाँ देश भर के साधु-संत आते हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलता है। इस दृष्टि से यह कुंभ बुरा नहीं है। एक सांस्कृतिक-आध्यात्मिक मेला लोगों को आपस में जोड़ता है। यह जुड़ाव बना रहे, इसलिए यह पाँचवाँ कुंभ भी बना रहे। सरकार इसे जारी रखे। इसी बहाने लोग छत्तीसगढ़ आते है। और पूरे देश में अपने राज्य का नाम होता है।
प्रस्तुतकर्ता girish pankaj पर 8:03 am 2 टिप्पणियाँ
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रविवार, 31 जनवरी 2010
श्लीलता और अश्लीलता
श्लीलता और अश्लीलता पर समाज में सदियों से बहसें चलती रही है, उस वक़्त भी जब किसी महिला की नग्न मूर्ती बनाई गयी और उसे कला का नाम दिया गया था. मतलब यह कि हर काल में दो धराये बहती रहती है. आज भी यही हो रहा है. हम प्रगतिशीलता की, खुलेपन की बाते करते है, और शौचालय या स्नानघर (चाहे तो आप बाथरूम कह लें)में दरवाजे लगाते है. वहां कोई खुलापन नहीं है. पूरी दुनिया में कही ऐसा नहीं है. चाहे अमरीका हो या ब्रिटेन. क्यों? वहां तो बहुत ज्यादा खुलापन है? फिर वहां ऐसा क्यों..? इसलिए, कि मर्यादा नाम की भी कोई चीज़ होती है. लेकिन इस वक्त अगर मै हिन्दी लेखन की बात करुँ तो एक ऐसी धारा बह रही है, जो खुद को उत्तराधुनिक मानती है, और जो यह दर्शन परोसने की कोशिश कर रही है, कि स्त्री की देह उसकी अपनी है, वह उसे जैसा चाहे रखे. ढंके, बेचे, सार्वजनिक करे, उसकी जो मर्ज़ी हो करे.
लेखन में भी यही हो रहा है.खुलेपन के नाम पर, उन्मुक्तता के नाम पर, आजादी के नाम पर जो लेखन हो रहा है, उसमे सारी मर्यादाएं टूट रही है. लेखिकाएं अश्लील दृश्यों का खुल कर वर्णन कर रही है, और उनके लेखन को बोल्ड निरूपित किया जा रहा है. जो जितना नंगा है, वह उतना आधुनिक है. इसीलिए अब स्त्री-देह पर कपडे का महत्त्व कम होता जा रहा है. स्त्री की देह अब खुल कर सामने लाई जा रही है, खुद स्त्री के द्वारा. और इसे बताया जा रहा है, कि यह आधुनिकता है. बोल्डनेस है. सलवार-कुरता या साड़ी वाली औरत पिछडी हुई है. जो देह दिखा रही है, और अंगरेजी भजी बोल रही है, वह मॉडर्न है. लेखन में भी जो लेखिका सम्भोग के दृश लिखरही है, समलैंगिकता का विन्यास गढ़ रही है, वह बड़ी बोल्ड है. इतने सालों के लेखन में मेरे सामने भी कई अवसर आये जब मै भी अपने उपन्यासों या कहानियों में दृश की माँग कह कर , और बोल्डनेस दिखाने के नाम पर -बड़ी चालाकी से अश्लीलता परोस सकता था, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया. क्योकि मुझे लगा कि जब पूरा समाज ही पतन को आधुनिकता समझाने की भूल कर रहा हो, तब लेखक तो यह भूल न करे. वह तो मर्यादा में रहे. सभी पतित हो जायेंगे, तो समाज को दिशा कौन दिखायेगा. ये भी बात है, कि अब लेखन से कितने लोग दिशा ग्रहण करते है, लेकिन कोशिश यही होनी चाहिए कि लेखक मूल्यों कि सर्जना करे. लेकिन अब ये सब बेमानी है.
कुछ लेखिकाए लोकप्रिय होने के चक्कर में साहित्य में खुल कर अश्लीलता परोस रही है, और इनको चने के झाड में चढ़ाने वाले घटिया आलोचक और संपादक भी है, जो इनका महिमा मंडन कर रहे है और सम्मान कर रहे है. ऐसे संक्रमण काल में अश्लीलता के विरोध में उठी आवाजों का कोई ख़ास अर्थ नहीं. फिर भी आवाज़ उठानी चाहिये. हम अन्दर से नंगे है. बाथरूम में, शौचालय में नंगे है, लेकिन सड़क पर हम कपड़ों में होते है. क्यों.?जो लोग नंगेपन के इतने ही पक्षधर है, वे सडको पर भी नंगे क्यों नहीं घूमते.? जाहिर है, कही न कही लोक-लाज का भय है. फिर साहित्य में ही क्यों हम आधुनिक या बोल्ड होने में तुल गए है..?
बोल्ड लेखन का अर्थ अश्ल्लीलता फैलाना नहीं होना चाहिए. बोल्ड लिखना है, तो अन्याय के खिलाफ बोल्ड लिखें, अत्याचार के खिलाफ लिखें. सामजिक बुराइयों के खिलाफ लिखे. ये क्या बात हुई कि दो सहेलियां मिली और सेक्स शुरू हो गया. अरे भाई, दो सहेलियां मिल कर किसी बलात्कारी को पकडे, किसी अन्याय का मुकाबला करे, महिलाओं को एकजुट करे.. रतिक्रिया ही न करे. चलो मान लिया, कि कर भी रही है, तो प्रतीकों से काम चला लो भाई, कि ''रीमा ने सीमा के गले से लगा लिया, और.....'' पर्याप्त है इतना. बात खत्म हो जायेगी. पाठक को भी कुछ कल्पना करने दो. उसकी बुद्धि पर भी भरोसा रखो. क्या तुम ही सब खोल दोगे ? लेकिन नहीं इतने से बात नहीं बनेगी. रीमा सीमा के एक-एक कपडे उतारेगी, फिर एक-एक अंग को देखेगी, उसका वर्णन करेगी, फिर रति का लंबा वर्णन भी होगा. तभी तो साबित होगा कि लेखिका बोल्ड है. मन-बहन की गाली भी होगी. हद है. जो हो रहा है, वह दिखा रहे है, सदियों से वही कुछ हो रहा है, जिसका नतीजा ही यहाँ संसार है, तो क्या उसी का वर्णन होता रहे..?
देश-समाज, सभ्यता, जीवन-मूल्य, नैतिकता, श्लीलता, मर्यादा, संस्कृति, ये सब को देश निकाला दे दिया जाए.? मेरी बहनों, मेरे लेखकों, इस देश की पश्चिमी-ललक को पहचानो, इस देश का भारतीयपन ख़त्म न होने पाए. अश्लीलता हर काल में बुरी रही है, उस वक्त भी जब नग्न मूर्तियाँ बनायी जाती थी. यह उदाहरण न दिया जाए कि खजुराहो या काम-कला की मूर्तियों को पूरे समाज की स्वीकृति थी. उसका विरोध करने वाले लोग तब भी हाशिये पर थे, आज भी है, कल भी रहेंगे. फिर भी विरोध होगा.
प्रस्तुतकर्ता girish pankaj पर 10:09 am 0 टिप्पणियाँ
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बुधवार, 27 जनवरी 2010
छत्तीसगढ़ की डायरी-1
नक्सलियों से निपटने सेना की जरूरत नहीं
बस्तर में नक्सलियों से निपटने के लिए सेना की जरूरत नहीं है। यह बात एक बार फिर सामने आई है। और बात कही है केंद्रीय गृह मंत्री ने। पिछले दिनों वे राजधानी में थे। एक बैठक में उन्होंने कहा कि हमारी पुलिस और अर्धसैनिक बल ही पर्याप्त है। सचमुच सेना की मदद लेने के अनेक खतरे भी हैं। सेना सीमा पर ही ठीक है। आंतरिक मामलों से निपटने के लिए पुलिस और अर्धसैनिक बल ठीक रहते हैं। आमआदमी तो खैर इनको भी झेलना भी पड़ता है, फिर भी कोई बात नहीं, कुछ काम तो खैर होता ही है। लेकिन सेना अगर कार्रवाई करती है, तो बहुत से निर्दोष भी चपेट में आ जाते हैं इसलिए जो लोग यह कहते हैं, कि नक्सल समस्या के समाधान के लिए सेना की मदद ली जाए, वे लोग उसके दुष्परिणामों पर विचार नहीं करते। इसलिए गृहमंत्री के बयान का स्वागत ही होना चाहिए, और सरकार की कोशिश यह होनी चाहिए कि वह खा-पीकर अघाई-सी पुलिस को चुस्त करे ताकि वे दुरुस्त हो कर नक्सलियों का मुकाबला कर सकें।
नये राज्यपाल का आशावाद
नरसिंहन जी की जगह शेखरदत्त ने पदभार ग्रहण किया है। श्री दत्त यहाँ रह चुके हैं। बीस साल पहले वे रायपुर के कमिश्नर थे। अब राज्यपाल के रूप में उनकी नई पारी है। इस बीच लम्बा अनुभव भी वे ले चुके हैं। उन्होंने शपथग्रहण के बाद जो कुछ कहा, उसे देख कर यही लगता है, कि वे भी कुछ बेहतर करके दिखाएँगे। नक्सली समस्या के सामाधान के लिए उन्होंने कहा कि हम विकास के रास्ते पर चल कर नक्सली समस्या से लड़ेंगे। यह सकारात्मक सोच है। छत्तीसगढ़ में करोड़ों-अरबों का नुसकसान कर चुके नक्सलियों को मुँहतोड़ •ावाब देना है तो विकास ही एक रास्ता है। आज बस्तर शोषण का अड्डा बन गया है। नक्सली भी शोषण कर रहे हैं और तंत्र भी कर रहा है। दोनों के बीच आदिवासी पिस रहे हैं। इन सब का फायदा कोई तीसरा भी उठा रहा है। इसलिए यह जरूरी है कि बस्तर में ईमानदारी के साथ विकास कार्य हों, और भ्रष्ट अफसरों की खबर ली जाए।
बुरे फँसे काँग्रेसी विधायक और महापौर...
अतिरिक्त सद्भावना दिखाना भी खतरे से खाली नहीं होता। इस चक्कर में काँग्रेस की महापौर किरनमयी नायक और काँग्रेस के विधायक महंत रामसुंदर दास जी फँस गए। अब आलाकमाल को सफाई देनी पड़ रही है। हुआ यह कि पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक भागवत जी राजधानी पधारे। स्वयंसेवकों का पथसंचलन निकला तो महापौर ने एक जगह इनका स्वागत कर दिया। महंत जी ने भी स्वागत कर दिया। बस, काँग्रेस को यह घटना नागवार लगी। उन्होंने नोटिस भेज दिया। विचारधारा की दृष्टि से काँग्रेस और आरएसएस का कोई तालमेल नहीं है इसलिए काँग्रेस का भड़कना स्वाभाविक ही था। फिर भी सद्भावना भी कोई चीज होती है। शहर में हजारों स्वयंसेवक जमा है। जनप्रतिनिधि के रूप में स्वागत कर देने से कया फर्क पड़ जाता? विचारधारा अपनी जगह है, और सामाजिक लोकाचार अपनी जगह।
मेयर का सफाई अभियान
राजनीति में कई बार अनेक नौटंकियाँ करनी पड़ती हैं। लेकिन ये नौटंकियाँ बेकार नहीं जाती। इसका असर भी होता है। पिछले दिनों रायपुर की मेयर सफाई अभियान पर निकली। कुछ जगह पहुँच कर फावड़ा हाथ में लेकर नाली साफ करने लगी। उनको देख कर पार्षद भी भिड़ गए। इनको लगा देख कर सफाई कर्मियों को शर्म आई होगी, वे अपने काम को ईमानदारी के साथ करने लगे, लेकिन चार दिन की चाँदनी वाली हालत ही रही। फिर गंदगी, फिर बदहाली। जब तक नागरिक चेतना विकसित नहीं होगी, राजधानी की गंदगी दूर नहीं हो सकती। जिनके जिम्मे सफाई का काम है, वे ठीक से काम ही नहीं करते, और इधर आम लोग भी जहाँ-तहाँ गंदगी करते रहते हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि मेयर विचलित हों। खुद सफाई का स्वांग करने के पीछे भावना यही है, कि लोग अपनी जिम्मेदारी समझें और राजधानी को साफ रखे।
अफसर करे न चाकरी
राजधानी की मेयर नई हैं। महिला है। उनमें काम करने का नूतन उत्साह है, लेकिन अफसर तो पुराने हैं। घाघ हैं। वे काम ही नहीं करते। असहयोग कर रहे हैं। मेयर का दर्द यह है कि अफसर उनकी बात नहीं सुनते। कहना नहीं मानते। मेयर को चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि सिस्टम तो पहले से ही बिगड़ा हुआ है। जो अफसर काम न करने का आदी हो चुका है, वह इतनी जल्दी कैसे सुधरेगा? उन पर तो निरंतर दबाव बनाना पड़ेगा। कड़ी कार्रवाई करनी होगी, जब सुधरेंगे लोग। इसलिए नर हो न निराश करो मन को ,वाले गीत को ध्यान में रख कर मैडम मेयर को काम करना चाहिए। वेशक यह कारण भी हो सकता है कि मेयर महिला है। मेयर ने कुछ कहा है कि महिला होने के कारण लोग उन्हें महत्व नहीं दे रहे होंगे, लेकिन महिला ही पुरुषों को हिला सकती है। यह बात भी किसी से छिपी नहीं है। इसलिए पुरुष अफसरों सावधान..।
पुलिस का डंडा-प्रेम
यह तो अमर है। लिख-लिख कर कितने लोग मर-खप गए, लेकिन डंडा ऊँचा रहे हमारा..। इसे कोई फर्क नहीं पड़ा। अँगरेजों के समय भी खूब चला और अब भी चल रहा है। पिछले दिनों बिलासपुर के पास बोदरी नगर पंचायत में अनशनकारियों पर पुलिसिया डंडा चला। महिलाओं को भी नहीं छोड़ा। डंडे की आँख नहीं होती, दिल नहीं होता। वह चलता है, तो बस, चलता है। वहाँ लोग चुनाव स्थगित करने की माँग लेकर अनशन कर रहे थे। आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस दबाव बना रही थी। लोग भड़क गए। नारेबाजी तेज हो गई। बस पुलिस को ऐसे ही मौकों का इंतजार रहता है। यह केवल बोदरी का दर्द नहीं है, पूरे छत्तीसगढ़ का भी दर्द है। लेकिन इस दर्द की फिलहाल कोई दवा नजर नहीं आ रही है।
शबरी कन्या आश्रम की रजत जयंती
यहाँ चल रहा शबरी कन्या आश्रम ने पच्चीस वर्ष पूरे कर लिए। पिछले दिनों आश्रम ने रजत जयंती मनाई। वनवासी विकास समिति यह आश्रम चलाती है। इस आश्रम की खासियत यह है कि यहाँ नार्थ ईस्ट की बच्चियाँ रहती हैं। 67 बच्चियों में 62 बच्चियाँ अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैंड, असम, मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय से आई हैं। इनका लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा सब समिति के माध्यम से हो रहा है। ये बच्चियाँ यहाँ रह कर संस्कार ग्रहण कर रही है। वहाँ की संस्कृति को छत्तीसगढ़ से परिचित करा रही हैं। इस आश्रम को एक ट्रस्ट ने दस लाख रुपए दिए। ऐसे काम करने वाले आश्रमों को मदद करने के लिए धनपतियों को आगे आना ही चाहिए।
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गुरुवार, 19 नवंबर 2009
बेताल कथा-1
-गिरीश पंकज
उसकी हरकत को देख कर वेताल हँस पड़ा और बोला-'' हे राजन, मनुष्य अपना धन-वैभव, नाते-रिश्तेदार किसी को भी कस कर पकड़ कर ले। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जिसे जाना होता है, वह चला ही जाता है। आज नहीं तो कल। जैसे मैं अभी हूँ, थोड़ी देर बाद नहीं रहूँगा। ''
इतना बोल कर वेताल ने ठहाका लगाया। वेताल के ठहाके और उसके आत्मविश्वास पर विक्रमार्क को बड़ा गुस्सा आया। लेकिन वह खामोशी के साथ चलता रहा। वेताल ने आगे कहना शुरू किया-''चलो आज फिर एक कहानी सुनाता हूँ । तुमको कहानी सुनने का बड़ा शौक है। इसीलिए तुम महल छोड़ कर मेरे पीछे पड़े हो, ताकि तुम्हें नई-नई कहानियाँ सुनने मिलें। मैं सब समझता हूँ। आजकल राज-काज में तुम्हारा मन नहीं लग रहा । वहाँ रहो तो सौ तरह के छल-छंद करने पड़ते हैं । और तुम ठहरे सीधे-सादे। खैर, मुझे क्या। मेरी बोरियत दूर करने के लिए तुम आ गए हो। तो, सुनो एक कहानी....''
''..राजन्,किसी शहर में एक राजा रहा करता था । उसका नाम था महेंद्रप्रताप। वह बड़ा गरीब था। राजा के नौकर-चाकर भी गरीब थे। राजा की माँ गरीब थी। पिता गरीब था। प्रजा तो बिल्कुल ही गरीब थी। दरअसल राजा को पड़ोसी राज्य के राजा शत्रुजय सिंह ने लंबे समय तक बंदी बना कर रखा था। राजकोष को पूरी तरह लूट कर उसने महेंद्रप्रताप को मुक्त किया था। राजकोष काली होने के कारण राजा का राजसी ठाट-बाट जाता रहा। उसे अपनी गरीबी पर बड़ी कोफ्त होती। राजकोष कैसे भरा जाए ताकि ऐशोआराम के साधन जुटें। हर राजा को अपने प्रजा की नहीं, अपने खजाने की चिंता रहती है। गरीबी के कारण न राजा पुतरियों का नाच देख पाता था, और न सोमरस का पान कर पाता था। शतरंज की बाजी भी नहीं खेल पाता था। फोकट में कौन आए। राजा जब पैसे लुटाता है तभी तक उसके पास भीड़ रहती है। भीड़ देखे बगैर किसी राजा को चैन नहीं पड़ता। भीड़ जब राजा के जिंदाबाद के नारे लगाती है तो राजा को लगता है अब जनम सार्थक हुआ । ....
राजा इसी सोच में घुला जा रहा था कि काश उसके पास कोई सुयोग्य मंत्री होता। बदहाली के कारण पुराना मंत्री राजा महेंद्रप्रताप को छोड़कर चला गया था। राजा को नये वित्त मंत्री की तलाश थी। राज्य में एक बेराजेगार युवक रहा करता ता । वह विदेश से शिक्षा ग्रहण करके लौटा था । जैसे ही उसे पता चला कि राजा को वित्त मंत्री की तलाश है तो वह राजा से मिलने पहुँच गया। युवक नये ज़माने का था, सो उसने राजा से कहा, हे राजन, मैं आपके राज की दुर्दशा को दूर कर सकता हूँ, लेकिन एवज में मैं प्रतिमास एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ लूँगा। आपको मेरा यह पैकेज मंजूर हो तो बात करें।....
युवक की बात सुन कर राजा हँस पड़ा, और बोला- ' हे अतिउत्साही युवक, राजकोष में एक हजर स्वर्ण मुद्राएँ होती तो मैं सिर तरह मुँह लटकाए नहीं बैठा होता। कुछ न कुछ खाते-पीते रहता। ऐश चलती रहती, लेकिन यहाँ तो खाली डब्बा, खाली बोतल है। तुम फोकट में अपनी सेवाएँ दे सको, तो स्वागत है। वरना जिस ओर से आए हो, उसी ओर से वापस चले जाओ।'
राजन, जैसा कि पहले ही बता चुका हूँ कि युवक परदेस से आर्थिक मामलों का खास प्रशिक्षण लेकर लौटा था। उसे पूरा विश्वास था कि राज्य में उसे अच्छा वेतन मिल जाएगा, लेकिन यहाँ तो सिर मुड़ाते ही ओले पडने की नौबत थी। कड़के राज्य का निवासी होने के कारण वह दुखी था। राजा की बात सुन कर वह निराश हो गया, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। उसने आखिरी दाँव खेला-राजाजी, मैं अपना मूल्य नहीं गिरा सकता, लेकिन एक वचन देना होगा, कि जैसे ही आपका राजकोष लबालब भर जाए, आप मुझे प्रतिमाह एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ जरूर देंगे।
राजा महेंद्रप्रताप की आँखों में चमक आ गई । वह बोल उेठे-अगर ऐसा हो गया तो मैं एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ जरूर दूँगा। पर ऐसा हो तो सही। वैसे मेरी भी एक शर्त है। अगर छह माह के भीतर ऐसा नहीं हुआ तो तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा।
युवक हँसा और बोला-मुझे आपकी शर्त मंजूर है लेकिन हम दोनों की शर्तें लिखित रहेंगी। मेरा अनुभव रहा है कि मतलब निकल जाने के बाद बड़े लोग अपने पिताश्री को भी नहीं पहचानते।
राजा ने कहा ठीक है । फिर उसने अपने ऊँघते हुए मंत्री को जगाया और युवक को लिखित आदेश थमा दिया ।
इतनी कहानी सुनाने के बाद वेताल हमेशा की तरह खामोश हो गया। फिर बोला-'' हे विक्रमार्क, अब आप ही बताइए कि आगे क्या हुआ? क्या राजकोष सचमुच लबालब भर गया? क्या युवक ऐसा कर सका, या उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया? बिल्कुल ठीक-ठीक क हानी सुनाना, वरना तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।''
विक्रमार्क को कहानी बड़ी रोचक लगी।
इसमें सस्पेंस था।
रोमांच भी था ।
चलते-चलते विक्रमार्क न आँखें बंद की और सोचने लगा। थोड़ी देर में ही कहानी का भविष्य सामने दिखने लगा।
उसने कहना शुरू किया-''युवक ने राजा महेंद्रप्रताप से बस एक ही बात कही कि राजन, राजकोष को भरने का एक ही तरीका है, कि आप प्रजा पर करों का बोझ लाद दे। किसी तरह का संकोच न करें। तरह-तरह के कर बनाएँ और प्रजा पर थोप दें। आयकर, वाणिज्यकर, पर्यावरण कर, साँस कर, यातायात कर, मनोरंजन कर, शिक्षा कर, जन्म कर, मृत्यु कर, ये कर वो कर आदि-आदि। कर ही कर। कर लादते हुए प्रजा से छल-संवाद संवाद भी करे, कि राज्य को शत्रुओं से बचाने के लिए धन की जरूरत है। कुछ महीने की बात है। जनता देश प्रेम दिखाए और अपने खून-पसीने की कमाई का एक हिस्सा राज्य को दे। यह आदेश है। आदेश न मानने वाले दंडित किए जाएंगे। राजा का आदेश था सो बेचारी प्रजा अपना पेट काट-काट के कर पटाने लगी और देखते ही देखते रोजकोष भरने लगा। जल्दी ही लबालब हो गया। राजा का सूखा चेहरा खिल उठा। उसने युवक को अपना वित्त मंत्री बना दिया। युवक की बेरोजगारी दूर हुई और राजा की गरीबी भी। राजा के ऐशोआराम के दिन लौट आए और रोज महफिलें सजने लगीं।''
विक्रमार्क इतना बोल कर रुका ही था, कि वेताल ने कोई देरी नहीं की क्योंकि राजा का मौन भंग हो चुका था और शर्त की मुताबिक बैतलवा फिर डाल पर जा लटका ।
प्रस्तुतकर्ता girish pankaj पर 10:07 am 1 टिप्पणियाँ


