शुक्रवार, 25 मार्च 2011
गोचर भूमि बचाना, यानी छत्तीसगढ़ को बचाना
प्रस्तुतकर्ता girish pankaj पर 9:09 am 1 टिप्पणियाँ
लेबल: lekh/ गिरीश पंकज
सोमवार, 21 मार्च 2011
छत्तीसगढ़ की डायरी
भी मौका मिल जाता है नक्सलियों को
पुलिसवाले किसी का घर जला दें। उसके साथ अत्याचार करें और फिर यह सोचे कि नक्सली शांति के साथ बैठे रहें, तो यह असंभव है। पुलिस-दमन का खामियाजा पुलिस को भुगतना ही पड़ता है। शिकायत मिली है, कि पिछले दिनों बस्तर के नारायणपुर-ओरछा मार्ग पर स्थित एक गाँव में पुलिस और सीआरपीएफ की टीम किसी सुखराम को खोजने गई। घर पर वह नहीं मिला तो पुलिसवालों ने उसका घर ही जला दिया। और पाँच लोगों को पकड़ कर ले गई। घर में रखा खाने-पीने का सारा सामान जल गया। यह आरोप ग्रामीणों ने ही लगाया है। इस घटना के बाद से सुखराम का भी अता-पता नहीं है। किसी को खोजने का यह क्या तरीका है कि उसके घर को ही पूँक दिया जाए? ऐसा काम तो गुंडे या माफिया करते हैं। पुलिस से ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति आनंदनारायण मुल्ला जी ने कभी कहा था, पुलिस यानी वर्दीधारी गुंडों का संगठित गिरोह। क्या पुलिस बिल्कुल वैसी होती जा रही है? इसमें दो राय नहीं कि, छत्तीसगढ़ में पुलिस का दमन बढ़ता जा रहा है। किसी घर के किसी सदस्य की तलाश में पुलिसवाले घर के किसी भी सदस्य को उठा कर ले जाते हैं। और इस पर पुलिस सोचे कि उसके खिलाफ प्रेम उपजेगा, तो यह असंभव है। नक्सलियों को तो मौका चाहिए। वे बदला लेने के लिए तैयार रहते हैं। पुलिस अत्याचार की ताजा घटना के बाद एक बार फिर पुलिस और सीआरपीएफ वाले उनके निशाने पर आ जाएँगे। इसलिए पुलिस को भी फूँक-फूँक कर कदम रखना चाहिए।
छत्तीसगढ़ में विपक्ष यानी भाजपा की टीम-बी...?
ये हम नहीं कह रहे हैं, जोगी जी कह रहे हैं। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के मुद्दे बेहद सटीक होते हैं। उनका उत्तर खोजना मुश्किल हो जाता है। अभी एक पत्र उन्होंने अपनी ही पार्टी के नेता प्रतिपक्ष को भेजा है। देखें, नेता प्रतिपक्ष क्या सफाई देते हैं। मामला यह है, कि विधानसभा के दौरान कांग्रेस ने एक बैठक करके नगरीय प्रशासन मंत्री राजेश मूणत के बहिष्कार का निर्णय लिया था। बैठक में जोगी शामिल नहीं हो सके थे, लेकिन उन्होंने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा था, कि इससे कांग्रेस मजबूत होगी। लेकिन कुछ दिन बाद अचानक नेता प्रतिपक्ष रवींद्र चौबे ने बहिष्कार का निर्णय वापस ले लिया। इसपर जोगी जी भड़क गए और चौबे जी को एक कड़ी चिट्ठी भेजी है। उन्होंने दो टूक लिखा है, कि यही कारण है कि लोग काँग्रेस को भाजपा की टीम-भी भी कहने लगे हैं। जोगी जी का विरोध जायज है। बिना बैठक बुलाए नेता प्रतिपक्ष ने बिना बैठक बुलाए बहिष्कार वापसी का निर्णय कैसे ले लिया? यही एक ऐसा निर्णय ता, जिससेकांग्रेस की कुछ इमेज बन रही थी। वरना तो राज्य में विपक्ष की जो हालत है, वह किसी से छिपी नहीं है। लोग कहने लगे हैं, कि भाजपा ने विरोधियों में से कुछ को सेट कर लिया है। जोगी जी ने चिट्ठी लिख कर अगर गुस्से का इजहार किया है तो गलत नहीं किया है।
पढऩे आए हैं या गुंडागर्दी करने?
मेडिकल छात्रों से उम्मीद की जाती है, कि वे पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाएँगे, क्योंकि उन्हें पढ़ाई पूर्ण करके देश की सेवा करनी है। लेकिन माहौल ऐसा बन जाता है, कि छात्र अपना लक्ष्य ही भूल जाते हैं। पिछले दिनों डेंटल कालेज के छात्र अपना वार्षिकोत्सव मना रहे ते तो वहाँ मेडिकल कालेज के कुछ छात्र चले आए और हुड़दंग मचाने लगे। मारपीट पर उतारू हो गए। उनका गुस्सा इस बात को ले कर था, कि वार्षिकोत्सव में उन्हें क्यों नहीं बुलाया गया। अरे, भाई, नहीं बुलाया तो नहीं बुलाया। ये क्या बात हुई कि किसी को कोई निमंत्रण न दे तो दादागीरी करने लगे कि हमें निमंत्रण क्यों नहीं दिया? नहीं दिया, उनकी मर्जी। लेकिन मेडिकल छात्रों को तो यह बताना था, कि हम लोग भी कुछ हैं। आखिर वहीं हुआ, कुछ छात्र गिरफ्तार किए गए। माता-पिता का सिर नीचा हुआ। अब ये छात्र हॉस्टल से भी हटाए जाएँगे। घटना के बाद अभिभावक बच्चों को समझा रहे हैं, कि अपना ध्यान केवल पढऩे पर ही लगाएँ। अगर लगा सकें तो...।
भाई भाई न रहा
वैसे तो हर काल में भाई-भाई के बीच स्वार्थ की जंग होती रही है। इसलिए आजकल कोई घटना हो जाए तो यह नहीं कहा जा सकता कि कलजुग आ गया है। स्वार्थ का काला साया जब भी दिमाग पर छाता है तो विवेक मर जाता है। तब क्या भाई, क्या बहिन और क्या माता-पिता। पिछले दिनों रायपुर के एक चंदन तस्कर की हत्या हो गई थी। अब उसकी जान लेने वाला शूटर पकड़ाया तो उसेने ही बताया, कि तस्कर के भाई ने ही हत्या के लिए आठ लाख रुपए दिए थेे। इस तरह की एक नहीं अनेक घटनाएँ यही बताती हैं, कि समाज में धनलोलुपता बढ़ी है और और सहनशीलता घटी है। ऐसी हत्याएँ इसी कारण होती हैं।
छत्तीसगढ़ की ''कामधानी''.....
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर है और न्यायधानी है बिलासपुर। अब दोनों शहर कामधानी में बदलते जा रहे हैं। आए दिन यहाँ सेक्स रैकेट पकड़े जाते हैं। वैसे केवल ये दो शहर ही ऐसे नहीं है, जहाँ सेक्स का धंधा होता हो। ये कारोबार रायगढ़ से ले कर दुर्ग-भिलाई तक पसरा हुआ है। अब तो महानगरों की वेश्याएँ यहाँ पैकेज पर आती है। बीस-पच्चीस हजार तक लेती हैं। छत्तीसगढ़ में धनपतियों की संख्या बढ़ रही है। इनका काला धन बाहर कैसे निकले, इस काम को कॉलगर्लें अंजाम दे रही हैं। कुछ लोग उद्योग लगा रहे हैं, तो कुछ लोग देह व्यापार में संभावना तलाश रहे हैं। इसमे बेरोजगार लड़किया हैं तो दलाल भी। जो राजधानी बनने के पहले भी छत्तीसगढ़ में धंधेबाज लोग थे, लेकिन राजधानी बनने के बाद यह व्यापक हो गया है।
कंजूसी की हद है जान ही दे दी..
इकलौते बेटे ने मोटर साइकिल खरीद ली तो दुखी पिता ने आत्मदाह कर लिया। महासमुंद जिले के एक गाँव की घटना है। हरिकीर्तन नामक व्यक्ति के शादीशुदा बेटे ने पिता की असहमति के बावजूद मोटर साइकिल खरीद ली। बस, पिता का गुस्सा भड़क गया। उसने पैरावट में आग लगा ली और उसमें कूद गया। इस व्यक्ति के बारे में लोगों का यही कहना था, कि हरिकीर्तन गुस्सैल स्वभाव का था और कंजूसकिस्म का भी था। गुस्सा आदमी की जान भी ले सकता है। इसलिए बहुत सोच-समझ कर कदम उठाना चाहिए लेकिन अब यह बात समझने के लिए हरिकीर्तन जी मौजूद नहीं है। यह दूसरे लोगों के लिए सबक है कि भाई, गुस्से में अपने को या दूसरे को नुकसान पहुँचाने से क्या फायदा। जो हो गया, उसे नियति मान कर संतोष कर लेना चाहिए।
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रविवार, 27 फ़रवरी 2011
छत्तीसगढ़ की डायरी
और इधर काँग्रेसी आपस में भिड़े हैं...
उधर रमन सरकार जनहित पर ध्यान केंद्रित करके लोगों का दिल जीतने में लगी है, वहीं काँग्रेसी बेचारे अभी आपस में ही भिड़े हुए हैं। पिछले दिनों हुए उपचुनाव में काँग्रेस हार गई। संजारी बालोद के उपचुनाव में पराजित प्रत्याशी इस बात से दुखी है कि वह अपने जिन वरिष्ठ नेताओं को चाचा और बाबू कहता था, उनसे पूरा सहयोग नहीं मिला। अजीत जोगी तो चुनाव प्रचार करने ही नहीं गए। जोगी जी ने भी मजेदार बात कही। उन्होंने कहा कि प्रत्याशी मेरे पास आया था, उसने धन माँगा तो उसे धन दे दिया गया। तन-मन का सहयोग मांगा होता तो वह भी दिया जाता। पराजित प्रत्याशी कह रहा है, कि बड़े नेता आपस में भिड़ते रहे और मैं बलि का बकरा बन गया। जो भी हो, इस चुना की पराजय से एक बार फिर काँग्रेस को आत्ममंथन का मौका मिला है, कि वह सोच कि छत्तीसगढ़ में धीरे-धीरे वह हाशिये पर क्यों जा रही है। हर बार की तरह इस उपचुनाव में भी काँग्रेस की आंतरिक गुटबाजी साफ नजर आ रही थी।
फिर शराबबंदी के खिलाफ आंदोलन
छत्तीसगढ़ में शराब की नदियाँ बह रही हैं,कहना गलत न होगा। अधिकांश गाँव और शहर इसकी चपेट में हैं। इसके विरुद्ध आंदोलन भी होते हैं, लेकिन शराब दूकान बंद कराने में सबको पसीना आ जाता है। आंदोलन की इस कड़ी में अब दुर्ग के पास के तीन गाँव जगे हैं। उन्होंने कलेक्टर को ज्ञाापन दिया है और चेताया है कि शराब भट्टी नहीं हटी तो उग्र आंदोलन किया जाएगा। धनोरा-खम्हरिया गाँव के बीच खुली शराब दूकान के कारण क्या महिलाएँ और क्या पुरुष सबका आना-जाना मुश्किल हो गया है। महिलाएँ ज्यादा परेशान न रहती है। और यह सिलसिला दस-पंद्रह वर्षों से चल रहा है। आखिर महिलाओं ने प्रेरित किया तो पुरुष भी उठ खड़े हुए। सरपंच भी जगे। देखना यह है कि अब जनता का प्रतिरोध जीतता है,कि शराब का मुनाफा
चमत्कार को नमस्कार
इस देश में फरजी लोगों की भरमार है। फरजी तांत्रिक, फरजी भविष्यवक्ता लेकिन कुछ लोग आज भी अपनी सिद्धि के बल पर ऐसा प्रामाणिक प्रदर्शन करते हैं, कि लोगों की श्रद्धा के पात्र बन जाते हैं। पहले रायपुर में और अब राजिम में विराजमान पंडोखर बाबा की बड़ी चर्चा है। उनके पास जो कोई जाता है, प्रसन्न हो कर ही लौटता है। इनके पास पता नहीं क्या सिद्धि है कि एक-एक बात सही बता देते हैं। लोग जो समस्या ले कर उनके पास पहुँचते हैं, वहीं समस्या बाबा के पास पहले से ही कागज पर लिखी हुई रहती है। एक व्यक्ति को उन्होंने बताया कि तुम्हारे ऊपर इतने लाख और इतने रुपए का कर्ज है। वह आदमी चकरा गया। अनेक उदाहरण लोग बता रहे हैं। जो जा रहा है, वह हैरत से भर कर लौटता है। इसका मतलब साफ है, कि कोई न कोई ऐसी विद्या तो है जिसके सहारे कोई व्यक्ति मन की बात को पढ़ लेता है। दुर्भाग्यवश अब पंडोखर बाबा जैसे लोग नहीं के बराबर हैं।
राजिम कुंभ के बहाने संस्कृति
रायपुर से चालीस किलोमीटर दूर महानदी के तट पर बसा कस्बा राजिम अब पूरे देश में जाना जाता है। यहाँ हर साल कुम्भ भरता है। पहले इस कुंभ शब्द पर अनेक लोगों पर आपत्ति हुआ करती थी,लेकिन धीरे-धीरे कुंभ ऐसा लोकप्रिय हुआ कि अब देश भर के साधु-संत यहाँ आ कर धूनी रमाते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे शुरू किया। वह दिल से सहयोग भी करती है। पूरी व्यवस्था करती है। राजिम कुंभ के बहाने अब यहाँ हर साल सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी होता है। छत्तीसगढ़ के कलाकारों को अपनी कला दिखाने का एक मंच मिल जाता है। बाहर के भी अनेक कलाकार यहाँ आते हैं। इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान से छत्तीसगढ़ की ख्याति दूर-दूर तक फैल रही है। देश की राजधानी दिल्ली तक राजिम कुंभ का प्रचार किया जाता है। उत्तरप्रदेश समेत अन्य राज्यों के अनेक प्रख्यात संत प्रतीक्षा करते हैं, कि कब राजिम कुंभ लगे और वे धूनी रमाने पहुँच जाएँ।
पारिवारिक सहिष्णुता का पतन...
क्या शहर क्या गाँव, आपसी सौहार्द धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। अनेक घटनाएँ इस बात का प्रमाण है। पिछले दिनों राजधानी में एक पति ने पत्नी के चेहरे पर तेजाब फेंक दिया और फिर खुद जहर खा लिया। दोनों की आपस में अनबन थी। सुलह कराने की कोशिशें भी हुई लेकिन आपसी अहम के कारण बात नहीं बनी। दोनों अलग-अलग रहने लगे। पिछले दिनों पति पत्नी के पास पहुँचा और घर चलने का आग्रह किया। पत्नी नहीं मानी तो पति ने गुस्से में आ कर उसपर तेजाब फेंक दिया। अपने आप में यह मूर्खता है, मगर गुस्से में बहुत से लोग तेजाब का सहारा ले लेते हैं। बाद में पति को ग्लानि हुई या पुलिस का भय, उसने भी जहर खा लिया। यह पहली घटना नहीं है, कि इस कालम में चिंता की जा रही है। आए दिन ऐसी घटनाएँ होती रहती है, जिसमें पारिवारिक असहिष्णुता के कारण लोग एक-दूसरे की जान लेने पर हैं। राजधानी में ही एक पत्नी अपने पति से त्रस्त हो कर अपनी बेटी के साथ रेल से कट मरी। खुद की जान ले ली और और एक मासूम को भी मरने पर मजबूर कर दिया।
प्रस्तुतकर्ता girish pankaj पर 6:46 am 3 टिप्पणियाँ
लेबल: गिरीश पंकज, छत्तीसगढ़ की डायरी
रविवार, 13 फ़रवरी 2011
छत्तीसगढ़ की डायरी
नक्सलियों की 'भी' चलती है..
नक्सलियों ने अठारह दिन पहले जिन पाँच जवानों को अगवा किया था, उन्हें स्वामी अग्निवेश और सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार गौतम नवलखा आदि दो हजार लोगों की उपस्थिति में अंतत: रिहा कर दिया गया। बस्तर के घने जंगलों के बीच एक समारोह हुआ। जहाँ नक्सलियों ने बाजे-गाजे के बीच अगवा पुलिस जवानों को रिहा किया। इस शर्त के साथ, कि जवान पुलिस की नौकरी छोड़ देंगे। हालांकि बाद में इस शर्त का कोई कास असर दिखा नहीं। क्योंकि जवान उम्र के इस पड़ाव में अब नई नौकरी कहाँ से लाएँगे। इस रिहाई के बाद सोचने वाली बात यही है कि छत्तीसगढ़ में सरकार कहाँ है? नक्सलियोंकी ही चलती है। लगता है यहाँ एक तरह से नक्सलियों की ही सरकार चल रही है। सरकारतो मूक दर्शक बनने पर मजबूर हो गई है। यह एक तरह से विफलता ही है लेकिन अभी गेंद नक्सलियों के पाले में है। नक्सलियों को हीरो बनाने वाले स्वामी अग्निवेश की उपस्थिति में नक्सलियों ने जवानों को रिहा करके यह संदेश दे दिया है कि वे सरकार को कुछ नहीं समझते। ये अलग बात है कि मुख्यमंत्री ने नक्सलियों से बातचीत के लिए हामी भरी है, लेकिन क्या नक्सली हथियार छोड़ देंगे? क्या वे मुख्यधारा में शामिल होंगे? अगर ऐेेसा हो सके तो बड़ी बात है लेकिन ऐसा कुछ दीखता नहीं। एक ओर नक्सली अगवा जवानों को रिहा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ हिंसा और तोडफ़ोड़ का खेल भी खेल रहे हैं।
विनाश के विरुद्ध विकास की लड़ाई
नक्सली बस्तर में उत्पात मचाते ही रहते हैं। किसी भवन को उड़ा देना, किसी की हत्या कर देना उनके लिए बाएँ हाथ का खेल है। पाँच अगवा जवानों को छोड़ देने का मतलब यह नहीं है कि उनके भीतर करुणा का उदय हो गया है। इस बहाने मीडिया में वे छाए रहे। पिछले दिनों नक्सलियों ने बस्तर के एक रमणीय स्थल चित्रकोट में स्थित एक पुलिस चौकी को उड़ा दिया, लेकिन सबसे प्रेरक बात यह हुई कि चौबीस घंटे बाद ही चौकी शुरु कर दी गई। जनता ने ध्वस्त चौकी के निर्माण में अपना पसीना बहा दिया। यह घटना इस बात का सबूत है कि अगर विध्वंस अपना काम करता है तो सृजनधर्मी भी पीछे नहीं हटते। बस्तर के आम लोग नक्सलियों की गतिविधियों के पक्षधर नहीं है। इसके पहले भी अनेक गाँवों की महिलाओं एव लोगों ने नक्सलियों के विरुद्ध जुलूस निकाले, प्रदर्शन किए। यह उल्लेखनीय घटना है। आज जब नक्सली भय के पर्याय बन चुके हैं, तब ग्रामीण सामने आकर विध्वंस के विरुद्ध विकास का पसीना बहाते हैं, तो लगता है, कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाले लोग भी जिंदा हैं।
लूट सके तो लूट...
छत्तीसगढ़ सरकार के दो चेहरे सामने आते रहते हैं। एक तरफ वह जनविकास की बात करती है,तो दूसरी तरफ जनता के पैसों से अय्याशी के सामान भी जुटाने में संकोच नहीं करती। फिछले दिनों लोगों को यह जान कर बड़ा अचरज हुआ कि जनता के पैसों से विधायकों एवं मंत्रियों को वाशिंग मशीन, ओवन और डिनर सेट बाँटे गये। ये पैसे सीधे-सीधे जनता के पैसे थे। इनमें किसानों को पैसा था, सिंचाई का पैसा था और सड़क बनाने केलिए जो पैसे आए थे, उन पैसों से विधायकों केलिए उपहार खरीदे गए। सूचना के अधिकार के तहत लोगों ने जो जानकारियाँ हासिल की, उससे ये सब खुलासे हुए। इस पाप में पक्ष और विपक्ष दोनों समान रूप से भागीदार हैं। यानी जनता को लूटने में विपक्ष भी पीछे नहीं है। वैसे बीच यह चर्चा आम है कि विपक्ष बिका-बिका-सा लगता है क्योंकि सरकार के खिलाफ उसके उग्र तेवर नजर ही नहीं आते। एक कवि ने इस लूट पर कुछ इस तरह से तुकबंदी की है
जनता की ही माल है, लूट से तो लूट।
बाद में तू पछताएगा, जब कुरसी जाएगी छूट।।
वेलेंटाइन डे.....
14 फरवरी को वेलेंटाइन डे रहता है। लेकिन लगता है युवा पीढ़ी के कुछ बिगड़ैल प्रतिनिधि रोज वेलेंटाइन डे के ही मूड में रहते हैं। इसीलिए रायपुर, बिलासपुर और भिलाई के कुछ बड़े-बड़े बाग-बगीचों में युवक-युवतियाँ इश्क लड़ाते मिल जाते हैं। पुलिस का या कुछ सामाजिक संगठनों का दबाव न रहे तो ये लोग खुल्मखुल्ला प्यार (?)करने पर उतारू हो जाएँ। पिछले दिनों ऐसे ही कुछ प्यारातुर जोड़ों को राजधानी से तीस किलोमीटर दीर भिलाईनगर की पुलिस ने पकड़ा। एक-दो नहीं, पूरे बीच जोड़े। ये लोग शायद वेलेंटाइन डे का पूर्वाभ्यास कर रहे थेे। इन सबको पुलिस पकड़ कर थाने ले गई। वहाँ इनके माता-पिताओं को बुलाया गया। युवा जोड़ों ने माफी मांगी तब जा कर उन्हें छोड़ा गया। अब इतना सब होने के बाद युवकों ने माता-पिता की इज्जत की कितनी परवाह की, कितनी शर्मिंदगी महसूस की, इसका तो पता नहीं चल सका, लेकिन लोगों को विश्वास है कि ये जिस तरह की हवा बह रही है, उसे देखते हुए तो यही लगता है, कि ये लोग सुधरने से रहे और वेलेंटाइन डे के दिन एक बार फिर छिप कर ही सही, इश्क का इजहार करने से बाज नहीं आएंगे।
पीएससी है कि मजाक...?
छतत्तीसगढ़ बनने के बाद ही यहाँ लोक सेवा आयोग का गठन भी हो गया था। लेकिन इन दस सालों में एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि आयोग ने साफ-सुथरा काम किया हो। हर बार विवाद की नौबत आती रही। कभी रिश्वतखोरी, तो कभी अनियमितता, तो कभी कोई गंभीर त्रुटि। हर बार जब परीक्षा होती है, तो उसके साथ मामला हाईकोर्ट में पहुँच जाता है। कभी विज्ञापन में त्रुटि तो कभी कुछ और। त्रस्त छात्रों ने दो दिन पहले मोमबत्ती जुलूस निकाल कर आयोग के खिलाफ प्रदर्शन किया। छात्रों ने मांग की कि अगर आयोग को चला नहीं सकते तो इस भंग ही कर दिया जाए। अब छत्तीसगढ़ के छात्र परीक्षा देने केलिए मध्यप्रदेश या झारखंड जाने का मन बना रहे हैं। छात्रों का कहना है कि अगर सचमुच गंभीरता के साथ आयोग को संचालित करना है तो इसका एक वार्षिक कैलेंडर बनाया जाए। परीक्षा की तिथि घोषित की जाए। और सबसे बड़ी बाद ऐसे लोगों को बिठाया जाए, जिनमें कुछ समझ हो। अनुभव हो। अनुभवहीनता का ही नतीजा है कि पीएससी की हर परीक्षा विवादास्पद हुई है।
प्रस्तुतकर्ता girish pankaj पर 8:47 pm 0 टिप्पणियाँ
लेबल: गिरीश पंकज, छत्तीसगढ़ की डायरी
रविवार, 6 फ़रवरी 2011
ललित शर्मा यानी ब्लॉगर नंबर वन.....
प्रस्तुतकर्ता girish pankaj पर 7:24 am 9 टिप्पणियाँ
मंगलवार, 28 दिसंबर 2010
छत्तीसगढ़ अब गो-क्रांति की दिशा में
प्रस्तुतकर्ता girish pankaj पर 8:25 pm 1 टिप्पणियाँ
लेबल: गिरीश पंकज, lekh
रविवार, 19 दिसंबर 2010
छत्तीसगढ़ की डायरी
मगरमच्छों को भी पकड़ो.....
महिला पटवारी को रिश्वत की सजा
पिछले दिनों भ्रष्टाचार विरोधी दस्ते ने एक महिला सरपंच को रिश्वतखोरी के आरोप में रंगे हाथों पकड़ा और जेल भेज दिया। जो रिश्वत लेता है, उसे सजा मिलनी ही चाहिए। मगर सवाल यही है कि बारह हजार रुपये रिश्वत लेनी वाली महिला सरपंच तो पकड़ में आ गई, वे लोग कब पकड़ में आएंगे,जो करोडों की रिश्वत लेते हैं और कभी पकड़े ही नहीं जाते। पिछले कुछ वर्षों में अनेक लोग पकड़े गये मगर वे शातिर लोग अपने-अपने प्रभावों का इस्तेमाल करके बेदाग निकल गए। करप्शन ब्यूरो को बधाई कि वह अच्छा काम कर रहा है। रिश्वतखोरों को सजा मिलनी ही चाहिए। मगर जनता को और अच्छा तब लगेगा,जब वह मछलियों के शिकार के साथ-साथ मगरमच्छों को भी पकड़े। छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचारी मगरमच्छ बढ़ते ही जा रहे हैं ।
कुछ की लालबत्ती जली तो कुछ की बुझी...
आखिर वही हुआ, जिसका अनुमान था। सरकार ने कुछ आयोगों, बोर्डों, निगम-मंडलों के अध्यक्षों की नियक्तियाँ कर दीं। इस बार कुछ पुराने लोगों का पत्ता साफ हो गया तो कुछ नये चेहरों को मौका मिला। पिछली बार कुछ लोगों के खिलाफ शिकायतें भी मिली थीं। इसलिए उन्हें दुबारा मौका नहीं मिला। तो कुछ लोगों को संगठन के काम के लिए उपयुुक्त समझा गया। इस बार पार्टी ने समझदारी से काम लिया। इसीलिए पूरी समर्पण के साथ पार्टी के लिए दिन-रात एक करने वाले कुछ नेताओं को मौका दिया गया। ये वे लोग हैं, जिनके बारे में हर बार यही कयास लगाये जाते थे, कि इन्हें राज्यमंत्री का दर्जा दिया जाएगा, लेकिन इनके चाहने वाले हर बार निराश होते थे, लेकिन इस बार पार्टा ने कोई चूक नहीं की। खरसिया, अंबिकापुर, धमतरी, बालोद, अभनपुर जैसे सुदूर इलाके में रहने वाले जुझारू लोगों को राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया गया। इससे उनके समर्थकों में उत्साह बढ़ा है। इसका लाभ पार्टी को ही मिलेगा। और इधर जिन लोगों को लालबत्ती नहीं मिल सकी है, उनका भी कहीं न कहीं उपयोग किया ही जाएगा। वैसे अभी भी कुछ और नियुक्तियाँ शेष हैं। यानी पार्टी के लिए समर्पित कुछ और जुझारू लोगों को प्रतिसाद मिलने वाला है। किसको क्या मिलेगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन अभी जिस तरह से कुछ लोगों को लालबत्ती का तोहफा दिया गया है, उसे देख कर लोगों का अनुमान है, कि दूसरे चरण में भी सुपात्रों का चयन होगा।
नक्सली के आत्मसमर्पण का अर्थ
पिछले दिनों बस्तर के एक नक्सली सोनसाय रावड़े ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। यह समर्पण इस बात को दर्शाता है,कि अब नक्सलियों के बीच में काम करने वाले संवेदनशील लोगों की मानसिकता में बदलाव आने लगा है। आना ही चाहिए। पिछले कुछ महीने से बस्तर के लोग नक्सलियों की हिंसक गतिविधियों के विरुद्ध सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करते रहे हैं। हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। समर्पण करने वाले सोनसाय ने भी यही माना है। अब वह चाहता है कि वह युवकों को सही दिशा दे और कोशिश करेगा कि वे राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़े न कि नक्सलियों के भरमाने में आएँ। प्रशासन ने सोनसाय के प्रति पूरी सहानुभूति दिखाई है। उसके पुनर्वास के लिए जितनी भी कोशिश हो सके, होनी चाहिए और यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, कि उसे पूरी तरह संरक्षण मिले। समर्पण के बाद जाहिर है नक्सली सोनसाय के शत्रु हो जाएंगे। यह सब जानते हुए भी सोनसाय ने खतरा उठाया है, इसलिए वह नि:संदेह बधाई का पात्र है।
आदिवासियों को आरक्षण
भाजपा सरकार इस वक्त फूँक-फूँक कर कदम रख रही है। जनता का दिल जीतने के अनेक उपायों में एक नया उपक्रम है आदिवासियों को तेईस प्रतिशत आरक्षण। आदिवासियों को बेहतर सुविधाएँ, अनुकूल अवसर देने का यही समय है। ऐसे वक्त में जबकि नक्सली आदिवासियों के हित के नाम पर उनका और दूसरे लोगों का लहू बहाने का काम कर रहे हैं, सरकार ने आदिवासियों को यह बता दिया है, कि यह सरकार उनकी चिंता करती है। आदिवासियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने की व्यवस्था से समाज के लोग भी खुश हैं। अब समय आ गया है, कि आदिवासी समाज को समाज की सक्रियधारा से जोड़ा जाए। उनकी शिक्षा,स्वास्थ्य, पेयजल जैसे बुनियादी मुद्दों के साथ उन्हें रोजगार के भी सम्मानजनक अवसर मिलेंगे, तभी उनका समग्र विकास होगा।
विकलांगों के बारे में सोचने की जरूरत
समाज में सकलांगों के बारे में सोचा ही जाता है। उनके लिए अनेक योजनाएं भी बनती है। लेकिन समाज में ऐसी संस्थाएँ इक्का-दुक्का ही हैं, जो विकलांगों के बारे में गंभीरतापूर्वक सोचती हैं। छत्तीसगढ़ की इकलौती संस्था अखिल भारतीय विकलांग चेतना परिषद इस दिशा में गंभीरता के साथ काम कर रही है। पिछले दिनों संस्था ने साहित्यकारों को विकलांगों के बारे में लिखने के लिए प्रेरित किया था। अब वे हर साल की तरह विकलांग युवक-युवतियों की शादी की तैयारी कर रहे हैं।26 दिसंबर को रायपुर में परिचय सम्मेलन रखा गया है। 13 फरवरी 2011 को सामूहिक विवाह का आयोजन किया जाएगा । सबसे अच्छी बात यह है, कि इस आयोजन में समाज के हर वर्ग के लोग सहयोग करते हैं। मारवाड़ी युवा मंच और ब्राह्मण समाज की कुछ ज्यादा उत्साह के साथ भागीदारी निभाता है। सरकार विवाहित जोड़ों को आर्थिक मदद करती है। समाज और सरकार साथ-साथ चले तो बहुत-सी समस्याएँ हल होती रहेगी।
प्रस्तुतकर्ता girish pankaj पर 5:15 am 0 टिप्पणियाँ
लेबल: छत्तीसगढ़ की डायरी






