गुरुवार, 19 मई 2011

छत्तीसगढ़ की डायरी

रिश्वत दो वरना फँसा दूँगा....
छत्तीसगढ़ के पुलिस वाले अब शातिर लोगों को गिरफ्तार करने के बजाय खुद गिरफ्तार हो रहे हैं। फिछले एक महीने में दो थानेदार पकड़े गए। ये दोनों महानुभाव लोगों को चमका कर वसूली करने की कोशिश कर रहे थे। अभी हाल ही में पामगढ़ नामक कस्बे में एक थानेदार ने एक व्यक्ति को उसकी बहू की हत्या के आरोप में फँसाने की धमकी देते हुए पचास हजार रुपए माँगे। उस व्यक्ति की बहू ने जहर का कर जान दे दी थी। इतना मुद्दा वसूली के लिए काफी होता है। थानेदार साहब को मौका मिल गया। उन्होंने ससुर से कहा, तुमको बहू की हत्या के आरोप में अंदर कर दूँगा। मामला सुलटाना है तो पचास हजार रुपए देना होगा। ससुर ने फौरन तीन हजार रुपए दे दिए और कहा कि बाकी राशि बाद में दूँगा। उसके बाद ससुर ने हिम्मत कर के 'एंटी करप्शन ब्यूरो' से बात की । ब्यूरो ने सहयोग किया और थानेदार को घेरने की योजना बनाई। थानेदार के पास दस हजार रुपए के साथ ससुर को भेज गिया।और रिश्वतखोर थानेदजार को रंगेहाथों गिरफ्तार कर लिया। थानेदार की जमानत भी नहीं हुई और उसे जेल भेज दिया गया। इस घटना सेदूसरे थानेदार या पुलिस वाले सबक लेंगे, ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है।
धर्मंप्रचारक पिट गया.......
धर्मप्रचार करना गलत नहीं है। हर धर्म वाला अपने धर्म की विशेषताएँ बता कर लोगों को अपनी ओर खींचने का काम कर सकता है। दिक्कत वहाँ शुरू होती है, जब कोई अपने धर्म का प्रचार करे और दूसरे धर्म की निंदा शुरू कर दे। पिछले दिनों चाँपा नामक कस्बे में एक धर्मप्रचारक प्राचार्य इसी चक्कर में शिव सैनिकों के हाथों पिट गया। एक कालेज में प्राचार्य के पद पर कार्यरत ये सज्जन एक धर्म विशेष के गुरू के रूप में जाने जाते हैं। चांपा में एक व्यक्ति की तबीयत खराब थी। ये प्राचार्य महोदय उसके घर गए और वहाँ बहुत से लोगोंकोजमा करके धर्मोपदेश देने लगे। यहाँ तक तो सब ठीक था, अचानक उन्होंने हिंदू देवी-देवताओं के बारे में अभद्र शब्दों को उपयोग शुरू कर दिया। जब इस बात की जानकारी शिव सैनिकों को लगी तो उन्होंने प्राचार्य महोदय की जम कर ठुकाई की और उन्हें थाने पहुँचा दिया।
नक्सलियों के नाम पर चमकाने की कोशिश
छत्तीसगढ़ में नक्सलियों कोइतना आतंक फैल चुका है कि छोटे-मोटे गुंडे अब उनकी आड़ में कमाई करने की कोशिशें करने लगे हैं। ताजा मामला रायपुर का है। शिक्षाकर्मी के पद पर कार्यरत चंद्रकात साहू नामक युवक ने तीन लोगोंको अलग-अलग एसएमएस भेजे और सबसे पैसों की मांग की। एक सज्जन को एसएमएस किया कि लाल सलाम, तीन दिन के भीतर दो करोड़ रुपये पहुँचा दो वरना पूरे परिवार को उड़ा दिया जाएगा। चंद्रकात सनकी भी था। उसने एक दूसरे सज्जन को एसएमएस किया कि हम लादेन की मौत का बदला लेंगे। पुलिस वालों ने पता करने की कोशिश शुरू कर दी कि ये कौन है जो नक्सली या आतंकवादी बन कर वसूली का काम कर रहा है। आखिर पता चल ही गया। एसएमएस करने वाला एक शिक्षाकर्मी निकला। इस कुकर्मी के  पास से छह सिम कार्ड भी बरामद किए गए। अब यह नकली नक्सली  अपने खेल के कारण जेल में है ।
अफसरों का स्वर्ग छत्तीसगढ़
इसके पहले भी इस मुद्दे पर चर्चा हो चुकी है मगर क्या करें, दुबारा करना पड़ रहा है। दो दिन पहले फिर एक एस. बाबू नामक करोड़पति दवा नियंत्रक पकड़ा गया। इसके पास से करोड़ों की बेनामी संपत्ति का पता चला है। ये महानुभाव केरल के हैं। इन्होंने छत्तीसगढ़ से अर्जित हराम की कमाई केरल भी भिजवा दी थी। ऐसे एक नहीं अनेक अफसर ऐसे हैं जोबाहरी राज्यों के हैं। वे यहाँ की नंबर दो की कमाई अपने गृह नगर भेज देते हैं। बाबू नामक दवा नियंत्रक की केरल में भी इफरात संपत्ति है। वन विभाग के एक अधिकारी डीडी संत के पास भी अनंत दौलत होने का पता चला है। उनके यहाँ भी छापा पड़ तो पता चला कि इनके भी अनेक बेनामी खाते हैं। बहुत से खाते में मोनालिसा के नाम से है। इसी नाम से ये वन अफसर खाते रहे हैं। इसके पहले भी अनेक अधिकारी पकड़ में आ चुके हैं, जो प्रदेश का नाम रौशन कर रहे हैं, कि छत्तीसगढ़ में अकूत दौलत है, लूट सके तो लूट।
टॉपर तीन साल बाद निकला मुन्नाभाई....
मुन्नाभाई एमबीबीएस फिल्म को भला कौन भूल सकता है? फर्जी तरीके से परीक्षा दे कर पास होने वाले मुन्नाभाई कहे जाने लगे हैं। छत्तीसगढ़ में भी ऐसे मुन्नाभाइयों की कमी नहीं है। एक मुन्नाभाई तो सचमुच मेडिकल छात्र ही निकला। तीन साल एक छात्र ने पीएमटी की परीक्षा में टॉप किया था। अखबारों में उसकी तस्वीर छपी थी। उसने बड़ी-बड़ी बातें भी की थीं। पिछले दिनों पता चला कि वह फर्जी छात्र था। खेल करने वाले खेल कर जाते हैं और विभाग सोता रहता है। इस बार पीएमटी की परीक्षा ही रद्द करनी पड़ गई क्योंकि जूलाजी और कैमेस्ट्री के पर्चे इंटरनेट पर उपलब्ध थे। पेपर लीक न हों इसलिए छत्तीसगढ़ व्यावसायिक शिक्षा मंडल ने दक्षिण भारत की एक कंपनी को पेपर सेट करने का ठेका दे दिया था। मामला उजागर हुआ तो पूरी परीक्षा ही रद्द कर दी गई। छत्तीसगढ़ में अधिकारियों मैं बेईमानी करने का जुनून-सा सवार है। पीएससी की परीक्षा में भी कुछ न कुछ अनियमितताएँ होती रहती हैं। हर बार परीक्षा होती है और किसी न किसी गड़बड़ी के कारण छात्र कोर्ट की शरण में चले जाते हैं।
फैज अहमद फैज की बेटी आई छत्तीसगढ़
सन् दो हजार ग्यारह अनके साहित्यकारों की जन्म शताब्दी वर्ष है। अज्ञेय, नागार्जुन केदारनाथ अग्रवाल, शमशरेबहादुर सिंह एवं गोपालसिंह नेपाली(हिंदी), फैज़ अहमद फैज़ एवं मजाज़  (उर्दू) तथा श्री श्री (तेलुगु)। पूरे देश में इन साहित्यकारों की जन्म शताब्दियाँ मनाई जा रही है। छत्तीसगढ़ के प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान ने 14-15 मई को भिलाई में फैज और केदारनाथ अग्रवाल की स्मृति में बड़ा आयोजन किया। इसमें पाकिस्तान से भी लेखक-आलोचक भिलाई पधारे। सबसे बड़ी बात यह रही कि महान शायर फैंज की बेटी मुनीज़ा  हाशमी भी आई और अपने पिता से जुड़े रोचक संस्मरण सुनाए। फैज प्रगतिशील शायर ने अन्याय के खिलाफ लिखते थे इसलिए वे वर्षों तक जेल में भी रहे। मुनीज़ा  उन दिनों की याद करते हुए बीच-बीच में भावुक भी हुई। अनेक वक्ताओं ने फैज पर अपने विचार व्यक्त किए मगर पाकिस्तान से पधारे लोगों को सुनना एक अभूतपूर्व अनुभव रहा। ''हम मेहनत कश इसदुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे''....जैसी कालजयी कविता लिखने वाले फैज के बारे में सुन कर उपस्थित हिंदी समाज को एक बड़े शायर की शायरी और संघर्ष से परिचय हुआ और लोगों को समझ में आया कि बड़ा शायर बनने के लिए ''उँगलियों को  खूनेदिल में भी डुबोना'' पड़ता है।

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शनिवार, 16 अप्रैल 2011

छत्तीसगढ़ की डायरी

छत्तीसगढ़ की पुलिस ने फिर दिखाई मर्दानगी..
अपनी गली में एक पशु भी शेर होता है। कुछ यही हाल है अपनी पुलिस का थाने में कोई चला जाए तो वर्दी धारी उस पर ऐसे पिल पड़ते हैं कि पता नहीं सामने वाला कितना बड़ा गुनाहगार है। गुनाहगार के साथ दुब्र्यवहार तो चलो समझ में भी आता है, मगर जिसकी कोई गलती नहीं, उसे जब पुलिस के लोग पीटते हैं, तो लगता है, ये लोग ही सबसे बड़े अपराधी हैं। पिछले दिनों औद्योगिक नगर कोरबा की पुलिस ने जो कोबरा रूप दिखाया, उसे सुनकर लोग दहल गए। एक महिला बेचारी अपने पति की गुशुदगी की रिपोर्ट लिखाने गई थी, मगर वह तो जैसे गुंडों के बीच ही फँस गई। पाँच शराबी पुलिस कर्मियों ने उसको मारा-पीटा, उसके साथ बदसलूकी की। पुलिस के आला अफसर बोल रहे हैं कि महिला के साथ मारपीट नहीं की गई। महिला के शरीर पर जो निशान धिख रहे हैं, क्या वह भूत ने बना दिए? नैतिकता तो यह कहती है, कि पुलिस के आला अफसर स्वीकार करें कि हाँ, गलती हुई हैं। दोषी लोगों पर कार्रवाई की जाएगी, लेकिन ऐसा करके शायद पुलिस छोटी हो जाएगी। इसलिए वो बड़ी बने रहना चाहती है? छत्तीसगढ़ में पुलिस अत्याचार के मामले तेजी के साथ बढ़ रहे हैं। पलिस निरंकुश हो रही है। लोग कहने लगे हैं, कि जिस प्रदेश का पुलिस-मुखिया लेखक हो, उसके समय में भी अगर पुलिस में करुणा-संवेदना-सहानुभूति आदि मानवीय तत्व नहीं जग सके, तो कब जगेंगे?
खुदकशी के बढ़ते मामले
छत्तीसगढ़ में पुलिस-अत्याचार के मामले बढ़ रहे तो लोगों में खुदकशी की प्रवृत्ति बढ़ रही है। और इसके पीछे भी दुभाग्यवश प्रशासनिक तंत्र ही कारण है। प्रशासन इतना निर्मम होता जा रहा है, कि वह जिंदा आदमी की मांग पर कोई विचार नहीं करता और जब वह त्रस्त होकर आत्महत्या कर लेता है तो मुआवजा देने सरकार पहुँच जाती है। पिछले दिनों एक किसान ने आत्महत्या कर ली थी, क्योंकि दस साल से उसकी जमीन का मुआवजा नहीं मिल पा रहा था। लेकिन सबसे दिल दहला देने वाली घटना घटी है भिलाई में। जहाँ एक परिवार के चार सदस्यों ने सामूहिक आत्महत्या कर ली। माँ, तीन बहनें मर गईं। एक युवक बच गया है। जहर उसने भी खाया था। उसे अस्पताल में भरती किया गया है। इस परिवार की मांग थी, कि परिवार के मुखिया जो कभी भिलाई इस्पात संयंत्र में काम करते थे, उनकी अकाल मौत होने के कारण उनके बेटे को अनुकम्पा नौकरी दी जाए। लेकिन नौकरी तो दूर प्रबंधन उन्हें घर से ही बेदखल करने की तैयारी कर रहा था। इस परिवार ने क्षेत्र की सांसद सेभी गुहार लगाई मगर वो हेमामालिनी के नृत्य कार्यक्रम में भिड़ी रहीं। आखिरकार इस परिवार ने खुदकशी कर ली। परिवार ने मरने के पहले तीन-तीन पत्र लिखे जिसमें उसने अपना पूरा दुखड़ा बयान किया है। अब बे युवक को नौकरी देने की बात की जा रही है। ऐसी नौकरी का क्या औचित्य जो चार-चार शहादतों के बाद मिलती हो? कांग्रेस इस मामले को लेकर मानवाधिकार आयोग जाने वाली है। अनेक सामाजिक संगठन इस हादसे की निंदा कर रहे हैं। मगर ये हादसे एक सबक की तरह आते हैं कि अगर दुखी लोग खुदकशीकी धमकी दे रहे हैं तो उसे हल्के से न लियाजाए। जब जीने का कोई आधार ही न बचे तो मरना अंतिम विकल्प होता है। बावजूद इसके कि आत्महत्या कमजोरी है, कायरता है, लेकिन मजबूर आदमी या परिवार अंतिम रास्ते के रूप में यही विकल्प चुनता है।
काँग्रेस में आई जान, पटेल को मिली कमान
छत्तीसगढ़ काँग्रेस में पहली बार जान लौटती दीख रही है। इस बार नए प्रदेशाध्यक्ष के रूप में नंदकुमार पटेल का हाईकमान ने चयन किया है। सही समय पर ओबीसी कार्ड खेला गया है। यही कारण है, कि पटेल की नियुक्ति को मोतीलाल वोरा, विद्याचरण शुक्ल और अजीत जोगी जैसे अलग-अलग गुट के नेताओं ने भी प्रसन्नता के साथ स्वीकार किया है। खुद श्री पटेल यह मान कर चल रहे हैं, कि छत्तीसगढ़ में अब विपक्ष मजबूत होगा। वे ऐसा नहीं कह रहे हैं, कि इसके पहले यहाँ विपक्ष कमजोर था, मगर जैसा भी था, या अभी है, वह सबके सामने हैं। आपस की गुत्थागुत्ती में उलझी पार्टी को नंदकुमार पटेल जोड़ सकें तो यह उनकी बड़ी सफलता होगी। कहने की जरूरत नहीं, कि विपक्ष अपनी सामाजिक छवि को बेहतर बनाने में बहुत पीछे हैं। लेकिन अब शायद ऐसा न हो। नंदकुमार पटेल प्रदेश के पहले गृह मंत्री रह चुके हैं। रायगढ़ जिले से आते हैं। सतह से उठ कर राजनीति करने वाले रहे हैं इसलिए काँग्रेस कार्यकर्ता बहुत आशावान है कि इस बार पटेल जी के अध्यक्ष बनने के बाद काँग्रेस शायद कुछ बेहतर प्रदर्शन कर सके।
भाजपा की सफल रैली...
राजधानी में शनिवार को भाजपा ने केंद्र सरकार के विरोध में सफल रैली निकाली और सप्रे शाला मैदान में सभा की। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी और राजनाथ सिंह जैसे बड़े नेताओं की उपस्थिति में प्रदेश भर से आए हजारों कार्यकर्ताओं को दिशा मिली। गड़करी ने केंद्र के भ्रष्टाचार पर जमकर चुटकिया लीं। उन्होनें कहा, कि काँग्रेस का भ्रष्टाचार सबसे बड़ा धारावाहिक हो गया है। श्री गड़करी और राजनाथ सिंह समेत मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाया । प्रदेश के कोने-कोने से कार्यकर्ता पहुँचे थेे। इसरैली से कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार हुआ। राष्ट्रीय नेताओं ने मुख्यमंत्री रमन सिंह की सराहना भी की। लेकिन इस सभा को ले कर काँग्रेसी काफी नाराज थे। न केवल काँग्रेसी वरन् खिलाड़ी भी। काली पट्टी बांधकर एनएसयूआई न विरोध करने की कोशिश की मगर उन्हें हिरासत में ले लिया गया।
प्रदूषण बनाम खरदूषण
प्रदेश में औद्योगिक विकास हो, इससे किसी को इंकार नहीं है। लेकिन यह विकास विनाश बन कर लोगों के जीवन को, स्वास्थ्य को ही निगलने लगे, तो विकास चुभने लगता है। रायपुर और आसपास अनेक उद्योग लगे हैं, उनके प्रदूषण के कारण आसपास की खेती चौपट हो रही है और लोगों का स्वास्थ भी गिर रहा है। यही हाल रायगढ़ के लोगों को है। रायगढ़ क्षेत्र भी औद्योगिक नक्शे में शुमार हो चुका है।  लेकिन इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ रहा है। वहाँ के एक संयंत्र के विरुद्ध लोगों को सड़कों पर उतरना पड़ा। लोग एलर्जी से, दमे से तथा अनेक बीमारियों से परेशान है। संयंत्र का प्रदूषण खरदूषण जैसे राक्षस की तरह जीना दूभर कर रहा है। पिछले दिनों लोग कलेक्टर से मिले। शिकायत की तो कलेक्टर ने कुछ पंप सील करवा दिए मगर बाद में पता चला कि संयंत्र प्रबंधन ने पंप को खोल लिया । यह गंभीर अपराध है।

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

गोचर भूमि बचाना, यानी छत्तीसगढ़ को बचाना

नईदुनिया, रायपुर के २५ मार्च के अंक में प्रकाशित लेख..

सोमवार, 21 मार्च 2011

छत्तीसगढ़ की डायरी

पुलिसवालों के अत्याचारों के कारण 
भी मौका मिल जाता है नक्सलियों को
पुलिसवाले किसी का घर जला दें। उसके साथ अत्याचार करें और फिर यह सोचे कि नक्सली शांति के साथ बैठे रहें, तो यह असंभव है। पुलिस-दमन का खामियाजा पुलिस को भुगतना ही पड़ता है। शिकायत मिली है, कि पिछले दिनों बस्तर के  नारायणपुर-ओरछा मार्ग पर स्थित एक गाँव में पुलिस और सीआरपीएफ की टीम किसी सुखराम को खोजने गई। घर पर वह नहीं मिला तो पुलिसवालों ने उसका घर ही जला दिया। और पाँच लोगों को पकड़ कर ले गई। घर में रखा खाने-पीने का सारा सामान जल गया। यह आरोप ग्रामीणों  ने ही लगाया है। इस घटना के बाद से सुखराम का भी अता-पता नहीं है। किसी को खोजने का यह क्या तरीका है कि उसके घर को ही पूँक दिया जाए? ऐसा काम तो गुंडे या माफिया करते हैं। पुलिस से ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति आनंदनारायण मुल्ला जी ने कभी कहा था, पुलिस यानी वर्दीधारी गुंडों का संगठित गिरोह। क्या पुलिस बिल्कुल वैसी होती जा रही है? इसमें दो राय नहीं कि, छत्तीसगढ़ में पुलिस का दमन बढ़ता जा रहा है। किसी घर के किसी सदस्य की तलाश में पुलिसवाले घर के किसी भी सदस्य को उठा कर ले जाते हैं। और इस पर पुलिस सोचे कि उसके खिलाफ प्रेम उपजेगा, तो यह असंभव है। नक्सलियों को तो मौका चाहिए। वे बदला लेने के लिए तैयार रहते हैं। पुलिस अत्याचार की ताजा घटना के बाद एक बार फिर पुलिस और सीआरपीएफ वाले उनके निशाने पर आ जाएँगे। इसलिए पुलिस को भी फूँक-फूँक कर कदम रखना चाहिए।
छत्तीसगढ़ में विपक्ष यानी भाजपा की टीम-बी...?
ये हम नहीं कह रहे हैं, जोगी जी कह रहे हैं। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के मुद्दे बेहद सटीक होते हैं। उनका उत्तर खोजना मुश्किल हो जाता है। अभी एक पत्र उन्होंने अपनी ही पार्टी के नेता प्रतिपक्ष को भेजा है। देखें, नेता प्रतिपक्ष क्या सफाई देते हैं। मामला यह है, कि विधानसभा के दौरान कांग्रेस ने एक बैठक करके नगरीय प्रशासन मंत्री राजेश मूणत के बहिष्कार का निर्णय लिया था। बैठक में जोगी शामिल नहीं हो सके थे, लेकिन उन्होंने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा था, कि इससे कांग्रेस मजबूत होगी। लेकिन कुछ दिन बाद अचानक नेता प्रतिपक्ष रवींद्र चौबे ने बहिष्कार का निर्णय वापस ले लिया। इसपर जोगी जी भड़क गए और चौबे जी को एक कड़ी चिट्ठी भेजी है। उन्होंने दो टूक लिखा है, कि यही कारण है कि लोग काँग्रेस को भाजपा की टीम-भी भी कहने लगे हैं। जोगी जी का विरोध जायज है। बिना बैठक बुलाए नेता प्रतिपक्ष ने बिना बैठक बुलाए बहिष्कार वापसी का निर्णय कैसे ले लिया? यही एक ऐसा निर्णय ता, जिससेकांग्रेस की कुछ इमेज बन रही थी। वरना तो राज्य में विपक्ष की जो हालत है, वह किसी से छिपी नहीं है। लोग कहने लगे हैं, कि भाजपा ने विरोधियों में से कुछ को सेट कर लिया है। जोगी जी ने चिट्ठी लिख कर अगर गुस्से का इजहार किया है तो गलत नहीं किया है।
पढऩे आए हैं या गुंडागर्दी करने?
मेडिकल छात्रों से उम्मीद की जाती है, कि वे पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाएँगे, क्योंकि उन्हें पढ़ाई पूर्ण करके देश की सेवा करनी है। लेकिन माहौल ऐसा बन जाता है, कि छात्र अपना लक्ष्य ही भूल जाते हैं। पिछले दिनों डेंटल कालेज के छात्र अपना वार्षिकोत्सव मना रहे ते तो वहाँ मेडिकल कालेज के कुछ छात्र चले आए और हुड़दंग मचाने लगे। मारपीट पर उतारू हो गए। उनका गुस्सा इस बात को ले कर था, कि वार्षिकोत्सव में उन्हें क्यों नहीं बुलाया गया। अरे, भाई, नहीं बुलाया तो नहीं बुलाया। ये क्या बात हुई कि किसी को कोई निमंत्रण न दे तो दादागीरी करने लगे कि हमें निमंत्रण क्यों नहीं दिया? नहीं दिया, उनकी मर्जी। लेकिन मेडिकल छात्रों को तो यह बताना था, कि हम लोग भी कुछ हैं। आखिर वहीं हुआ, कुछ छात्र गिरफ्तार किए गए। माता-पिता का सिर नीचा हुआ। अब ये छात्र हॉस्टल से भी हटाए जाएँगे। घटना के बाद अभिभावक बच्चों को समझा रहे हैं, कि अपना ध्यान केवल पढऩे पर ही लगाएँ। अगर लगा सकें तो...।
भाई भाई न रहा
वैसे तो हर काल में भाई-भाई के बीच स्वार्थ की जंग होती रही है। इसलिए आजकल कोई घटना हो जाए तो यह नहीं कहा जा सकता कि कलजुग आ गया है। स्वार्थ का काला साया जब भी दिमाग पर छाता है तो विवेक मर जाता है। तब क्या भाई, क्या बहिन और क्या माता-पिता। पिछले दिनों रायपुर के एक चंदन तस्कर की हत्या हो गई थी। अब उसकी जान लेने वाला शूटर पकड़ाया तो उसेने ही बताया,  कि तस्कर के भाई ने ही हत्या के लिए आठ लाख रुपए दिए थेे। इस तरह की एक नहीं अनेक घटनाएँ यही बताती हैं, कि समाज में धनलोलुपता बढ़ी है और और सहनशीलता घटी है। ऐसी हत्याएँ इसी कारण होती हैं।
छत्तीसगढ़ की ''कामधानी''.....
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर है और  न्यायधानी है बिलासपुर। अब दोनों शहर कामधानी में बदलते जा रहे हैं। आए दिन यहाँ सेक्स रैकेट पकड़े जाते हैं। वैसे केवल ये दो शहर ही ऐसे नहीं है, जहाँ सेक्स का धंधा होता हो। ये कारोबार रायगढ़ से ले कर दुर्ग-भिलाई तक पसरा हुआ है। अब तो महानगरों की वेश्याएँ यहाँ पैकेज पर आती है। बीस-पच्चीस हजार तक लेती हैं। छत्तीसगढ़ में धनपतियों की संख्या बढ़ रही है। इनका काला धन बाहर कैसे निकले, इस काम को कॉलगर्लें अंजाम दे रही हैं। कुछ लोग उद्योग लगा रहे हैं, तो कुछ लोग देह व्यापार में संभावना तलाश रहे हैं। इसमे बेरोजगार लड़किया हैं तो दलाल भी। जो राजधानी बनने के पहले भी छत्तीसगढ़ में धंधेबाज लोग थे, लेकिन राजधानी बनने के बाद यह व्यापक हो गया है।
कंजूसी की हद है जान ही दे दी..
इकलौते बेटे ने मोटर साइकिल खरीद ली तो दुखी पिता ने आत्मदाह कर लिया। महासमुंद जिले के एक गाँव की घटना है। हरिकीर्तन नामक व्यक्ति के  शादीशुदा बेटे ने पिता की असहमति के बावजूद मोटर साइकिल खरीद ली। बस, पिता का गुस्सा भड़क गया। उसने पैरावट में आग लगा ली और उसमें कूद गया। इस व्यक्ति के बारे में लोगों का यही कहना था, कि हरिकीर्तन गुस्सैल स्वभाव का था और कंजूसकिस्म का भी था। गुस्सा आदमी की जान भी ले सकता है। इसलिए बहुत सोच-समझ कर कदम उठाना चाहिए लेकिन अब यह बात समझने के लिए हरिकीर्तन जी मौजूद नहीं है। यह दूसरे लोगों के लिए सबक है कि भाई, गुस्से में अपने को या दूसरे को नुकसान पहुँचाने से क्या फायदा। जो हो गया, उसे नियति मान कर संतोष कर लेना चाहिए। 

रविवार, 27 फ़रवरी 2011

छत्तीसगढ़ की डायरी

सबको खुश करने वाला बजट
छत्तीसगढ़ की रमन सरकार का हर कदम इतना सधा हुआ रहता है,कि विपक्ष केवल कोसता ही रह जाता है। कोशिश करता है, कि आलोचना की कुछ गुंजाइश तो निकले लेकिन आमजन खुश तो सरकार गदगद.  चाहे एक-दो रुपया किलो चावल हो या सस्ती दाल। नमक, साइकल, चरणपादुका वितरण आदि अनेक योजनाएँ हैं जिससे आम गरीब आदमी खुश है। अभी २६ फरवरी को रमन सरकार ने अपना सालाना बजट पेश किया। इसमें भी रमन सरकार ने सबको खुश करने का फार्मूला निकाला। क्या किसान और क्या व्यापारी, हर कोई खुश हो गया। किसानों के हित की अनेक घोषणाएँ की तो चेक पोस्ट ही खत्म कर दिया। प्रोफेशनल टेक्स भी समाप्त। गोबर-गोमूत्र से बनी वस्तुओं को कर मुक्त कर दिया। सात और शहरों में पोलिटेक्निक कॉलेज खुलेंगे। बिलासपुर में एक विश्वविद्यालय भी खुलेगा। विकलांगों के लिए भी अनेक लाभकारी घोषणाएँ हुई हैं। बस्तर का भी खास ध्यान रखा है। वहाँ आदिवासियों को मुफ्त में एक किलो चना दिया जाएगा। एक नई हिंदस्वराज पीठ की स्थापना  होगी तो संस्कृत को प्रोत्साहन देने के लिए एक लखटकिया सम्मान भी शुरू करने की घोषणा की गई है। ऐसी अनेक घोषणाएँ की गई है, जिससे सरकार अंत्योदय के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रही है। ऐसी ही रणनीति पर सरकार चलती रही तो वोट बैंक इनके हाथ से भला कैसे फिसल सकता है?  
और इधर काँग्रेसी आपस में भिड़े हैं...
उधर रमन सरकार जनहित पर ध्यान केंद्रित करके लोगों का दिल जीतने में लगी है, वहीं काँग्रेसी बेचारे अभी आपस में ही भिड़े हुए हैं। पिछले दिनों हुए उपचुनाव में काँग्रेस हार गई। संजारी बालोद के उपचुनाव में पराजित प्रत्याशी इस बात से दुखी है कि वह अपने जिन वरिष्ठ नेताओं को चाचा और बाबू कहता था, उनसे पूरा सहयोग नहीं मिला। अजीत जोगी तो चुनाव प्रचार करने ही नहीं गए। जोगी जी ने भी मजेदार बात कही। उन्होंने कहा कि प्रत्याशी मेरे पास आया था, उसने धन माँगा तो उसे धन दे दिया गया। तन-मन का सहयोग मांगा होता तो वह भी दिया जाता। पराजित प्रत्याशी कह रहा है, कि बड़े नेता आपस में भिड़ते रहे और मैं बलि का बकरा बन गया। जो भी हो, इस चुना की पराजय से एक बार फिर काँग्रेस को आत्ममंथन का मौका मिला है, कि वह सोच कि छत्तीसगढ़ में धीरे-धीरे वह हाशिये पर क्यों जा रही है। हर बार की तरह इस उपचुनाव में भी काँग्रेस की आंतरिक गुटबाजी साफ नजर आ रही थी।
फिर शराबबंदी के खिलाफ आंदोलन
छत्तीसगढ़ में शराब की नदियाँ बह रही हैं,कहना गलत न होगा। अधिकांश गाँव और शहर इसकी चपेट में हैं। इसके विरुद्ध आंदोलन भी होते हैं, लेकिन शराब दूकान बंद कराने में सबको पसीना आ जाता है। आंदोलन की इस कड़ी में अब दुर्ग के पास के तीन गाँव जगे हैं। उन्होंने कलेक्टर को ज्ञाापन दिया है और चेताया है कि शराब भट्टी नहीं हटी तो उग्र आंदोलन किया जाएगा। धनोरा-खम्हरिया गाँव के बीच खुली शराब दूकान के कारण क्या महिलाएँ और क्या पुरुष सबका आना-जाना मुश्किल हो गया है। महिलाएँ ज्यादा परेशान न रहती है। और यह सिलसिला दस-पंद्रह वर्षों से चल रहा है। आखिर महिलाओं ने प्रेरित किया तो पुरुष भी उठ खड़े हुए। सरपंच भी जगे। देखना यह है कि अब जनता का प्रतिरोध जीतता है,कि शराब का मुनाफा  
चमत्कार को नमस्कार
इस देश में फरजी लोगों की भरमार है। फरजी तांत्रिक, फरजी भविष्यवक्ता लेकिन कुछ लोग आज भी अपनी सिद्धि के बल पर ऐसा प्रामाणिक प्रदर्शन करते हैं, कि लोगों की श्रद्धा के पात्र बन जाते हैं। पहले रायपुर में और अब राजिम में विराजमान पंडोखर बाबा की बड़ी चर्चा है। उनके पास जो कोई जाता है, प्रसन्न हो कर ही लौटता है। इनके पास पता नहीं क्या सिद्धि है कि एक-एक बात सही बता देते हैं। लोग जो समस्या ले कर उनके पास पहुँचते हैं, वहीं समस्या बाबा के पास पहले से ही कागज पर लिखी हुई रहती है। एक व्यक्ति को उन्होंने बताया कि तुम्हारे ऊपर इतने लाख और इतने रुपए का कर्ज है। वह आदमी चकरा गया। अनेक उदाहरण लोग बता रहे हैं। जो जा रहा है, वह हैरत से भर कर लौटता है। इसका मतलब साफ है, कि कोई न कोई ऐसी विद्या तो है जिसके सहारे कोई व्यक्ति मन की बात को पढ़ लेता है। दुर्भाग्यवश अब पंडोखर बाबा जैसे लोग नहीं के बराबर हैं। 
राजिम कुंभ के बहाने संस्कृति
रायपुर से चालीस किलोमीटर दूर महानदी के तट पर बसा कस्बा राजिम अब पूरे देश में जाना जाता है। यहाँ हर साल कुम्भ भरता है। पहले इस कुंभ शब्द पर अनेक लोगों पर आपत्ति हुआ करती थी,लेकिन धीरे-धीरे कुंभ ऐसा लोकप्रिय हुआ कि अब देश भर के साधु-संत यहाँ आ कर धूनी रमाते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे शुरू किया। वह दिल से सहयोग भी करती है। पूरी व्यवस्था करती है। राजिम कुंभ के बहाने अब यहाँ हर साल सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी होता है। छत्तीसगढ़ के कलाकारों को अपनी कला दिखाने का एक मंच मिल जाता है। बाहर के भी अनेक कलाकार यहाँ आते हैं। इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान से छत्तीसगढ़ की ख्याति दूर-दूर तक फैल रही है। देश की राजधानी दिल्ली तक राजिम कुंभ का प्रचार किया जाता है। उत्तरप्रदेश समेत अन्य राज्यों के अनेक प्रख्यात संत प्रतीक्षा करते हैं, कि कब राजिम कुंभ लगे और वे धूनी रमाने पहुँच जाएँ।
पारिवारिक सहिष्णुता का पतन...
क्या शहर क्या गाँव, आपसी सौहार्द धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। अनेक घटनाएँ इस बात का प्रमाण है। पिछले दिनों राजधानी में एक पति ने पत्नी के चेहरे पर तेजाब फेंक दिया और फिर खुद जहर खा लिया। दोनों की आपस में अनबन थी। सुलह कराने की कोशिशें भी हुई लेकिन आपसी अहम के कारण बात नहीं बनी। दोनों अलग-अलग रहने लगे। पिछले दिनों पति पत्नी के पास पहुँचा और घर चलने का आग्रह किया। पत्नी नहीं मानी तो पति ने गुस्से में आ कर उसपर तेजाब फेंक दिया। अपने आप में यह मूर्खता है, मगर गुस्से में बहुत से लोग तेजाब का सहारा ले लेते हैं। बाद में पति को ग्लानि हुई या पुलिस का भय, उसने भी जहर खा लिया। यह पहली घटना नहीं है, कि इस कालम में चिंता की जा रही है। आए दिन ऐसी घटनाएँ होती रहती है, जिसमें पारिवारिक असहिष्णुता के कारण लोग एक-दूसरे की जान  लेने पर हैं। राजधानी में ही एक पत्नी अपने पति से त्रस्त हो कर अपनी बेटी के साथ रेल से कट मरी। खुद की जान ले ली और और एक मासूम को भी मरने पर मजबूर कर दिया।

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

छत्तीसगढ़ की डायरी

ये छत्तीसगढ़ है... यहाँ तो 
नक्सलियों की 'भी' चलती है..

नक्सलियों ने अठारह दिन पहले जिन पाँच जवानों को अगवा किया था, उन्हें स्वामी अग्निवेश और सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार गौतम नवलखा आदि दो हजार लोगों की उपस्थिति में अंतत: रिहा कर दिया गया। बस्तर के घने जंगलों के बीच एक समारोह हुआ। जहाँ नक्सलियों ने बाजे-गाजे के बीच अगवा पुलिस जवानों को रिहा किया। इस शर्त के साथ, कि जवान पुलिस की नौकरी छोड़ देंगे। हालांकि बाद में इस शर्त का कोई कास असर दिखा नहीं। क्योंकि जवान उम्र के इस पड़ाव में अब नई नौकरी कहाँ से लाएँगे। इस रिहाई के बाद सोचने वाली बात यही है कि छत्तीसगढ़ में सरकार कहाँ है? नक्सलियोंकी ही चलती है। लगता है यहाँ एक तरह से नक्सलियों की ही सरकार चल रही है। सरकारतो मूक दर्शक बनने पर मजबूर हो गई है। यह एक तरह से विफलता ही है लेकिन अभी गेंद नक्सलियों के पाले में है। नक्सलियों को हीरो बनाने वाले स्वामी अग्निवेश की उपस्थिति में नक्सलियों ने जवानों को रिहा करके यह संदेश दे दिया है कि वे सरकार को कुछ नहीं समझते। ये अलग बात है कि मुख्यमंत्री ने नक्सलियों से बातचीत के लिए हामी भरी है, लेकिन क्या नक्सली हथियार छोड़ देंगे? क्या वे मुख्यधारा में शामिल होंगे? अगर ऐेेसा हो सके तो बड़ी बात है लेकिन ऐसा कुछ दीखता नहीं। एक ओर नक्सली अगवा जवानों को रिहा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ हिंसा और तोडफ़ोड़ का खेल भी खेल रहे हैं।
विनाश के विरुद्ध विकास की लड़ाई
नक्सली बस्तर में उत्पात मचाते ही रहते हैं। किसी भवन को उड़ा देना, किसी की हत्या कर देना उनके लिए बाएँ हाथ का खेल है। पाँच अगवा जवानों को छोड़ देने का मतलब यह नहीं है कि उनके भीतर करुणा का उदय हो गया है। इस बहाने मीडिया में वे छाए रहे। पिछले दिनों नक्सलियों ने बस्तर के एक रमणीय स्थल चित्रकोट में स्थित एक पुलिस चौकी को उड़ा दिया, लेकिन सबसे प्रेरक बात यह हुई कि चौबीस घंटे बाद ही चौकी शुरु कर दी गई। जनता ने ध्वस्त चौकी के निर्माण में अपना पसीना बहा दिया। यह घटना इस बात का सबूत है कि अगर विध्वंस अपना काम करता है तो सृजनधर्मी भी पीछे नहीं हटते। बस्तर के आम लोग नक्सलियों की गतिविधियों के पक्षधर नहीं है। इसके पहले भी अनेक गाँवों की महिलाओं एव लोगों ने नक्सलियों के विरुद्ध जुलूस निकाले, प्रदर्शन किए। यह उल्लेखनीय घटना है। आज जब नक्सली भय के पर्याय बन चुके हैं, तब ग्रामीण सामने आकर विध्वंस के विरुद्ध विकास का पसीना बहाते हैं, तो लगता है, कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाले लोग भी जिंदा हैं।
लूट सके तो लूट...
छत्तीसगढ़ सरकार के दो चेहरे सामने आते रहते हैं। एक तरफ वह जनविकास की बात करती है,तो दूसरी तरफ जनता के पैसों से अय्याशी के सामान भी जुटाने में संकोच नहीं करती। फिछले दिनों लोगों को यह जान कर बड़ा अचरज हुआ कि जनता के पैसों से विधायकों एवं मंत्रियों को वाशिंग मशीन, ओवन और डिनर सेट बाँटे गये। ये पैसे सीधे-सीधे जनता के पैसे थे। इनमें किसानों को पैसा था, सिंचाई का पैसा था और सड़क बनाने केलिए जो पैसे आए थे, उन पैसों से विधायकों केलिए उपहार खरीदे गए। सूचना के अधिकार के तहत लोगों ने जो जानकारियाँ हासिल की, उससे ये सब खुलासे हुए। इस पाप में पक्ष और विपक्ष दोनों समान रूप से भागीदार हैं। यानी जनता को लूटने में विपक्ष भी पीछे नहीं है। वैसे बीच यह चर्चा आम है कि विपक्ष बिका-बिका-सा लगता है क्योंकि सरकार के खिलाफ उसके उग्र तेवर नजर ही नहीं आते। एक कवि ने इस लूट पर कुछ इस तरह से तुकबंदी की है
जनता की ही माल है, लूट से तो लूट।
बाद में तू पछताएगा, जब कुरसी जाएगी छूट।।

वेलेंटाइन डे.....
14 फरवरी को वेलेंटाइन डे रहता है। लेकिन लगता है युवा पीढ़ी के कुछ बिगड़ैल प्रतिनिधि रोज वेलेंटाइन डे के ही मूड में रहते हैं। इसीलिए रायपुर, बिलासपुर और भिलाई के कुछ बड़े-बड़े बाग-बगीचों में युवक-युवतियाँ इश्क लड़ाते मिल जाते हैं। पुलिस का या कुछ सामाजिक संगठनों का दबाव न रहे तो ये लोग खुल्मखुल्ला प्यार (?)करने पर उतारू हो जाएँ। पिछले दिनों ऐसे ही कुछ प्यारातुर जोड़ों को राजधानी से तीस किलोमीटर दीर भिलाईनगर की पुलिस ने पकड़ा। एक-दो नहीं, पूरे बीच जोड़े। ये लोग शायद वेलेंटाइन डे का पूर्वाभ्यास कर रहे थेे। इन सबको पुलिस पकड़ कर थाने ले गई। वहाँ इनके माता-पिताओं को बुलाया गया। युवा जोड़ों ने माफी मांगी तब जा कर उन्हें छोड़ा गया। अब इतना सब होने के बाद युवकों ने माता-पिता की इज्जत की कितनी परवाह की, कितनी शर्मिंदगी महसूस की, इसका तो पता नहीं चल सका, लेकिन लोगों को विश्वास है कि ये जिस तरह की हवा बह रही है, उसे देखते हुए तो यही लगता है, कि ये लोग सुधरने से रहे और वेलेंटाइन डे के दिन एक बार फिर छिप कर ही सही, इश्क का इजहार करने से बाज नहीं आएंगे।
पीएससी है कि मजाक...?
छतत्तीसगढ़ बनने के बाद ही यहाँ लोक सेवा आयोग का गठन भी हो गया था। लेकिन इन दस सालों में एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि आयोग ने साफ-सुथरा काम किया हो। हर बार विवाद की नौबत आती रही। कभी रिश्वतखोरी, तो कभी अनियमितता, तो कभी कोई गंभीर त्रुटि। हर बार जब परीक्षा होती है, तो उसके साथ मामला हाईकोर्ट में पहुँच जाता है। कभी विज्ञापन में त्रुटि तो कभी कुछ और। त्रस्त छात्रों ने दो दिन पहले मोमबत्ती जुलूस निकाल कर आयोग के खिलाफ प्रदर्शन किया। छात्रों ने मांग की कि अगर आयोग को चला नहीं सकते तो इस भंग ही कर दिया जाए। अब छत्तीसगढ़ के छात्र परीक्षा देने केलिए मध्यप्रदेश या झारखंड जाने का मन बना रहे हैं। छात्रों का कहना है कि अगर सचमुच गंभीरता के साथ आयोग को संचालित करना है तो इसका एक वार्षिक कैलेंडर बनाया जाए। परीक्षा की तिथि घोषित की जाए। और सबसे बड़ी बाद ऐसे लोगों को बिठाया जाए, जिनमें कुछ समझ हो। अनुभव हो। अनुभवहीनता का ही नतीजा है कि पीएससी की हर परीक्षा विवादास्पद हुई है।

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

ललित शर्मा यानी ब्लॉगर नंबर वन.....

हिंदी चिट्ठाकारों में ललित शर्मा जाना-पहचाना नाम है. श्री शर्मा वैसे भी नंबर वन रहे है. लेकिन अब उन पर का ठप्पा भी लग गया है. जी हाँ, चिट्ठाजगत की शीर्ष-चालीस की सूची में अब श्री ललित शर्मा नंबर वन में पहुँच गए है. ललित की मेहनत, लगन, ईमानदारी और जनसहयोग भावना किसी से नहीं छिपी है. लोगों ने उन्हें रस्ते से हटाने की कोशिशे की, मगर वे डटे रहे. किसे के हटाने से चट्टान कब खसक सकी है? आज नतीजा सामने है.पिछले दिनों छत्तीसगढ़ राष्ट्र भाषा प्रचार समिति ने ललित को श्रेष्ठ ब्लागर का खिताब भी प्रदान कर सम्मानित किया था. एक कार्यक्रम में एक और नंबर वन ब्लॉगर समीरलाल का भी हमने सम्मान किया था. किसी कारणवश समीर रायपुर पहुँच नहीं सके थे. अब लग रहा है, कि हमने ललित शर्मा का सम्मान करके कोई गलती नहीं कि, क्योंकि वे भी नंबर वन हो गए है. आज ''चिट्ठाजगत'' की सूची में सबसे ऊपर कोई है तो एक छत्तीसगढ़िया है. ललित को इस सूची में देखना हम लोगों के लिये गर्व की बात है. मैं कभी वहाँ पहुच ही नहीं सकता, लेकिन मुझे पता था कि ललित एक दिन टाप-40 में भी टाप पर होगा. और वह हुआ भी. पिछले साल ही मैंने कह दिया था. मैं ज्योतिषी नहीं हूँ, मगर ललित कि लगन देख कर संभावना नज़र आने लगी थी. सूची में कुछ नाम ऊपर-नीचे होते रहते है. यह जीवन का भी क्रम है-उतार-चढ़ाव. लेकिन आज ललित नंबर वन है. इसलिए बधाई के पात्र हैं. ललित शर्मा की इस उपलब्धि के लिये केवल मै खुश नहीं हूँ, पूरा छत्तीसगढ़ और पूरा हिंदी ब्लॉग जगत खुश है. क्योंकि ललित शर्मा को केवल मेरा ही स्नेह नहीं मिल रहा, उसके चाहने वाले देश-विदेश में फैले हुयेहै. 

सुनिए गिरीश पंकज को