गुरुवार, 19 मई 2011

हवा के साथ

जब से सूरज निकला
जब तक नहीं डूबा
दोड़ता रहता है पैर
बाँसों पर, तनी हुई रस्सियों पर
तारों पर। 
थम जाती है साँस
खिंचती आती आँत
धीरे-धीरे 
पीठ के आस-पास
बंध् जाती है दृष्टि
एक पूरी उम्र
खिंच-खिंच कर
न्यूनतम हो जाती है जैसे! 

- डॉ० शिवशंकर मिश्र  

1 Comment:

alka sarwat said...

अति भावुक और सोचनीय

सुनिए गिरीश पंकज को