गुरुवार, 19 नवंबर 2009

बेताल कथा-1

बेताल कथा

सुयोग्य वित्तमंत्री
-गिरीश पंकज
विक्रमार्क ने वेताल को कंधे पर लाद कर इस बार मजबूती से जकड़ लिया।
उसकी हरकत को देख कर वेताल हँस पड़ा और बोला-'' हे  राजन, मनुष्य अपना धन-वैभव, नाते-रिश्तेदार किसी को भी कस कर पकड़ कर ले। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जिसे जाना होता है, वह चला ही जाता है। आज नहीं तो कल। जैसे मैं अभी हूँ, थोड़ी देर बाद नहीं रहूँगा। ''
इतना बोल कर वेताल ने ठहाका लगाया। वेताल के ठहाके और उसके आत्मविश्वास पर विक्रमार्क को बड़ा गुस्सा आया। लेकिन वह खामोशी के साथ चलता रहा। वेताल ने आगे कहना शुरू किया-''चलो आज  फिर एक कहानी सुनाता हूँ । तुमको कहानी सुनने का बड़ा शौक है। इसीलिए तुम महल छोड़ कर मेरे पीछे पड़े हो, ताकि तुम्हें नई-नई कहानियाँ सुनने मिलें। मैं सब समझता हूँ। आजकल राज-काज में तुम्हारा मन नहीं लग रहा । वहाँ रहो तो सौ तरह के छल-छंद करने पड़ते हैं । और तुम ठहरे सीधे-सादे। खैर, मुझे क्या। मेरी बोरियत दूर करने के लिए तुम आ गए हो। तो, सुनो एक कहानी....''
''..राजन्,किसी शहर में एक राजा रहा करता था । उसका नाम था महेंद्रप्रताप। वह बड़ा गरीब था। राजा के नौकर-चाकर भी गरीब थे। राजा की माँ गरीब थी। पिता गरीब था। प्रजा तो बिल्कुल ही गरीब थी। दरअसल राजा को पड़ोसी राज्य के राजा शत्रुजय सिंह ने लंबे समय तक बंदी बना कर रखा था। राजकोष को पूरी तरह लूट कर उसने महेंद्रप्रताप को मुक्त किया था। राजकोष काली होने के कारण राजा का राजसी ठाट-बाट जाता रहा। उसे अपनी गरीबी पर बड़ी कोफ्त होती। राजकोष कैसे भरा जाए ताकि ऐशोआराम के साधन जुटें। हर राजा को अपने प्रजा की नहीं, अपने खजाने की चिंता रहती है। गरीबी के कारण न राजा पुतरियों का नाच देख पाता था, और न सोमरस का पान कर पाता था। शतरंज की बाजी भी नहीं खेल पाता था। फोकट में कौन आए। राजा जब पैसे लुटाता है तभी तक उसके पास भीड़ रहती है। भीड़ देखे बगैर किसी राजा को चैन नहीं पड़ता। भीड़ जब राजा के जिंदाबाद के नारे लगाती है तो राजा को लगता है अब जनम सार्थक  हुआ । ....
राजा इसी सोच में घुला जा रहा था कि काश उसके पास कोई सुयोग्य मंत्री होता। बदहाली के कारण पुराना मंत्री राजा महेंद्रप्रताप को छोड़कर चला गया था। राजा को नये वित्त मंत्री की तलाश थी। राज्य में एक बेराजेगार युवक रहा करता ता । वह विदेश से शिक्षा ग्रहण करके लौटा था । जैसे ही उसे पता चला कि राजा को वित्त मंत्री की तलाश है तो वह राजा से मिलने पहुँच गया। युवक नये ज़माने का था, सो उसने राजा से कहा, हे राजन, मैं आपके राज की दुर्दशा को दूर कर सकता हूँ, लेकिन एवज में मैं प्रतिमास एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ लूँगा। आपको मेरा यह पैकेज मंजूर हो तो बात करें।....
युवक की बात सुन कर राजा हँस पड़ा, और बोला- ' हे अतिउत्साही युवक, राजकोष में एक हजर स्वर्ण मुद्राएँ होती तो मैं सिर तरह मुँह लटकाए नहीं बैठा होता। कुछ न कुछ खाते-पीते रहता। ऐश चलती रहती, लेकिन यहाँ तो खाली डब्बा, खाली बोतल है। तुम फोकट में अपनी सेवाएँ दे सको, तो स्वागत है। वरना जिस ओर से आए हो, उसी ओर से वापस चले जाओ।'
राजन, जैसा कि पहले ही बता चुका हूँ कि युवक परदेस से आर्थिक मामलों का खास प्रशिक्षण लेकर लौटा था। उसे पूरा विश्वास था कि राज्य में उसे अच्छा वेतन मिल जाएगा, लेकिन यहाँ तो सिर मुड़ाते ही ओले पडने की नौबत थी। कड़के राज्य का निवासी होने के कारण वह दुखी था। राजा की बात सुन कर वह निराश हो गया, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। उसने आखिरी दाँव खेला-राजाजी, मैं अपना मूल्य नहीं गिरा सकता, लेकिन एक वचन देना होगा, कि जैसे ही आपका राजकोष लबालब भर जाए, आप मुझे प्रतिमाह एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ जरूर देंगे।
राजा महेंद्रप्रताप की आँखों में चमक आ गई । वह बोल उेठे-अगर ऐसा हो गया तो मैं एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ जरूर दूँगा। पर ऐसा हो तो सही। वैसे मेरी भी एक शर्त है। अगर छह माह के भीतर ऐसा नहीं हुआ तो तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा।
युवक हँसा और बोला-मुझे आपकी शर्त मंजूर है लेकिन हम दोनों की शर्तें लिखित रहेंगी। मेरा अनुभव रहा है कि मतलब निकल जाने के बाद बड़े लोग अपने पिताश्री को भी नहीं पहचानते।
राजा ने कहा ठीक है । फिर उसने अपने ऊँघते हुए मंत्री को जगाया और युवक को लिखित आदेश थमा दिया ।
इतनी कहानी सुनाने के बाद वेताल हमेशा की तरह खामोश हो गया। फिर बोला-'' हे विक्रमार्क, अब आप ही बताइए कि आगे क्या हुआ? क्या राजकोष सचमुच लबालब भर गया? क्या युवक ऐसा कर सका, या उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया? बिल्कुल ठीक-ठीक क हानी सुनाना, वरना तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।''
विक्रमार्क को कहानी बड़ी रोचक लगी।
इसमें सस्पेंस था।
रोमांच भी था ।
चलते-चलते विक्रमार्क न आँखें बंद की और सोचने लगा। थोड़ी देर में ही कहानी का भविष्य सामने दिखने लगा।
उसने कहना शुरू किया-''युवक  ने राजा महेंद्रप्रताप से बस एक ही बात कही कि राजन, राजकोष को भरने का एक ही तरीका है, कि आप प्रजा पर करों का बोझ लाद दे। किसी तरह का संकोच न करें। तरह-तरह के कर बनाएँ और प्रजा पर थोप दें। आयकर, वाणिज्यकर, पर्यावरण कर, साँस कर, यातायात कर, मनोरंजन कर, शिक्षा कर, जन्म कर, मृत्यु कर, ये कर वो कर आदि-आदि। कर ही कर। कर लादते हुए प्रजा से छल-संवाद संवाद भी करे, कि राज्य को शत्रुओं से बचाने के लिए धन की जरूरत है। कुछ महीने की बात है। जनता देश प्रेम दिखाए और अपने खून-पसीने की कमाई का एक हिस्सा राज्य को दे। यह आदेश है। आदेश न मानने वाले दंडित किए जाएंगे। राजा का आदेश था सो बेचारी प्रजा अपना पेट काट-काट के कर पटाने लगी और देखते ही देखते रोजकोष भरने लगा। जल्दी ही लबालब हो गया। राजा का सूखा चेहरा खिल उठा। उसने युवक को अपना वित्त मंत्री बना दिया। युवक की बेरोजगारी दूर हुई और राजा की गरीबी भी। राजा के ऐशोआराम के दिन लौट आए और रोज महफिलें सजने लगीं।''
विक्रमार्क इतना बोल कर रुका ही था, कि वेताल ने कोई देरी नहीं की क्योंकि राजा का मौन भंग हो चुका था और शर्त की मुताबिक बैतलवा  फिर डाल पर जा लटका ।

1 Comment:

योगेश स्वप्न said...

नव वर्ष २०१० की हार्दिक मंगलकामनाएं. ईश्वर २०१० में आपको और आपके परिवार को सुख समृद्धि , धन वैभव ,शांति, भक्ति, और ढेर सारी खुशियाँ प्रदान करें . योगेश वर्मा "स्वप्न"

सुनिए गिरीश पंकज को