<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129</id><updated>2012-02-16T05:50:52.129-08:00</updated><category term='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><category term='दृष्टिपात की   सम्पादकीय'/><category term='डॉ० शिवशंकर मिश्र की  कविता'/><category term='गिरीश पंकज'/><category term='व्यंग्य / गिरीश पंकज'/><category term='lekh/  गिरीश पंकज'/><category term='/  गिरीश पंकज'/><category term='samachar'/><category term='छ्त्तीसगढ़ की डायरी/ गिरीशपंकज'/><category term='lekh'/><category term='छत्तीसगढ़ की डायरी / गिरीश पंकज'/><title type='text'>सद्भावना दर्पण</title><subtitle type='html'>पत्रकार-व्यंग्यकार गिरीश पंकज की पत्रिका</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>62</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-3158499794609271725</id><published>2012-01-30T21:04:00.000-08:00</published><updated>2012-01-30T21:04:11.881-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छ्त्तीसगढ़ की डायरी/ गिरीशपंकज'/><title type='text'>छ्त्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="color: #783f04; text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;सौ बिस्तरों वाला कैंसर अस्पताल अंतिम चरण में&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: red; text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;वेदांता समूह ने छत्तीसगढ़ में किया कमाल&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;एक करोड़ का एक बिस्तर....&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;यह चौंकाने वाली बात तो है मगर यह सच है कि छत्तीसगढ़ में सौ बिस्तरों  वाला एक ऐसा कैंसर अस्पताल अंतिम चरण में हैं, जिसकी लागत तीन सौ करोड़ की  है। टाटा मेमोरियल जैसा अंतरराष्ट्रीय स्तर का यह अस्पताल नये रायपुर में  निर्माणाधीन है। वेदांता केंसर चिकित्सालय एवं अनुसंधान केंद्र के रूप में  यह अस्पताल कैंसर-फ्री छत्तीसगढ़ के सपने के संकल्प के साथ शुरू हो रहा  है। छत्तीसगढ़ में कैंसर के मरीज बढ़ रहे हैं। तम्बाखू, खैनी, बीड़ी-सिगरेट  के बढ़ते सेवन के कारण राज्य में कैंसर की शिकायत बढ़ी है। इसीलिए बाल्को  (वेदांता) कंपनी&amp;nbsp; के संचालक अनिल अग्रवाल ने पहल की और टाटा मेमोरियल  अस्पताल जैसा विश्वस्तरीय अस्पताल बनाने का बीड़ा उठा लिया। राज्य सरकार ने  उनको जमीन दे दी। पिछले दिनों पत्रकारों के एक दल ने नया रायपुर जा कर  अस्पताल के निर्माण कार्य को देखा। सभी की यही राय थी कि यह अस्पताल न केवल  छत्तीसगढ़ के लोगों की, वरन देश-विदेश के कैंसर मरीजों के उपचार का बड़ा  केंद्र बन जाएगा। तीन सौ करोड़ की लागत वाले अस्पताल की अब लागत बढ़ कर  साढ़े तीन सौ करोड़ रूपए तक पहुँच चुकी है, लेकिन जनहित को ध्यान में रखते हुए  वेदांता समूह अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट से कोई समझौता नहीं कर रहा, यह संतोष  की बात है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;कलेक्टर के &lt;/b&gt;&lt;b&gt;'घटिया' बयान पर भड़&lt;/b&gt;&lt;b&gt;के&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt; जशपुर&lt;/b&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;के&lt;/b&gt;&lt;b&gt; लोग&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले को वहाँ के एक बड़े अधिकारी ने अतिउत्साह में आ कर ' घटिया' कह दिया। अधिकारी की मंशा कुछ और रही होगी, लेकिन अतिउत्साह में  विवेक को भी सक्रिय रखना चाहिए। अधिकारी के बयान से दु:खी&amp;nbsp; जशपुर जिले  के लोगों ने प्रतिकार किया और जशपुर बंद करके दिखा दिया कि वे 'घटिया बयान'  का गाँधीवादी तरीके से प्रतिकार कर सकते हैं। शालीन तरीका यही है। हालांकि  जब मुख्यमंत्री ने हस्तक्षेप किया को उच्चाधिकारी महोदय को अपनी गलती का  अहसास हुआ और स्वीकार किया की उन्हें ऐसा नहीं कहना था। दूसरे अफसर भी इस  उच्चाधिकारी के बयान पर आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं। आदमी जितना ऊँचा उठे,  उसे उतना ही विनम्र होना चाहिए, लेकिन इस सोच पर बहुत कम लोग टिक पाते हैं।  फिर अगर आदमी कलेक्टर बन जाए तो बहुत कम लोग मनुष्यों जैसा आचरण करते हैं।  यह पद की अपनी बुराई है, जिसके शिकार हो कर अनेक लेग बहक जाते हैं। बहरहाल  घटिया बयान से आक्रोशित जशपुर जिले के बंद ने यह बात सिद्ध कर दी कि जशपुर  जिले के लोग भालेभाले तो हैं, मगर उनकी अस्मिता को ललकारने पर 'भोले' लोग  शालीनता के साथ ''भाले'' भी बन सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;मिशनरियों की मदद...?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ के एक आईएएस अधिकारी पर मिशनरियों की मदद करने का आरोप लगा है।  और यह आरोप भाजपा सरकार के एक वरिष्ठ नेता ने लगाया है। बनवारीलाल अग्रवाल  विधानसभा के उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं। उनके बयान को हल्के से नहीं लिया जा  सकता। उन्होंने अधिकारी का नाम ले कर खुलेआम यह बात कही है कि उनके  संरक्षण में मिशनरियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसमें दो राय नहीं  कि छत्तीसगढ़ में धर्म परिवर्तन का खेल चल रहा है। हालांकि धर्म परिवर्तन  के लिए आदिवासियों की सेवा को माध्यम बनाया जाता है। मिशनरियों की सेवा  भावना देख कर बाद में लोग धर्मपिरवर्तन कर लेते हैं। यही कारण है कि कल्याण  आश्रम जैसी संस्तोँ सामने आई और वे आदिवासियों की सेवा में लगी हुई  हैं।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;b&gt;कुष्ठ रोगी महिला को गाँव से निकाला...&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में विकास की&amp;nbsp; गंगा बह रही है मगर पिछड़ेपन का नाला भी बजबजाते  रहता है। अनेक तरह की बुराइयाँ समय-समय पर सामने आती रहती हैं। कैंसर की  तरह कुष्ठ रोग भी राज्य की एक बड़ी समस्या है। सरकार इससे निपटने की काशिश  तो कर रही है, मगर जन जागृति की कमी के कारण अनेक लोग कुष्ठ को छूत की  बीमारी भी समझने की भूल कर बैठते हैं। यही कारण है कि पिछले दिनों एक गाँव  में एक पति ने अपनी कुष्ठ-पीडि़त पत्नी को घर से निकाल दिया, न केवल पति ने  निकाला वरन पूरे गाँव के लोगों ने महिला का गाँव से बाहर निकाल दिया।  महिला अपने बच्चों के साथ दर-दर भीख मांगने पर मजबूर हो गई। कुष्ठ रोग  साध्य है। यही कारण है कि महात्मा गाँधी ने अपने समय में एक कुष्ठ रोगी की  सेवा करके संदेश दिया था कि उइस रोग से दूर भागने की जरूरत नहीं है। अब एक  बार फिर यह अभियान चलना चाहिए ताकि गाँव के लोग जागरूक हों और कुष्ठ रोगी  को सामान्य मरीज समझ कर उसकी सेवा करें। एमडीटी की गोली खाने से कुष्ठ रोग  धीरेे-धीरे खत्म हो जाता है। इस बात का प्रचार जरूरी है। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;पिता-पत्नी समेत अनेक लोगों की हत्या...&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;राजधानी में पिछले दिनों एक ऐसा व्यक्ति पुलिस की गिरफ्त में आया जिसने&amp;nbsp;  अपने पिता की, पत्नी की, और मामा ससुर समेत कम से कम सात लोगों की निर्मम  हत्याएँ कर दीं। पिता को चलती ट्रेन से धकेल दिया था। सिर्फ सनक में। अरुण  चंद्राकर नामक यह युवक मनोरोगी नहीं है, स्वस्थ है। लेकिन स्वारथ के चक्कर  में पिछले दो-चार सालों के भीतर उसने अपने ही लोगों को मौत के घाट उतार  दिया। पिता मामा ससुर, साला, साली समेत अन्य लोगों की जानें ले ली। हत्या  कारण ा कोई खास नहीं रहता था।&amp;nbsp; इस भयंकर हत्यारे को देख कर नहीं लगता कि  इसने इतनी हत्याएँ की होंगी। हर हत्या के पीछे कहीं आर्थिक मामला था, तो  कहीं अपना अहम। समाज में ऐसे लोग भी बढ़ रहे हैं जो असहिष्णुता के शिकार हो  कर अपने सगों की जान लेने से भी नहीं पिचकते। इसके पहले बी कुछ मामले  सामने आ चुके हैं, जब जमीन या पैसे के विवाद के कारण अपनों ने ही अपनों की  जान ले ली। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;नकलचोर डॉक्टर की उपाधि छीनी&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;पी-एच.डी&amp;nbsp; करने के मामले में कभी-कभी यह भी सुनने में आता है कि लोग  इधर-उधर का मैटर जोड़-जाड़ कर उपाधि प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन पिछले  दिनों रायपुर में एक ऐसा मामला सामने आया जिसमें एक प्राध्यापक ने एक नहीं  अनेक पृष्ठ जस के तस उतार दिए और पीएचडी की उपाधि हसिल कर ली। बाद में जब  पता चला तो लोगों की आँखें फटी की फटी रह गई। आखिर पं. रविशंकर शुुक्ल  विश्वविद्यालय ने गुरुदास तोलानी नामक व्यक्ति की उपाधि वापस लेने का  निर्णय किया। उस पर और भी मामले चलेंगे ही, मगर इस घटना से पीएचडी करने  वालों की साख पर बट्टा लगा है। अपनी नौकरी में तरक्की, वेतनमान में  बढ़ोत्तरी आदि के चक्कर में अनेक लोग पीएचडी करते हैं। उनकी मंशा शोध नहीं  होती, इसीलिए ऐसे अपराध हो जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;पत्रकार के हत्यार कहाँ छिपे बैठे हैं?&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;रायपुर के पास एक कस्बा है छुरा। एक साल पहले यहाँ के एक पत्रकार उमेश  राजपूत को कुछ अज्ञात लोगों ने गोली मार दी थी। लेकिन हत्यारे अब तक लापता  हैं। बिलासपुर के पत्रकार सुशील पाठक के हत्यारे भी पकड़ से बाहर हैं। इस  मामले में पुलिस की अकर्मण्यता को पत्रकार ही नहीं आम लोग भी कोस रहे हैं,  लेकिन इससे पुलिस की सेहत पर कोई असर नहीं पडऩे वाला। पिछले दिनों  पत्रकारों ने छुरा में धरना बी दिया और पुलिस की लापरवाही की निंदा भी की।  उमेश राजपूत की पत्रकारिता को याद भी किया। सच तो यही है कि पत्रकार या कोई  भी केवल इतना ही कर सकता है। असली काम तो पुलिस को करना है हत्यारों तक  पहुँचने का। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-3158499794609271725?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/3158499794609271725/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=3158499794609271725' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/3158499794609271725'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/3158499794609271725'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='छ्त्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-4417012490896202439</id><published>2011-10-18T06:15:00.000-07:00</published><updated>2011-10-18T06:18:48.059-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी / गिरीश पंकज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='/  गिरीश पंकज'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ की चिट्ठी /</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="color: magenta; font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;छत्तीसगढ़ में आंखफोड़ काँड....?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;छत्तीसगढ़ में आँखफोड़ कांड हो गया मगर इसकी व्यापक  हलचल न हुई, क्योंकि कांड सरकारी था। डाक्टरों ने किया था। जी हाँ, सरकारी  डॉक्टरों ने। बात अधिक पुरानी नहीं है। कुछ दिन पहले की है। बालोद में  स्वास्थ्य शिविर लगाया गया। वहाँ मोतियाबिंद से पीडि़त लोगों को आपरेशन  होना था। हुआ भी। मगर ऐसा आपरेशन हुआ कि 25 लोगों ने अपनी रौशनी  हमेशा-हमेशा के लिए गँवा दी। माँझी जब नाव डुबोए तो उसे कौन बचाए? यही  कहावत लोगों को याद आ रही है। सरकारी ऑपरेशन में ऐसे गैर जिम्मेदार डाक्टर  भेजे जाएँगे, जो लोगों की आँखों की रौशनी ही छीन लें, तो उन्हें डॉक्टर कहा  जाए या डिफाल्टर? डॉक्टर को भगवान का दूत कहा जाता है मगर जब सरकारी  खानापूर्ति का भूत सवार हो जाए तो भगवान का दूत कब शैतान के दूत में बदल  जाए, कहना कठिन होता है। अब पीडि़त लोग मांग कर रहे हैं, कि दोषी डॉक्टरों  पर कड़ी कार्रवाई की जाए, मगर प्रश्न यही है कि क्या कार्रवाई होगी?  क्योंकि डॉक्टर लीपापोती करने में लगे हुए हैं। अगर डाक्टरों पर कार्रवाई न  हुई तो सरकारी स्वास्थ्य शिविरों पर प्रश्न चिन्ह लगेंगे, लोग डरेंगे कि  सरकारी शिविर में जा कर रिस्क लेना ठीक नहीं। इसके पहले भी नसबंदी के बाद  एक-दो लोगों के मौत की खबर भी आ चुकी है। इसलिए यह जरूरी है कि स्वास्थ्य  शिविर बला टालने के उपक्रम न बनें, वरन इन शिविरों में सर्वाधिक जिम्मेदार  और अनुभवी डॉक्टरों को ही भेजा जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;जात न पूछो नेता की, मगर...&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कबीरदास जी छह सौ साल पहले कह गए कि  जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मगर हमारा समाज अभी तक जाति-पाति और  धर्म के खूँटे से बँधा है। छत्तीसगढ़ के पूर्वमुख्यमंत्री अजीत जोगी की  जाति क्या है, इसको ले कर बहुत पहले से विवाद बना हुआ है। वे आदिवासी है,  या ईसाई, यही पता नहीं चल पा रहा है।&amp;nbsp; जोगी खुद को आदिवासी कहते हैं।  उन्होंने जब चुनाव लड़ा था तो अपनी जाति आदिवासी बताई थी। याचिकाकर्ता ने  कहा कि जोगी ईसाई हैं।&amp;nbsp; इसी मामले की जाँच हो रही है। मामला सुप्रीम कोर्ट  तक पहुँच गया है। सुको ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वही पता करे  कि जोगी की जाति क्या है। अब आनन-फानन में एक हाईपॉवर समिति बनाई गई है, जो  पता करेगी कि जोगी की जाति क्या है। स्वाभाविक है कि उनके पिता और दादा की  जाति पता की जाएगी। कुछ न कुछ तो सच्चाई सामने आएगी ही। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;भीड़ की चिंता में....&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;स्वाभाविक ही है कि किसी बड़े नेता की  रैली निकले और भीड़ के बारे में न सोचा जाए? भाजपा के पीएम इन वेटिंड के  रूप में चर्चित नेता लालकृष्ण आडवाणी रथ यात्रा पर हैं। यह यात्रा 22  अक्टूबर को रायपुर आएगी। आडवाणी जी की सबा भी होगी। स्वाभाविक है इसके लिए  भीड़ चाहिए। इस हेतु भाजपा के बड़े नेता पिछले दिनों बैठे और विचार मंथन  किया कि कैसे अधिक से अधिक भीड़ जुटाई जाए। पिछले दिनों जब नेताओं की बैठक  हुई तो बताते हैं कि किसी एक नेता ने साफ-साफ कहा कि अनेक लोग अभी  मलाईदारों पदों पर काबिज हैं, इनको भीड़ की जिम्मेदारी सौंपी जाए। सचमुच  मलाईदार पदवाले कब काम आएँगे? कुछ लोगों के बारे में सभी लोग जानते हैं, कि  ये लोग अपना-अपना घर भरने पर तुले हैं, यही समय तो है पार्टी की सेवा का,  कुछ मेहनत करें, कुछ गाँठ ढीली करें और लोगों को राजधानी रायपुर तक ला कर  आडवाणी जी की सभा को सफल बनाएँ।&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;छत्तीसगढ़ में मुन्नाभाइयों की भरमार?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बालोद में लापरवाह  डॉक्टरों के कारण अनेक लोगों की आँखें चली गईं, क्या ये लोग मुन्नाबाई  एमबीबीएस किस्म के लोग तो नहीं थे? मामले की जाँच हो तो ऐसे डॉक्टरों की  डिग्रियाँ भी देख लेनी चाहिए। आजकल छत्तीसगढ़ में ऐसे अनेक छात्रा सामने आ  रहे हैं, जिन्होंने फर्जी तरीके से मेडिकल में दाखिला पाने में सफलता हासिल  कर ली है लेकिन अब जा कर पोल खुली तो भागते फिर रहे हैं। तैंतीस छात्रों  पर जुर्म दर्ज हो चुका है। और 24 छात्र ऐसे हैं जो संदेह के दायरे में हैं।  लगभग सौ छात्रों पर यह आरोप लगा कि उन्होंने फर्जी तरीके से मेडिकल कालेज  में प्रेवश लिया। जिन छात्रों की बुनियाद ही फर्जी है, वे कल को पढ़ाई में  भी तिकड़मों के जरिए परीक्षाएँ भी पास कर सकते हैं। ऐसे लोग कल डॉक्टर  बनेंगे और किसी का आपरेशन करेंगे तो स्वाभाविक है कि मरीज भगवान का ही  प्यारा हो जाएगा। इसलिए यह जरूरी है कि फर्जी छात्रों पर कड़ी कार्रवाई की  जाए और उनको अपात्र घोषित किया जाए। इस बात की भी सावधानी बरती जाए कि  भविष्य में कोई भी छात्र फर्जी ढंग से प्रवेश पाने के हथकंडे न अपनाए। वरना  होता यही है कि जो प्रतिभाशाली है, वे तो किसी कारणवश रह जाते हैं, मगर  फर्जी छात्र प्रवेश पाकर एक तरह से योग्य लोगों का ही हक मारते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;छत्तीसगढ़ की&amp;nbsp; 'स्वर्णिम' खेल प्रतिभाएँ&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में खेल  प्रतिभाओं की कमी नहीं है। अगर ईमानदारी से तलाश की जाए तो हर क्षेत्र में  यहाँ के खिलाड़ी चमक सकते हैं। मौका मिलना चाहिए। अभी मौका मिला और  छत्तीसगढ़ के दो खिलाडिय़ों ने छत्तीसगढ़ को गौरवान्वित कर दिया। दक्षिण  अफ्रीका&amp;nbsp; के कामनवेल्थ गेम में छत्तीसगढ़ रुस्तम सारंग और जगदीश विश्वकर्मा  ने स्वर्णपदक जीत कर साबित कर दिया कि यहाँ के खिलाडिय़ों को मौका मिल जाए  तो वे छत्तीसगढ़ का नाम रौशन कर सकते हैं। राज्य में खेल गतिविधियाँ बढ़ तो  रही हैं, मगर अधिकांश खेल संगठनों में पैसे वालों का कब्जा है। कुछ लोगों  की सामाजिक छवि भी ठीक नहीं हैं। ये लोग वास्तविक खेल प्रतिभाओं के साथ  न्याय नहीं कर सकते। इसलिए खेल संघों में पूर्णकालिक खिलाडिय़ों को ही  पदाधिकारी बनाना चाहिए, न कि नेताओं या उद्योगपतियों को। उनको केवल सदस्य  बनाया जाए और आर्थिक मदद ली जाए, लेकिन जिम्मेदार पद पर बैठाना उचित नहीं,  क्योंकि ये लोग भाई-भतीजावाद और सामंतशाही के शिकार हो जाते हैं। फिर भी  प्रतिभा अपना हक प्राप्त कर ही लेती हैं। जैसे अभी दो लोगों ने स्वर्ण पदक  जीत कर अपनी प्रतिभा को साबित कर दिखाया। ये लोग गाँव के हैं और सीमित  साधनों के सहारे साधना करके यहाँ तक पहुँचे। खेल संघ ऐसे ही लोग की तलाश  करे। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;गुणवंत व्यास नहीं रहे&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यथा नाम तथा गुण। ऐसे थे 72 वर्षीय प्रो.  गुणवंत व्यास। संगीत गुरू के रूप में उनकी खास पहचान थी। अभी पिछले महीने  उन्हें काका हाथरसी संगीत सम्मान से नवाजा गया था। राज्य सरकार का  प्रतिष्ठित&amp;nbsp; चक्रधर सम्मान भी उन्हें मिल चुका था। राज्य की हर बड़े  महत्वपूर्ण सांगीतिक आयोजन में व्यास जी की उपस्थिति रहती थी। उनके सिखाए  अनेक छात्र आज संगीत की दुनिया में अपने मुकाम पर हैं। पिछले कुछ दिनों से  उनकी तबीयत खराब थी। अचानक दो दिन पहले उनका चला जाना संगीत प्रेमियों को  दुखी कर गया। संगीत की बारीकियाँ सिखाना और उसी तरह जीवन को संगीतमय बहनाए  रखने की कला के धनी थे। उन्होंने साहित्य की भी सेवा की। कुछ गुजराती  रचनाओं का उन्होंने से हिंदी अनुवाद भी किया था.&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #888888;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-4417012490896202439?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/4417012490896202439/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=4417012490896202439' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/4417012490896202439'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/4417012490896202439'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='छत्तीसगढ़ की चिट्ठी /'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-276373551857670512</id><published>2011-09-22T22:30:00.000-07:00</published><updated>2011-09-22T22:32:17.703-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छ्त्तीसगढ़ की डायरी/ गिरीशपंकज'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ में राजयोग-सा वैभव  भोग रहे अफसर ....</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&amp;nbsp;&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;हर अफसर के कमरे में 'सीसी टीवी'-कैमरे  लगाये, तब पूरा  सिस्टम सुधार जाएगा&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;गिरीश पंकज&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; पिछले दिनों गाँव से आये एक व्यक्ति को अपने काम के सिलसिले में कुछ  ''बड़े'' अफसरों से मिलना पडा. उसे अफसरों के आलीशान चेम्बरों को निकट से  देखने&amp;nbsp; का मौका मिला, तो वह हतप्रभ रह गया. उसने अपने मन की बात मुझसे शेयर  की. उसका यही कहना था कि जनता की गाढ़ी कमाई किस तरह विलासिता में खर्च की  जा रही है? मेरे मित्र की बातों पर मैं विचार करने लगा, वह ठीक कह रहा  था.मैंने भी विलासितापूर्ण जीवन जीने के पक्षधर अफसरों को निकट से देखा  है.&amp;nbsp; हमारे मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह का कक्ष भी मैंने देखा है. आप को  आश्चर्य होगा कि वहाँ ऐसा कोई तामझाम नजर नहीं आता, जितना कुछ अफसरों के  यहाँ नज़र आता है. मुख्यमंत्री के&amp;nbsp; कार्यालय में एक सादगी है. और सच तो यही  है कि सादगी में ही सौन्दर्य है , लेकिन इस राज्य के कुछ छोटे-बड़े अफसर  वैभव-विलासपूर्ण सुविधाए जुटाने में इतना आगे निकल गए है कि मत पूछिए. समझ  में नहीं आता कि ये प्रशासन चलाने के लिये बैठे हैं या राज्य की जनता के  पैसों पर ऐश करने ? चकाचक दीवारें, बेहद कीमती टेबल-कुर्सियां और भव्य  दिखाने वाले सोफसेट्स, कमरे में लगा महंगा से महँगा एलसीडी टीवी. और भी  अन्य सुविधाए. जैसे महंगे मोबाइल सेट, लेपटाप, और सरकारी पैसे से खरीदी गई  बेशकीमती करें आदि..ऐसा&amp;nbsp; नवाबी ठाठ गुलामी के दौर में तो समझ में चल जाता,  मगर लोकतंत्र में यह अफसरी- आडम्बर किसी भी देशप्रेमी को चुभ सकता है.&amp;nbsp; मगर  यह कटुसत्य है कि अफसर छत्तीसगढ़ में राजयोग-सा वैभव&amp;nbsp; भोग रहे है. अफसर  बड़े चालाक&amp;nbsp; होते है. ये जनप्रतिनिधियों को भी विलासिता का स्वाद चखाने की  कोशिश करते है, इसलिये गाँव का सीधा-सदा नेता मंत्री बनाने के बाद सामंती  मिजाज़ में आ जाता है. इसके पीछे अफसरों का षड्यंत्र&amp;nbsp; होता है. कुछ अफसर  अपनी सुविधाओं को बटोरने के लिये पहले मंत्रियों को खुश करते हैं. अफसरों  को विदेश घूमना हो, तो वे मंत्रियों के लिये कार्यक्रम बनाते हैं और खुद भी  चिपक जाते हैं. एक दशक से यही हो रहा है. अफसरियत इतनी हावी है कि वह साफ़  नज़र आती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; आदमी जिस वातावरण में रहेगा उसका असर उसकी सोच पर भी पडेगा.  लेकिन यहाँ के अफसर&amp;nbsp; 'सादा जीवन को तुच्छ विचार' समझते है.&amp;nbsp; क्या छोटे,  क्या बड़े, हर स्तर के अफसर जनता के पैसों का दुरुपयोग अपने-अपने दफ्तरों  को चमकाने में कर रहे है. इस तरफ अगर मुख्यमंत्री ध्यान दे कर अफसरों पर  लगाम कस दें, तो सब ठीक हो&amp;nbsp; जायेंगे. अब मंत्रालय और अन्य दफ्तर धीरे-धीरे  नए रायपुर में शिफ्ट होंगे, वहाँ इस बात पर ध्यान देने की ज़रुरत है कि  पुराने फर्नीचरों,&amp;nbsp; सोफासेटों आदि से ही काम चलाया जाये. तामझाम पर  अतिरिक्त&amp;nbsp; खर्च न किया जाये. वैभव पूर्ण दफ्तर, कारों आदि से विकास नहीं  होता, विकास के लिये त्वरित गति से कामकाज निपटाना ज़रूरी है. उस दिशा में  हमारे अफसर बेहद ढीले हैं. जन प्रतिनिधियों के आदेशों को भी दरकिनार रख  देने वाले अनेक अफसर स्वेच्छाचारिता के कारण बदनाम हैं. इन पर मुख्यमंत्री  जी जब तक लगाम नहीं कसेंगे, प्रदेश का भला नहीं हो सकेगा. वरना इन अफसरों  के कराण प्रदेश का बहुत-सा धन फिजूलखर्ची&amp;nbsp; में ही&amp;nbsp; नष्ट हो रहा है. इसे  रोकना ज़रूरी है. &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; इस चिंतन को समझने की ज़रुरत है कि&amp;nbsp; सरकारी दफ्तर, या मंत्रालय  आदि ऐसे भव्य नहीं होने चाहिए कि गाँव के आदमी को घुसने में भी डर लगे. ये  सबके लिये खुले रहने चाहिए. और बेहद सादगीपूर्ण भी होने चाहिए. . ''सादगी  के साथ कार्य'' अपने राज्य का नारा होना चाहिए. सरकारी&amp;nbsp; कार्यालय जनता के  काम के लिये होते है, तामझाम को दिखाने के लिये नहीं. अगर सूचना के अधिकार  के तहत ब्योरे निकलवाएँ जाएँ तो असलियत सामने आ सकती है, कि एक-एक दफ्तर की  साज-सज्जा पर कितना खर्च हुआ है. यह बर्बादी है और एक तरह का भ्रष्टाचार  ही है. आज हर बड़े अफसर के भव्य कक्ष में महंगे से महंगा टीवी दीवार पर  चस्पा है? लोग पूछते हैं कि ये अफसर दफ्तर में काम करना चाहते हैं या टीवी  देखना ? लगना ही है तो सरकार हर अफसर के कमरे में 'सीसी टीवी' और कैमरे  लगाये, तब पता चलेगा कि ये अफसर किस तरह काम करते हैं. ऐसा हो गया तो पूरा  सिस्टम ही सुधार जाएगा. जैसे सूचना का अधिकार कानून के कारण अधिकारी&amp;nbsp;  कुछ-कुछ डरने लगे हैं, उसी तरह अगर हर अफसर क्लोज़ सर्किट टीवी की जद में आ  जाएगा, तो वह काम करने लगेगा. उसे अपनी छवि कि चिंता रहेगी. इसलिये कम से  कम नए रायपुर में तो हर अधिकारी के कमरे में क्लोजसर्किट&amp;nbsp; लगाये जाएँ, ताकि  पारदर्शिता बनी रहे. और द्र्तुगति से काम हो. और यह निर्देश तो अनिवार्य  रूप से दियें जाएँ कि दफ्तर के वैभव को बढ़ाने की बजाय काम की&amp;nbsp; गति पर  ध्यान दिया जाये. लगभग हर सरकारी दफ्तर महंगे से महंगे सामानों&amp;nbsp; के  इस्तेमाल कि कोशिश में लगे रहते है. सभी की यही मानसिकता&amp;nbsp; नज़र आती है कि  जितना भव्य&amp;nbsp; दफ्तर होगा, उतना नाम होगा, लेकिन नाम काम से होता है. यह बात  समझ में पता नहीं कब आयेगी? व्यावसायिक घराने या निजी कंपनियों के दफ्तर  भव्य रखने की प्रथा चला पडी है, अब उसी रास्ते पर सरकारी दफ्तर भी चलाने की  कोशिश करेंगे, तो यह जनता के पैसों का दुरुपयोग ही कहलायेगा. इस दिशा में   मुख्यमंत्री ही कुछ संज्ञान लेंगे तो बात बनेगी, क्योंकि वे सादगी के साथ  रहने वाले नेता हैं. अगर फिजूलखर्ची न रोकी गई तो यह सिलसिला चलता रहेगा.  नियम तो यही बनाना चाहिए कि कोई भी अफसर अपने दफ्तर को संवारने से पहले  उचित कारण बताये, वरना जनता के पैसों का दुरुपयोग इसी तरह जारी रहेगा.  विकासशील राज्य का एक-एक पैसा महत्वपूर्ण है. यह अफसरों या जनप्रतिनिधि  किसी की भी&amp;nbsp; विलासिता पर खर्च नहीं होना चाहिए.   &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-276373551857670512?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/276373551857670512/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=276373551857670512' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/276373551857670512'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/276373551857670512'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/09/blog-post_22.html' title='छत्तीसगढ़ में राजयोग-सा वैभव  भोग रहे अफसर ....'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-5887115690866052334</id><published>2011-09-21T06:13:00.000-07:00</published><updated>2011-09-21T06:24:42.299-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गिरीश पंकज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='samachar'/><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;h3 class="post-title" style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="color: #990000;"&gt;&lt;i&gt;&lt;span style="font-size: small; font-weight: normal;"&gt;&lt;b&gt;सु&lt;/b&gt;&lt;b&gt;प्रिया रॉय को आलइंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ने सम्मानित किया.&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;h3 class="post-title" style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: x-large;"&gt;आलोकजी की याद में पुरस्कार दिया जायेगा&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;div class="post-header-line-1"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-TBq7i-bj8Jk/TnctneV3d4I/AAAAAAAAAZI/V-awUrRjAy8/s1600/alokji.jpg" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" src="http://2.bp.blogspot.com/-TBq7i-bj8Jk/TnctneV3d4I/AAAAAAAAAZI/V-awUrRjAy8/s400/alokji.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;मेरे&lt;/b&gt; दिवंगत बड़े भ्राता-तुल्य एक समूची पीढी के आइडियल बन चुके जंगजू पत्रकार &lt;b&gt;आलोक तोमरजी&lt;/b&gt;  के बारे में अब कुछ भी कहने-लिखने में जो तकलीफ होती रही है उसका बयान भी  पीड़ा देता है. इसी साल 20 मार्च को उनके देहावसान के अकस्मात् घावों को  भरने में समय लगेगा, यादें ही संबल बनेंगी. यादों के समंदर उफनते व बिछोह  की हिलोरें जगाते है.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके बारे में आइसना के महासचिव &lt;i&gt;विनय डेविड &lt;/i&gt;ने जो मेल भेजा है वह  सराहनीय है. स्वागत योग्य है. संगठन के प्रांतीय अध्यक्ष अवधेश भार्गव ने  आलोक तोमर की स्मृति में हर साल एक चयनित जांबाज पत्रकार को &lt;i&gt;पच्चीस हजार रुपये&lt;/i&gt; का पुरस्कार देने की घोषणा की है. यह घोषणा&lt;i&gt; भोपाल&lt;/i&gt; में की गयी जहां आलोकजी की पत्नी &lt;i&gt;सुप्रिया रॉय&lt;/i&gt; को आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ने सम्मानित किया.&lt;br /&gt;एक धूमकेतू की तरह हिन्दी बैल्ट पर छा जाने वाले पत्रकार आलोकजी ने अर्श से  फर्श तक का सफ़र तय किया और वे गर्दिशों के दौर में भी वे कभी विचलित नही  हुए. वे एक जंगजू की तरह पत्रकारिता की जद्दोजहद में जमे और डट कर  चुनौतियों से लड़े.  लेखक के रूप में आलोकजी एक रोल माडल बन बीमारी के  दिनों में भी कीमोथेरेपी कराते हुए भी लिखते . खरा लिखते . तथ्यों के साथ  लिखते और आख़िरी के दिनों में उन्होंने बड़े-बड़ों  को उधेड़ डाला. सच  बोलने के खतरे जिए . कार्टून विवाद में जेल भी गए मगर तन कर खड़े  रहे .  उनमें जोखिम लेने का जज्बा था. किसी ने लिखा अगर खबर है तो है ,चाहे वो  बरखा दत्त हों वीर संघवी हों या उनके अभिन्न मित्र ओमपुरी हों या फिर कोई  और. अगर खबर का वो हिस्सा हैं तो आप आलोक जी से पास-ओवर की उम्मीद बिलकुल न  करें. वे छाप देते थे डंके की चोट पर. इस दौर में जहां पत्रकारिता की  दुनिया बाजारु हो चुकी है, उस दौर में आलोक तोमरजी ने गंभीर सरोकारों वाली   पत्रकारिता  की. पत्रकारिता को लेकर उनके  बारे में उनके शब्दों में ही  कहूँ तो दो बार तिहाड़ जेल और कई बार विदेश हो आए  और उन्होंने  भारत में  कश्मीर से ले कर कालाहांडी के सच बता कर लोगों को स्तब्ध भी किया . दिल्ली  के एक पुलिस अफसर से पंजा भिडा कर जेल भी गए . झुकना तो सीखा ही नही. वे  दाऊद इब्राहीम से भी मिले और सीधी-सपाट बात की जिसे सरेआम छापा. जब उनको एक  कार्टून मामले में जेल जाना पड़ा तो साफ़ कहा एक सवाल है आप सब से और अपने  आप से। जिस देश में एक अफसर की सनक अभिवक्ति की आजादी पर भी भरी पड़ जाए,  जिस मामले में रपट लिखवाने वाले से ले कर सारे गवाह पुलिस वाले हों, जिसकी  पड़ताल, 17 जांच अधिकारी करें और फिर भी चार्ज शीट आने में सालों लग जायें,  जिसमें एक भी नया सबूत नहीं हो-सिवा एक छपी हुई पत्रिका के-ऐसे मामले में  जब एक साथी पूरी व्यवस्था से निरस्त्र या ज्यादा से ज्यादा काठ की तलवारों  के साथ लड़ता है तो आप सिर्फ़ तमाशा क्यों देखते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;समर शेष है, नही पाप का भागी केवल व्याध &lt;br /&gt;जो तटस्थ है, समय लिखेगा, उनका भी अपराध&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनसत्ता में अपनी मार्मिक खबरों से चर्चा में आये आलोक तोमरजी  ने सिख  दंगों से लेकर कालाहांडी की मौत को इस रूप में सामने रखा कि पढ़नेवालों का  दिल हिल गया.  कुछ वैसे ही जैसे हर खबर सिर्फ खबर नहीं होती ,कभी कभी  ख़बरों को अखबारनवीस जीता भी है उन्हें खाता भी है उन्हें पीता भी  है,ख़बरों को जीने वाले ही आलोक तोमर कहलाते हैं.   मौत एक दिन सबको आनी   है. अन्ना हजारे ने भी कहा है की उनको सुरक्षा नही चाहिए क्योंकि हार्ट   अटैक तो कोई नही रोक सकता. आलोक  कैंसर से लड़े ,लड़ते शेर ही हैं ,बाकी  आत्मसमर्पण कर देते हैं ,एक ऐसे वक्त में जब  लड़ने की बात  पर है तो सब  चाहते हैं इस देश में भगत सिंह पैदा तो हो  मगर पड़ोसी के यहाँ हो. इस दौर  में  आलोक जी का ये जज्बा था कि संघर्ष में वे झुके नही, रुके नही., थके  नही, लड़े आन बान शान से और मूल्यों के लिए लड़े. कलम की खातिर लड़े.  ख़बरों की खतिर लड़े. पूछा जाए उन सिख परिवारों से जिनको न्याय दिलाने के  लिए वे लड़े. जिनके खिलाफ एक शब्द भी लिखने से लोग कतराते थे  ,लेकिन आलोक  जी ने साहस के साथ उनके बारे में भी लिखा.&lt;br /&gt;आलोक तोमरजी ने सत्रह साल की उम्र में एक छोटे शहर के बड़े अखबार से  जिंदगी शुरू की. दिल्ली में &lt;i&gt;जनसत्ता&lt;/i&gt;  में  दिल लगा कर काम किया और अपने संपादक गुरू प्रभाष जोशी के हाथों छह  साल में सात पदोन्नतियां पा कर विशेष संवाददाता बन गए। फीचर सेवा शब्दार्थ  की स्थापना 1993 में कर दी थी और बाद में इसे समाचार सेवा डेटलाइन  इंडिया.कॉम बनाया।&lt;br /&gt;11 मार्च  को उन्होंने लिखा &lt;br /&gt;मै डरता हूं कि मुझे &lt;br /&gt;डर क्यो नहीं  लगता &lt;br /&gt;जैसे कोई कमजोरी है &lt;br /&gt;निरापद होना.. &lt;br /&gt;वे जीवन भर जुझारू रहे.. आइसना (आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन)  द्वारा महानतम लेखनी के धनी और हजारों पत्रकारों के प्रेरणा-स्रोत आलोक  तोमर की स्मृति में हर साल किसी जांबाज पत्रकार को पच्चीस हजार रुपये का  पुरस्कार दिए जाने की घोषणा वंदनीय और अभिनंदनीय है.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-vs6I87xc3LE/TnkTPABfQ7I/AAAAAAAAAZQ/nGYKAS0TBa8/s1600/aisna%2Baward%2B2011.jpeg" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="230" src="http://3.bp.blogspot.com/-vs6I87xc3LE/TnkTPABfQ7I/AAAAAAAAAZQ/nGYKAS0TBa8/s400/aisna%2Baward%2B2011.jpeg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;संयोजक &lt;i&gt;आलोक मित्र मंच&lt;/i&gt; के डी दयाल और मेरी भी राय में भी दरअसल यह घोषणा तो &lt;i&gt;मध्य प्रदेश &lt;/i&gt;सरकार  को करनी चाहिए जिसे नाज होना चाहिए कि आलोकजी वहां जन्मे और देश-दुनिया  में मध्य प्रदेश का मान बढ़ाया. एक तरफ हम यह भी देखते हैं, &lt;i&gt;इंदौर प्रेस क्लब&lt;/i&gt;  ने भी घोषणा कर दी कि वे लोग हर साल भाषाई महोत्सव में एक यशस्वी पत्रकार  को आलोक तोमर की स्मृति में पुरस्कार देंगे ताकि आलोक तोमर के नाम व काम को  जिंदा रखा जा सके. इस घोषणा की खबरें भी प्रकाशित हुई मगर आइसना ने कम से  कम उनको सच्चे तौर पर याद तो किया है और आशा है&lt;i&gt; आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन&lt;/i&gt; इस वायदे को निभाएगा.&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: purple;"&gt;रमेश शर्मा&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: purple;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;span style="font-size: x-small;"&gt;(यायावर ब्लॉग)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-5887115690866052334?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/5887115690866052334/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=5887115690866052334' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/5887115690866052334'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/5887115690866052334'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/09/blog-post_21.html' title=''/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-TBq7i-bj8Jk/TnctneV3d4I/AAAAAAAAAZI/V-awUrRjAy8/s72-c/alokji.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-6242219886676533417</id><published>2011-09-19T10:35:00.000-07:00</published><updated>2011-09-20T05:13:44.545-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='/  गिरीश पंकज'/><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;h3 class="post-title" style="font-weight: normal;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;a href="http://sharmaramesh.blogspot.com/2011/09/blog-post_18.html"&gt;हम अपने सपने भी  हिंदी भाषा में ही देखते हैं&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; &lt;/h3&gt;&lt;div class="post-header-line-1"&gt;&lt;h2 class="date-header"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/h2&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-l5HBb26PlhI/Tnbi0CjRfYI/AAAAAAAAAY4/sibudRmW7iM/s1600/Pustak%2BLokarpan-1.JPG" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="181" src="http://2.bp.blogspot.com/-l5HBb26PlhI/Tnbi0CjRfYI/AAAAAAAAAY4/sibudRmW7iM/s400/Pustak%2BLokarpan-1.JPG" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;बालकोनगर &lt;/b&gt;में हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी &lt;i&gt;हिंदी दिवस&lt;/i&gt;  पर साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की अविरल धारा बहती रही. भारत  एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) प्रबंधन द्वारा आयोजित हिंदी  सप्ताह-2011 के अंतर्गत मुख्य कार्यक्रम बालकोनगर के सेक्टर-1 स्थित प्रगति  भवन में धूमधाम से मना ।&lt;br /&gt;वक्ताओं ने हिंदी भाषा की परंपरा, उसके मजबूत पक्षों तथा भाषा विकास में आने वाली बाधाओं के विषय में विस्तार से चर्चा की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;कार्यक्रम के मुख्य अतिथि दैनिक नई दुनिया, रायपुर के संपादक &lt;i&gt;रवि भोई&lt;/i&gt;, कार्यक्रम अध्यक्ष छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार&lt;i&gt; रमेश नैयर&lt;/i&gt;, विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार &lt;i&gt;गिरीश पंकज&lt;/i&gt;, राष्ट्रीय सहारा के ब्यूरो चीफ रमेश शर्मा, बालको के मानव संसाधन प्रमुख &lt;i&gt;अमित जोशी&lt;/i&gt; तथा बालको के प्रशासन महाप्रबंधक &lt;i&gt;के.एन. बर्नवाल&lt;/i&gt;  सहित अन्य विशिष्ट जनों की उपस्थिति में हिंदी सप्ताह के दौरान आयोजित  काव्य-पाठ, निबंध-लेखन और भाषण स्पर्धा के विजेता छात्र-छात्राओं को &lt;i&gt;पुरस्कार&lt;/i&gt; दिए गए ।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;श्री नैयर ने कहा कि मातृ भाषा हमारी सांसों में बसती है। हम अपने सपने भी  हिंदी भाषा में ही देखते हैं। प्रेम की भाषा हिंदी है। हमें अपनी भाषा पर  गर्व होना चाहिए।&lt;br /&gt;श्री भोई ने कहा कि हिंदी को आगे ले जाने के लिए स्कूलों और घरों में  बच्चों से शुरूआत करनी होगी। हिंदी भाषा संबंधी भेदभाव को समाप्त करना  होगा।&lt;br /&gt;श्री पंकज ने कहा कि हिंदी भाषा गैर हिंदी भाषियों के हाथों में अधिक  सुरक्षित है। उन्होंने गांधी जी के शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि सच्चा  सुराज हिंदी के रास्ते ही आ सकता है। &lt;br /&gt;श्री जोशी और श्री बर्नवाल का जोर था की कि हमें निश्चित ही अंग्रेजी और  अन्य भाषाएं सीखनी चाहिए परंतु यह भी ध्यान रखना होगा कि इससे राष्ट्रभाषा  को नुकसान न हो।&lt;br /&gt;6वीं से 8वीं कक्षा वर्ग के लिए आयोजित काव्य पाठ स्पर्धा में अंकुश पांडेय  को प्रथम, अंशु विश्वकर्मा को द्वितीय और प्रभात कुमार जांगड़े को तृतीय  पुरस्कार मिला। आयुश धर द्विवेदी और अम्बरीश पांडेय को सांत्वना पुरस्कार  दिया गया। 9वीं से 12वीं कक्षा के लिए आयोजित भाषण प्रतियोगिता में संजना  साहू को पहला पुरस्कार मिला। श्वेता तिवारी को दूसरा और प्रिया त्रिवेदी को  तीसरा पुरस्कार मिला। गौतम सिदार और रंजन कुमार सिंह को सांत्वना पुरस्कार  दिया गया। 9वीं से 12वीं कक्षा के लिए आयोजित निबंध लेखन में रंजन, कुमार  सिंह, शशांक दुबे और अविनाश तिवारी क्रमशरू पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर  रहे। शुभम यादव और दिशा चंद्रा को सांत्वना पुरस्कार दिया गया। निबंध लेखन  के 11वीं से 12वीं कक्षा वर्ग में श्रद्धा कुंभकार को पहला, किरण गोस्वामी  को दूसरा और रेणुका कंवर को तीसरा पुरस्कार दिया गया। प्रिया त्रिवेदी और  आयशा खातून को सांत्वना पुरस्कार मिला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतिथियों ने बालको आयोजित हिंदी सप्ताह की सराहना करते हुए स्पर्धा के प्रतिभागियों की हौसला अफजाई की।&lt;br /&gt;बालको के कंपनी संवाद महाप्रबंधक बी.के. श्रीवास्तव ने स्वागत उद्बोधन में  बताया कि छत्तीसगढ़ सरस्वती साहित्य समिति के सचिव   महावीर प्रसाद चंद्रा  ‘दीन’ द्वारा शेक्सपीयर के नाटक ‘ए मिडसमर नाइट्स ड्रीम’ के छत्तीसगढ़ी  भावानुवाद ‘मया के रंग’, समिति के कोषाध्यक्ष  रविंद्रनाथ सरकार रचित काव्य  संग्रह ‘सुबह का सूरज’, समिति के पदाधिकारी लोकनाथ साहू रचित नाट्य संकलन  ‘रंगविहार’ और समिति के पूर्व अध्यक्ष प्रमोद आदित्य  रचित काव्य संग्रह  ‘अगोरा’ का प्रकाशन बालको के सौजन्य से हुआ है.&lt;br /&gt;देवी सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम की शुरूआत हुई जिसमे  विभिन्न साहित्यिक संगठनों के पदाधिकारी, कोरबा के अनेक साहित्यकार,  बालकोनगर के विभिन्न स्कूल के शिक्षक-शिक्षिकाएं, बड़ी संख्या में  विद्यार्थी और बालको महिला मंडल की अनेक पदाधिकारी मौजूद थीं। कार्यक्रम का  संचालन छत्तीसगढ़ सरस्वती साहित्य समिति के अध्यक्ष शुकदेव पटनायक ने  किया। सचिव महावीर प्रसाद चंद्रा ने आभार जताया।  इस अवसर पर राष्ट्रीय  धर्म ऊर्जा के संपादक  विकास जोशी और दैनिक नई, दुनिया के सह-संपादक  सुनील  गुप्ता भी मौजूद थे।&lt;br /&gt;कार्यक्रम में अगले दिन काव्य गोष्ठी का आयोजन स्मरणीय रहा|&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-6242219886676533417?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/6242219886676533417/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=6242219886676533417' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/6242219886676533417'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/6242219886676533417'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/09/blog-post_19.html' title=''/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-l5HBb26PlhI/Tnbi0CjRfYI/AAAAAAAAAY4/sibudRmW7iM/s72-c/Pustak%2BLokarpan-1.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-5922992248380828631</id><published>2011-09-19T10:30:00.000-07:00</published><updated>2011-09-19T10:30:58.778-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-5922992248380828631?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/5922992248380828631/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=5922992248380828631' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/5922992248380828631'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/5922992248380828631'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title=''/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-8935091863895944829</id><published>2011-06-26T08:38:00.000-07:00</published><updated>2011-06-26T08:38:21.207-07:00</updated><title type='text'>दृष्टिपात: थोथा है आराधना का बालश्रम समाप्त करने का संकल्प</title><content type='html'>&lt;a href="http://drishtipatpatrika.blogspot.com/2011/06/blog-post_25.html"&gt;दृष्टिपात: थोथा है आराधना का बालश्रम समाप्त करने का संकल्प&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-8935091863895944829?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://drishtipatpatrika.blogspot.com/2011/06/blog-post_25.html' title='दृष्टिपात: थोथा है आराधना का बालश्रम समाप्त करने का संकल्प'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/8935091863895944829/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=8935091863895944829' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/8935091863895944829'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/8935091863895944829'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/06/blog-post_26.html' title='दृष्टिपात: थोथा है आराधना का बालश्रम समाप्त करने का संकल्प'/><author><name>अरुण कुमार झा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00993922860981766612</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-QDqU48vNtug/Tk_0IaPzrhI/AAAAAAAAA5M/RpomzB-sJag/s220/Arun%2BKumar%2BJha%2BEditor%2BDrishtipat%2BRanchi.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-7183912020559482637</id><published>2011-06-26T06:32:00.000-07:00</published><updated>2011-06-26T06:34:39.930-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गिरीश पंकज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="background-color: #f4cccc;"&gt;&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;सामंतीप्रवृत्तिवाले अफसरों का क्या किया जाए..? &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;u&gt;&lt;b&gt;&lt;/b&gt;&lt;/u&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;छत्तीसगढ़&lt;/b&gt; में सरकार निरंतर बेहतरी के काम करने की काशिशें कर रही है, मगर  यहाँ के कुछ अफसर अपनी हरकतों से सरकार की छवि खराब करने की कोशिशों में  लगे हैं। हर दूसरा अफसर करोड़ों की कमाई कर रहा है। जिसके यहाँ भी छापे  मारो, वह अरबपति निकलता है। यह तो अलग मुद्दा है, इससे भी महत्वपूर्ण है  अफसरों का जनता से व्यवहार। बहुत से अफसर जनप्रतिनिधयों को कुछ समझते ही  नहीं, उन्हें लगता है वे ही इस व्यवस्था के भाग्यविधाता है। इसलिए उनकी  हरकतें भी एकदम सामंती रहती है। हैं तो जनता के नौकर लेकिन आचरण ऐसा  करेंगे, कि वे शाह है या राजा-महाराजा है। पिछले दिनों बस्तर में ऐसा ही  वाकया देखने को मिला, जब दंतेवाड़ा के कलेक्टर ने दो चपरासियों को संडास  में बंद करवा दिया। चपरासियों का कसूर यही था, कि वे अपनी ड्यूटी में विलंब  से पहुँचे थे, इस कारण दोपहर के भोजन में विलंब हुआ था। कलेक्टर का गुस्सा  जायज था, मगर उन्होंने जो हरकत की, वह यही दर्शाता है कि उन्होंने अपने आप  को राजा ही समझ लिया था। आम लोगों का भी यही कहना है&amp;nbsp; कि ऐसी घटनाएँ तो सामंती दौर में हुआ करता था। लेकिन अब  लोकतंत्र है। किसी को भी दंडित करने के भी नियम-कायदे हैं। ऐसी मनमानी नहीं  चल सकती कि किसी को सजा देने के लिए संडास में ही बंद कर दिया जाए। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;span style="color: #990000; font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;शराबबंदी की दिशा में बढ़ता छत्तीसगढ़&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;छत्तीसगढ़  को 'धान का कटोरा' कहा जाता है लेकिन हालत यह हो गई है कि इसे कुछ लोग  'दारू की बोतल' भी कहने लगे हैं। अनेक गाँव ऐसे हैं, जहाँ स्कूल नजर नहीं  आते मगर, दारू की दुकान जरूर मिल जाती है। दो रुपए किलो चावल खा कर और दारू  पी कर बहुत से ग्रामीण टुन्न नजर आते हैं। छत्तीसगढ़ की यही स्थिति बनती  जडा रही थी। इसे लेकर यहाँ की महिलाओं में गुस्सा था। वे लगातार प्रदर्शन  भी करती रही। इन सब का असर अब जाकर हुआ है। पिछले दिनों प्रदेश के  मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने साफ-साफ कहा कि भले ही हमें राजस्व का नुसकान  उठाना पड़े, लेकिन हम शराबबंदी कर के रहेंगे। हालांकि यह काम एकदम से नहीं  होगा। धीरे-धीरे होगा, मगर होगा जरूर । वैसे पिछले दिनों सरकार ने निर्णय  लेकर 239 शराब दुकानों को तो बंद ही कर दिया है। यह भी निर्णय किया है कि  दो हजार से कम आबादी वाले गाँवों में शराब दुकानें नहीं खुलेंगी। सरकार  धीरे-धीरे ही सही, अब छत्तीसगढ़ को शराबबंदी की दिशा में ले जा रही है। अगर  ऐसा&amp;nbsp; हो गया तो कोई बड़ी बात नहीं कि देश-दुनिया में छत्तीसगढ़ का एक और  खूबसूरत चेहरा सामने आएगा।&amp;nbsp; शराबबंदी हो जाए तो छत्तीसगढ़ प्रगति के पथ पर  और तेजी केसाथ बढ़ेगा, इसमें दो राय नहीं। &lt;br /&gt;&lt;span style="color: lime; font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;पूर्व मुख्यमंत्री जोगी के बेटे की&amp;nbsp; पिटाई &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;छत्तीसगढ़ हो या अन्य  दूसरे कोई प्रांत,हर जगह राजनीति में माफियाओं को बोलबाला है। गुंडे बढ़  रहे हैं। वे लोकतंत्र में जीते हैं तो हैं मगर उन्हें बाहुबल पर ज्यादा  यकीन रहता है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ के पूर्वमुख्यमंत्री अजीत जोगी के  बेटे अमित को मध्यप्रदेश में कुछ गुंडों ने बुरी तरह पीट दिया। वहाँ भाजपा  की&amp;nbsp; सरकार है. अमित प्रदेश हो रहे एक उपचुनाव में प्रचार करने गए थे। दमोह  जिले की जबेरा सीट पर उपचुनाव हो रहा है, जहाँ से उनकी ममेरी बहन डा.  तान्या चुनाव लड़ रही है। स्वाभाविक था कि अमित बहन के प्रचार के लिए जाते,  लेकिन अब राजनीति में सहिष्णुता कम होती जा रही है। हिंसक लोग बढ़ रहे  हैं। ये लोग डंडे के सहारे प्रचार करने पर यकीन रखते हैं। हिंसा के कारण  अमित की आँखें में गंभीर चोट पहुँची। हाथ भी जख्मी हुआ है। कहते हैं, कि  गुंडे लोग स्व. अर्जुन सिंह के बेट अजय सिंह पर हमले की तैयारी में थे।  अमित अजय सिंह की कार में सवार थे, इसलिए गलतफहमी में पिट गए। लेकिन इस  चक्कर में कुछ भी हो सकता था। &lt;br /&gt;&lt;span style="color: #cc0000; font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;एक राज्य जहाँ पर्चे लीक हो जाते हैं...?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ शैक्षणिक  नक्शे में अभी अपनी जगह नहीं बना सका है। और लगता है शिक्षा माफिया ऐसा  होने भी नहीं देगा। पिछले दिनों पीएमटी के पेपर दूसरी लीक होने का मामला  सामने आया। पाँच से ले कर बारह लाख रुपयों में ये पर्चे बिके थे। बिलासपुर  के पास तखतपुर नामक कस्बे के धर्मशाला में फर्जीवाड़ा चल रहा था. वहाँ छापा  मारा गया तो अनेक छात्र-छात्राएँ मिले। इस मामले में कुछ आरोपियों को पकड़  लिया गया है। यह बड़ी सफलता है मगर इन सब कारणों से दूसरे प्रतिभाशाली  छात्र प्रभावित होते हैं। पिछले दिनों उस छात्र को पकड़ा गया, जिसने पिछले  साल पीएमटी की परीक्षा में टॉप किया था। उसने फर्जी तरीके से परीक्षा दी  थी। यानी मुन्नाभाई वाली फिल्म की शूटिंग छत्तीसगढ़ में लगातार चल रही है।  व्यावसायिक परीक्षा मंडल की विफलता इस बात का सबूत है कि दाल में काला तो  है। विभागीय लोग भी रैकेट में शामिल रहते हैं। प्रश्न यही है कि आखिर वह  दिन कब आएगा, जब परीक्षा जैसे मामले में ईमानदारी के साथ काम होगा?  फर्जीवाड़ा करके पीएमटी पास करने वाले लड़के कल मेडिकल की पढ़ाई भी फर्जी  तरीके से ही करेंगे, और चकमा दे कर निकलते रहेंगे, तो प्रदेश के स्वास्थ्य  का क्या अंजाम होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। इसके पहले पीएससी की  परीक्षाएँ भी निरंतर खटाई में पड़ती रही है। स्कूलों में पैसे ले कर लोगों  को टॉप करने के मामले सामने आ चुके हैं।&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b style="color: #660000;"&gt;हो गया 'व्हाइट हाउस' का लोकार्पण &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर  में नगर निगम कार्यालय अब अपने नये भवन में लगेगा। 25 जून को महामहिम  राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल जी ने इसको लोकार्पित किया। वास्तु के  लिहाज&amp;nbsp; से यह भवन नयनाभिराम है। अपनी झक्क सफेदी के कारण लोग इसे 'व्हाइट  हाउस' कहने लगे हैं। हालांकि यह शब्द चुभता है मगर अब अँगरेजी बहुत से  लोगों की आत्मा का हिस्सा भी बनती जा रही है इसलिए किसी को अटपटा भी नहीं  लगता। इसमें अनके तरह की आधुनिक सुविधाएँ भी हैं। वक्त-वक्त की बात है।  भाजपा के महापौर सुनील सोनी के समय सेयह भवन बनना शुरू हुआ था, लेकिन जब  उनके बैठने का समय आया तो चुनाव हो गया और भाजपा हार गई। निगम पर कांग्रेस  का क ब्जा हो गया। महापौर डॉ. किरणमयी नायक को यह सौभाग्य मिला कि वे  महापौर के रूप में इस नये भवन में विराजमान हो। राष्ट्रपति के हाथों भवन का  शुभारंभ हुआ, यह और गौरव की बात रही। उद्गाटन समारोह में राष्ट्रपति ने  बड़ी अच्छी बात कही कि हमें गरीबों को झुग्गीवासियों का हित भी ध्यान में  रखना चाहिए। यह बात नगरनिगम के महापौर और पार्षदों को गाँठ&amp;nbsp; बाँध लेनी  चाहिए। लोग यही कह रहे हैं कि जब आदमी महलजीवी हो जाता है तो गरीब उसे  चुभने लगते हैं। रायपुर नगर निगम इसका अपवाद बने तो बेहतर होगा। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-7183912020559482637?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/7183912020559482637/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=7183912020559482637' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/7183912020559482637'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/7183912020559482637'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-5087103346661663959</id><published>2011-05-25T08:40:00.000-07:00</published><updated>2011-05-25T08:40:36.799-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दृष्टिपात की   सम्पादकीय'/><title type='text'>क्योंकि हम ढीठ जो हैं</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #333333; font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="post-body entry-content" id="post-body-676639542877648526" style="position: relative; width: 628px;"&gt;&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; font-size: 15px; line-height: 1.4; margin-bottom: 0.5em; margin-right: 1em; padding-bottom: 4px; padding-left: 4px; padding-right: 4px; padding-top: 4px; position: relative; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-RQWgiQCqRVw/Td0Zb3CKlwI/AAAAAAAAA0g/DHKgtpG9cF8/s1600/drishtipat+cover+may+11.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; color: #336699; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto; text-decoration: none;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/-RQWgiQCqRVw/Td0Zb3CKlwI/AAAAAAAAA0g/DHKgtpG9cF8/s320/drishtipat+cover+may+11.jpg" style="border-bottom-style: none; border-color: initial; border-left-style: none; border-right-style: none; border-top-style: none; border-width: initial; position: relative;" width="238" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="font-size: 12px; text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial; font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;मई २०११&amp;nbsp;अंक&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="line-height: 1.4; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-large;"&gt;स&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 15px;"&gt;बके मुख पर है कालिख किसको कौन लजाये रे!’ लेकिन हम सबके साथ-साथ अपने को भी लजा रहे हैं, फिर भी हमें लाज नहीं आती। हम पूरी तरह निर्लज्ज हो चुके हैं।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 15px; line-height: 1.4; text-align: justify;"&gt;जब से मैंने होश संभाला; तब से ही भ्रष्टाचार के रोने-गाने की आवाज मेरे कानो में घुलती रही है। संभवतः आपके साथ भी ऐसा ही होता हो। &amp;nbsp;आपने कभी इस पर विचार किया है कि ऐसा क्यों होता है? शायद इसलिए कि हमारा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सिस्टम पटरी पर ठीक से फीट नहीं किया गया है। जिस दिन इसे फीट कर दिया जायेगा, उसी दिन सब ठीक हो जायेगा। लेकिन इसे ठीक करेगा कौन? क्योंकि सब के मुख पर तो कालिख पुता हुआ है, कौन आयेगा सामने इसे ठीक करने को? आप को विश्वास नहीं होता तो आप सौ व्यक्ति को एक जगह बुलाकर भ्रष्टाचार पर गोष्ठी करवा लीजिए, सौ के सौ व्यक्ति तरह से तरह से भ्रष्टाचार पर आख्यान-व्याख्यान दे देता हुआ चला जायेगा, लेकिन एक भी व्यक्ति उसमें से ऐसा नहीं सामने आयेगा, जो अपने को पहला भ्रष्ट व्यक्ति साबित करे। तो आखिर भ्रष्टाचार करता कौन है? इस प्रश्न का उत्तर कौन देगा? इसका उत्तर कैसे मिलेगा? लगता है सृष्टि की समाप्ति तक इस यक्ष प्रश्न का उत्तर हम नहीं ढूंढ़ पायेंगे। क्योंकि हम ढीठ जो हैं।&amp;nbsp;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 15px; line-height: 1.4; text-align: justify;"&gt;आज तक आपने यह सुना है कि कोई जानवर किसी भ्रष्टाचार में लिप्त रहा है? यह तो सिर्फ इंसान पर लागू होता है। अब आप ही बताइए कि जानवर भला कि हम? तब आप कहेंगे कि जानवर तो घर-वर नहीं बनाता..., तो क्या घर-वर बनाने वाले को भ्रष्टाचार करने की छूट है? ये कैसा हमारा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सिस्टम है भाई! आपने किसी जानवर को देखा है कभी ऐसा करते हुए कि पेट भर जाने के बाद भी वह कल के लिए भोजन को मुँह में दबा कर ले जाता हो? लेकिन हम ऐसा करते हैं। &amp;nbsp;जिस दिन इन सवालों का जवाब हम ढूंढ़ लेंगे, हमारे जीवन से भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा, लेकिन यह राह आसान नहीं है। क्योंकि किसी बच्चे का जन्म हो या अखबार का या फिर मानव कृत कोई उद्यम का; उसकी बुनियाद भ्रष्टाचार पर ही टिकी होती है। यानि कि जीवन से मृत्यु और उसके बाद तक भी हम भ्रष्टाचार में डूबे हुए ही चलते हैं। ऐसे में कोई मसीहा भी तो नहीं सुझता, जो पाक साफ रहा हो।&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 15px; line-height: 1.4;"&gt;&lt;a href="" name="more"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-size: 15px; line-height: 1.4; text-align: justify;"&gt;देखिए एक छोटा सा उदाहरण- हमारे समाज में एक व्यक्ति गंदगी करता है और दूसरा उसे तमाम उम्र साफ करता रहता है। अब आप ही बताइए कि गंदगी करने वाला व्यक्ति भ्रष्टाचारी है या साफ करने वाला? लेकिन वहीं हमारे समाज में एक को हिकारत की नजर से देखा जाता है और दूसरे को सम्मान की नजर से। अब बोलिए क्या देश समाज और हमारे जीवन से एक क्या अरबो अन्ना या गांधी भ्रष्टाचार को समाप्त करने की बात को छोड़िए, उसे क्या अपनी जगह से हिला भी पायेगा? &amp;nbsp;इसके लिए सबसे पहले हमे अपने भीतर के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सिस्टम को दुरूस्त करना होगा। &amp;nbsp;बगैर इन सिस्टमों को दुरूस्त किये हम सिर्फ लोगों को अपने को अपनी आने वाली पीढ़ी को ठगने जैसा कृत्य ही करते रहेंगे, उन्हें धेखा ही देते रहेंगे। &amp;nbsp;भूखा व्यक्ति का कोई धर्म नहीं होता; पेट भरे हुए लोगों के स्वार्थ और लालच से बचने की आवश्यकता है, जो भ्रष्टाचार के धर्म का पोषक है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 15px; line-height: 1.4; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial; line-height: 25px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: medium;"&gt;अरूण कुमार झा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.4;"&gt;&amp;nbsp;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: blue;"&gt;प्रधान संपादक&lt;/span&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 15px; line-height: 1.4;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-5087103346661663959?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/5087103346661663959/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=5087103346661663959' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/5087103346661663959'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/5087103346661663959'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/05/blog-post_25.html' title='क्योंकि हम ढीठ जो हैं'/><author><name>अरुण कुमार झा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00993922860981766612</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-QDqU48vNtug/Tk_0IaPzrhI/AAAAAAAAA5M/RpomzB-sJag/s220/Arun%2BKumar%2BJha%2BEditor%2BDrishtipat%2BRanchi.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-RQWgiQCqRVw/Td0Zb3CKlwI/AAAAAAAAA0g/DHKgtpG9cF8/s72-c/drishtipat+cover+may+11.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-7203107303998850533</id><published>2011-05-19T07:28:00.000-07:00</published><updated>2011-05-19T07:28:49.712-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डॉ० शिवशंकर मिश्र की  कविता'/><title type='text'>हवा के साथ</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-cJlUYYpiTTA/TdUnM9nYOKI/AAAAAAAAAz8/x_Qgz0hDCjU/s1600/child+nut.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://4.bp.blogspot.com/-cJlUYYpiTTA/TdUnM9nYOKI/AAAAAAAAAz8/x_Qgz0hDCjU/s320/child+nut.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: collapse; font-family: arial, sans-serif;"&gt;जब से सूरज निकला&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जब तक नहीं डूबा&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दोड़ता रहता है पैर&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बाँसों पर, तनी हुई रस्सियों पर&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तारों पर।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;थम जाती है साँस&lt;/div&gt;&lt;div&gt;खिंचती आती आँत&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-GHXOG0oH-jg/TdUmgEFYaBI/AAAAAAAAAz4/67sXzw7NUkg/s1600/Dr.+Shivshankar+Mishra.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" src="http://3.bp.blogspot.com/-GHXOG0oH-jg/TdUmgEFYaBI/AAAAAAAAAz4/67sXzw7NUkg/s200/Dr.+Shivshankar+Mishra.jpg" width="176" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="line-height: 32px;"&gt;धीरे-धीरे&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पीठ के आस-पास&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बंध् जाती है दृष्टि&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक पूरी उम्र&lt;/div&gt;&lt;div&gt;खिंच-खिंच कर&lt;/div&gt;&lt;div&gt;न्यूनतम हो जाती है जैसे!&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; font-family: arial; line-height: 25px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; font-family: arial; line-height: 25px;"&gt;- डॉ० शिवशंकर मिश्र &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-7203107303998850533?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/7203107303998850533/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=7203107303998850533' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/7203107303998850533'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/7203107303998850533'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/05/blog-post_19.html' title='हवा के साथ'/><author><name>अरुण कुमार झा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00993922860981766612</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-QDqU48vNtug/Tk_0IaPzrhI/AAAAAAAAA5M/RpomzB-sJag/s220/Arun%2BKumar%2BJha%2BEditor%2BDrishtipat%2BRanchi.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-cJlUYYpiTTA/TdUnM9nYOKI/AAAAAAAAAz8/x_Qgz0hDCjU/s72-c/child+nut.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-1060458401963514722</id><published>2011-05-19T06:39:00.000-07:00</published><updated>2011-05-19T06:39:59.123-07:00</updated><title type='text'>छत्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;रिश्वत दो वरना फँसा दूँगा....&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ के पुलिस वाले अब शातिर लोगों को गिरफ्तार करने के बजाय खुद  गिरफ्तार हो रहे हैं। फिछले एक महीने में दो थानेदार पकड़े गए। ये दोनों  महानुभाव लोगों को चमका कर वसूली करने की कोशिश कर रहे थे। अभी हाल ही में  पामगढ़ नामक कस्बे में एक थानेदार ने एक व्यक्ति को उसकी बहू की हत्या के  आरोप में फँसाने की धमकी देते हुए पचास हजार रुपए माँगे। उस व्यक्ति की बहू  ने जहर का कर जान दे दी थी। इतना मुद्दा वसूली के लिए काफी होता है।  थानेदार साहब को मौका मिल गया। उन्होंने ससुर से कहा, तुमको बहू की हत्या  के आरोप में अंदर कर दूँगा। मामला सुलटाना है तो पचास हजार रुपए देना होगा।  ससुर ने फौरन तीन हजार रुपए दे दिए और कहा कि बाकी राशि बाद में दूँगा।  उसके बाद ससुर ने हिम्मत कर के 'एंटी करप्शन ब्यूरो' से बात की । ब्यूरो ने  सहयोग किया और थानेदार को घेरने की योजना बनाई। थानेदार के पास दस हजार  रुपए के साथ ससुर को भेज गिया।और रिश्वतखोर थानेदजार को रंगेहाथों गिरफ्तार  कर लिया। थानेदार की जमानत भी नहीं हुई और उसे जेल भेज दिया गया। इस घटना  सेदूसरे थानेदार या पुलिस वाले सबक लेंगे, ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है।  &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;धर्मंप्रचारक पिट गया.......&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;धर्मप्रचार करना गलत नहीं है। हर  धर्म वाला अपने धर्म की विशेषताएँ बता कर लोगों को अपनी ओर खींचने का काम  कर सकता है। दिक्कत वहाँ शुरू होती है, जब कोई अपने धर्म का प्रचार करे और  दूसरे धर्म की निंदा शुरू कर दे। पिछले दिनों चाँपा नामक कस्बे में एक  धर्मप्रचारक प्राचार्य इसी चक्कर में शिव सैनिकों के हाथों पिट गया। एक  कालेज में प्राचार्य के पद पर कार्यरत ये सज्जन एक धर्म विशेष के गुरू के  रूप में जाने जाते हैं। चांपा में एक व्यक्ति की तबीयत खराब थी। ये  प्राचार्य महोदय उसके घर गए और वहाँ बहुत से लोगोंकोजमा करके धर्मोपदेश  देने लगे। यहाँ तक तो सब ठीक था, अचानक उन्होंने हिंदू देवी-देवताओं के  बारे में अभद्र शब्दों को उपयोग शुरू कर दिया। जब इस बात की जानकारी शिव  सैनिकों को लगी तो उन्होंने प्राचार्य महोदय की जम कर ठुकाई की और उन्हें  थाने पहुँचा दिया। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;नक्सलियों के नाम पर चमकाने की कोशिश&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में नक्सलियों  कोइतना आतंक फैल चुका है कि छोटे-मोटे गुंडे अब उनकी आड़ में कमाई करने की  कोशिशें करने लगे हैं। ताजा मामला रायपुर का है। शिक्षाकर्मी के पद पर  कार्यरत चंद्रकात साहू नामक युवक ने तीन लोगोंको अलग-अलग एसएमएस भेजे और  सबसे पैसों की मांग की। एक सज्जन को एसएमएस किया कि लाल सलाम, तीन दिन के  भीतर दो करोड़ रुपये पहुँचा दो वरना पूरे परिवार को उड़ा दिया जाएगा।  चंद्रकात सनकी भी था। उसने एक दूसरे सज्जन को एसएमएस किया कि हम लादेन की  मौत का बदला लेंगे। पुलिस वालों ने पता करने की कोशिश शुरू कर दी कि ये कौन  है जो नक्सली या आतंकवादी बन कर वसूली का काम कर रहा है। आखिर पता चल ही  गया। एसएमएस करने वाला एक शिक्षाकर्मी निकला। इस कुकर्मी के&amp;nbsp; पास से छह सिम  कार्ड भी बरामद किए गए। अब यह नकली नक्सली&amp;nbsp; अपने खेल के कारण जेल में है ।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;अफसरों का स्वर्ग छत्तीसगढ़&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इसके पहले भी इस मुद्दे पर चर्चा हो  चुकी है मगर क्या करें, दुबारा करना पड़ रहा है। दो दिन पहले फिर एक एस.  बाबू नामक करोड़पति दवा नियंत्रक पकड़ा गया। इसके पास से करोड़ों की बेनामी  संपत्ति का पता चला है। ये महानुभाव केरल के हैं। इन्होंने छत्तीसगढ़ से  अर्जित हराम की कमाई केरल भी भिजवा दी थी। ऐसे एक नहीं अनेक अफसर ऐसे हैं  जोबाहरी राज्यों के हैं। वे यहाँ की नंबर दो की कमाई अपने गृह नगर भेज देते  हैं। बाबू नामक दवा नियंत्रक की केरल में भी इफरात संपत्ति है। वन विभाग  के एक अधिकारी डीडी संत के पास भी अनंत दौलत होने का पता चला है। उनके यहाँ  भी छापा पड़ तो पता चला कि इनके भी अनेक बेनामी खाते हैं। बहुत से खाते  में मोनालिसा के नाम से है। इसी नाम से ये वन अफसर खाते रहे हैं। इसके पहले  भी अनेक अधिकारी पकड़ में आ चुके हैं, जो प्रदेश का नाम रौशन कर रहे हैं,  कि छत्तीसगढ़ में अकूत दौलत है, लूट सके तो लूट। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;टॉपर तीन साल बाद निकला मुन्नाभाई...&lt;/b&gt;.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मुन्नाभाई एमबीबीएस फिल्म  को भला कौन भूल सकता है? फर्जी तरीके से परीक्षा दे कर पास होने वाले  मुन्नाभाई कहे जाने लगे हैं। छत्तीसगढ़ में भी ऐसे मुन्नाभाइयों की कमी  नहीं है। एक मुन्नाभाई तो सचमुच मेडिकल छात्र ही निकला। तीन साल एक छात्र  ने पीएमटी की परीक्षा में टॉप किया था। अखबारों में उसकी तस्वीर छपी थी।  उसने बड़ी-बड़ी बातें भी की थीं। पिछले दिनों पता चला कि वह फर्जी छात्र  था। खेल करने वाले खेल कर जाते हैं और विभाग सोता रहता है। इस बार पीएमटी  की परीक्षा ही रद्द करनी पड़ गई क्योंकि जूलाजी और कैमेस्ट्री के पर्चे  इंटरनेट पर उपलब्ध थे। पेपर लीक न हों इसलिए छत्तीसगढ़ व्यावसायिक शिक्षा  मंडल ने दक्षिण भारत की एक कंपनी को पेपर सेट करने का ठेका दे दिया था।  मामला उजागर हुआ तो पूरी परीक्षा ही रद्द कर दी गई। छत्तीसगढ़ में  अधिकारियों मैं बेईमानी करने का जुनून-सा सवार है। पीएससी की परीक्षा में भी कुछ न कुछ अनियमितताएँ होती रहती हैं। हर बार परीक्षा होती है और किसी न  किसी गड़बड़ी के कारण छात्र कोर्ट की शरण में चले जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;फैज अहमद फैज की बेटी आई छत्तीसगढ़&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सन् दो हजार ग्यारह  अनके साहित्यकारों की जन्म शताब्दी वर्ष है। अज्ञेय, नागार्जुन केदारनाथ  अग्रवाल, शमशरेबहादुर सिंह एवं गोपालसिंह नेपाली(हिंदी), फैज़ अहमद फैज़ एवं  मजाज़&amp;nbsp; (उर्दू) तथा श्री श्री (तेलुगु)। पूरे देश में इन साहित्यकारों की  जन्म शताब्दियाँ मनाई जा रही है। छत्तीसगढ़ के प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान  ने 14-15 मई को भिलाई में फैज और केदारनाथ अग्रवाल की स्मृति में बड़ा  आयोजन किया। इसमें पाकिस्तान से भी लेखक-आलोचक भिलाई पधारे। सबसे बड़ी बात  यह रही कि महान शायर फैंज की बेटी मुनीज़ा&amp;nbsp; हाशमी भी आई और अपने पिता से  जुड़े रोचक संस्मरण सुनाए। फैज प्रगतिशील शायर ने अन्याय के खिलाफ लिखते थे  इसलिए वे वर्षों तक जेल में भी रहे। मुनीज़ा&amp;nbsp; उन दिनों की याद करते हुए  बीच-बीच में भावुक भी हुई। अनेक वक्ताओं ने फैज पर अपने विचार व्यक्त किए  मगर पाकिस्तान से पधारे लोगों को सुनना एक अभूतपूर्व अनुभव रहा। ''हम मेहनत  कश इसदुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे''....जैसी कालजयी कविता लिखने  वाले फैज के बारे में सुन कर उपस्थित हिंदी समाज को एक बड़े शायर की शायरी  और संघर्ष से परिचय हुआ और लोगों को समझ में आया कि बड़ा शायर बनने के लिए  ''उँगलियों को&amp;nbsp; खूनेदिल में भी डुबोना'' पड़ता है। &lt;br clear="all" /&gt; &lt;br /&gt;-- &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-1060458401963514722?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/1060458401963514722/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=1060458401963514722' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/1060458401963514722'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/1060458401963514722'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-7312895164451715133</id><published>2011-04-16T08:43:00.001-07:00</published><updated>2011-04-16T08:43:53.208-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='/  गिरीश पंकज'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;छत्तीसगढ़ की पुलिस ने फिर दिखाई मर्दानगी..&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अपनी&lt;/b&gt; गली में एक पशु भी शेर होता है। कुछ यही हाल है अपनी पुलिस का  थाने में कोई चला जाए तो वर्दी धारी उस पर ऐसे पिल पड़ते हैं कि पता नहीं  सामने वाला कितना बड़ा गुनाहगार है। गुनाहगार के साथ दुब्र्यवहार तो चलो  समझ में भी आता है, मगर जिसकी कोई गलती नहीं, उसे जब पुलिस के लोग पीटते  हैं, तो लगता है, ये लोग ही सबसे बड़े अपराधी हैं। पिछले दिनों औद्योगिक  नगर कोरबा की पुलिस ने जो कोबरा रूप दिखाया, उसे सुनकर लोग दहल गए। एक  महिला बेचारी अपने पति की गुशुदगी की रिपोर्ट लिखाने गई थी, मगर वह तो जैसे  गुंडों के बीच ही फँस गई। पाँच शराबी पुलिस कर्मियों ने उसको मारा-पीटा,  उसके साथ बदसलूकी की। पुलिस के आला अफसर बोल रहे हैं कि महिला के साथ  मारपीट नहीं की गई। महिला के शरीर पर जो निशान धिख रहे हैं, क्या वह भूत ने  बना दिए? नैतिकता तो यह कहती है, कि पुलिस के आला अफसर स्वीकार करें कि  हाँ, गलती हुई हैं। दोषी लोगों पर कार्रवाई की जाएगी, लेकिन ऐसा करके शायद  पुलिस छोटी हो जाएगी। इसलिए वो बड़ी बने रहना चाहती है? छत्तीसगढ़ में  पुलिस अत्याचार के मामले तेजी के साथ बढ़ रहे हैं। पलिस निरंकुश हो रही है।  लोग कहने लगे हैं, कि जिस प्रदेश का पुलिस-मुखिया लेखक हो, उसके समय में  भी अगर पुलिस में करुणा-संवेदना-सहानुभूति आदि मानवीय तत्व नहीं जग सके, तो  कब जगेंगे? &lt;br /&gt;&lt;b&gt;खुदकशी के बढ़ते मामले&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;छत्तीसगढ़ में पुलिस-अत्याचार के मामले बढ़ रहे तो लोगों में खुदकशी की  प्रवृत्ति बढ़ रही है। और इसके पीछे भी दुभाग्यवश प्रशासनिक तंत्र ही कारण  है। प्रशासन इतना निर्मम होता जा रहा है, कि वह जिंदा आदमी की मांग पर कोई  विचार नहीं करता और जब वह त्रस्त होकर आत्महत्या कर लेता है तो मुआवजा देने  सरकार पहुँच जाती है। पिछले दिनों एक किसान ने आत्महत्या कर ली थी,  क्योंकि दस साल से उसकी जमीन का मुआवजा नहीं मिल पा रहा था। लेकिन सबसे दिल  दहला देने वाली घटना घटी है भिलाई में। जहाँ एक परिवार के चार सदस्यों ने  सामूहिक आत्महत्या कर ली। माँ, तीन बहनें मर गईं। एक युवक बच गया है। जहर  उसने भी खाया था। उसे अस्पताल में भरती किया गया है। इस परिवार की मांग थी,  कि परिवार के मुखिया जो कभी भिलाई इस्पात संयंत्र में काम करते थे, उनकी  अकाल मौत होने के कारण उनके बेटे को अनुकम्पा नौकरी दी जाए। लेकिन नौकरी तो  दूर प्रबंधन उन्हें घर से ही बेदखल करने की तैयारी कर रहा था। इस परिवार  ने क्षेत्र की सांसद सेभी गुहार लगाई मगर वो हेमामालिनी के नृत्य कार्यक्रम  में भिड़ी रहीं। आखिरकार इस परिवार ने खुदकशी कर ली। परिवार ने मरने के  पहले तीन-तीन पत्र लिखे जिसमें उसने अपना पूरा दुखड़ा बयान किया है। अब बे  युवक को नौकरी देने की बात की जा रही है। ऐसी नौकरी का क्या औचित्य जो  चार-चार शहादतों के बाद मिलती हो? कांग्रेस इस मामले को लेकर मानवाधिकार  आयोग जाने वाली है। अनेक सामाजिक संगठन इस हादसे की निंदा कर रहे हैं। मगर  ये हादसे एक सबक की तरह आते हैं कि अगर दुखी लोग खुदकशीकी धमकी दे रहे हैं  तो उसे हल्के से न लियाजाए। जब जीने का कोई आधार ही न बचे तो मरना अंतिम  विकल्प होता है। बावजूद इसके कि आत्महत्या कमजोरी है, कायरता है, लेकिन  मजबूर आदमी या परिवार अंतिम रास्ते के रूप में यही विकल्प चुनता है। &lt;br /&gt;&lt;div&gt; &lt;b&gt;काँग्रेस में आई जान, पटेल को मिली कमान&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ काँग्रेस में पहली बार जान लौटती दीख रही है। इस बार नए  प्रदेशाध्यक्ष के रूप में नंदकुमार पटेल का हाईकमान ने चयन किया है। सही  समय पर ओबीसी कार्ड खेला गया है। यही कारण है, कि पटेल की नियुक्ति को  मोतीलाल वोरा, विद्याचरण शुक्ल और अजीत जोगी जैसे अलग-अलग गुट के नेताओं ने  भी प्रसन्नता के साथ स्वीकार किया है। खुद श्री पटेल यह मान कर चल रहे  हैं, कि छत्तीसगढ़ में अब विपक्ष मजबूत होगा। वे ऐसा नहीं कह रहे हैं, कि  इसके पहले यहाँ विपक्ष कमजोर था, मगर जैसा भी था, या अभी है, वह सबके सामने  हैं। आपस की गुत्थागुत्ती में उलझी पार्टी को नंदकुमार पटेल जोड़ सकें तो  यह उनकी बड़ी सफलता होगी। कहने की जरूरत नहीं, कि विपक्ष अपनी सामाजिक छवि  को बेहतर बनाने में बहुत पीछे हैं। लेकिन अब शायद ऐसा न हो। नंदकुमार पटेल  प्रदेश के पहले गृह मंत्री रह चुके हैं। रायगढ़ जिले से आते हैं। सतह से उठ  कर राजनीति करने वाले रहे हैं इसलिए काँग्रेस कार्यकर्ता बहुत आशावान है  कि इस बार पटेल जी के अध्यक्ष बनने के बाद काँग्रेस शायद कुछ बेहतर  प्रदर्शन कर सके। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;भाजपा की सफल रैली...&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;राजधानी में शनिवार को भाजपा ने केंद्र सरकार के विरोध में सफल रैली निकाली  और सप्रे शाला मैदान में सभा की। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी और  राजनाथ सिंह जैसे बड़े नेताओं की उपस्थिति में प्रदेश भर से आए हजारों  कार्यकर्ताओं को दिशा मिली। गड़करी ने केंद्र के भ्रष्टाचार पर जमकर  चुटकिया लीं। उन्होनें कहा, कि काँग्रेस का भ्रष्टाचार सबसे बड़ा धारावाहिक  हो गया है। श्री गड़करी और राजनाथ सिंह समेत मुख्यमंत्री रमन सिंह ने  कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाया । प्रदेश के कोने-कोने से कार्यकर्ता पहुँचे  थेे। इसरैली से कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार हुआ। राष्ट्रीय नेताओं ने  मुख्यमंत्री रमन सिंह की सराहना भी की। लेकिन इस सभा को ले कर काँग्रेसी  काफी नाराज थे। न केवल काँग्रेसी वरन् खिलाड़ी भी। काली पट्टी बांधकर  एनएसयूआई न विरोध करने की कोशिश की मगर उन्हें हिरासत में ले लिया गया। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रदूषण बनाम खरदूषण &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;प्रदेश में औद्योगिक विकास हो, इससे किसी को इंकार नहीं है। लेकिन यह विकास  विनाश बन कर लोगों के जीवन को, स्वास्थ्य को ही निगलने लगे, तो विकास  चुभने लगता है। रायपुर और आसपास अनेक उद्योग लगे हैं, उनके प्रदूषण के कारण  आसपास की खेती चौपट हो रही है और लोगों का स्वास्थ भी गिर रहा है। यही हाल  रायगढ़ के लोगों को है। रायगढ़ क्षेत्र भी औद्योगिक नक्शे में शुमार हो  चुका है।&amp;nbsp; लेकिन इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ रहा है। वहाँ के एक संयंत्र  के विरुद्ध लोगों को सड़कों पर उतरना पड़ा। लोग एलर्जी से, दमे से तथा अनेक  बीमारियों से परेशान है। संयंत्र का प्रदूषण खरदूषण जैसे राक्षस की तरह  जीना दूभर कर रहा है। पिछले दिनों लोग कलेक्टर से मिले। शिकायत की तो  कलेक्टर ने कुछ पंप सील करवा दिए मगर बाद में पता चला कि संयंत्र प्रबंधन  ने पंप को खोल लिया । यह गंभीर अपराध है। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-7312895164451715133?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/7312895164451715133/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=7312895164451715133' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/7312895164451715133'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/7312895164451715133'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-3023350069762209844</id><published>2011-03-25T09:09:00.000-07:00</published><updated>2011-03-25T09:09:23.132-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='lekh/  गिरीश पंकज'/><title type='text'>गोचर भूमि बचाना, यानी छत्तीसगढ़ को बचाना</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh5.googleusercontent.com/-VRjeLPU4moc/TYy9p-7VcjI/AAAAAAAAAdg/CRzf32NemMU/s1600/gocharbhumi.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="266" src="https://lh5.googleusercontent.com/-VRjeLPU4moc/TYy9p-7VcjI/AAAAAAAAAdg/CRzf32NemMU/s320/gocharbhumi.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;b&gt;नईदुनिया, रायपुर के २५ मार्च के अंक में प्रकाशित लेख..&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-3023350069762209844?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/3023350069762209844/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=3023350069762209844' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/3023350069762209844'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/3023350069762209844'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/03/blog-post_25.html' title='गोचर भूमि बचाना, यानी छत्तीसगढ़ को बचाना'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='https://lh5.googleusercontent.com/-VRjeLPU4moc/TYy9p-7VcjI/AAAAAAAAAdg/CRzf32NemMU/s72-c/gocharbhumi.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-261191170671377511</id><published>2011-03-21T07:45:00.000-07:00</published><updated>2011-03-21T07:51:15.658-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी / गिरीश पंकज'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;पुलिसवालों के अत्याचारों के कारण&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;भी मौका मिल जाता है नक्सलियों को &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पुलिसवाले किसी का घर जला दें। उसके साथ अत्याचार करें और फिर यह सोचे कि  नक्सली शांति के साथ बैठे रहें, तो यह असंभव है। पुलिस-दमन का खामियाजा  पुलिस को भुगतना ही पड़ता है। शिकायत मिली है, कि पिछले दिनों बस्तर के&amp;nbsp;  नारायणपुर-ओरछा मार्ग पर स्थित एक गाँव में पुलिस और सीआरपीएफ की टीम किसी  सुखराम को खोजने गई। घर पर वह नहीं मिला तो पुलिसवालों ने उसका घर ही जला  दिया। और पाँच लोगों को पकड़ कर ले गई। घर में रखा खाने-पीने का सारा सामान  जल गया। यह आरोप ग्रामीणों&amp;nbsp; ने ही लगाया है। इस घटना के बाद से सुखराम का  भी अता-पता नहीं है। किसी को खोजने का यह क्या तरीका है कि उसके घर को ही  पूँक दिया जाए? ऐसा काम तो गुंडे या माफिया करते हैं। पुलिस से ऐसी अपेक्षा  नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति आनंदनारायण मुल्ला जी ने कभी कहा था, पुलिस  यानी वर्दीधारी गुंडों का संगठित गिरोह। क्या पुलिस बिल्कुल वैसी होती जा  रही है? इसमें दो राय नहीं कि, छत्तीसगढ़ में पुलिस का दमन बढ़ता जा रहा  है। किसी घर के किसी सदस्य की तलाश में पुलिसवाले घर के किसी भी सदस्य को  उठा कर ले जाते हैं। और इस पर पुलिस सोचे कि उसके खिलाफ प्रेम उपजेगा, तो  यह असंभव है। नक्सलियों को तो मौका चाहिए। वे बदला लेने के लिए तैयार रहते  हैं। पुलिस अत्याचार की ताजा घटना के बाद एक बार फिर पुलिस और सीआरपीएफ  वाले उनके निशाने पर आ जाएँगे। इसलिए पुलिस को भी फूँक-फूँक कर कदम रखना  चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;छत्तीसगढ़ में विपक्ष यानी भाजपा की टीम-बी...?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ये हम नहीं कह रहे हैं, जोगी जी कह रहे हैं। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के मुद्दे बेहद सटीक होते हैं। उनका उत्तर खोजना मुश्किल हो जाता है। अभी एक पत्र उन्होंने अपनी ही पार्टी के नेता प्रतिपक्ष को भेजा है। देखें, नेता प्रतिपक्ष क्या सफाई देते हैं। मामला यह है, कि विधानसभा के दौरान कांग्रेस ने एक बैठक करके नगरीय प्रशासन मंत्री राजेश मूणत के बहिष्कार का निर्णय लिया था। बैठक में जोगी शामिल नहीं हो सके थे, लेकिन उन्होंने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा था, कि इससे कांग्रेस मजबूत होगी। लेकिन कुछ दिन बाद अचानक नेता प्रतिपक्ष रवींद्र चौबे ने बहिष्कार का निर्णय वापस ले लिया। इसपर जोगी जी भड़क गए और चौबे जी को एक कड़ी चिट्ठी भेजी है। उन्होंने दो टूक लिखा है, कि यही कारण है कि लोग काँग्रेस को भाजपा की टीम-भी भी कहने लगे हैं। जोगी जी का विरोध जायज है। बिना बैठक बुलाए नेता प्रतिपक्ष ने बिना बैठक बुलाए बहिष्कार वापसी का निर्णय कैसे ले लिया? यही एक ऐसा निर्णय ता, जिससेकांग्रेस की कुछ इमेज बन रही थी। वरना तो राज्य में विपक्ष की जो हालत है, वह किसी से छिपी नहीं है। लोग कहने लगे हैं, कि भाजपा ने विरोधियों में से कुछ को सेट कर लिया है। जोगी जी ने चिट्ठी लिख कर अगर गुस्से का इजहार किया है तो गलत नहीं किया है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;पढऩे आए हैं या गुंडागर्दी करने?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मेडिकल छात्रों से उम्मीद की जाती है, कि वे पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाएँगे, क्योंकि उन्हें पढ़ाई पूर्ण करके देश की सेवा करनी है। लेकिन माहौल ऐसा बन जाता है, कि छात्र अपना लक्ष्य ही भूल जाते हैं। पिछले दिनों डेंटल कालेज के छात्र अपना वार्षिकोत्सव मना रहे ते तो वहाँ मेडिकल कालेज के कुछ छात्र चले आए और हुड़दंग मचाने लगे। मारपीट पर उतारू हो गए। उनका गुस्सा इस बात को ले कर था, कि वार्षिकोत्सव में उन्हें क्यों नहीं बुलाया गया। अरे, भाई, नहीं बुलाया तो नहीं बुलाया। ये क्या बात हुई कि किसी को कोई निमंत्रण न दे तो दादागीरी करने लगे कि हमें निमंत्रण क्यों नहीं दिया? नहीं दिया, उनकी मर्जी। लेकिन मेडिकल छात्रों को तो यह बताना था, कि हम लोग भी कुछ हैं। आखिर वहीं हुआ, कुछ छात्र गिरफ्तार किए गए। माता-पिता का सिर नीचा हुआ। अब ये छात्र हॉस्टल से भी हटाए जाएँगे। घटना के बाद अभिभावक बच्चों को समझा रहे हैं, कि अपना ध्यान केवल पढऩे पर ही लगाएँ। अगर लगा सकें तो...।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;भाई भाई न रहा&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो हर काल में भाई-भाई के बीच स्वार्थ की जंग होती रही है। इसलिए आजकल कोई घटना हो जाए तो यह नहीं कहा जा सकता कि कलजुग आ गया है। स्वार्थ का काला साया जब भी दिमाग पर छाता है तो विवेक मर जाता है। तब क्या भाई, क्या बहिन और क्या माता-पिता। पिछले दिनों रायपुर के एक चंदन तस्कर की हत्या हो गई थी। अब उसकी जान लेने वाला शूटर पकड़ाया तो उसेने ही बताया,&amp;nbsp; कि तस्कर के भाई ने ही हत्या के लिए आठ लाख रुपए दिए थेे। इस तरह की एक नहीं अनेक घटनाएँ यही बताती हैं, कि समाज में धनलोलुपता बढ़ी है और और सहनशीलता घटी है। ऐसी हत्याएँ इसी कारण होती हैं। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;छत्तीसगढ़ की ''कामधानी''..... &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर है और&amp;nbsp; न्यायधानी है बिलासपुर। अब दोनों शहर कामधानी में बदलते जा रहे हैं। आए दिन यहाँ सेक्स रैकेट पकड़े जाते हैं। वैसे केवल ये दो शहर ही ऐसे नहीं है, जहाँ सेक्स का धंधा होता हो। ये कारोबार रायगढ़ से ले कर दुर्ग-भिलाई तक पसरा हुआ है। अब तो महानगरों की वेश्याएँ यहाँ पैकेज पर आती है। बीस-पच्चीस हजार तक लेती हैं। छत्तीसगढ़ में धनपतियों की संख्या बढ़ रही है। इनका काला धन बाहर कैसे निकले, इस काम को कॉलगर्लें अंजाम दे रही हैं। कुछ लोग उद्योग लगा रहे हैं, तो कुछ लोग देह व्यापार में संभावना तलाश रहे हैं। इसमे बेरोजगार लड़किया हैं तो दलाल भी। जो राजधानी बनने के पहले भी छत्तीसगढ़ में धंधेबाज लोग थे, लेकिन राजधानी बनने के बाद यह व्यापक हो गया है। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कंजूसी की हद है जान ही दे दी..&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इकलौते बेटे ने मोटर साइकिल खरीद ली तो दुखी पिता ने आत्मदाह कर लिया। महासमुंद जिले के एक गाँव की घटना है। हरिकीर्तन नामक व्यक्ति के&amp;nbsp; शादीशुदा बेटे ने पिता की असहमति के बावजूद मोटर साइकिल खरीद ली। बस, पिता का गुस्सा भड़क गया। उसने पैरावट में आग लगा ली और उसमें कूद गया। इस व्यक्ति के बारे में लोगों का यही कहना था, कि हरिकीर्तन गुस्सैल स्वभाव का था और कंजूसकिस्म का भी था। गुस्सा आदमी की जान भी ले सकता है। इसलिए बहुत सोच-समझ कर कदम उठाना चाहिए लेकिन अब यह बात समझने के लिए हरिकीर्तन जी मौजूद नहीं है। यह दूसरे लोगों के लिए सबक है कि भाई, गुस्से में अपने को या दूसरे को नुकसान पहुँचाने से क्या फायदा। जो हो गया, उसे नियति मान कर संतोष कर लेना चाहिए।&amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-261191170671377511?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/261191170671377511/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=261191170671377511' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/261191170671377511'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/261191170671377511'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-3130803436072667478</id><published>2011-02-27T06:46:00.000-08:00</published><updated>2011-02-27T06:46:20.617-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गिरीश पंकज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;सबको खुश करने वाला बजट&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;छत्तीसगढ़ की रमन&lt;/b&gt;  सरकार का हर कदम इतना सधा हुआ रहता है,कि विपक्ष केवल कोसता ही रह जाता  है। कोशिश करता है, कि आलोचना की कुछ गुंजाइश तो निकले लेकिन आमजन खुश तो  सरकार गदगद.&amp;nbsp; चाहे एक-दो रुपया किलो चावल हो या सस्ती दाल। नमक, साइकल,  चरणपादुका वितरण आदि अनेक योजनाएँ हैं जिससे आम गरीब आदमी खुश है। अभी २६  फरवरी को रमन सरकार ने अपना सालाना बजट पेश किया। इसमें भी रमन सरकार ने  सबको खुश करने का फार्मूला निकाला। क्या किसान और क्या व्यापारी, हर कोई  खुश हो गया। किसानों के हित की अनेक घोषणाएँ की तो चेक पोस्ट ही खत्म कर  दिया। प्रोफेशनल टेक्स भी समाप्त। गोबर-गोमूत्र से बनी वस्तुओं को कर मुक्त  कर दिया। सात और शहरों में पोलिटेक्निक कॉलेज खुलेंगे। बिलासपुर में एक  विश्वविद्यालय भी खुलेगा। विकलांगों के लिए भी अनेक लाभकारी घोषणाएँ हुई  हैं। बस्तर का भी खास ध्यान रखा है। वहाँ आदिवासियों को मुफ्त में एक किलो  चना दिया जाएगा। एक नई हिंदस्वराज पीठ की स्थापना&amp;nbsp; होगी तो संस्कृत को  प्रोत्साहन देने के लिए एक लखटकिया सम्मान भी शुरू करने की घोषणा की गई है।  ऐसी अनेक घोषणाएँ की गई है, जिससे सरकार अंत्योदय के लक्ष्य की ओर तेजी से  आगे बढ़ रही है। ऐसी ही रणनीति पर सरकार चलती रही तो वोट बैंक इनके हाथ से  भला कैसे फिसल सकता है?&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;और इधर काँग्रेसी आपस में भिड़े हैं...&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उधर रमन सरकार जनहित पर  ध्यान केंद्रित करके लोगों का दिल जीतने में लगी है, वहीं काँग्रेसी बेचारे  अभी आपस में ही भिड़े हुए हैं। पिछले दिनों हुए उपचुनाव में काँग्रेस हार  गई। संजारी बालोद के उपचुनाव में पराजित प्रत्याशी इस बात से दुखी है कि वह  अपने जिन वरिष्ठ नेताओं को चाचा और बाबू कहता था, उनसे पूरा सहयोग नहीं  मिला। अजीत जोगी तो चुनाव प्रचार करने ही नहीं गए। जोगी जी ने भी मजेदार  बात कही। उन्होंने कहा कि प्रत्याशी मेरे पास आया था, उसने धन माँगा तो उसे  धन दे दिया गया। तन-मन का सहयोग मांगा होता तो वह भी दिया जाता। पराजित  प्रत्याशी कह रहा है, कि बड़े नेता आपस में भिड़ते रहे और मैं बलि का बकरा  बन गया। जो भी हो, इस चुना की पराजय से एक बार फिर काँग्रेस को आत्ममंथन का  मौका मिला है, कि वह सोच कि छत्तीसगढ़ में धीरे-धीरे वह हाशिये पर क्यों  जा रही है। हर बार की तरह इस उपचुनाव में भी काँग्रेस की आंतरिक गुटबाजी  साफ नजर आ रही थी। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;फिर शराबबंदी के खिलाफ आंदोलन&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में शराब की नदियाँ बह  रही हैं,कहना गलत न होगा। अधिकांश गाँव और शहर इसकी चपेट में हैं। इसके  विरुद्ध आंदोलन भी होते हैं, लेकिन शराब दूकान बंद कराने में सबको पसीना आ  जाता है। आंदोलन की इस कड़ी में अब दुर्ग के पास के तीन गाँव जगे हैं।  उन्होंने कलेक्टर को ज्ञाापन दिया है और चेताया है कि शराब भट्टी नहीं हटी  तो उग्र आंदोलन किया जाएगा। धनोरा-खम्हरिया गाँव के बीच खुली शराब दूकान के  कारण क्या महिलाएँ और क्या पुरुष सबका आना-जाना मुश्किल हो गया है।  महिलाएँ ज्यादा परेशान न रहती है। और यह सिलसिला दस-पंद्रह वर्षों से चल  रहा है। आखिर महिलाओं ने प्रेरित किया तो पुरुष भी उठ खड़े हुए। सरपंच भी  जगे। देखना यह है कि अब जनता का प्रतिरोध जीतता है,कि शराब का मुनाफा&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;चमत्कार को नमस्कार&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इस देश में फरजी लोगों की भरमार है। फरजी  तांत्रिक, फरजी भविष्यवक्ता लेकिन कुछ लोग आज भी अपनी सिद्धि के बल पर ऐसा  प्रामाणिक प्रदर्शन करते हैं, कि लोगों की श्रद्धा के पात्र बन जाते हैं।  पहले रायपुर में और अब राजिम में विराजमान पंडोखर बाबा की बड़ी चर्चा है।  उनके पास जो कोई जाता है, प्रसन्न हो कर ही लौटता है। इनके पास पता नहीं  क्या सिद्धि है कि एक-एक बात सही बता देते हैं। लोग जो समस्या ले कर उनके  पास पहुँचते हैं, वहीं समस्या बाबा के पास पहले से ही कागज पर लिखी हुई  रहती है। एक व्यक्ति को उन्होंने बताया कि तुम्हारे ऊपर इतने लाख और इतने  रुपए का कर्ज है। वह आदमी चकरा गया। अनेक उदाहरण लोग बता रहे हैं। जो जा  रहा है, वह हैरत से भर कर लौटता है। इसका मतलब साफ है, कि कोई न कोई ऐसी  विद्या तो है जिसके सहारे कोई व्यक्ति मन की बात को पढ़ लेता है।  दुर्भाग्यवश अब पंडोखर बाबा जैसे लोग नहीं के बराबर हैं।&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;राजिम कुंभ के बहाने संस्कृति&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;रायपुर से चालीस किलोमीटर दूर  महानदी के तट पर बसा कस्बा राजिम अब पूरे देश में जाना जाता है। यहाँ हर  साल कुम्भ भरता है। पहले इस कुंभ शब्द पर अनेक लोगों पर आपत्ति हुआ करती  थी,लेकिन धीरे-धीरे कुंभ ऐसा लोकप्रिय हुआ कि अब देश भर के साधु-संत यहाँ आ  कर धूनी रमाते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे शुरू किया। वह दिल से सहयोग भी  करती है। पूरी व्यवस्था करती है। राजिम कुंभ के बहाने अब यहाँ हर साल  सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी होता है। छत्तीसगढ़ के कलाकारों को अपनी कला  दिखाने का एक मंच मिल जाता है। बाहर के भी अनेक कलाकार यहाँ आते हैं। इस  सांस्कृतिक आदान-प्रदान से छत्तीसगढ़ की ख्याति दूर-दूर तक फैल रही है। देश  की राजधानी दिल्ली तक राजिम कुंभ का प्रचार किया जाता है। उत्तरप्रदेश  समेत अन्य राज्यों के अनेक प्रख्यात संत प्रतीक्षा करते हैं, कि कब राजिम  कुंभ लगे और वे धूनी रमाने पहुँच जाएँ। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;पारिवारिक सहिष्णुता का पतन..&lt;/span&gt;.&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;क्या शहर क्या गाँव, आपसी सौहार्द  धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। अनेक घटनाएँ इस बात का प्रमाण है। पिछले  दिनों राजधानी में एक पति ने पत्नी के चेहरे पर तेजाब फेंक दिया और फिर खुद  जहर खा लिया। दोनों की आपस में अनबन थी। सुलह कराने की कोशिशें भी हुई  लेकिन आपसी अहम के कारण बात नहीं बनी। दोनों अलग-अलग रहने लगे। पिछले दिनों  पति पत्नी के पास पहुँचा और घर चलने का आग्रह किया। पत्नी नहीं मानी तो  पति ने गुस्से में आ कर उसपर तेजाब फेंक दिया। अपने आप में यह मूर्खता है,  मगर गुस्से में बहुत से लोग तेजाब का सहारा ले लेते हैं। बाद में पति को  ग्लानि हुई या पुलिस का भय, उसने भी जहर खा लिया। यह पहली घटना नहीं है, कि  इस कालम में चिंता की जा रही है। आए दिन ऐसी घटनाएँ होती रहती है, जिसमें  पारिवारिक असहिष्णुता के कारण लोग एक-दूसरे की जान&amp;nbsp; लेने पर हैं। राजधानी  में ही एक पत्नी अपने पति से त्रस्त हो कर अपनी बेटी के साथ रेल से कट मरी।  खुद की जान ले ली और और एक मासूम को भी मरने पर मजबूर कर दिया। &lt;br clear="all" /&gt; &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-3130803436072667478?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/3130803436072667478/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=3130803436072667478' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/3130803436072667478'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/3130803436072667478'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/02/blog-post_27.html' title='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-6615824813257537783</id><published>2011-02-13T20:47:00.000-08:00</published><updated>2011-02-13T20:51:52.357-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गिरीश पंकज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;ये छत्तीसगढ़ है... यहाँ तो&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;नक्सलियों की 'भी' चलती है..&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नक्सलियों ने अठारह दिन पहले जिन पाँच जवानों को अगवा किया था, उन्हें स्वामी अग्निवेश और सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार गौतम नवलखा आदि दो हजार लोगों की उपस्थिति में अंतत: रिहा कर दिया गया। बस्तर के घने जंगलों के बीच एक समारोह हुआ। जहाँ नक्सलियों ने बाजे-गाजे के बीच अगवा पुलिस जवानों को रिहा किया। इस शर्त के साथ, कि जवान पुलिस की नौकरी छोड़ देंगे। हालांकि बाद में इस शर्त का कोई कास असर दिखा नहीं। क्योंकि जवान उम्र के इस पड़ाव में अब नई नौकरी कहाँ से लाएँगे। इस रिहाई के बाद सोचने वाली बात यही है कि छत्तीसगढ़ में सरकार कहाँ है? नक्सलियोंकी ही चलती है। लगता है यहाँ एक तरह से नक्सलियों की ही सरकार चल रही है। सरकारतो मूक दर्शक बनने पर मजबूर हो गई है। यह एक तरह से विफलता ही है लेकिन अभी गेंद नक्सलियों के पाले में है। नक्सलियों को हीरो बनाने वाले स्वामी अग्निवेश की उपस्थिति में नक्सलियों ने जवानों को रिहा करके यह संदेश दे दिया है कि वे सरकार को कुछ नहीं समझते। ये अलग बात है कि मुख्यमंत्री ने नक्सलियों से बातचीत के लिए हामी भरी है, लेकिन क्या नक्सली हथियार छोड़ देंगे? क्या वे मुख्यधारा में शामिल होंगे? अगर ऐेेसा हो सके तो बड़ी बात है लेकिन ऐसा कुछ दीखता नहीं। एक ओर नक्सली अगवा जवानों को रिहा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ हिंसा और तोडफ़ोड़ का खेल भी खेल रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;विनाश के विरुद्ध विकास की लड़ाई&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;नक्सली बस्तर में उत्पात मचाते ही रहते हैं। किसी भवन को उड़ा देना, किसी की हत्या कर देना उनके लिए बाएँ हाथ का खेल है। पाँच अगवा जवानों को छोड़ देने का मतलब यह नहीं है कि उनके भीतर करुणा का उदय हो गया है। इस बहाने मीडिया में वे छाए रहे। पिछले दिनों नक्सलियों ने बस्तर के एक रमणीय स्थल चित्रकोट में स्थित एक पुलिस चौकी को उड़ा दिया, लेकिन सबसे प्रेरक बात यह हुई कि चौबीस घंटे बाद ही चौकी शुरु कर दी गई। जनता ने ध्वस्त चौकी के निर्माण में अपना पसीना बहा दिया। यह घटना इस बात का सबूत है कि अगर विध्वंस अपना काम करता है तो सृजनधर्मी भी पीछे नहीं हटते। बस्तर के आम लोग नक्सलियों की गतिविधियों के पक्षधर नहीं है। इसके पहले भी अनेक गाँवों की महिलाओं एव लोगों ने नक्सलियों के विरुद्ध जुलूस निकाले, प्रदर्शन किए। यह उल्लेखनीय घटना है। आज जब नक्सली भय के पर्याय बन चुके हैं, तब ग्रामीण सामने आकर विध्वंस के विरुद्ध विकास का पसीना बहाते हैं, तो लगता है, कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाले लोग भी जिंदा हैं। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;लूट सके तो लूट...&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ सरकार के दो चेहरे सामने आते रहते हैं। एक तरफ वह जनविकास की बात करती है,तो दूसरी तरफ जनता के पैसों से अय्याशी के सामान भी जुटाने में संकोच नहीं करती। फिछले दिनों लोगों को यह जान कर बड़ा अचरज हुआ कि जनता के पैसों से विधायकों एवं मंत्रियों को वाशिंग मशीन, ओवन और डिनर सेट बाँटे गये। ये पैसे सीधे-सीधे जनता के पैसे थे। इनमें किसानों को पैसा था, सिंचाई का पैसा था और सड़क बनाने केलिए जो पैसे आए थे, उन पैसों से विधायकों केलिए उपहार खरीदे गए। सूचना के अधिकार के तहत लोगों ने जो जानकारियाँ हासिल की, उससे ये सब खुलासे हुए। इस पाप में पक्ष और विपक्ष दोनों समान रूप से भागीदार हैं। यानी जनता को लूटने में विपक्ष भी पीछे नहीं है। वैसे बीच यह चर्चा आम है कि विपक्ष बिका-बिका-सा लगता है क्योंकि सरकार के खिलाफ उसके उग्र तेवर नजर ही नहीं आते। एक कवि ने इस लूट पर कुछ इस तरह से तुकबंदी की है&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;जनता की ही माल है, लूट से तो लूट।&lt;br /&gt;बाद में तू पछताएगा, जब कुरसी जाएगी छूट।।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;वेलेंटाइन डे.....&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;14 फरवरी को वेलेंटाइन डे रहता है। लेकिन लगता है युवा पीढ़ी के कुछ बिगड़ैल प्रतिनिधि रोज वेलेंटाइन डे के ही मूड में रहते हैं। इसीलिए रायपुर, बिलासपुर और भिलाई के कुछ बड़े-बड़े बाग-बगीचों में युवक-युवतियाँ इश्क लड़ाते मिल जाते हैं। पुलिस का या कुछ सामाजिक संगठनों का दबाव न रहे तो ये लोग खुल्मखुल्ला प्यार (?)करने पर उतारू हो जाएँ। पिछले दिनों ऐसे ही कुछ प्यारातुर जोड़ों को राजधानी से तीस किलोमीटर दीर भिलाईनगर की पुलिस ने पकड़ा। एक-दो नहीं, पूरे बीच जोड़े। ये लोग शायद वेलेंटाइन डे का पूर्वाभ्यास कर रहे थेे। इन सबको पुलिस पकड़ कर थाने ले गई। वहाँ इनके माता-पिताओं को बुलाया गया। युवा जोड़ों ने माफी मांगी तब जा कर उन्हें छोड़ा गया। अब इतना सब होने के बाद युवकों ने माता-पिता की इज्जत की कितनी परवाह की, कितनी शर्मिंदगी महसूस की, इसका तो पता नहीं चल सका, लेकिन लोगों को विश्वास है कि ये जिस तरह की हवा बह रही है, उसे देखते हुए तो यही लगता है, कि ये लोग सुधरने से रहे और वेलेंटाइन डे के दिन एक बार फिर छिप कर ही सही, इश्क का इजहार करने से बाज नहीं आएंगे। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;पीएससी है कि मजाक...? &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छतत्तीसगढ़ बनने के बाद ही यहाँ लोक सेवा आयोग का गठन भी हो गया था। लेकिन इन दस सालों में एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि आयोग ने साफ-सुथरा काम किया हो। हर बार विवाद की नौबत आती रही। कभी रिश्वतखोरी, तो कभी अनियमितता, तो कभी कोई गंभीर त्रुटि। हर बार जब परीक्षा होती है, तो उसके साथ मामला हाईकोर्ट में पहुँच जाता है। कभी विज्ञापन में त्रुटि तो कभी कुछ और। त्रस्त छात्रों ने दो दिन पहले मोमबत्ती जुलूस निकाल कर आयोग के खिलाफ प्रदर्शन किया। छात्रों ने मांग की कि अगर आयोग को चला नहीं सकते तो इस भंग ही कर दिया जाए। अब छत्तीसगढ़ के छात्र परीक्षा देने केलिए मध्यप्रदेश या झारखंड जाने का मन बना रहे हैं। छात्रों का कहना है कि अगर सचमुच गंभीरता के साथ आयोग को संचालित करना है तो इसका एक वार्षिक कैलेंडर बनाया जाए। परीक्षा की तिथि घोषित की जाए। और सबसे बड़ी बाद ऐसे लोगों को बिठाया जाए, जिनमें कुछ समझ हो। अनुभव हो। अनुभवहीनता का ही नतीजा है कि पीएससी की हर परीक्षा विवादास्पद हुई है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-6615824813257537783?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/6615824813257537783/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=6615824813257537783' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/6615824813257537783'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/6615824813257537783'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/02/blog-post_13.html' title='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-6224883811329674371</id><published>2011-02-06T07:24:00.000-08:00</published><updated>2011-02-06T07:33:42.424-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी / गिरीश पंकज'/><title type='text'>ललित शर्मा यानी ब्लॉगर  नंबर वन.....</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TU64oEOvDHI/AAAAAAAAAcE/RXNJs1sy2ik/s1600/lalitshrma.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="356" src="http://3.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TU64oEOvDHI/AAAAAAAAAcE/RXNJs1sy2ik/s640/lalitshrma.JPG" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;i&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;हिंदी चि&lt;span style="background-color: #f4cccc;"&gt;ट्ठाकारों में &lt;/span&gt;&lt;b style="background-color: #f4cccc; color: red;"&gt;ललित शर्मा&lt;/b&gt;&lt;span style="background-color: #f4cccc;"&gt;&amp;nbsp;जाना-पहचाना नाम है. श्री शर्मा वैसे भी नंबर वन रहे है. लेकिन अब उन पर का ठप्पा भी लग गया है. जी हाँ, &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;b style="background-color: #f4cccc;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;चिट्ठाजगत&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="background-color: #f4cccc; color: blue;"&gt;की शीर्ष-चालीस की सूची में अब श्री ललित शर्मा नंबर वन में पहुँच गए है. ललित की मेहनत, लगन, ईमानदारी और जनसहयोग भावना किसी से नहीं छिपी है. लोगों ने उन्हें रस्ते से हटाने की कोशिशे की, मगर वे डटे रहे. किसे के हटाने से चट्टान कब खसक सकी है? आज नतीजा सामने है.पिछले दिनों छत्तीसगढ़ राष्ट्र भाषा प्रचार समिति ने ललित को श्रेष्ठ ब्लागर का खिताब भी प्रदान कर सम्मानित किया था. एक कार्यक्रम में एक और नंबर वन ब्लॉगर समीरलाल का भी हमने सम्मान किया था. किसी कारणवश समीर रायपुर पहुँच नहीं सके थे. अब लग रहा है, कि हमने ललित शर्मा का सम्मान करके कोई गलती नहीं कि, क्योंकि वे भी नंबर वन हो गए है. आज ''चिट्ठाजगत'' की सूची में सबसे ऊपर कोई है तो एक छत्तीसगढ़िया है. ललित को इस सूची में देखना हम लोगों के लिये गर्व की बात है. मैं कभी वहाँ पहुच ही नहीं सकता, लेकिन मुझे पता था कि ललित एक दिन टाप-40 में भी टाप पर होगा. और वह हुआ भी. पिछले साल ही मैंने कह दिया था. मैं ज्योतिषी नहीं हूँ, मगर ललित कि लगन देख कर संभावना नज़र आने लगी थी. सूची में कुछ नाम ऊपर-नीचे होते रहते है. यह जीवन का भी क्रम है-उतार-चढ़ाव. लेकिन आज ललित नंबर वन है. इसलिए बधाई के पात्र हैं. ललित शर्मा की इस उपलब्धि के लिये केवल मै खुश नहीं हूँ, पूरा छत्तीसगढ़ और पूरा हिंदी ब्लॉग जगत खुश है. क्योंकि &lt;b style="color: red;"&gt;&lt;a href="http://lalitdotcom/"&gt;ललित शर्मा&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="color: red;"&gt; &lt;/span&gt;को केवल मेरा ही स्नेह नहीं मिल रहा, उसके चाहने वाले देश-विदेश में फैले&lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: #f4cccc;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: #f4cccc; color: blue;"&gt;हुयेहै.&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-6224883811329674371?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/6224883811329674371/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=6224883811329674371' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/6224883811329674371'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/6224883811329674371'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='ललित शर्मा यानी ब्लॉगर  नंबर वन.....'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TU64oEOvDHI/AAAAAAAAAcE/RXNJs1sy2ik/s72-c/lalitshrma.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-7938611611742074357</id><published>2010-12-28T20:25:00.000-08:00</published><updated>2010-12-28T20:25:14.041-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गिरीश पंकज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='lekh'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ अब गो-क्रांति की दिशा में</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TRq3dEszIwI/AAAAAAAAAZM/IpstuWnDKzU/s1600/go+kranti+lekh.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="233" src="http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TRq3dEszIwI/AAAAAAAAAZM/IpstuWnDKzU/s320/go+kranti+lekh.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/%20http://epaper.naidunia.com/"&gt; http://epaper.naidunia.com/&lt;/a&gt;नई दुनिया, रायपुर के२९-१२-२०१० के अंक में मेरा लेख देखें. गो-क्रांति को अलग तरीके से समझने की कोशिश की है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-7938611611742074357?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/7938611611742074357/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=7938611611742074357' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/7938611611742074357'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/7938611611742074357'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/12/blog-post_28.html' title='छत्तीसगढ़ अब गो-क्रांति की दिशा में'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TRq3dEszIwI/AAAAAAAAAZM/IpstuWnDKzU/s72-c/go+kranti+lekh.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-5259083823905543522</id><published>2010-12-19T05:15:00.000-08:00</published><updated>2010-12-19T05:16:33.882-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;मगरमच्छों को भी पकड़ो.....&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;महिला पटवारी को रिश्वत की सजा&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों भ्रष्टाचार विरोधी दस्ते ने एक महिला सरपंच को रिश्वतखोरी के  आरोप में रंगे हाथों पकड़ा और जेल भेज दिया। जो रिश्वत लेता है, उसे सजा  मिलनी ही चाहिए। मगर सवाल यही है कि बारह हजार रुपये रिश्वत लेनी वाली  महिला सरपंच तो पकड़ में आ गई, वे लोग कब पकड़ में आएंगे,जो करोडों की  रिश्वत लेते हैं और कभी पकड़े ही नहीं जाते। पिछले कुछ वर्षों में अनेक लोग  पकड़े गये मगर वे शातिर लोग अपने-अपने प्रभावों का इस्तेमाल करके बेदाग  निकल गए। करप्शन ब्यूरो को बधाई कि वह अच्छा काम कर रहा है। रिश्वतखोरों को  सजा मिलनी ही चाहिए। मगर जनता को और अच्छा तब लगेगा,जब वह मछलियों के  शिकार के साथ-साथ मगरमच्छों को भी पकड़े। छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचारी  मगरमच्छ बढ़ते ही जा रहे हैं ।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कुछ की लालबत्ती जली तो कुछ की बुझी...&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आखिर वही हुआ, जिसका अनुमान था। सरकार ने कुछ आयोगों, बोर्डों, निगम-मंडलों के अध्यक्षों की नियक्तियाँ कर दीं। इस बार कुछ पुराने लोगों का पत्ता साफ हो गया तो कुछ नये चेहरों को मौका मिला। पिछली बार कुछ लोगों के खिलाफ शिकायतें भी मिली थीं। इसलिए उन्हें दुबारा मौका नहीं मिला। तो कुछ लोगों को संगठन के काम के लिए उपयुुक्त समझा गया। इस बार पार्टी ने समझदारी से काम लिया। इसीलिए पूरी समर्पण के साथ पार्टी के लिए दिन-रात एक करने वाले कुछ नेताओं को मौका दिया गया। ये वे लोग हैं, जिनके बारे में हर बार यही कयास लगाये जाते थे, कि इन्हें राज्यमंत्री का दर्जा दिया जाएगा, लेकिन इनके चाहने वाले हर बार निराश होते थे, लेकिन इस बार पार्टा ने कोई चूक नहीं की। खरसिया, अंबिकापुर, धमतरी, बालोद, अभनपुर जैसे सुदूर इलाके में रहने वाले जुझारू लोगों को राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया गया। इससे उनके समर्थकों में उत्साह बढ़ा है। इसका लाभ पार्टी को ही मिलेगा। और इधर जिन लोगों को लालबत्ती नहीं मिल सकी है, उनका भी कहीं न कहीं उपयोग किया ही जाएगा। वैसे अभी भी कुछ और नियुक्तियाँ शेष हैं। यानी पार्टी के लिए समर्पित कुछ और जुझारू लोगों को प्रतिसाद मिलने वाला है। किसको क्या मिलेगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन अभी जिस तरह से कुछ लोगों को लालबत्ती का तोहफा दिया गया है, उसे देख कर लोगों का अनुमान है, कि दूसरे चरण में भी सुपात्रों का चयन होगा।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;नक्सली के आत्मसमर्पण का अर्थ&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों बस्तर के एक नक्सली सोनसाय रावड़े ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। यह समर्पण इस बात को दर्शाता है,कि अब नक्सलियों के बीच में काम करने वाले संवेदनशील लोगों की मानसिकता में बदलाव आने लगा है। आना ही चाहिए। पिछले कुछ महीने से बस्तर के लोग नक्सलियों की हिंसक गतिविधियों के विरुद्ध सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करते रहे हैं। हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। समर्पण करने वाले सोनसाय ने भी यही माना है। अब वह चाहता है कि वह युवकों को सही दिशा दे और कोशिश करेगा कि वे राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़े न कि नक्सलियों के भरमाने में आएँ। प्रशासन ने सोनसाय के प्रति पूरी सहानुभूति दिखाई है। उसके पुनर्वास के लिए जितनी भी कोशिश हो सके, होनी चाहिए और यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, कि उसे पूरी तरह संरक्षण मिले। समर्पण के बाद जाहिर है नक्सली सोनसाय के शत्रु हो जाएंगे। यह सब जानते हुए भी सोनसाय ने खतरा उठाया है, इसलिए वह नि:संदेह बधाई का पात्र है। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;आदिवासियों को आरक्षण&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;भाजपा सरकार इस वक्त फूँक-फूँक कर कदम रख रही है। जनता का दिल जीतने के अनेक उपायों में एक नया उपक्रम है आदिवासियों को तेईस प्रतिशत आरक्षण। आदिवासियों को बेहतर सुविधाएँ, अनुकूल अवसर देने का यही समय है। ऐसे वक्त में जबकि नक्सली आदिवासियों के हित के नाम पर उनका और दूसरे लोगों का लहू बहाने का काम कर रहे हैं, सरकार ने आदिवासियों को यह बता दिया है, कि यह सरकार उनकी चिंता करती है। आदिवासियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने की व्यवस्था से समाज के लोग भी खुश हैं। अब समय आ गया है, कि आदिवासी समाज को समाज की सक्रियधारा से जोड़ा जाए। उनकी शिक्षा,स्वास्थ्य, पेयजल जैसे बुनियादी मुद्दों के साथ उन्हें रोजगार के भी सम्मानजनक अवसर मिलेंगे, तभी उनका समग्र विकास होगा। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;विकलांगों के बारे में सोचने की जरूरत&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;समाज में सकलांगों के बारे में सोचा ही जाता है। उनके लिए अनेक योजनाएं भी बनती है। लेकिन समाज में ऐसी संस्थाएँ इक्का-दुक्का ही हैं, जो विकलांगों के बारे में गंभीरतापूर्वक सोचती हैं। छत्तीसगढ़ की इकलौती संस्था अखिल भारतीय विकलांग चेतना परिषद इस दिशा में गंभीरता के साथ काम कर रही है। पिछले दिनों संस्था ने साहित्यकारों को विकलांगों के बारे में लिखने के लिए प्रेरित किया था। अब वे हर साल की तरह विकलांग युवक-युवतियों की शादी की तैयारी कर रहे हैं।26 दिसंबर को रायपुर में परिचय सम्मेलन रखा गया है। 13 फरवरी 2011 को सामूहिक विवाह का आयोजन किया जाएगा । सबसे अच्छी बात यह है, कि इस आयोजन में समाज के हर वर्ग के लोग सहयोग करते हैं। मारवाड़ी युवा मंच और ब्राह्मण समाज की कुछ ज्यादा उत्साह के साथ भागीदारी निभाता है। सरकार विवाहित जोड़ों को आर्थिक मदद करती है। समाज और सरकार साथ-साथ चले तो बहुत-सी समस्याएँ हल होती रहेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-5259083823905543522?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/5259083823905543522/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=5259083823905543522' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/5259083823905543522'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/5259083823905543522'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/12/blog-post_19.html' title='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-4585668622601043362</id><published>2010-12-02T02:30:00.000-08:00</published><updated>2010-12-02T02:30:50.138-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='lekh/  गिरीश पंकज'/><title type='text'>अफसरों पर लगाम: एक सार्थक काम</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TPd0c5vTBaI/AAAAAAAAAY0/85i2xe0KNGM/s1600/afarshahi.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="436" src="http://1.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TPd0c5vTBaI/AAAAAAAAAY0/85i2xe0KNGM/s640/afarshahi.JPG" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लोकप्रिय समाचारपत्र नईदुनिया, रायपुर में आजके अंक मे प्रकाशित लेख. अखबार वेब पर भी उपलब्ध है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-4585668622601043362?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/4585668622601043362/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=4585668622601043362' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/4585668622601043362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/4585668622601043362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='अफसरों पर लगाम: एक सार्थक काम'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TPd0c5vTBaI/AAAAAAAAAY0/85i2xe0KNGM/s72-c/afarshahi.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-5862029921611677385</id><published>2010-11-27T21:52:00.000-08:00</published><updated>2010-11-27T21:52:22.470-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य / गिरीश पंकज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;छत्तीसगढ़ की पुलिस को&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मनुष्य बनाया जाए....&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ की पुलिस पर एक आम आरोप यह लगाया जाता रहा है, कि वह फर्जी मुठभेड़ करती है और  लोगों को किसी न किसी मामले में फँसाकर जेल भेजती रहती है। पुलिस ऐसे  लोगों पर अंकुश लगाने की कोशिश करती है, जो अक्सर प्रतिरोध करते हैं।  अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं। जिंदा कौमों को प्रतिकार करना ही  चाहिए। प्रतिकार लोकतंत्र की ताकत है लेकिन अंगरेजों के समय की पुलिस आजाद  देश में भी दमनकारी मानसिकता में है। बस्तर में पुलिस ऐसी ही हरकतें कर रही  है। पिछले दिनों सीपीआइ ने जगदलपुर में जोरदार रैली निकाली। इसमें हजारों  लोग शामिल हुए। इनमें आदिवासियों की संख्या भी कम नहीं थी। यह रैली अन्याय  के खिलाफ थी। फिर चाहे अन्याय नक्सली करें, चाहे पुलिसवाले। पिछले दिनों  पुलिस एक ग्रामीण को उठा कर ले गई, उसका आज तक पता नहीं। गाँववाले पूछने गए  तो उन्हीं को धमकाया जाने लगा। यानी अत्याचार भी करो और दादागीरी भी?  इन्हीं सब कारणों से पुलिस के प्रति समाज में घृणा की बावना भरती जा रही  है। पुलिस को मनुष्य बनाने की कवायद आखिर कब शुरू होगी?&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;अपहरण का कारोबार&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पूरे छत्तीसगढ़ के परिदृश्य को देखें तो लगता है, हर कहीं अपराध बढ़ता जा रहा है। जब छत्तीसगढिय़ा दुखी हो कर कहने पर मजबूर होता है, कि पुलिस बैठे-बैठे केवल रोटियाँ तोड़ रही है। राजधानी रायपुर से लेकर अंबिकापुर तक फैला है अपहरण का कारोबार। अपहरण और लापता होने की वारदातें बढ़ रही हैं. पिछले दिनों राजधानी में दो छात्र लापता हुए थे, वे आज तक लापता ही हैं। पता नहीं चल रहा कि कहाँ चले गए? अभी हाल ही में फिर दो स्कूली छात्राएँ लापता हो गई हैं। एक लापता किशोर की तो बाद में केवल लाश ही मिली।&amp;nbsp; पुलिस ने गुमशुदा दस्ता बनाया था। अब तो लगता है,उसे ही खोजने की बारी है कि वह कहाँ है? वैसे लोगों का कहना यही है, कि दस्ता सक्रिय भी हो जाएगा, तो क्या गारंटी है, कि वह सफल होगा। गृहमंत्री के दस्ते का हश्र सब देख रहे हैं। रायपुर में वाहनों में आगजनी और तोड़-फोड़ की वारदातें बढ़ती ही जा रही है। लोग हैरत में हैऔर एक-दूसरे से पूछते हैं, कि आखिर इस पुलिसतंत्र का सामाजिक औचित्य क्या है? &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;न्यायिक जाँच में दिक्कत क्या?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अंबिकापुर के छात्र ऋतिक का अपहरण हुआ और बाद में उसकी हत्या कर दी गई। इस मुद्दे पर सरगुजा भी बंद रहा। पूरा छत्तीसगढ़ उद्वेलित रहा। स्वाभाविक है,कि काँग्रेस के लिए यह एक अवसर था सरकार की खिंचाई का। काँग्रेस की माँग गलत नहीं है, कि हत्याकांड की न्यायिक जाँच होनी चाहिए। इसमें दिक्कत क्या है। जनभावनाओं का सम्मान होना ही चाहिए। लोगों को दु:ख तब होता है, और गुस्सा भी आता है, जब जनप्रतिनिधि- मंत्री महोदय पुलिस का पक्ष लेते हैं और कहते हैं हत्याकांड के लिए समाज जिम्मेदार है। कई बार लोगों को भी यही लगता है, कि समाज ऐसे लोगों को अपना प्रतिनिधि चुनने का जिम्मेदार है जो जनता के साथ नहीं, पुलिस के साथ खड़े नजर आते हैं : उस पुलिस के साथ जिसका चरित्र क्या है, क्या रहा है, वह सबके सामने है। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कितने करोड़पति अफसर है यहाँ...?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वैसे अब किसी का करोड़पति होना चौंकाने वाली बात नहीं हो सकती क्योंकि किसी का पुराना बड़ा मकान भी अब एकाध करोड़ की कीमत तक पहुँच जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के अनेक अफसरों के पास से जब मकान-दूकान और नकदी निकलते हैं, तब खबर बनती है, चर्चाएँ होती है। फिर चाहे अफसर रायपुर को हो, बिलासपुर का हो या और कहीं का। पिछले दिनों रायपुर नगरनिगम के एक अधिकारी के पास से करोड़ों की संपत्ति मिली और अब बिलासपुर नगरनिगम का इंजीनियर सपड़ में आया। आखिर ये लोग इतने श्रमवीर कहाँ से हो जाते हैं, कि रातों रात मालामाल हो गए? जाहिर है यह पाप की, हराम की कमाई है। जो सीधे-सीधे लूट के कारण अर्जित की गई ? ऐसे लोगों की संपत्ति हर हाल में राजसात होनी चाहिए। और दोषी लोगों को कड़ा दंड भी मिलना चाहिए। ताकि दूसरे सबक लें। हमारे यहाँ अकसर छापे पड़ते हैं बाद में सब चमत्कारिक रूप से&amp;nbsp; निर्दोष निकलते हैं।&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;अफसरों पर लगाम की फिर कवायद&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में अफसरी का धंधा मंदा ही नहीं होता। अफसरों का स्वर्ग है यह राज्य। यहाँ अफसर लूटखसोटबी करतेहैं, अन्याय भी करते हैं और नायक बने घूमते हैं। क्योंकि बहुत-से लोग हीनबाव सेग्रस्त रहते हैं। वे अफसरों को कार्यक्रमों में बुलाते हैं, उनका सम्मान करते हैं। अपने स्वार्थ के लिए उन लोगों की प्रतिष्ठा की जाती है, जो किसी लायक नहीं है। जैसे किसी पुलिसवाले का सम्मान इसलिए कर दिया जाता है, कि उसने चोर या हत्यारे को पकड़ लिया। यह तो पुलिस का काम है, इसीलिए तो उसे नौकरी दी गई है। लेकिन नहीं, सबंध गाँठने के लिए उसे सम्मानति किया जाता है। जिसे जिस काम के लिए रखा गया है, उसे उसके काम के एवज में सम्मानति किया जाना अजीब लगता है,लेकिन यह हो रहा है। अब सरकार ने एक पुराने सिविलसेवा (आचरण) अधिनियम 1965 को फिर से लागू करके साफ-साफ निर्देश दिए हंै कि कोई भी अफसर उद्घाटन-शिलान्यास नहीं करेगा। किसी कार्यक्रम में अतिथि नहीं बनेगा। वैसे तीसरी बार यह अधिनियम लागू किया गया है, लेकिन कुछ बेशरम अफसर इसका पालन नहीं करते और आए दिन मंचों पर स्थापित नजर आते रहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;शिक्षामंत्री के महत्वपूर्ण सुझाव&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;शिक्षा में भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय एवं मानवीय मूल्यों को बढ़ाने वाले पाठ्यक्रम शामिल किए जाने चाहिए। महापुरुषों के पाठ पढ़ाए जाने चाहिए। प्रदेश के शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने पिछले दिनों दिल्ली में इस आशय के सुझाव दिए। एनसीइआरटी की बैठक में श्री अग्रवाल ने अपने सुझाव रखे। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता, कि वर्तमान दौर में हम अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। राष्ट्रीय मूल्य तो जैसे हाशिये पर ही फिंका गए हैं। मानवीय मूल्य भी बेमानी होते जा रहे हैं। स्कूलों में खेलकूद-बागवानी और सांस्कृतिक गतिविधियाँ कम होती जा रही हैं। आज पूरा ध्यान बच्चे के व्यावसायिक कैरियर पर ही केंद्रित है। उसे बेहतर मानव बनाने की बुनियादी चिंता कहीं नजर नहीं आती। बच्चे को अपने पैरों पर खड़ा होना है, उसे अच्छी नौकरी हासिल करनी है। अच्छा व्यवसाय करने लायक बनना है। मगर उसे अच्छा इंसान भी बनना है। इसका पाठ भी पढ़ाया जाना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-5862029921611677385?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/5862029921611677385/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=5862029921611677385' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/5862029921611677385'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/5862029921611677385'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-9007903817490479998</id><published>2010-10-30T09:22:00.000-07:00</published><updated>2010-10-30T09:22:34.057-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;राज्यपाल से भी बड़ा हो गया सलमान...?&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;हे भगवान्.......&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बॉलीवुड के  कुख्यातकिस्म के विख्यात अभिनेता सलमान खान को राज्योत्सव में बुलाने की तो  खूब आलोचनाएँ होती रहीं, मगर उसके आने के बाद जो कुछ हुआ, वह तो नहले पे  दहले जैसी बात हो गई। राज्योत्सव के उद्घाटन के बाद मंच पर सलमान खान को  बुलाया गया। दुखद पहलू यह रहा, कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री और अन्य  जनप्रतिनिधियों को मंच पर बुला कर सलमान का स्वागत करवाया गया। सबने यह  दृश्य देखा और चकित रह गए। राज्यपाल एक हीरो का स्वागत करने पर मंच पर जाए,  यह राज्यपाल के पद की गरिमा के खिलाफ है। और वो भी ऐसे हीरो का स्वागत  करे, जिसका आपराधिक रिकार्ड रहा हो। लोगों ने इसे&amp;nbsp; सांस्कृतिक भूल कहा, जो  हो गई है। लेकिन यह एक सबक है। दस मिनट मंच पर रहा सलमान और व्यवस्था चरमरा  गई। युवा दर्शक बेचारे जिस उत्साह के साथ आए थे, उन्हें निराशा हाथ लगी।  सलमान ने कोई कार्यक्रम ही पेश नहीं किया। संस्कृति विभाग के निमंत्रण पत्र  में उसका ऐसा गुनगान किया गया, कि मत पूछिए। सलमान की चार तस्वीरें कुछ इस  अंदाज में छपी हैं गोया वो आकर कोई धमाल करने वाला है। सलमान की तस्वीरें&amp;nbsp;  छापने से संस्कृति विभाग का पुलिसियापन ही जाहिर हुआ है। खैर, जो होना था,  सो हो गया: भविष्य में इस विभाग की गरिमा का ख्याल रखा जाना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;b&gt;कमीशनखोरी से दुखी भाजपाई&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;भाजपा की सरकार  है मगर भाजपा के कार्यकर्ता शासन-प्रशासन में व्याप्त कमीशनखोरी से दुखी  हैं। पिछले दिनों राजधानी में भाजयुमो का सम्मेलन सम्पन्न हुआ। इसमें  राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुराग ठाकुर पधारे। सम्मेलन में मुख्यनमंत्री डॉ. रमन  सिंह भी थे। यहाँ अनेक कार्यकर्ताओं ने अपनी पीड़ा सामने रखी और यह आरोप  लगाया कि जनप्रतिनिधि विकास के लिए दिए जाने वाले पैसों में कमीशनखोरी करते  हैं। राज्य में बढ़ रही शराबखोरी पर भी चर्चा हुई। अनुराग ठाकुर ने कहा,  ऐसे गलत लोगों को बेनकाब करना चाहिए। सबको यह संकल्प करना चाहिए कि वे  चुनाव ने शराब बाँटेंगे और न पीएंगे। मुख्यमंत्री इस प्रवृत्ति की निंदा  करते हुए दो टूक कहा,कि ठेकेदारी करने वाले नेताओं को जनता रिजेक्ट कर देती  है। सम्मेलन के माध्यम से वैचारिक मंथन हुआ। अब वे नेता सावधान हो जाएँगे  जो कमीशनखोरी में लिप्त रहते हैं। और जिनकी तरफ इशारा किया जा रहा था। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;b&gt;दस्ता बना सिरदर्द...&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हमारे गृहमंत्री  ईमानदार हैं। कुछ करना चाहते हैं। मगर उनके दाएँ-बाएँ रहने वाले लोग उनकी  छवि धूमिल करने के पीछे पड़ गए हैं। उन्होंने शराबखारी, जुआ-सट्टा आदि  सामाजिक बुराइयों से निपटने के लिए एक दस्ता बना दिया, लेकिन अब यह दस्ता  सिरदर्द साबित हो रहा है। इस दस्ते पर मारपीट-गुंडागर्दी, वसूली आदि के  गंभीर आरोप लग रहे हैं। खरोरा में इस दस्ते ने जो गुंडागर्दी की, उसके  खिलाफ तो भाजपा के ही जुझारू विधायक देवजी पटेल ने मोर्चा खोल दिया था। अब  सांसद चंदूलाल साहू भी सामने आ गए हैं। इसके अलावा भी कुछ भाजपाई सामने आ  कर दस्ते की हरकतों का विरोध कर रहे हैं। बेहतर तो यही होगा, कि गृहमंत्री  वर्तमान दस्ते को भंग करे और साफ-सुथरी छवि वाले लोगों को जोड़ कर फिर नया  दस्ता बनाए। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;b&gt;करोड़ों की कमाईवाला वन अधिकारी&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जब लोग  कहते हैं कि जंगल कट रहे हैं, वहाँ निर्माण कार्य में घपले होते हैं, तो  लोग गलत नहीं कहते। मनेंद्रगढ़ में भारतीय वन सेवा के अधिकारी रजक के  खिलाफ करोड़ों के घोटाले के आरोप लगे। उसकी जाँच भी हुई। अधिकारी अपनी सफाई  में कुछ ठीक-ठाक नहीं कह पाए, इसलिए सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया है।  ऐसे अनेक अधिकारी है, जिनके कारण छत्तीसगढ़ की वन संपदा नष्ट हो रही है।  पिछले कुछ दिनों से अनेक भ्रष्ट अधिकारी सरकार के निशाने पर आ रहे हैं। अगर  यही रफ्तार रही तो उम्मीद की जा सकती है, कि भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी।  बशर्ते अधिकारी सुधर जाएँ। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;घूसखोरी के खिलाफ हेल्पलाइन...&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;एक दशक हो  गए अपने राज्य को बने, लेकिन विकास के साथ-साथ भ्रष्टाचार भी लगातार  फलता-फूलता रहा है। विकास एक कदम चलता है और भ्रष्टाचार दस कदम आगे बढ़  जाता है। कई अफसर लाल हो गए हैं। इनसे कैसे निपटा जाए, यह बड़ी समस्या है।  लेकिन इस दिशा में अब पहल हो रही है। लड़कियों से छेडख़ानी को रोकने के लिए  सरकार ने एक हेल्पलाइन शुरू की है। कुछ टेलीफोन नंबर दिए हैं, जिस पर  लड़कियाँ फोन करती हैं और दोषी को पकड़ा जाता है। अब रिश्वतखोरी को पकड़ाने  के लिए भी हेल्पलाइन शुरू कर दी गई है। लोगों को इसका उपयोग करना चाहिए और  जो रिश्वतखोर हैं, भ्रष्ट हैं, उनकी जानकारी इन नंबरों पर देनी ही चाहिए।  आप भी नोट कर लें ये नंबर- 800, 110180 और 01124651000। हो सकता है, कभी  काम ही आएं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;बच के रहें नकली मिठाइयों से...&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अगले हफ्ते दीपावली है। इस अवसर पर आप  मिठाइयाँ खरीदेंगे। लोगबाग आप को खिलाएँगे भी, मगर सावधान रहने की जरूरत  है। पैसे कमाने की धुन में अनैतिक हो चुके कुछ लोग त्योहारों के मौकों पर  नकली खोवा बनाते हैं। इसकी बनी मिठाइयाँ खाकर आदमी की जान भी जा सकती है।  जहरीली चीजें धीरे-धीरे असर दिखाती हैं। मगर मौत के सौदागरों को इससे कोई  मतलब नहीं। वे तो यह मान कर चलते हैं, कि ईश्वर के सामने हाथ जोड़ेंगे और  पाप खत्म हो जाएँगे। ऐसे पापी पूरे छत्तीसगढ़ में छाए हुए हैं। वे राजधानी  में भी हैं, रायगढ़ में भी हैं, अंबिकापुर में भी है तो बस्तर में भी। कहीं  भी मिल जाएँगे मिलावटखोर। सावधान तो हमें रहना है। बेहतर हो कि घर पर  मिठाइयाँ बनाएँ। खुद भी खाएँ और पड़ोसियों को भी खिलाएँ।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;b&gt;अरुंधति का पुतला फूँका&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अरुंधति राय एक  लेखिका है। अब वह सामाजिक कार्यकर्ता है। लेकिन वह कुछ ज्यादा ही उत्साह  में आ जाती है। नक्सलियों का खुलेआम समर्थन करती ही है। अब वह इसलिए चर्चा  में है कि उसने पिछले दिनों कह दिया, कि कश्मीर भारत का अंग नहीं है। अब यह  बयान देशद्रोह से कम नहीं है। लेकिन अरुंधति काकुछ नहीं हुआ। हमारे देश  में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भयंकर दुरुपयोग होता है। होता रहा है।  कायदे से अरुंधति पर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए, मगर नहीं चला। लेकिन  इस देश में लोग अभी मुर्दा नहीं हुए हैं। राजधानी में भी लोग जिंदा हैं।  इसलिए अभाविप ने अरुंधति राय का पुतला दहन कर अपना आक्रोश व्यक्त किया।  कहीं तो कोई प्रतिक्रिया हुई,यह बड़ी बात है।&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-9007903817490479998?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/9007903817490479998/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=9007903817490479998' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/9007903817490479998'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/9007903817490479998'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/10/blog-post_30.html' title='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-8843781929529472579</id><published>2010-10-27T06:03:00.000-07:00</published><updated>2010-10-27T06:03:03.866-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt;हद है....सलमान के स्वागत में सरकार...?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;छत्तीसगढ़&amp;nbsp; में २६ अक्टूबर  से राज्योत्सव शुरू हो गया है. १ नवम्बर २००० को नया राज्य बना था. यह  दसवां वर्ष है. उत्सव १ नवम्बर तक चलेगा. लेकिन कल उद्घाटन के ठीक बाद मंच  पर जो नज़ारा दिखा, उसे देख कर उन लोगो को गहरी निराशा हुई, जो चीज़ों को,  जीवन को गंभीरता से लेते है. बालीवुड के एक नायक सलमान खान का जिस तरह मंच  पर पहुँच&amp;nbsp; कर राज्यपाल, मुख्यमंत्री समेत अन्य मंत्रियों और अफसरों ने  सोत्साह स्वागत किया, उसे देख कम से कम मेरे जैसे नागरिक की आँखे तो शर्म  से झुक ही गई. औरों की भी झुकी होंगी, क्योंकि सलमान का ऐसा कद नहीं है, कि  उसके स्वागत के लिये राज्यपाल और मुख्मंत्री मंच पर जाये. ये हो सकता है,  कि सलमान खान राजपाल और मुख्यमंत्री का स्वागत करता. मगर यहाँ तो उल्टी  गंगा बह रही थी. सलमान खान भी अपनी किस्मत को सराह रहा होगा&amp;nbsp; कि अच्छा  राज्य मिला, जो उसे इतनामहत्व दे रहा है. &lt;br /&gt;आखिर सलमान खान का अवदान क्या है? चंद औसत दर्जे की फिल्में..? क्यों उसे  इतना महत्त्व दिया गया? इसलिए कि वह उसकी देहयष्टि आकर्षक है? इसलिए कि वह  काले हिरनों का शिकार कराने में माहिर है, या फिर इसलिए कि वह गाडी चलता है  और लोगों को कुचल देता है? किस कारण एक सरकार सलमान कहाँ का स्वागत कराने  उमड़ पडी? इसका कारण खोजा जाना चाहिए. बहुत पुरानी बात नहीं है, जब सलमान को  काले हिरन के अविध शिकार के लिये गिरफ्तार कर के जेल मे ठूंसा&amp;nbsp; गया था.  नशे की हालत में कार चला कर लोगों को कुचलने का आरोपी भी यही (खल) नायक है.  अनेक किस्से है, इस हीरो के. किसी से मारपीट करना, हीरोइनों के साथ 'स्कैंडल' गाली -गलौज&amp;nbsp; करना  आदि-आदि&amp;nbsp; ऐसे व्यक्ति का&amp;nbsp; राज्योत्सव के मंच पर महानायक बता कर स्वागत करना  यह बताता है कि राज्य मे ऐसे कुछ सलाहकार है, जो सांसकृतिक शून्यता के  शिकार हो चुके है. ठीक है, कि सलमान को एक निजी कंपनी ने बुलाया था. मगर  राज्यपाल और मुख्यमंत्री द्वारा उसका पुष्पगुच्छ से स्वागत करना, किसी भी  कोण से सही नहीं ठहराया जा सकता. नई पीढ़ी के युवकों मे किसी हीरो को देखने  की दीवानगी स्वाभाविक है, मगर एक सरकार किसी हीरो का स्वागत कराने मंच पर  चली आये, यह पहली बार देखा गया. कलाकार का सम्मान होनाचाहिए, मगर उसकी  सामाजिक छवि भी तो हो. जो व्यक्ति गंभीर अपराध के मामले में सजायाफ्ता हो,  उसके स्वागत मे काम से काम सरकार को तो उतरना ही नहीं चाहिए था. मगर ऐसा  हुआ, यह देख कर अनेक लोगों को धक्का लगा. राजपाल और मुख्यमंत्री से यह चूक  कैसे हो गई, यह&amp;nbsp; लोगों की समझ से परे है. बहुत संभव है, उन्हें सलमान खान  के अतीत की जानकारी न रही हो. यह काम सलाहकारों का है. पता नहीं उनको सलाह  देने वाले लोग कैसे है. बहुत संभव है, कि उन लोगों को भी यह पता न रहा हो,  कि सलमान खान गंभीर अपराध के सिलसिले में जेल कि हवा खा चुका है. &lt;br /&gt;लोग पुरानी घटनाओं को जल्दी भूल जाते है.&amp;nbsp; दरअसल&amp;nbsp; रजत-परदे की चमक ही ऐसी  है,कि इसमें दिखाने वाला खलनायक भी नायक लगता है. सलमान की&amp;nbsp; नई फिल्म  ''दबंग'' आई है. जिसमें उसने&amp;nbsp; भ्रष्ट पुलिस अधिकारी का किरदार&amp;nbsp; निभाया है.  फिल्म&amp;nbsp; 'मुन्नी ' बदनाम हुई...'' जैसे गाने के कारण खूब चली. इस फिल्म कि  लोकप्रियता ने सलमान को ज्यादा लोकप्रिय बना दिया. इस देश का दर्शक भी अब  खलनायक को ही नायक समझाने की भूल कर रहा है. जो भी&amp;nbsp; हो, मै तो सलमान को  खुशकिस्मत मानता हूँ, कि महानायक की तरह उसका छत्तीसगढ़ में पूरी सरकार ने  स्वागत किया. इस छत्तीसगढ़ में इन दिनों वैसे भी पुलिस वाले दबंगई दिखा रहे  है. लोग ठीक कह रहे है, कि अगर बालीवुड़ के ही किसी नायक को बुलाना था, तो  ऐसे किसी कलाकार को बुलाते, जिसकी सामाजिक छवि भी ठीकठाक हो. कई नाम हो  सकते है. मगर अब किसी ने सलमान की तगड़ी ''मार्केटिंग'' कर ही दी तो दूसरा  नाम सामने कैसे आ सकता था. मगर सलमान का स्वागत करके सरकार की&amp;nbsp; छवि धूमिल  ही हुई है, इसमें दो राय नहीं हो सकती. लोग इस घटना को चमत्कार की&amp;nbsp; तरह ले  रहे है,कि एक सरकार एक विवादस्पद फ़िल्मी नायक के स्वागत मे उपस्थित हो गई. &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-8843781929529472579?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/8843781929529472579/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=8843781929529472579' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/8843781929529472579'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/8843781929529472579'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/10/blog-post_27.html' title='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-2685582598565590501</id><published>2010-10-09T07:42:00.000-07:00</published><updated>2010-10-09T07:42:44.288-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छ्त्तीसगढ़ की डायरी/ गिरीशपंकज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;बस्तर : उम्मीद कायम है..&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;नक्सलवाद के विरुद्ध बस्तर में जिस तरह लोग लामबंद होते रहे हैं, उसे देख कर यह विश्वास दृढ़ होता है, कि अन्याय के विरुद्ध जीवत प्रतिकार का सिलसिला जारी है। सलवाजुडूम भले ही अब बंद हो गया हो मगर शांति के लिए लोग फिर भी एक जुट हो रहे हैं। पिछले दिनों बस्तर में बीजापुर और जगदलपुर में शांति के लिए सैकड़ों लोग जमा हुए और यह संकल्प दुहाराया कि जब तक बस्तर में शांति बहाल नहीं हो जाती, लोग हिंसा के विरुद्ध खड़े होते रहेंगे। गाँधी जयंती के दिन लोगों के मन में बड़ा उत्साह था। डर यही है कि यह उत्साह समय के साथ ठंडा न पड़ जाए। नक्सलियों के विरुद्ध पुलिस और दूसरे जवान अपने तरह से लड़ रहे हैं। लेकिन जनता कोभी साथ देना है।&amp;nbsp; उन्हें घबराना ही नहीं है। जगदलपुर में एक संस्था बनी है बस्तर शांति एवं विकास संघर्ष परिषद। इस संस्था के गठन के दिन मुख्य वक्ता के रूप में मैं शामिल हुआ था। वहाँ जमा सैकड़ों लोगों के उत्साह को देख कर लगा कि अभी भी उम्मीद कायम है। और रहनी चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;जोगी का आशावाद&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को मानना पड़ेगा। एक मायने में वे सबके प्रेरणास्रोत है। शारीरिक दुर्घटना केकारण और कोई होता तो वह हताश हो गया होता । मगर जोगीजी उत्साह सेबरे रहते हैं। और आए दिन सरकार के नाक में दम किए रहते हैं। लोग घबराए रहते हैं, कि पता नहीं, कब क्या हो जाए। अभी पिछले दिनों जोगी जी ने कह दिया कि भाजपा के बारह विधायक उनके संपर्क में हैं। ये विधायक बेहद नाराज हैं क्योंकि इनकी उपेक्षा हो रही है। जोगी जी का संकेत यही है कि सरकार उनकी मुट्ठी में है। जब चाहे निपटा सकते हैं। जोगीजी के इस बयान से लोग सकते में हैं। जोगी जी यह भी कह रहे हैं कि वे बहुत कुछ कर सकते हैं, मगर जब तक हाइकमान तैयार नहीं होगा, वे कुछ नहीं करेंगे। और यह तय है कि हाईकमान ऐसा कुछ नहीं चाहेगा, कि सरकार गिरे। मतलब केवल हवाहवाई बात है। फिर भी जोगी जी के इस बयान से भाजपा में सुरसुरी तो जरूर छूटी होगी और यह भी देखा जा रहा होगा, कि वे बारह विधायक हैं कौन। हैं भी या नहीं?&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;राहुल का बचकाना बयान &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;राहुल गाँधी अब बच्चे नहीं रहे। वे सांसद भी बन गए हैं। इसलिए संभल कर बोलना चाहिए। वे पिछले दिनों कह गए किस संघ और सिमी एक जैसे हैं। कहाँ राष्ट्रविरोधी संस्था सिमी और कहाँ राष्ट्रवाद के लिए जीने-मरने वाली संस्था संघ। संघ कट्टर हो सकता है, लेकिन वह सिमी जैसा आतंकवादी नहीं है। राहुल को किसी ने गलत फीड कर दिया होगा। बेचारे ने कह दिया। स्वाभाविक है कि उनका पुतला जला। राजधानी ही नहीं अनके जगह। बिना सोच-समझे बोलने के कारण ही हमारे यहाँ विवाद पैदा होते हैं। राहुल का बयान कुछ ऐसा ही है जैसे कोई हत्यारे और पंडित को एक ही श्रेणी में रख दे।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;प्रतीकों में भी हो सकती है बलि&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कुछेक धर्मस्थलों में पशुबलि दी जाती है। पूरा प्रांगण लहूलहान न•ार आने लगता है। जो लोग बलि के पक्ष में होते हैं, उन्हें बुरा नहीं लगता मगर बहुत से ऐसे लोग भी होते हैं,जो खून देख कर ही घबरा जाते हैं। हमारा समाज हिंसा विरोधी रहा है। लेकिन धार्मिक परंपरा के नाम पर हिंसा के मामले में मौन हो जाता है। जबकि लोगों को इसका विरोध करना ही चाहिए। सभ्य समाज में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। अगर किसी की धार्मिक मान्यता है तो उसका रूप बदला जा सकता है। प्रतीकों में बलि ली जा सकती है। नारियल को भी लो प्रतीक बनाते रहे हैं। ईश्वर कभी भी बलि से प्रसन्न नहीं हो सकता। वह त्याग को पसंद करता है। करुणा से वह खुश होता है। सुशिक्षित आम लोगों को यह समझाया जा सकता है। मिल-जुल कर एक वातावरण बनाने की कोशिश करनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;शोर पर ऐतराज&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हमारे यहाँ धार्मिकता की भी ऐसी उग्रता देखने में आती है कि मत पूछिए। धर्म-कर्म में लगे बहुत से लोग कई बार अभद्रता की हद से गुजर जाते हैं। लाउडस्पीकर बजाकर आसपास के लोगों को परेशान कर देते हैं। आजकल हर घर में पढऩे-लिखने वाले बच्चे होते हैं। पढ़ाई का कितना दबाव रहता है, यह किसी से छिपा नहीं। जब घर के बाहर फुलसाउंड में लाउडस्पीकर बजता है तो बच्चे पढ़ नहीं पाते। बहुत से लोग शोर के कारण तनावग्रस्त भी हो जाते हैं। अगर ऐसे समय में कोई पीडि़त व्यक्ति आयोजकों के पास जाए तो वे अन्यथा लेते हैं और लडऩे पर उतारू हो जाते हैं। तब लगता है, कि यह कैसी धार्मिकता है जो दूसरों का दिल दुखा कर ईश्वर को खुश करना चाहती है। जबकि ईश्वर तो लोगों के दिलों में भी रहता है। अब लोग आस्था कम और प्रदर्शन में ज्यादा विश्वास करने लगे हैं। इसीलिए वे केवल अपनी सुविधा का ध्यान रखते हैं, दूसरों का नहीं। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;फिर वही शराब....&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ इस वक्त नक्सलवाद के साथ-साथ नशावाद से भी पीडि़त है। ऐसा कोई गाँव या शहर नहीं होगा,जहाँ शराब के कारण हिंसक स्थितियाँ न बनती हों। आपस में मारपीट, वैमनस्यता के पीछे शराब भी एक बड़ा कारण है। हालत यह भी होती है कि शराब के कारण घर-परिवारों में मौतें भी होने लगी हैं। पिछले दिनों आरंग क्षेत्र की कुछ जागरूक महिलाएँ रायपुर आईं और शराब बंदी के लिए प्रदर्शन करके लौट गईं। इनमें एक ऐसी महिला भी शामिल थी, जिसके पति की मौत शराब पीने के कारण हुई। अनेक मौतें केवल शराब केकारण हुई हैं। फिर भी शराबखोरी पर अंकुश नहीं लग रहा। प्रशासन को केवल आय चाहिए। शराबविरोधी आंदोलन को चालाकी के साथ दबा दिया जाता है। लेकिन ऐसा करके प्रशासन खुद अपराध कर रहा है। शायद उसे इस बात का अहसास ही नहीं है। गनीमत है कि छत्तीसगढ़ मुर्दा नहीं है। यहाँ शराब के विरुद्ध लोग एकजुट होते रहते हैं। आज नहीं तो कल हो सकता है कोई ऐसी व्यवस्था आए जो शराबबंदी के खिलाफ ईमानदारी से कोई निर्णय ले।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-2685582598565590501?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/2685582598565590501/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=2685582598565590501' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/2685582598565590501'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/2685582598565590501'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-5160398946525634746</id><published>2010-09-26T09:05:00.000-07:00</published><updated>2010-09-26T09:05:11.437-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt; &lt;span style="font-size: x-large;"&gt;छत्तीसगढ़ ; घपलेबाज अफसरों की संख्या बढ़ रही&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;छत्तीसगढ़ के बारे में यही कहा जाता है कि यह बाहर से आए अफसरों का स्वर्ग  है। और यह दीख भी रहा है। आजकल हर दूसरे-तीसरे दिन किसी न किसी अफसर के यहाँ  छापा पड़ रहा है। काफी माल बरामद हो रहा है। छोटे से छोटा अफसर भी करोडों  में खेल रहा है। क्या आईएएस और क्या डिप्टी कलेक्टर, हर कोई नोट कलेक्ट कर  रहा है। तरह-तरह के घोटाले हो रहे हैं। सबसे मज़े की बात यह है कि लोग पकड़  में तो आते हैं, अखबारों के माध्यम से इनकी मिट्टीपलीद&amp;nbsp; भी होती है, लेकिन  चिकने घड़ों को कोई फर्क नहीं पड़ता। और सच्चाई भी यही है, कि छापे के बाद  कुछ दिन तक हलचल रहती है। बाद में मामला शांत हो जाता है। तबाही के कहीं  कोई निशान ही नजर नहीं आते। कितने ही मामले गिनाए जा सकते हैं। यही सब देख  कर तो बाकी अफसरों के भी हौसले बुलंद हैं, कि डटकर करो कमाई। किसी का बाल  भी बाँका नहीं होगा। कमाल हो रहा है, कमाल हो रहा है। अफसर तो अफसर, अब  बाबू भी लाल हो रहा है। लोग समझ रहै हैं कि छत्तीसगढ़ खुशहाल हो रहा है।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;छत्तीसगढ़ की पुलिस इतनी कमजोर नहीं....&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;नक्सल समस्या एक अंधेरी रात में तब्दील हो चुकी है, ऐसा लगता है। ऐसा कोई दिन नहीं,जब कोई वारदात न हो। वहाँ रहने वाले लोगों को दहशत के साये में जीना पड़ता है। पुलिस वाले वहाँ जाना नहीं चाहते तो उनको प्रशासनिक डंडा दिखाया जाता है। खैर, काम तो करना ही पड़ेगा। जो पुलिसवाले वहाँ जाने से बचते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि खतरा कहाँ नहीं है। जीवन ही खतरे का नाम है और पुलिस में जो आता है, वह खतरों का खिलाड़ी बन जाता है। वरदी का मतलब है कि सिर पर कफन बाँध कर निकल पड़े हैं। सुविधाएँ यहाँ नहीं है। यहाँ संघर्ष है। चुनौतियाँ हैं। नक्सलवाद सबसे बड़ी चुनौती है। उससे भागने का मतलब है हम यह बता रहे हैं कि हम कायर है। जबकि वरदी वहीं पहनता है जो हिम्मती होता है। अगर पुलिस वाले नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जाने से घबराएंगे तो नक्सलियों के हौसले तो और बढ़ेंगे। इसलिए हिम्मत से काम लें और नक्सलियों से लोहा लें। छत्तीसगढ़ की पुलिस कमजोर नहीं, बहादुर है। यह संदेश पूरे देश तक जाना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;नक्सल -अंधेरा: कब होगी सुबह?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वैसे पुलिस के जवानों को बहादुरी का सबक तो सिखाना आसान है, लेकिन यथार्थ यही है, कि वहाँ सरकार नाकाम-सी हो रही है। अभी सात जवानों का अपहरण किया गया । तीन को तो हत्या ही कर दी गई। चार अभी बंधक हैं। यह सब नक्सली आतंकवाद को दर्शाने का एक तरीका है। बंधक बने लोगों के परिजन किन मानसिक दौरों से गुजर रहे हैं, यह उनके बयानों से समझा जा सकता है। वे लोग नक्सलियों से अनुरोध कर रहे हैं, कि हमारे घर वालों को छोड़ दो तो वे लोग पुलिस की नौकरी ही छोड़ देंगे। उनकी जान बख्श दो। आदि-आदि। छोटे-छोटे बच्चे अपील कर रहे हैं लेकिन क्या नक्सली कुछ रहम करेंगे? अगर वे रहम करना जान लें तो नक्सली ही क्यों रहते? आम लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर इस रात की सुबह कब होगी। लेकिन धैर्य रखना ही होगा। क्योंकि सुबह अवश्य आएगी। शांति का सूरज चमकेगा ही। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;ओ आँखवाले डॉक्टर, देखकर काम करो&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हद है लापरवाही की। पिछले दिनों विश्रामपुर की एक तीन वर्षीय बच्ची की आँख में चोट लगी तो परिजनों ने अंबिकापुर के डाक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने कुछ उपचार किया और आँख पर पट्टी&amp;nbsp;  &amp;nbsp; बाँध दी। दो दिन बाद छुट्टी भी दे दी। मगर आँख में दर्द बना रहा। बाद में पता चला कि अंबिकापुर के डॉक्टर ने तो बच्ची की आँख ही निकाल दी और डुप्लीकेट आँख लगा दी है। बच्ची की आँख में दर्द रहने लगा तो घर वाले बच्ची को लेकर रायपुर आए। एक जाने-माने डॉक्टर को दिखाया तब मामला सामने आया। घर वालों ने गैरजिम्मेदार डॉक्टर के खिलाफ विश्रामपुर थाने में रिपोर्ट लिखाई है। अब डॉक्टर महोदय सफाई में कह रहे हैं, कि घर वालों के कहने पर बच्ची की आँख निकाली थी। घर वालों की सहमति अगर थी तो घर वालों ने थाने में रिपोर्ट ही क्यों लिखाई? मामला गंभीर है। भयंकर किस्म की आपराधिक लापरवाही का है। डॉक्टर की लापरवाही केकारण एक नन्ही बच्ची की एक आँख चली गई, इसका दर्द बच्ची और उसके परिजन ही समझ सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;वाह रे गांजा-तस्कर सरपंच....?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सरपंच मतलब गाँव का प्रधान ..राजा। लेकिन बहुत-से गाँवों में सरपंचों की लापरवाही और लालच के कारण शराब और तरह-तरह की नशाखोरी फल-फूल रही है। गाँव के गाँव तबाह हो रहे हैं। पिछले दिनों रायपुर जिले के सुदूर गाँव का एक सरपंच गांजा-तस्करी में लिप्ट मिला। दूसरे लोग तो पकड़े गए मगर सरपंच पुलिस की गिरफ्त में आने के पहले ही वह फरार हो गया। लेकिन इससे एक बात तो साफ हो गई कि सरपंच की शह में गाँजे का कारोबार चल रहा था। एक सरपंच पकड़ा गया। अभी कुछ पकड़ सेबाहर हैं। अनेक गाँव आज नशे के केंद्र बनते जा रहे हैं। पचं-सरपंचों की सहमति के चलते शराब दूकाने खुल रही है। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;पुस्तक-मेले की परम्परा विकसित हो&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बिलासपुर में पुुस्तक मेला शुरु हो गया है। 3 अक्टूबर तक चलेगा। रायपुर में लगने वाला है। लेकिन अनुभव यही आया है कि इन पुस्तक मेलों में बहुत अधिक खरीदी नहीं होती। ये पुस्तक मेले में केवल दर्शनीय बन कर रहा जाते हैं। लोग पुस्तकों के पास तो आते हैं। मगर बाजार से गुजरा हूँ खरीदार नहीं हूँ&amp;nbsp; जैसी पंक्ति को सार्र्थक करते हुए निकल लेते हैं। जबकि अन्य राज्यों में होने वाले पुस्तक मेलों के बारे में सुन-पढ़ कर बड़ा आश्चर्य होता है, कि वहाँ साधारण से साधारण आदमी अच्छी खरीदारी करता है। छत्तीसगढ़ में पुस्तक-मेले की संस्कृति अभी बन रही है। यह शुरुआत है। यह सिलसिला चलता रहेगा तो भविष्य में पुस्तकें भी खरीदी जाएँगी। अभी तो सरकारी खरीदी भर होती है। वह भी इसलिए कि कुछ अफसरों को खासा कमीशन मिल जाता है। वे लाल हो जाते हैं। फिर भी इन पुस्तक मेलों का दिल से स्वागत होना चाहिए और छत्तीसगढ़ के दूरदराज स्थानों में रहने वाले कभी रायपुर-बिलासपुर जाएं तो मेलों तक भी जाकर कुछ न कुछ पुस्तकें जरूर खरीदें। &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-5160398946525634746?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/5160398946525634746/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=5160398946525634746' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/5160398946525634746'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/5160398946525634746'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/09/blog-post_26.html' title='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-9175972519005070167</id><published>2010-09-04T06:34:00.000-07:00</published><updated>2010-09-04T06:38:33.594-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गिरीश पंकज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><title type='text'>हाय, ये बलात्कारी शिक्षक</title><content type='html'>&lt;div style="background-color: #eeeeee;"&gt;&lt;b&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: #eeeeee; color: red;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: magenta; font-size: x-large;"&gt;हाय, ये बलात्कारी शिक्षक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: magenta;"&gt;.................&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: purple; font-size: small;"&gt;शिक्षक दिवस के दिन लोग शिक्षकों की पूजा करते हैं, उनका सम्मान करते हैं। शिक्षक होते भी इस लायक हैं कि उनका आदर किया जाए, लेकिन कभी-कभी कुछ शिक्षक सकलकर्मी यानी कुकर्मी भी निकल जाते हैं। जिनसे उम्मीद करते हैं, कि वे संस्कार देंगे, वे पट्ठे बलात्कार करते हुए पकड़े जाते हैं। भिलाई के ज्ञानदीप स्कूल में एक अज्ञानी शिक्षक का मामला प्रकाश में आया है। यह नीच शिक्षक पाँचवीं कक्षा की एक छात्रा को अपनी वासना का शिकार बनाना चाहता था। उस पर मामला दर्ज हो गया है। अब तो उसे स्कूल से हटा भी दिया गया होगा। दुख की बात यह है कि कुछ शिक्षक गलती से शिक्षा के पेशे में आ जाते हैं। दरअसल उन्हें होना था अपराधी, बनना था माफिया मगर अध्यापक बन गए। मगर मानसिकता वहीं की वही। क्या करें? ऐसे घटिया शिक्षकों के कारण पूरी बिरादरी बदनाम होती है। सचमुच, एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है। ऐसे शिक्षकों को आजीवन जेल में ही &lt;/span&gt;&lt;span style="color: purple; font-size: large;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;सड़ाना चाहिए, ताकि उन्हें हर पल अपनी गलती का अहसास होता रहे। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;लहू का रंग एक है....&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br style="color: purple;" /&gt; &lt;span style="color: purple; font-size: small;"&gt;पिछले दिनों फिर एक घटना प्रकाश में आई, कि एक घायल नक्सली को एक जवान ने अपना खून दिया। यानी उसकी जान ही बचाई। खून देने वाले जवान ने साबित कर दिया, कि मानवता सबसे ऊपर है। वह चाहता तोकून न भी देता। उन नक्सलियोंं को खून क्यों दें, जो बेकसूरों का खून बहाते हैं। यह निर्मम व्यावहारिक सोच है, मगर नैतिकता या जीवन-मूल्य यही कहते हैं, कि मानवता की रक्षा की जाए। हो सकता है, जवान के खून देने के बाद नक्सलियों का मन पसीजे।&amp;nbsp; वे सोचने पर विवश हों, कि जिनको हम मार डालते हैं, उनके ही लोग हमारे साथी की जान बचाने के लिए रक्तदान करते हैं। लहू का रंग एक हैं। मगर जब लहू की सोच हिंसक हो जाए, तो क्या किया जा सकता है। जवान ने अपना लहू दे कर पुण्य का काम किया है। उसका अभिनंदन होना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: purple;" /&gt; &lt;span style="background-color: #6aa84f; color: purple; font-size: large;"&gt;सबक है यह पुलिस के लिए..&lt;/span&gt;&lt;br style="color: purple;" /&gt; &lt;span style="color: purple; font-size: small;"&gt;पुलिस का मतलब यह नहीं है, कि किसी के साथ भी मनमानी कर ली जाए। डंडा हाथ में आने के बाद कुछ लोग रावणत्व के शिकार हो जाते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं, कि लोकतंत्र में कानून नाम की कोई चीज भी है। पुलिसवालों को कानून की रक्षा के लिए डंडा दिया जाता है, लेकिन भाई लोग उस डंडे से किसी का भी सिर फोडऩे लगते हैं। आरपीएफ के प्रभारी समेत सात पुलिस कर्मियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया गया है। हुआ यह कि किसी मामले में एक व्यक्ति को जेल हो गई थी, लेकिन पुलिस चालान नहीं पेश कर पाई। व्यक्ति को जमानत पर रिहा कर दिया गया। लेकिन पुलिस उसे फिर पकड़ कर ले गई। उसे मारा-पीटा। प्रताडि़त किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रट ने मामला दर्ज करने का आदेश दे दिया। शिकार करने वाले लोग खुद शिकार हो गए। प्रताडि़त व्यक्ति को,उसके परिवार को तब संतोष मिलेगा, जब दोषी पुलिस वालों को कड़ी सजा मिलेगी। और मिलेगी ही क्योंकि न्याय के घर देर है, अंधेर नहीं। &lt;/span&gt;&lt;br style="color: purple;" /&gt; &lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;छत्तीसगढ़ में घसपैठिए....? &lt;/span&gt;&lt;br style="color: purple;" /&gt; &lt;span style="color: purple; font-size: small;"&gt;छत्तीसगढ़ ही क्या, पूरा भारत घुसपैठियों का घर बनता जा रहा है। यह एक बड़ी समस्या है, फिलहाल अगर छत्तीसगढ़ की बात करें, तो यहाँ भी बांग्लादेश और पाकिस्तान के लोग घसुपैठ की कोशिश करते रहते हैं। अपने देश से वीजा बना कर आते हैं और भारत में ही रह जाते हैं। क्योंकि यहाँ सुख-शांति है। आराम से अपना धंधा कर सकते हैं। अपने यहाँ भ्रष्टाचार इतना है कि थोड़े से पैसे मिलने के बाद संबंधित अधिकारी किसी भी किस्म का प्रमाणपत्र दे सकता है। ऐसा ही एक पाकिस्तानी भवनदास सचदेव दस -बारह से रायपुर में रह रहा था। मकान भी खरीद लिया था। अपना व्यवसाय भी कर रहा था। अचानक पोल खुली। पुलिस ने पाक नागरिक केविरुद्ध चार सौ बीसी का मामला दर्ज कर लिया। इसके बाद ही यही सोचा जा रहा है, कि ेेसे न जाने कितने लोग यहाँ होंगे। रायपुर ही नहीं, आसपास भी ऐसे विदेशी होंगे, जो चुपचाप रह रहे हैं। एक अभियान चलना चाहिए, ताकि संद्ग्धि लोग पकड़ में आ सकें। &lt;/span&gt;&lt;br style="color: purple;" /&gt; &lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;स्वर्ग है राजधानी सेक्स-माफिया के लिए....&lt;/span&gt;&lt;br style="color: purple;" /&gt; &lt;span style="color: purple; font-size: small;"&gt;छत्तीसगढ़ में भू माफिया, शराब माफिया, उद्योग माफिया आदि-आदि सक्रिय हैं। एक और माफिया तेजी के साथ पैर पसार रहा है। यह है सेक्स-माफिया। यह माफिया बाहर से लड़कियाँ बुलवाता है और यहाँ के रईसजादों को सप्लाई करता है। ये रईस लोग रायपुर के ही नहीं होते। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से यहाँ आते हैं। पिछले दिनों ऐसे ही एक सेक्स रैकेट का भाँडा फूटा। जम्मू और दिल्ली की लड़कियों के साथ छत्तीसगढ़ के ही दो युवक पकड़ में आए। दलाल फरार हो गया।&amp;nbsp; पकड़ी गई लड़कियों के पास से अनेक बड़े शहरों की हवाई टिकटे मिली। यानी ये चलती-फिरती देह-मशीनें थी। आज यहाँ तो कल वहाँ। कोई बड़ी बात नहीं, कि ये धनलोलुप लड़कियाँ अपने अभिभावकों से छल करके घूमती रहती हैं। पकड़ में आने पर इनके माता-पिता लज्जित होते हैं। लेकिन आज पैसे कमाने की हवस के कारण पतन इतनी तेजी से फैला है कि कई लोग इस पतन को अपने मौलिक अधिकार की तरह देखने लगे हैं। &lt;/span&gt;&lt;br style="color: purple;" /&gt; &lt;span style="color: magenta; font-size: large;"&gt;गाय मूक है मगर उसकी आँखें बोलती हैं&lt;/span&gt;&lt;br style="color: purple;" /&gt; &lt;span style="color: purple; font-size: small;"&gt;जन्माष्टमी धूमधाम से मनी। कुछ लोगों ने गायोंकी भी पूजा की। गौ माता की जय के नारे भी लगाए। लेकिन उसी दिन पूरे शहर में दिन के समय और रात को लावारिस-सी गायें घूमती रहीं। इधर-उधर बैठी भी मिलीं। जो गायें सड़कों पर यूँ ही बदहाल घूम रही थीं। उनके पालक भी गौ माता जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। हमारे यहाँ अजीब मानसिकता है। गायों का भरपूर दोहन करेंगे मगर उसकी देखभाल करने में कंजूसी करने लगेंगे। उसे चारा नहीं खिलाएंगे। उसकी सेवा नहीं करेंगे। केवल प्रणाम करेंगे, बस। गोया ऐसा करने से गौ माता प्रसन्न हो जाएगी। गाय मूक प्राणी है मगर उसकी आँखें बोलती हैं। जरा गौर से देखो। उसके आँसू भी बहते हैं।&amp;nbsp; उसे गोपालक गौर से देखे महसूस करे। जब वह गाय का दूध पीये या उसे बेच कर, उसमें पानी मिला कर कुछ कमाई करे, तो ध्यान रखे कि गाय को कुछ खिलाना-पिलाना भी है। उसे सड़कों पर मत छोड़ो। उसे मैदान में चरने भेजो।&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-9175972519005070167?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/9175972519005070167/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=9175972519005070167' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/9175972519005070167'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/9175972519005070167'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='हाय, ये बलात्कारी शिक्षक'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-1456294443174358895</id><published>2010-08-14T21:52:00.000-07:00</published><updated>2010-08-14T21:52:44.614-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='lekh'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य / गिरीश पंकज'/><title type='text'>एक 'देश' में 'दो-दो'देश ...?</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;'एक' देश में 'दो-दो' देश ...? &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #274e13;"&gt;दो-दो देश? जी हाँ, एक तरफ ''भारत'' है, या कहें कि ''हिन्दुस्तान'' है, तो दूसरी तरफ है ''इंडिया''.&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;देश के वर्तमान हालात देख कर कई बार महसूस होता है, कि क्या इस देश में आजादी को बहुत हल्के-से लिया जाने लगा है? क्या नागरिक और क्या व्यवस्था, हर कहीं राष्ट्र की गरिमा का ख्याल रखने जैसी कोई बात नहीं आती। सरकारें देश को निजी कारोबारियों की तरह चला रही हैं तो नागरिक अपने स्वार्थ में पड़कर देश का नुकसान करने पर तुले हैं। ऐसे विषम समय में देश की हालत पर सोचने और एक बार फिर देश को नवजागरण की दिशा में ले जाने वाली रचनात्मक ताकतों के पक्ष में वातावरण बनाने की जरूरत है। &lt;/span&gt;&lt;br style="color: #274e13;" /&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;आजादी के साठ दशक बीत जाने के बावजूद देश आज भी देश के गाँव और और आदिवासी इलाके विकास की रौशनी से महरूम हैं: वंचित हैं। कहीं बिजली नहीं, कहीं, सड़क नहीं, कहीं पाठशालाएँ नहीं। कहीं स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं। यह कैसा नया भारत हैं, जहाँ शहरों में मॉल पर मॉल बनते चले जाएँ और गाँव बदहाल दर बदहाल होते चले जाएँ? दो तरह का समाज बनाते जा रहे हैं हम। एक गरीबों का, एक अमीरों का। शहरों की हालत देखता हूँ तो हैरत होती हैं। यहाँ दो तरह के स्कूल विकसित हो चुके हैं। एक गरीबों के स्कूल हैं, तो दूसरी तरफ अमीरों के स्कूल हैं। और स्कूल भी कैसे, गोया वे सितारा होटल हों। वातानुकूलित। जो बच्चे कभी मिट्टी से जुड़कर अध्ययन करते थे, स्वस्थ रहते थेे। खुली हवा में साँस लेते थे, आज कमजोर शरीर के स्वामी बन रहे हैं। अमीरी का ऐसा भद्दा दिखावा हो रहा है, कि मत पूछिए। यही कारण है, कि समाज में हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ रही है। शहरों में आपराधिक घटनाएँ कई गुना बढ़ी हैं। आदिवासी इलाकों में नक्सलवाद जैसी नई बीमारी का उदय हो चुका है। इससे मुक्ति पाने के लिए ईमानदार प्रयास नहीं हो रहे हैं। इस रोग के पीछे गरीबी, बदहाली, असमानता और विकास के प्रति बेरुखी ही मुख्य कारण है। अगर हम सब इस दिशा में सोचें और कदम उठाएँ तो एक खुशहाल भारत को विकसित करने में कोई दिक्कत नहीं होगी। लेकिन अब इस दिशा में सोचने वाले लोग हाशिये पर हैं। आईना दिखाने वाले चिंतकों को सरकार विरोधी समझने की भी भूल कर दी जाती है। मेरा तो छोटा-सा अनुभव यही है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: #274e13;" /&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;आज भी गाँव और आदिवासी इलाके विकास की मुख्यधारा से कटे लगते हैं। जैसे वे बेचारे बाढ़ से घिरे हुए टापू हों। जहाँ, बदहाली है,भूख है, प्यास है। विकास के नाम पर जहाँ केवल एक हड़पनीति है। सारा विकास शहरें के हिस्से आया और गाँवें को हमने अछूत की तरह देखा। उसे हमने चुनाव के समय ही नमन किया। यानी कि हमने उसे केवल ठगने का ही काम किया। यही कारण है कि आज एक तरफ इंडिया है, जो पूर्णत: विकसित दिखता है, अँगरेजी&amp;nbsp; बोलता है, अश्लील या ऊटपटाँग कपड़े पहनता है। मॉलों में जीता है : मालामाल है। आदर्श-नैतिकता जहाँ कोई मुद्दा नहीं हैं। वहीं दूसरी तरफ एक अदद हिंदुस्तान है, भारत है, जो प्रतीक्षा कर रहा है, कि कब विकास की किरण आएगी, और उसका अँधेरा भागेगा। अँधेरे को यहाँ व्याख्यायित करने की जरूरत नहीं है। अँधेरा एक ऐसा रूपक है, जो अनेकार्थ उपस्थित करता है। आज अगर गाँवों में या आदिवासी इलाकों से हिंसा की लपटें निकल रही हैं, तो उसके पीछे शोषण ही रहा है। यह अलग बात है, कि इन लपटों में कुछ शातिर हवाएँ भी शरीक कर राष्ट्र को जानबूझकर क्षति पहुँचाने की कोशिशें कर रही हैं। इसलिए अब यह बेहद जरूरी है कि तमाम तरह के खतरे उठाते हुए और उससे निपटने की तैयारी के साथ हम अपने विकास के एजेंडे में गाँवे और वनांचलों को शामिल करें। यह बात समझ ली जानी चाहिए कि गाँव और वनांचलों का विकास ही राष्ट्र का सच्चा विकास है। बिना इसके विकास पूर्णत: एकांगी है, बेमानी है।&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;br style="color: #274e13;" /&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;देश के सामने महँगाई भी एक बड़ा मुद्दा है। कह सकते हैं, कि महँगाई की डायन खा रही है, और भ्रष्टाचार का दैत्य हमें परेशान कर रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य भी कम अहम मुद्दा नहीं है। गाँवों का विकास अब तक अलक्षित-सा है। न जाने क्यूँ हमने गाँव पर समुचित ध्यान ही नहीं दिया। वैसे अब नई पंचवर्षीयोजना में गाँवों तक इंटरनेट पहुँचाने का लक्ष्य तो बन गया है, लेकिन उदुख की बात यही है, कि गावों को विकास की मुख्यधारा से जोडऩे के लिए किए जाने वाले उपाय भ्रष्टाचार की चपेट में आ जाते हैं। दिल्ली में होने वाले कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारियों जो भ्रष्टाचारी-खेल हो रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है। भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में भारत के लोगों का एक चेहरा सामने आया है। निर्माण के नाम पर भ्रष्टाचार एक जैसे सांस्कृतिक परम्परा-सी बन गई है। पूरे महादेश में यह रोग फैला हुआ है। एक ओर भ्रष्ट अफसर और नेता मालामाल हो रहे हैं, वहीं, देश की आम जनता गरीबी का दंश भोगने पर विवश है। दिल्ली से लेकर बस्तर तक विकास की गंगा को गटर-गंगा बनानेवाले चंद लोग ही होते हैं। अगर हमारे देश में अफसर और नेता ईमानदार हो जाएँ तो यह देश स्वर्ग बन सकता है। लेकिन अब कोई इस दिशा में सोचता नहीं। सबको यही लगता है, कि जब तक कुरसी है,कमाई कर लो और निकल लो। देश की स्वतंत्रता के सामने यह एक बड़ी चुनौती ही है कि जिनके हाथों में हमने विकास की बागडोर सौंपी है, वे दिशाहीन घोड़े की तरह भाग रहे हैं। देश को चारा या कहें, कि पिज्जा -बर्गर या चाउमीन समझ कर हजम तो कर रहे हैं। देश को अपना घर समझ कर उसे सँवारने की कोई कोशिश नहीं हो रही। यही कारण है कि देश में भ्रष्टाचार बढ़ा है। घर भरने की पाशविक मनोवृत्ति के कारण देश हाशिये पर चला गया है। अपना घर-परिवार, अपना भारी-भरकम बैंक-बैलेंस, महँगी कारें, अत्याधुनिक बँगले आदि की ललक ने लोगों को हद दर्जे का अपराधी बना दिया है। इस फितरत के शिकार दिखने वाली जमात को आसानी से पहचाना जा सकता है। मजे की बात है कि ये खलनायक ही हमारे नायक बने हुए हैं। राजनीति और समाज के दूसरे घटक भी भ्रष्ट हो कर विकास करने में विश्वास करते हैं। नतीजा सामने है कि इस समय देश में भ्रष्टाचार सबसे बड़े खेल के रूप में उभरा है। हमारा देश ओलंपिक खेलों में भले ही फिसड्डी रहे, लेकिन वह भ्रष्टाचार में नंबर वन रहने की पूरी कोशिश करता है। यही कारण है, कि विकासशील भारत भ्रष्टाचार का काला साया मंडरा रहा है। इसलिए आज हम देखें तो हमारे सामने भ्रष्टाचार एक राष्ट्रीय मुद्दा है। जैसे हम नक्सलवाद या आतंकवाद को देश की बड़ी समस्या मानते हैं, उसी तरह भ्रष्टाचार भी उससे कहीं ज्यादा बड़ी समस्या है। बाजारवाद एक दूसरे किस्म की समस्या है। इसकी चपेट में हमारी नैतिकता आ गई है। यह एक दूसरा मसला है,जिस पर फिर कभी लिखूँगा। फिलहाल चौंसठवें स्वतंत्रता दिवस पर अगर देश के सामने उभरने वाले कुछ मुद्दों की बात करें तो इस वक्त भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा है। इससे मु्क्ति के बगैर देश का सच्चा विकास असंभव है। विकास तोएक प्रक्रिया है। वह होगी ही, लेकिन नैतिकता, ईमानदारी, समर्पण,त्याग, या फिर कहें, कि राष्ट्रप्रेम&amp;nbsp; के बगैर किसी देश सुव्यवस्थित और स्थायी विकास संभव नहीं हो सकता। मेरा कवि-मन अपने भावें को निष्कर्षत: इन पंक्तियों में अभिव्यक्त करना चाहता है, कि-&lt;/span&gt;&lt;br style="color: #274e13;" /&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;मेहनतकश भारत तो दिनभर खटकर मेहनत करता है&lt;/span&gt;&lt;br style="color: #274e13;" /&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;मगर इंडिया शोषक बनकर यहाँ हुकूमत करता है।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: #274e13;" /&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;जब तक एक देश में दो-दो देश यहाँ विकसाएँगे,&lt;/span&gt;&lt;br style="color: #274e13;" /&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;हिंसा के दानव को हम सब, कभी रोक ना पाएँगे।&lt;/span&gt;&lt;br style="color: #274e13;" /&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;वक्त आ गया है सब मिलकर भारत का उत्थान करें। &lt;/span&gt;&lt;br style="color: #274e13;" /&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;जहाँ समर्पण, त्याग खिले, उस बगिया का निर्माण करें।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-1456294443174358895?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/1456294443174358895/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=1456294443174358895' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/1456294443174358895'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/1456294443174358895'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='एक &apos;देश&apos; में &apos;दो-दो&apos;देश ...?'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-86596150587980277</id><published>2010-07-24T09:13:00.000-07:00</published><updated>2010-07-24T09:13:22.516-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गिरीश पंकज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;अब खेलों में राजनीति नहीं होगी ?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अब ऐसा मान कर चला जा रहा है, कि छत्तीसगढ़ में खेलों के मामले में कोई राजनीति नहीं होगी। यहाँ का ओलंपिक संघ अपने अच्छे कामों के लिए चर्चित भले न रहा हो, गुटबाजी के लिए जरूर कुख्यात रहा है। पदाधिकारी ही एक-दूसरे पर खुलेआम आरोप लगाते रहे हैं। हार कर संघ के लोगों ने तय किया कि अब इस संघ का अध्यक्ष मुख्यमंत्री को ही बना दिया जाए। मान-मनौवल के बाद मुख्यमंत्री राजी हो गए। अब उम्मीद की जाती है, कि सब कुछ ठीकठाक हो जाएगा। संघ के आजीवन संरक्षण विद्याचरण शुक्ल हैं। राजनीति के पुराने खिलाड़ी। उम्मीद की जा सकती है, कि विपरीत विचारधारा वाले दो दिग्गज मिलजुल कर छत्तीसगढ़ की खेल -संस्क ृति को शिखर तक ले जाएँगे। राजनीति में राजनीति उर्फ पॉलिट्किस होती रहती है तो कोई बात नहीं, कम से कम ओलंपिक संघ में यानी खेल में राजनीति न हो। सब यही कामना कर रहे हैं। डॉ. रमन सिंह आ गए हैं, तो यह बात पक्की है, कि वे खेल के मामले में राजनीति से ऊपर उठ कर ही सोचेंगे। वे ऐसा करते भी रहे हैं। उन्हें साफ भी किया है कि वे जितना हो सकेगा, बेहतर करने की कोशिश करेंगे। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;क्या बात है, स्वागत है नड्डा जी का &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में नड्डा यहाँ के लोगों का प्रिय व्यंजन रहा है। चाय के साथ वाय के रूप में नड्डा खाने का प्रचलन रहा है। इसीलिए जब भाजपा ने जगतप्रसाद जी नड्डा को छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाया तो यहाँ के लोगों ने उनका अतिरिक्त उत्साह के साथ स्वागत किया है। लोग यह मान कर चल रहे हैं, कि उनके आने से भाजपा की लोकप्रियता में इजाफा होगा। जैसा पता चला है, कि व सिद्धांतवादी हैं। मिलनसार हैं। उनके प्रभारी बनने से पार्टी को लाभ ही मिलेगा। नड्डा जी यहाँ बहुत जल्दी ही लोकप्रिय हो जाएंगे, क्योंकि उनका सरनेम यहाँ वर्षों से लोकप्रिय है। स्वाद के लिए लोग यहाँ नड्डे का स्वाद चखते रहे हैं। अब भाजपा को नए प्रभारी मिलने के कारण संगठन की दृष्टि से नया स्वाद मिलेगा, पार्टी के लोगों को इसकी आशा है। छत्तीसगढ़ की दो भाजपा नेत्रियों को चंड़ीगढ़ और उत्तरप्रदेश का प्रभार मिला है। इससे एक बात यह भी साफ हुई है, कि यहाँ की स्त्री-शक्ति पर भाजपा ने भरोसा किया है। यह बड़ी बात है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;आखिर हो ही गए निलंबित?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यानी संस्पेंड। जी हाँ, स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी है डॉ. आदिले। उन पर आरोप है, कि उन्होंने जगदलपुर मेडिकल कॉलेज में अपनी लड़की की भर्ती फर्जी तरीके से कराई थी। बहुत दिन से मामला सुर्खियों में था। लोगों को आश्चर्य हो रहा था, कि अब तक इनका निलंबन क्यों नहीं हुआ। लेकिन देर आयद दुरुस्त आयद। आखिर हो ही गए निलंबित। मतलब यह कि गलत काम करने की सजा मिलती ही है। भले ही विलंब हो जाए। अब यह मुहावरा भी गढ़ा जा सकता है, कि सरकार के घर देर हैं अंधेर नहीं। वैसे यहाँ कुछ&amp;nbsp; सरकारी अफसर ऐसे हैं, जो भर्ती के मामलों में गोलमाल करते रहे हैं। पिछले दिनों फर्जी जाति प्रमाण पत्र के भी कुछ मामले सामने आए। अभी एक पार्षद भी इस लपेटे में आ चुके हैं। उनका हश्र क्या होगा, यह बाद में तय होगा ही। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;छेड़ख़ानी की तो खैर नहीं....&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;राजधानी में जब से नए कप्तान ने कार्यभार संभाला है, पुलिस कुछ ही चुस्त-दुरुस्त न•ार आ रही है। यातायात व्यवस्था कुछ सुधरती तो दीख रही है। अगर यही हाल रहा तो सड़कों पर चलने से तनाव बढऩा कुछ कम हो जाएगा। अब ऐसा हो तो अच्छा है, वरना रायपुर में यह कहावत अकसर चरितार्थ होती है, कि चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात। खैर, अभी जो हो रहा है, उससे शहर सुधर ही रहा है। पिछले दिनों पुलिस ने स्कूलों के प्राचार्यों, समाजसेवियों और जनप्रतिनिधियों की बैठक की और कानून-व्यवस्था की स्थिति बहाल रखने के लिए क्या किया जाए, इस पर चर्चा भी हुई। राजधानी में छेडख़ानी की बढ़ती समस्या पर भी गंभीरता से विचार हुआ। हेल्पलाइन भी शुरू की गई है। उसका नंबर है-1091। उम्मीद की जा सकती है, कि राजधानी की लड़कियाँ, महिलाएँ इस नंबर को कंठस्थ कर लेंगी और जब कभी कोई उन्हें परेशान करने की कोशिश करे, इस नंबर पर शिकायत करके उसको सबक सिखाएँगी। शातिर लोगों के हौसले भी कुछ पस्त तो होंगे ही। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;शराब से बड़ा लगाव है ...?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;राजधानी में लोग आंदोलन करके शराब दूकानें बंद करवाते हैं मगर होता यह है, कि कुछ दिन बाद वही ढाक के वही तीन पात। यानी दूकानें फिर खुल जाती हैं। अभी पिछले दिनों टिकरापारा में स्कूल के सामने चल रही शराब दूकान को आंदोलन करने के बाद बंद कर दिया गया था। लोग खुश थे कि चलो, स्कूली बच्चों को शराबियों से मुक्ति मिली। लेकिन कुछ दिन बाद शराब दूकान फिर शुरू हो गई? यह बेशर्मी की हद है। इस बेशर्मी के विरु द्ध पार्षद एवं नागरिकों को फिर सड़क पर उतरना पढ़ा। समझ में नहीं आता, कि जब यह पता चल गया है, कि लोग शराब दूकान नहीं चाहते तो ठेकेदार ऐसी गुस्ताखी करता ही क्यों है? क्या उसे किसी का संरक्षण मिल जाता है। परदे के पीछे की कहानी साफ नहीं हो पाती। बहरहाल, स्वागत उस नागरिक चेतना का है जो मरी नहीं है। अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का साहस ही हमें मनुष्य बनाए रखता है। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;वाह, पैंतीलीस पुस्तकालय खुलेंगे...&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;यह एक अच्छी खबर है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत प्रदेश के स्कूलों में अब पुस्तकालय खुलेंगे। पैंतालीस हजार स्कूलों में पुस्तकालय? सोचिए, क्या मंजर होगा। बच्चों को पाठ्य पुस्तक के बाहर भी झाँकने को सुअवसर मिलेगा। आज हिंदी में स्तरीय बाल साहित्य की कोई कमी नहीं लेकिन वह बच्चों तक पहुँच नहीं पा रहा है।&amp;nbsp; लेकिन पर स्कूल में अगर एक पुस्तकालय खुल जाए तो बाल साहित्य की कमी पूरी हो सकती है। लेकिन इसके लिए एक सावधानी भी बरतने की जरूरत है। बाल साहित्य के नाम पर बहुत कुछ कचरा साहित्य भी परोसा जाता है। इसलिए यह जरूरी है, कि खरीदी के लिए अच्छे जानकार बाल साहित्यकारों की एक टीम भी बनानी चाहिए। उनकी अनुशंसा के आधार पर ही बाल साहित्य खरीदना चाहिए। खैर, ऐसा होगा या नहीं, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन पुस्तकालय खुलने से बच्चों तक कुछ न कुछ सत्साहित्य तो पहुँचेगा ही। इस निर्णयके लिए शिक्षा विभाग की जितनी तारीफ की जाए कम है।&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-86596150587980277?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/86596150587980277/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=86596150587980277' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/86596150587980277'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/86596150587980277'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/07/blog-post_24.html' title='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-6255874824203776357</id><published>2010-07-22T09:48:00.000-07:00</published><updated>2010-07-22T10:41:33.587-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='samachar'/><title type='text'>ब्लाँग आँफ द मंथ...पुरस्कार</title><content type='html'>&lt;h3 class="post-title entry-title"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;a href="http://etips-blog.blogspot.com/2010/07/blog-post_22.html"&gt;इस साल के मार्च ,अप्रैल और मई के लिए ब्लाँग आँफ द मंथ का पुरस्कार छीटेँ और बौछारेँ ,ग्यान दर्पण ,गिरीश पंकज को&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; &lt;/h3&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;हर महीने&amp;nbsp; की तरह इस बार भी ब्लाँग आँफ द मंथ के पुरस्कारो की घोषणा कर दी&amp;nbsp;  गयी है । ब्लाँगर साथियो को उत्साहित करने के लिये पिछले साल शुरू&amp;nbsp; किये गये  इस पुरस्कार के अन्तर्गत महीने&amp;nbsp; के सर्वश्रेठ ब्लाँग को चुनकर उन्हे  पुरस्कृत किया जाता है । ईटिप्स ब्लाँग टीम आप लोगो की तरह ही कोई कमाई नही  करती , अब तक हिन्दी टिप्स ब्लाग ,सलीम खान के ब्लाग ,उङनतश्तरी  ,प्रोपर्टी संसार ,बेचैनी ब्लाग ,छम्मक छल्लो ब्लाग इत्यादि को ये पुरस्कार  दिया जा चुका है । हमने ब्लाँग चयन के लिये&lt;a href="http://www.blogger.com/post-edit.g?blogID=5381782517240871129&amp;amp;postID=6255874824203776357" name="more"&gt;&lt;/a&gt; एक समिति  "BLOG OF THE MONTH FOUNDATION" बनाई है जो इस कार्य को बखूबी कर रही है ।  हम न तो कोई लाभ कमाते हैँ और ना ही पुरस्कार स्वरुप कोई राशि किसी को दी&amp;nbsp;  जाती है ।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;मार्च-2010 &lt;/b&gt;के लिये यह आनलाँईन पुरस्कार आपके अपने पसंदीदा ब्लाँग "छीटेँ और बोछारेँ" को दिया जा रहा है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;वहीँ &lt;b&gt;अप्रैल-2010 &lt;/b&gt;के लिये यह पुरस्कार आपके अपने चहेते ब्लाँग "ग्यान  दर्पण" को दिया जा रहा है । इसके सानदार लेखोँ और ब्लाँग जगत मे सक्रीय  भागीदारी के लिये ग्यान दर्पण को यह पुरस्कार दिया जा रहा है । &lt;br /&gt;वहीँ &lt;b&gt; मई-2010&lt;/b&gt; के लिये यह पुरस्कार छत्तीसगढ के प्रमुख साहित्यकार गिरीश पंकज जी  के दो ब्लागोँ "गिरीश पंकज","सदभावना दर्पण" को सामूहिक रुप से दिया जा  रहा &lt;/span&gt;है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;ईटिप्स ब्लाँग टीम की खबर&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-6255874824203776357?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/6255874824203776357/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=6255874824203776357' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/6255874824203776357'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/6255874824203776357'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/07/blog-post_22.html' title='ब्लाँग आँफ द मंथ...पुरस्कार'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-7191892717582618279</id><published>2010-07-19T09:27:00.000-07:00</published><updated>2010-07-19T09:27:57.804-07:00</updated><title type='text'>शोक   समाचार</title><content type='html'>&lt;h3 class="post-title entry-title"&gt; &lt;a href="http://sanjayubach.blogspot.com/2010/07/blog-post_19.html"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/h3&gt;&lt;div class="post-header"&gt;  &lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;जगदीश उपासने को पितृशोक&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इंडिया टुडे के कार्यकारी सम्पादक  जगदीश उपासने एवं भारतीय जनता पार्टी छत्तीसगढ़ के प्रदेश उपाध्यक्ष&amp;nbsp; सच्चिदानंद उपासने के पिता &lt;strong&gt;श्री दत्तात्रय उपासने &lt;/strong&gt;(वर्ष  87) का सोमवार को रायपुर में निधन हो गया। वे प्रख्यात समाज सेवी थे, स्व. उपासने की  धर्मपत्नी श्रीमती रजनीताई उपासने रायपुर शहर से विधायक भी रही हैं। उपासने  परिवार का राजनीति एवं समाज सेवा में  काफी योगदान रहा है। परिवार के  मुखिया के नाते स्व. उपासने ने आपात काल का वह दौर भी झेला था, जब उनके  परिवार के अधिकतर सदस्य जेल में डाल दिए गए थे। भाजपा परिवार में भी उनका  अभिभावक जैसा सम्मान था। यही कारण है कि जब स्व. उपासने ने स्थानीय अस्पताल  में अंतिम सांस ली उस समय मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी वहां उपस्थित थे।  वे अपने पीछे भरापूरा परिवार छोड़ गये हैं। स्व. उपासने का अंतिम संस्कार  शाम 4 बजे मारवाड़ी श्मशान घाट, रायपुर में किया।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;संजय द्विवेदी द्वारा प्रेषित खबर. &lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-7191892717582618279?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/7191892717582618279/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=7191892717582618279' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/7191892717582618279'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/7191892717582618279'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/07/blog-post_19.html' title='शोक   समाचार'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-4589199690743011081</id><published>2010-07-16T05:05:00.000-07:00</published><updated>2010-07-16T05:18:04.061-07:00</updated><title type='text'>द्वितीय प्रमोद वर्मा स्मृति आलोचना सम्मान</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;प्रमोद वर्मा  स्मृति आलोचना सम्मान&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="deleteBody"&gt;&lt;div class="postBody" style="color: #777777;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TEBJ3TJW2II/AAAAAAAAAXQ/2Wtyp9SEGQE/s1600/logo_pramod_varma.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="176" src="http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TEBJ3TJW2II/AAAAAAAAAXQ/2Wtyp9SEGQE/s200/logo_pramod_varma.jpg" width="180" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;मधुरेश और ज्योतिष जोशी को &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रायपुर &lt;/b&gt;। द्वितीय प्रमोद वर्मा स्मृति आलोचना सम्मान से प्रतिष्ठित  कथाआलोचक मधुरेश और युवा आलोचक ज्योतिष जोशी को सम्मानित किया जायेगा । यह  सम्मान उन्हें 31 जुलाई, प्रेमचंद जयंती के दिन रायपुर, छत्तीसगढ़ में  आयोजित द्वितीय अखिल भारतीय प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह में प्रदान किया  जायेगा । उक्त अवसर पर शताब्दी पुरुष द्वय अज्ञेय और शमशेर पर राष्ट्रीय  संगोष्ठी का भी आयोजन किया गया है । यह सम्मान हिन्दी आलोचना की परंपरा में  मौलिक और प्रभावशाली आलोचना दृष्टि को प्रोत्साहित करने के लिए 2 आलोचकों  को दिया जाता है। संस्थान द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर देश के दो आलोचकों को  सम्मान स्वरूप क्रमश- 21 एवं 11 हज़ार रुपये नगद, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक  चिन्ह एवं प्रमोद वर्मा के समग्र प्रदान कर सम्मानित किया जाता है । इसमें  एक सम्मान युवा आलोचक के लिए निर्धारित है । &lt;br /&gt;चयन समिति के संयोजक जयप्रकाश मानस ने अपनी विज्ञप्ति में बताया है कि इस  उच्च स्तरीय निर्णायक मंडल के श्री केदार नाथ सिंह, डॉ. धनंजय वर्मा, डॉ.  विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, विजय बहादुर सिंह और विश्वरंजन ने एकमत से वर्ष  2010 के लिए दोनों आलोचकों का चयन किया है । ज्ञातव्य हो कि मुक्तिबोध,  हरिशंकर परसाई और श्रीकांत वर्मा के समकालीन आलोचक, कवि, नाटककार और  शिक्षाविद् प्रमोद वर्मा की स्मृति में गठित संस्थान द्वारा स्थापित प्रथम  आलोचना सम्मान से गत वर्ष श्रीभगवान सिंह और कृष्ण मोहन को नवाज़ा गया था ।&lt;br /&gt;बरेली निवासी मधुरेश वरिष्ठ और पूर्णकालिक कथाआलोचक हैं जिन्होंने पिछले 35  वर्षों से हिन्दी कहानी और उपन्यासों पर उल्लेखनीय कार्य किया है । उनकी  प्रमुख चर्चित-प्रशंसित कृतियाँ है - आज की कहानी : विचार और प्रतिक्रिया,  सिलसिला : समकालीन कहानी की पहचान', हिन्दी आलोचना का विकास, हिन्दी कहानी  का विकास, हिन्दी उपन्यास का विकास, मैला आँचल का महत्व, नयी कहानी :  पुनर्विचार, नयी कहानी : पुनर्विचार में आंदोलन और पृष्ठभूमि, कहानीकार  जैनेन्द्र कुमार : पुनर्विचार, उपन्यास का विकास और हिन्दी उपन्यास :  सार्थक की पहचान, देवकीनंदन खत्री (मोनोग्राफ), रांगेय राघव (मोनोग्राफ),  यशपाल (मोनोग्राफ), यशपाल : रचनात्मक पुनर्वास की एक कोशिश , अश्क के पत्र,  फणीश्वरनाथ रेणु और मार्क्सवादी आलोचना आदि ।          डॉ. ज्योतिष जोषी  युवा पीढ़ी में पिछले डेढ़ दशक से अपनी मौलिक साहित्य, कला और संस्कृति  आलोचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करते हुए अपनी प्रखर उपस्थिति से  सबका ध्यान आकृष्ट किया है । मूलतः गोपालगंज बिहार निवासी श्री जोशी की  प्रमुख कृतियाँ हैं – आलोचना की छवियाँ, विमर्श और विवेचना, जैनेन्द्र और  नैतिकता, साहित्यिक पत्रकारिता, पुरखों का पक्ष, उपन्यास की समकालीनता,  नैमिचंद जैन, कृति आकृति, रूपंकर, भारतीय कला के हस्ताक्षर, सोनबरसा,  संस्कृति विचार, सम्यक, जैनेन्द्र संचयिता, विधा की उपलब्धिःत्यागपत्र व  भारतीय कला चिंतन (संपादन) ।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;input name="security_token" type="hidden" value="AOuZoY4jis7qAGVXbox9VZNZ0mdaosj7Fw:1279281822070" /&gt;&lt;input name="postID" type="hidden" value="57899541763778283" /&gt; &lt;input name="blogID" type="hidden" value="1800578818916214815" /&gt; &lt;br /&gt;&lt;div id="media"&gt;&lt;div&gt;&lt;div class="media" id="_div_http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TEBJ3TJW2II/AAAAAAAAAXQ/2Wtyp9SEGQE/s200/logo_pramod_varma.jpg"&gt;&lt;div class="mediaDelete"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;noscript&gt;&amp;amp;amp;lt;input type="checkbox" name="LHPHOTO" value="http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TEBJ3TJW2II/AAAAAAAAAXQ/2Wtyp9SEGQE/s200/logo_pramod_varma.jpg"&amp;amp;amp;gt; &amp;amp;amp;lt;span class="viewMediaNSLink"&amp;amp;amp;gt;&amp;amp;amp;lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TEBJ3TJW2II/AAAAAAAAAXQ/2Wtyp9SEGQE/s1600/logo_pramod_varma.jpg" target="_blank"&amp;amp;amp;gt;http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TEBJ3TJW2II/AAAAAAAAAXQ/2Wtyp9SEGQE/s1600/logo_pramod_varma.jpg&amp;amp;amp;lt;/a&amp;amp;amp;gt;&amp;amp;amp;lt;/span&amp;amp;amp;gt; &amp;amp;amp;lt;br&amp;amp;amp;gt;&lt;/noscript&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="errorbox-good"&gt;&lt;input name="securityToken" type="hidden" value="JYCO9xeuYW92J-SsFsFYs1a-UxU:1279281822168" /&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-4589199690743011081?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/4589199690743011081/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=4589199690743011081' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/4589199690743011081'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/4589199690743011081'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/07/blog-post_16.html' title='द्वितीय प्रमोद वर्मा स्मृति आलोचना सम्मान'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TEBJ3TJW2II/AAAAAAAAAXQ/2Wtyp9SEGQE/s72-c/logo_pramod_varma.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-3161445218927364842</id><published>2010-07-13T07:02:00.000-07:00</published><updated>2010-07-13T07:02:51.294-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='samachar'/><title type='text'>प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित</title><content type='html'>&lt;div align="center" class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt; text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 13.5pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 13.5pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #cc0000; font-family: Mangal;"&gt;प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt; text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TDxxSO552LI/AAAAAAAAAXI/BiXnHMS3ym0/s1600/logo_pramod_varma.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="196" src="http://4.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TDxxSO552LI/AAAAAAAAAXI/BiXnHMS3ym0/s200/logo_pramod_varma.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: #cc0000; font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;मुक्तिबोध&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;परसाई और श्रीकांत वर्मा के समकालीन तथा हिन्दी के&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;वरिष्ठ&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;आलोचक, कवि, नाटककार, विचारक और शिक्षाविद् श्री प्रमोद वर्मा की स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए प्रमोद वर्मा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;स्मृति संस्थान द्वारा वर्ष 2009 से दो राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार प्रारंभ किये गये हैं । यह सम्मान हिन्दी आलोचना की परंपरा में मौलिक और प्रभावशाली आलोचना दृष्टि को प्रोत्साहित करने के लिए 3 आलोचकों को दिया जाता है। वर्ष2010-11 के सम्मान हेतु निम्नानुसार प्रविष्टियाँ आमंत्रित हैः- &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #cc0000; font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान- &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: #cc0000; font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;इस सम्मान के अंतर्गत 40 वर्ष से अधिक आयु वाले आलोचक की ऐसी मौलिक आलोचनात्मक कृति जो पिछले पाँच वर्षों में प्रकाशित हुई हो, पर विचार किया जायेगा । सम्मान के अंतर्गत अप्रकाशित पांडुलिपि भी स्वीकार किये जायेंगे । पुरस्कार स्वरूप चयनित आलोचक को संस्थान द्वारा आयोजित राष्ट्र स्तरीय समारोह में 21 हज़ार रुपये नगद, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह आदि से सम्मानित किया जायेगा। &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #cc0000; font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान (युवा) -&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: #cc0000; font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt; text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;इस सम्मान के अंतर्गत 40 साल से कम आयु वाले युवा आलोचक के ऐसे मौलिक आलोचनात्मक लेखन, प्रकाशित कृति या अप्रकाशित पांडुलिपि पर विचार किया जायेगा जो आलोचना के प्रचलित प्रतिमानों से हटकर एवं प्रभावकारी हो । ऐसे आलोचकों की कृतियाँ पिछले 2 वर्षों के भीतर प्रकाशित हुई हो । सम्मानस्वरूप चयनित आलोचक को संस्थान द्वारा आयोजित राष्ट्र स्तरीय समारोह में 11 हज़ार रुपये नगद, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह आदि से सम्मानित किया जायेगा । &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #cc0000; font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान (राज्य स्तरीय) –&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: #cc0000; font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;इस सम्मान के अंतर्गत छत्तीसगढ़ राज्य के आलोचकों को उनकी मौलिक आलोचनात्मक लेखन, प्रकाशन के लिए सम्मानित किया जायेगा । ऐसे आलोचकों की कृति पिछले एक वर्ष के भीतर प्रकाशित हुई हो । सम्मान चयनित आलोचक को संस्थान द्वारा 7 हज़ार रुपये नगद, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह आदि से सम्मानित किया जायेगा । &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #cc0000; font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;निर्णायक मंडल – &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: #cc0000; font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;श्री केदार नाथ सिंह, श्री गंगाप्रसाद विमल, डॉ. धनंजय वर्मा, श्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, श्री विश्वरंजन । &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #cc0000; font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;निर्णायक मंडल (राज्य स्तरीय)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: #cc0000; font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;- &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #cc0000; font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: #cc0000; font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;श्री प्रभात त्रिपाठी, डॉ. बलदेव, डॉ. सुशील त्रिवेदी, श्री गिरीश पंकज, श्री विश्वरंजन&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #cc0000; font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;नियमावली – &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: #cc0000; font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;span&gt;1.&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; font-size-adjust: none; font-size: 7pt; font-stretch: normal; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; line-height: normal;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;प्रविष्टि के रूप में प्रकाशित कृति या पांडुलिपि की दो प्रतियाँ भेजना होगा । &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;span&gt;2.&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; font-size-adjust: none; font-size: 7pt; font-stretch: normal; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; line-height: normal;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;प्रविष्टि के साथ आलोचक का संक्षिप्त बायोडेटा और छायाचित्र भेजना आवश्यक होगा । &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;span&gt;3.&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; font-size-adjust: none; font-size: 7pt; font-stretch: normal; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; line-height: normal;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;प्रविष्टि कोई प्रकाशक, समीक्षक, प्रशंसक या स्वयं आलोचक भी भेज सकते हैं । &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;span&gt;4.&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; font-size-adjust: none; font-size: 7pt; font-stretch: normal; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; line-height: normal;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;प्रविष्टि प्राप्त होने की अंतिम तिथि – 30 मार्च, 2011 । &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;span&gt;5.&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; font-size-adjust: none; font-size: 7pt; font-stretch: normal; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; line-height: normal;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;प्रविष्टि भेजने का पता – जयप्रकाश मानस, कार्यकारी निदेशक, प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा, रायपुर, छत्तीसगढ़ – 492001 &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;span&gt;6.&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; font-size-adjust: none; font-size: 7pt; font-stretch: normal; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; line-height: normal;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;अन्य जानकारी के लिए मोबाईल नंबर 94241-82664 या &lt;a href="mailto:%E0%A4%88-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B2-pandulipipatrika@gmail.com" target="_blank"&gt;&lt;span style="color: windowtext;"&gt;ई-मेल-&lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-US" style="color: windowtext; font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;pandulipipatrika@gmail.&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;com&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;या हमारी वेबसाइट &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;a href="http://www.pramodvarma.com/" target="_blank"&gt;&lt;span style="color: windowtext;"&gt;www.pramodvarma.com&lt;/span&gt;&lt;/a&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;से संपर्क कर सकते हैं । &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt; text-align: right;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #cc0000; font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;जयप्रकाश मानस &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: #cc0000; font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;; font-size: 12pt;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt; text-align: right;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #cc0000; font-family: Mangal; font-size: 12pt;"&gt;कार्यकारी निदेशक&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center" class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt; text-align: center;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;   &lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़ &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center" class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt; text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा, रायपुर, छत्तीसगढ़-492001&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt; text-align: right;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-3161445218927364842?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/3161445218927364842/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=3161445218927364842' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/3161445218927364842'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/3161445218927364842'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/07/blog-post_13.html' title='प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TDxxSO552LI/AAAAAAAAAXI/BiXnHMS3ym0/s72-c/logo_pramod_varma.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-2080795210104200479</id><published>2010-07-11T07:21:00.000-07:00</published><updated>2010-07-11T07:21:08.327-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;b style="color: magenta;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;छत्तीसगढ़ में घोटाले की सड़क...&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;निर्माण और घोटाले की पक्की दोस्ती होती है। दोनों साथ-साथ रहते हैं। पीते-खाते हैं। खाते-पीते भी है। राज्य बनने&amp;nbsp; के बाद यह सिलसिला यहाँ कुछ ज्यादा तेज हुआ है। पहले भोपाल के लोग (यानी नेता, अफसर और ठेकेदार की तिकड़ी)खाते-पीते थे, अब रायपुर में लोग खाते-पीते हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत घटिया सड़कें बनती हैं। मिली-जुली कुश्ती होती है। दिल्ली से आने वाला पैसा कुछ लोगों की जेबों में चला जाता है। घटिया सड़क बनाने के आरोप में कुछ ठेकेदारों को तो काली सूची में डाल दिया गया है, मगर कुछ अफसर साफ-साफ बच निकले हैं। खेल के सूत्रधार तो अफसर भी होते हैं। अकेले अफसर कुछ&amp;nbsp; नहीं कर सकते। हिस्सेदारी की बात गलत नहीं है। अब कहा जा रहा है, कि जो सड़के घटिया बनी हैं, उन्हें फिर बनाया जाएगा। सड़क फोकट में तो बनेगी नहीं, जाहिर है फिर वहीं चक्कर शुरू होगा। नए ठेकेदार सामने आएंगे। और अगर ईमानदारी से देखभाल नहीं की गई तो फिर घटिया सड़कों पर चलना पड़ेगा।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;नक्सलियों से निपटने की तैयारी&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह ऐसी तैयारी नहीं है, कि अब सेना धावा बोल देगी। यह तैयारी है बौद्धिक। यह भी जरूरी काम होता है। 14 जुलाई को दिल्ली में नक्सल समस्या से पीडि़त राज्यों के मुख्यमंत्री केंद्र के साथ मिल-बैठ कर विचार करेगें, कि नक्सलियों से कैसे निबटा जाए। क्या सेना की मदद लें, अद्र्धसैनिक बल और बढ़ाएँ या सिपाहियों को और ज्यादा चुस्त करें। जो भी हो, कोई निर्णायक रणनीति बननी ही चाहिए। क्योंकि इधर अती हो रही है। नक्सलियों का एक नेता आजाद मारा गया है, तब से वे और अधिक बौखला गए है। एक दौर था जब जयपक्राश नारायण और विनोबा भावे जैसे महान नेताओं ने डकैतों का आत्म समर्पण करवा दिया था। आज भी यह काम हो सकता है। लेकिन दुख इस बात का है कि अब वैसे महान लोग हैं नहीं। खादी का कुरता पहन कर इधर-उधर डोलने वाले कुछ लोग संदिघ्ध हो गए हैं। कोई विदेशी मदद से अपना एनजीओ चला रहा है, तो कोई नक्सलियों के पक्ष में खड़ा है। बहरहाल, समझ में नहीं आ रहा, कि किया क्या जाए। लेकिन उम्मीद है, कि दिल्ली की बैठक कोई ठोस नतीजे के साथ खत्म होगी।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;राजधानी के किशोर अपराधी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;राजधानी में आए दिन लूटपाट, उठाईगीरी और हिंसक वारदातें हो रही हैं। कुछ लोग पकड़ में भी आ रहे हैं। दु:खद बात यह है कि बहुत-से मामले में किशोर और बिल्कुल युवा वर्ग के अपराधी सामने आ रहे हैं। अभी पिछले दिनों कुछ युवक पकड़े गए, इनमें एक राजनीतिक दल के सदस्य भी था। यह चिंतास्पद बात है। और ऐसा नहीं कि यह अभी इनकी संख्या बढ़ गई है। पिछले लंबे अरसे से किशोर-युवा ही पकड़ में आ रहे हैं। ये छोटे-मोटे अपराधी आने वाले समय के बड़े अपराधी हैं। सही शिक्षा का अभाव, नैतिक वातावरण की कमी और घर-परिवार का असर इन लड़कों को गुमराह बना ही देता है। इसलिए जरूरी हो जाता है, कि शालाओं में बच्चों के लिए नैतिक शिक्षा के पाठ जरूरी किए जाएं जो, जो अब लगभग समाप्त-से हो गए हैं। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;बारिश में शहर&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बारिश आती है और शहर के प्रशासन का असली चेहरा सामने आने लगता है। गड्ढे ही गड्ढे हो जाते हैं और इनमें पानी भरने और उसमें लोगों के धँसने का सिलसिला शुरू हो जाता है। गंदगी और उसके कारण होने वाली बीमारियाँ भी बढ़ जाती हैं। प्रशासन बारिश के पहले बड़े-बड़े वादे करता है, लेकिन वह कुछ कर नहीं पाता। और खामियाजा भुगतना पड़ता है सामान्यजन को। बारिश में शहर कई बार टापू-सा लगने लगता है। अनेक कालोनियों में कीचड़ ही कीचड़ नजर आता है। सूखे हुए तालाबों वाला शहर तालाबों में पट जाता है। जिधर देखो, उधर एक तालाब। दुर्घटनाएँ बढ़ती जाती हैं। शहर में बदबू और बीमारियों का साम्राज्य छाया रहता है। इस बार भी यही हो रहा है। महापौर खुद निकल रही है, नालियों से कचरे निकलवा रही है। लेकिन यह भी सच है कि&amp;nbsp; कोई कहाँ-कहाँ जाए? आम आदमी भी ग•ाब की शै है। नालियों को चोक आदमी ही करता है। घर का, दूकान का सारा कचरा नालियों में ही डालता है। जाहिर है बरसात में नालियाँ बजबजाने लगती हैं। इसलिए नागरिकों का भी दायित्व है कि वह शहर को साफ रखें। वरना भुगतना उन्हीं को है। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;गोवंश को बचाने के लिए साधुवाद..&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;गौ माता भाजपा गोवंश विकास प्रकोष्ठ के सदस्यों को धन्यवाद दे रही है, जिन्होंने सौ से ज्यादा गायों को कटने से बचा लिया। पिछले दिनों राजधानी और आसपास के कुछ शहरों से गो प्रेमियों ने कत्लखानों के लिए लेजाई जा रही गायों को पकड़ लिया। तस्करों को पुलिस के हवाले भी किया। सच बात तो यह है कि गो वंश की तस्करी का सिलसिला जारी है। कभी-कभार गायें पकड़ में आ जाती है, ये अलग बात है। आए दिन गायों की तस्करी होती रहती है।&amp;nbsp; चोरी-छिपे गायें भी कटती रहती हैं। राजधानी में भी यह अपराध हाता है। गोवंश विकास प्रकोष्ठ के सदस्यों को सतत निगरानी रखनी चाहिए। संदिग्ध इलाकों में घूम-घूम कर जायजा लेना चाहिए। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो गो वंश कटता ही रहेगा। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;लौकी के जूस का डर&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनोंदिल्ली के एक वैज्ञानिक की मौत लौकी के जूस पीने से हो गई। रायपुर और छत्तीसगढ़ के लोग भी जागरूक हैं। वे भी लौकी और अन्य फलों के जूस पीते रहते हैं। दिल्ली में हुई मौत के पीछे कारण यह बताया जा रहा है, कि वैज्ञानिक ने जो जूस पीया, वह काफी कड़वा था। वह मर गया और उसकी पत्नी अस्पताल में भरती हो गई। लौकी अगर कड़वी हो तो उसका जूस नहीं पीना चाहिए। दूसरी बात यह भी है, कि आजकल फल-सब्जियों में आक्सीटोसिन का इंजेक्शन भी लगा दिया जाता है। इससेभी स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है। राजधानी में बाजार में बिकने वाली सब्जियाँ भी संद्ग्धि नजर आती है। दरअसल पैसे कमाने की हवस के कारण समाज के कुछ लोग इतना नीचे गिर गए हैं, कि उनके लिए नैतिकता जैसे शब्द बेमानी हो गए हैं। अब लोग ही समझदारी से काम लें और किसी भी फल-सब्जी का जूस सेवन करने से पहले उसकी गुणवत्ता परख लें। बेहतर तो यही है कि लोग बागवानी करें और अपनी जरूरत की फल-सब्जियाँ खुद उगाने की दिशा में भी विचार करें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-2080795210104200479?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/2080795210104200479/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=2080795210104200479' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/2080795210104200479'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/2080795210104200479'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/07/blog-post_11.html' title='छत्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-3829621801875337430</id><published>2010-07-07T09:23:00.000-07:00</published><updated>2010-07-07T09:23:16.212-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गिरीश पंकज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='lekh'/><title type='text'>श्रद्धांजलि...</title><content type='html'>&lt;div style="background-color: #d9ead3;"&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;&lt;span style="background-color: #ead1dc; font-size: x-large;"&gt;रामशंकर अग्निहोत्री , अब ऐसे लोग कहाँ से लायेंगे?&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: #d9ead3;"&gt;वरिष्ठतम पत्रकार और लेखक रामशंकर अग्निहोत्री जी का अचानक यूं चला जाना हजारों लोगों को दुःख में&amp;nbsp; डुबो गया. आज (७ जुलाई) सुबह उनका निधन हो गया. संध्या देवेन्द्रनगर स्थित श्मशान घाट में सैकड़ों लोगो ने उन्हें अश्रुपूरित विदाई दी. उनके अंतिम संस्कार में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री समेत अनेक मंत्री, सांसद एवं विधायक शामिल हुए. उनको अंतिम विदाई देने के लिये मीडिया जगत के भी अनेक नामचीन चेहरे मौजूद थे.&amp;nbsp; &lt;br /&gt;अभी पाँच दिन पहले की बात है. उनसे मेरी मुलाकात&amp;nbsp; हुई थी. उन्होंने बताया था, कि&amp;nbsp; वे राममनोहर लोहिया पर एक पुस्तक सम्पादित कर रहे हैं. मानव अध्ययन शोधपीठ, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर के अध्यक्ष के रूप में वे गाँधी,लोहिया और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के विचारों पर एक बड़ा सेमीनार भी करने की तैयारी में थे. उनका उत्साह देख कर हर कोई दंग रह जाता था. वे पचासी साल के हो चुके थे और&amp;nbsp; बेहद स्वस्थ और फुर्तीले नज़र आते थे. इस अवस्था में भी किसी युवक की तरह सक्रिय रहते थे. मैंने उनका बहुत नाम सुन रखा था. उनके अनेक राष्ट्रवादी लेख भी इधर-उधर पढ़ता रहता था. लेकिन पिछले&amp;nbsp; कुछ सालों से उनका रायपुर आना-जाना कुछ बढ़ गया था, इसलिए किसी न किसी&amp;nbsp; कार्यक्रम में उनसे&amp;nbsp; भेंट हो जाती थी. &lt;br /&gt;मैंने उन्हें हमेशा एक विनम्र एवं नैतिक व्यक्ति के रूप में ही पाया. वे अनुभव की आंच में तप कर खरे हुए थे. अनेक समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने के बात वे पंडित दीनदयाल उपाध्याय मानव अध्ययन शोधपीठ के अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे थे. आज जब विश्वविद्यालय के कुलपति सच्चिदानंद जोशी से उनके बारें में चर्चा होने लगी, तो उन्होंने बताया, कि&amp;nbsp; वे विश्वविद्यालय में भी बेहद सक्रिय रहते थे. अखबारों में कोई महत्वपूर्ण खबर छपती थी तो वे कटिंग काट कर सन्दर्भ सामग्री के रूप में सहेज कर रखने लिये हमलोगों को दे दिया करते थे. तीन दिन पहले जब अग्निहोत्री जी अस्पताल में भरती हुए तो कृत्रिम साँस&amp;nbsp; के लिये उन्हें मास्क लगाया गया था. लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति उन्हें देखने पहुंचता, वे मास्क निकलकर भावी कार्यक्रमों के बारे में बात करने लग जाते थे. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंग, और संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल आदि भी&amp;nbsp; उन्हें देखने पहुंचे. सभी से उन्होंने कहा, कि अब मै स्वस्थ हो कर फिर सक्रिय होना चाहता हूँ. प्रदेश के मंत्री राजेश मूणत ने चर्चा के दौरान मुझे बताया कि, पिछले दिनों उन्होंने लगा कि उनका स्वास्थय&amp;nbsp; कुछ ज्यादा खराब हो रहा है, तो उन्होंने कहा था, ''मैं भोपाल जाऊँगा चेकअप कराने'', तो राजेश मूणत ने उनसे कहा, था कि ''वहां क्यों जायेंगे. यही आपका बढ़िया इलाज़ हो जाएगा''. इस पर मुसकरा कर चुप हो गए. &lt;br /&gt;अग्निहोत्री जी भाजपा के थिंक टैंक की तरह थे. इसलिए भाजपा के हर छोटे-बड़े नेता से उनके जावन और आत्मीय सम्बन्ध थे. यही कारण है, कि आज जैसे ही उनके निधन का दुखद समाचार मिला, लोग शोक में डूब गए. उन्हें श्रद्धांजलि देने लगभग पूरा मंत्रिमंडल ही डा. राजेंद्र दुबे के निवास पर उमड़ पडा था. रायपुर में उनका कोई निकट का&amp;nbsp; रिश्तेदार नहीं था. लेकिन जब मै उनको श्रद्धांजलि देने डा. दुबे के निवास पर पहुंचा तो देख कर दंग रह गया, कि अनेक मंत्री और अनेक महत्वपूर्ण भाजपा नेता वहां मौजूद है, और उनके अंतिम संस्कार की&amp;nbsp; तैयारियों में व्यस्त है. ऐसा बहुत कम होता है, कि किसी के निधन के बाद इतने लोग एकत्र हों, मगर अग्निहोत्री जी इतने महान व्यक्ति थे, कि उनके अंतिम दर्शन के लिये सैकड़ों लोग लालायित थे. भाजपा के लोग तो खैर थे ही, मेरे जैसे अनेक पत्रकार और अन्य&amp;nbsp; दूसरे लोग भी पहुँच गए थे. भाजपा के लोगो को उन्होंने बहुत कुछ दिया है, लेकिन हम जैसे पत्रकारों को भी उन्होंने बहत कुछ दिया. आज जब पत्रकारिता अपने मूल्य से गिर रही है, तब अग्निहोत्री जी ने समझाया कि विपरीत स्थितियों में भी खड़े रहना पत्रकार&amp;nbsp; का कर्तव्य है. &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: #d9ead3;"&gt;अग्निहोत्री जी&amp;nbsp; ने आपातकाल और रामजन्‍मभूमि आंदोलन से जुडी खबरों को वैश्विक क्षितिज पर प्रसारित करने में उन्‍होंने उल्‍लेखनीय भूमिका निभाई। शायद इसीलिए वे संघ और भाजपा के चहेते थे. विचारधारा से वे भले ही किसी एक वर्ग के चहेते बन गए थे, मगर उनकी राष्ट्रवादी पत्रकारिता के कारण हम जैसे लोग भी उनसे सीखते रहते थे. छोटो को स्नेह देना, उनकई तारीफ करना कोई अग्निहोत्री जी से सीखे. पिछले दिनों एक कार्यक्रम में मैंने ''दासबोध'' के हिंदी अनुवाद के सौ साल होने पर आयोजित कार्यक्रम में अपने विछार व्यक्त किये थे. अग्निहोत्री जी श्रोता के रूप में सामने विराजमान थे.उनके सामने बोलने में संकोच हो रहा था, फिर भी मैंने&amp;nbsp; अपनी बात कही. कार्यक्रम के बाद उन्होंने मेरी तारीफ करते हए कहा, कि आज ऐसे ही सोच की ज़रुरत है. इसके पहले भी कुछ अवसरों पर आपने मुझे प्रोत्साहित ही किया. बड़े लोग सचमुच बड़े होते है. मगर सामने वाले को अपने बड़प्पन का अहसास&amp;nbsp; नहीं होने देते. &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: #d9ead3;"&gt;पाँच दिन पहले जब उन्होंने मुझसे कहा, कि गाँधी, लोहिया, और दीनदयाल जी पर कार्यक्रम करनाहै, तो मैंने कहा, मेरे पास दीनदयाल जी से सम्बंधित जानकारियाँ नहीं है, तो वे फ़ौरन बोले, एक मिनट रुकिए. फिर वे बाहर गए और कर में रखी एक पुस्तक ले आये.यह पुस्तक दीनदयाल उपाध्याय जी पर केन्द्रित थी. उनका एक उपन्यास अम्बेडकर जी पर है. उसकी तारीफ सुनी है. पढ़ नहीं पाया हूँ. अब पढ़ना चाहूँगा, ताकि उनके औपन्यासिक शिल्प&amp;nbsp; के भी रूबरू हो सकूं. उनकी कुछ कविताये मैंने पढ़ी है. वे देश के नवनिर्माण में बेचैन रहने वाले राष्ट्रवादी लोगों में थे. अपना तन-मन-धान राष्ट्र की सेवा को समर्पित करने के लिये तैयार रहने वाले. वे अक्सर कहा करते थें कि अब अंतिम साँस तक रायपुर&amp;nbsp; में रह&amp;nbsp; कर राष्ट्र की सेवा करना चाहता हूँ. उन्होंने अपना वचन निभाया और रायपुर में ही अंतिम&amp;nbsp; साँस ली. उनके अवदान-सम्मान की बात करुँ तो श्री अग्निहोत्री 1975 से 1977 तक एकीकृत समाचार न्यूज एजेंसी नई दिल्ली (आपातकाल) के उप समाचार संपादक रहे। वर्ष 1978 से 1980 तक उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार ( महाराष्ट्र-गुजरात ) मुंबई के क्षेत्रीय व्यवस्थापक रहे । 1981 से 1983 तक हिन्दुस्थान समाचार के विशेष संवाददाता के रूपमें&amp;nbsp; काठमांडूमें भी रहे।&amp;nbsp; आप&amp;nbsp; हिन्दुस्थान समाचार, नई दिल्ली के प्रधान संपादक भी रह चुके थे.&amp;nbsp; श्री अग्निहोत्री 1986 से 1989 तक पांचजन्य साप्ताहिक, दिल्ली के प्रबंध संपादक भी थे.&amp;nbsp; 1989 से 1990 तक श्री राम कार सेवा समिति, सूचना केन्द्र, नई दिल्ली के निदेशक तथा 1992 में श्री रामजन्म भूमि मीडिया सेंटर, रामकोट, अयोध्या के निर्देशक थे। उन्होंने 1991 से 1998 तक मीडिया फोर फीचर्स लखनऊ का प्रकाशन और संपादन किया। वे 1999 से 2002 तक भारतीय जनता पार्टी के केन्द्रीय मीडिया प्रकोष्ठ, नई दिल्ली में रहे। उन्होंने 2002 से 2004 तक मीडिया वाच का संपादन और प्रकाशन किया।सन् २००८ के लिए माणिकचन्द्र वाजपेयी राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार से सम्‍मानित&amp;nbsp; रामशंकर 14 अप्रैल, 1926 को मध्य प्रदेश के सिवनी मालवा में जन्मे श्री अग्निहोत्री जी ने&amp;nbsp; सागर विश्वविद्यालय से&amp;nbsp; बी.ए. करने के बाद उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा प्राप्त किया।&amp;nbsp; आप 1949 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, महाकौशल के संगठन मंत्री नियुक्त हुए। वे&amp;nbsp; दैनिक युगधर्म, नागपुर के सह संपादक रहे। सांध्य दैनिक आकाशवाणी (दिल्ली) केभी आप&amp;nbsp; संपादक रह चुके थे।&amp;nbsp; कश्मीर सत्याग्रह में भी उनकी अहम् भूमिका थी।&amp;nbsp; आप पांचजन्य (मध्य भारत संस्करण) के भी संपादक रहे। मासिक राष्ट्रधर्म, लखनऊ का सम्पादन भी आपने किया । युगवार्ता, फीचर्स सर्विस, नई दिल्ली के संपादक थे। 1970 से 1975 तक आप&amp;nbsp; हिन्दुस्तान समाचार न्यूज एजेंसी के ब्यूरो प्रमुख रहे। 1971 में आप ने एक और जौहर दिखाया. आपने युद्ध-संवाददाता के रूप में भी कार्य कर अपनी जांबाजी का परिचय दिया था. आप 2004 में हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी संवाद समिति के अध्यक्ष रहे। &lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: #d9ead3;"&gt;एक साहित्यकार&amp;nbsp; के रूप में उनके अवदान को देखें तो उन्होंने बहुत अधिक रचनाएँ भले ही न की हों,&amp;nbsp;&amp;nbsp; लेकिन उन्होंने जितना लिखा, उत्कृष्ट ही लिखा. उनका एकमात्र काव्य संग्रह सत्यम एकमेव काफी चर्चित रहा है। अम्बेडकर परकेन्द्रित&amp;nbsp; उपन्यास ''मसीहा'&amp;nbsp; को पढ़ चुके लोगो का मानना है, कि किसी व्यक्ति के जीवन पर केन्द्रित ऐसे उपन्यास कम ही देखने में आते है. अनेक&amp;nbsp; देशों का भ्रमण कर चुके अग्निहोत्री जी को&amp;nbsp; इन्द्रप्रस्थ साहित्य भारती द्वारा डा. नगेन्द्र पुरस्कार, राष्ट्रीय पत्रकारिता कल्याण न्यास द्वारा स्व. बापूराव लेले स्मृत्ति पत्रकारिता पुरस्कार तथा माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान भोपाल द्वारा लाला बलदेव सिंह सम्मान प्रदान किया गया था. श्री अग्निहोत्री एक तरह से एकांत साहित्य साधक थे और एकनिष्ठ पत्रकार थे. उनके अनेक शिष्य आज पत्रकारिता जगत में अपना डंका बजा रहे है. उनके साथ के लोगों के उनके निधन पर गहरा दुःख हुआ. देश के कोने-कोने में उनके चाहने वाले आज फोन कर-कर के सम्बंधित जनों से बातें करते रहे. शवयात्रा में मंत्रीमंडल के अनेक लोग शामिल हुए. श्मशानघाट में मुख्यमंत्री&amp;nbsp; भी पहुँच गए थे. सब ग़मगीन थे. उन सबके बीच से ऐसा व्यक्ति चला गया&amp;nbsp; था, जिसके जाने की कोई उम्मीद ही नहीं थी. सब इस बात को लेकर भी दुखी थें कि उनको सही वैचारिक राह अब कौन दिखाएगा. पत्रकारिता की नैतिक मूल्य की परम्परा अब ख़त्म हो रही है, लेकिन जब मै अग्निहोत्री जी को देखता तो सुकून मिलता था, संतोष होता था, कि एक परम्परा अभी ज़िंदा है. आज वे हमारे बीच नहीं है, उनके जाने के बाद चिंता हो रही है, कि अब ऐसे लोग हम कहाँ से लायेंगे, जो बरगद होते हुए भी पौधों को पनपने का मौका देते&amp;nbsp; थे. &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-3829621801875337430?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/3829621801875337430/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=3829621801875337430' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/3829621801875337430'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/3829621801875337430'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/07/blog-post_07.html' title='श्रद्धांजलि...'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-307543372509745351</id><published>2010-07-04T22:31:00.000-07:00</published><updated>2010-07-04T22:31:30.991-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छ्त्तीसगढ़ की डायरी/ गिरीशपंकज'/><title type='text'>छ्त्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span style="background-color: cyan; color: magenta;"&gt;ये है छत्तीसगढ़ की पुलिस की डंडागीरी...&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="background-color: cyan;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt; &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;राजधानी रायपुर में डॉन शब्द से पुलिस इतनी नाराज है कि मत पूछो। इस चक्कर में एक स्कूली छात्र को पीट कर एक पुलिस अधिकारी ने अपनी डंडागीरी दिखाने की शर्मनाक कोशिश कर डाली। पिछले दिनों राजधानी में वाहनों में आग लगने की अनेक घटनाएँ हुईं। ये हरकतें किसी डॉन ग्रुप की हैं। पुलिस के कुछ अति होशियार लोगों ने कुछ लड़कों को पकड़ा और उन्हें डॉन ग्रुप&amp;nbsp; बताकर जेल भी भिजवा दिया। फिर भी शहर में वाहनों के जलने का सिलसिला चलता रहा। अब पुलिस के एक जिम्मेदार अधिकारी खुद कह रहे हैं, जो लड़के पहले पकड़े गए थे, वे डॉन ग्रुप के नहीं थे। आखिर पुलिस ऐसा करती क्यों है? फर्जी मामले क्यों बनते हैं? पिछले दिनों एक स्कूली छात्र को एक पुलिस अधिकारी ने पकड़ा और डंडे से पीटना शुरू कर दिया। लड़के का कुसूर इतना ही था कि उसकी बाइक पर &lt;b&gt;डॉन&lt;/b&gt; लिखा था। लोग इस हादसे से दुखी भी हुए और पुलिस&amp;nbsp; अफसर की मूर्खता पर हँसे भी। अरे भाई, पहले समझ तो लो। कल को डॉन फिल्म रायपुर में लगेगी तो क्या सिनेमा मालिक की सुटाई शुरू कर दोगे कि डॉन क्यों लगाई? कुछ लोग शरारत कर रहे हैं, तो डॉन शब्द से खुन्नस निकालना कहाँ की बुद्धिमानी है?&lt;br /&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;नक्सलियों की अंतहीन हरकतें...&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;बस्तर में लाशें गिनने का काम जारी है। आए दिन नक्सली हत्याएँ कर रहे हैं। वे खुद भी मर रहे हैं। लेकिन वे तो विचारधारा के नाम पर संघर्ष कर रहे हैं। दो मरते हैं सौ को मारते हैं। सिलसिला जारी है। पिछले दिनों सीआरपीएफ के जवानों की हत्या के पीछे उनका तर्क था, कि हमने इसलिए हत्या की, कि&amp;nbsp; इन लोगों ने कुछ निर्दोष ग्राणीणों की जानें लगी थीं। इस आरोप का कोई सबूत उनके पास नहीं है। अगर कुछ है तो पेश करना चाहिए। इसके पहले भी नक्सलियों ने अनेक हत्याएँ की हैं, उसका क्या कारण बताएँगे? कुल मिलाकर हत्याओं के लिए बहाने चाहिए। लोग तंग आ चुके हैं। इसीलिए अब आमजन मांग करने लगे हैं कि बस्तर में सेना बुलानी चाहिए। वह दिन दुर्भाग्यपूर्ण ही होगा,जब बस्तर में सेना का प्रवेश होगा। सेना आग की तरह फैलेगी और बहुत कुछ नष्ट होगा। नक्सली भी समझ लें कि वे साफ होंगे ही, और बहुत-से आम नागरिक भी चपेट में आ जाएँगे। अब यह बात समझ में भी तो आए, फिलहाल इस आहत समय से हर कोई उबरना चाहता है।&lt;br /&gt;&lt;div style="background-color: cyan; color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;गाय बर्बाद, मटन मार्केट आबाद..? &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;&lt;b style="color: black;"&gt;मटन... आमजीवन में बटन की तरह जरूरी हो गया है। गाय पालने वाले शहर से बाहर भेज दिए गए हैं मगर माँस बेचनेवालों को शहर में सुव्यवस्थित करने की काशिशें हो रही हैं। कुछ अंिहसा प्रेमी इस दृश्य को देख कर चकित हैं। गौ पालन से गंदगी होती है तो क्या माँस के व्यापार से शहर का माहौल शुद्ध हो जाता है? जहाँ माँस कटता है, वहाँ जाकर तो देखें। किस तरह से बदबू फैली रहती है। गंदगी का कैसा आलम रहता है। गाय के गोबर और मूत्र से तो खाद बनती है। गाय आक्सीजन छोड़ती है। वातावरण को शुद्ध बनाने में गाय की बड़ी भूमिका होती है। मगर राजधानी में उल्टा हो रहा है। गायें बाहर भेजी जा रही हैं और शहर में माँस के व्यापार के लिए सुविधाएँ दी जा रही हैं। आखिर क्यों? शायद इसीलिए कि अब माँस खाने और दारू पीने वाले बढ़ रहे हैं और दूध पीने वाले कम होते जा रहे हैं?&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;&lt;b style="color: black;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;गजगामिनी की तरह चलते सरकारी काम &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;सरकारी काम भी नौ दिन चले अढ़ाई कोस की तरह चलते रहते हैं। धीरे-धीरे, हौल-हौले। इसे&amp;nbsp; ही कहते हैं हाथी-चाल। जो काम समय पर हो सकते हैं, उन्हें लम्बा खींचने के पीछे&amp;nbsp; एक ही कारण होता है, कमाई...ऊपरी कमाई। जितने दिन काम होता है, उतने दिन तक कमाई का सिलसिला बना रहता है। मिलजुल कर खाने का भी अपना सुख होता है। लेकिन कुछ लोगों के इस सुखार्जन के कारण लोग दुखी हो जाते हैं। शहर में बनने वाले अधिकांश पुल अपने निर्माण की अवधि पार कर चुके हैं। काम चल ही रहा है। लोगों को आना-जाना प्रभावित होता है। लोग आंदोलन करते हैं। धरना देते हैं। लेकिन व्यवस्था को कोई फर्क नहीं पड़ता। वह अपने हिसाब से चलती है। तभी तो वह व्यवस्था है। निर्माण कार्य में लगे लोगों को शहर की सुविधाओं का ख्याल रहना चाहिए, आखिर वे भी नागरिक हैं। लेकिन इतनी बात वे समझ लेते तो लोग परेशान ही क्यों होते? &lt;br /&gt;&lt;div style="color: #741b47;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;महँगाई पर घमासान&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;महँगाई एक मुद्दा है। जिस पर अभी भाजपा गर्म है तो काँग्रेस भी। दोनों तरफ से बयानबाजी चल रही है। अभी भाजपा की सुषमा स्वराज राजधानी आई थीं। उनके नेतृत्व में भाजपा ने धरना दिया। फिर भाकपा का भारत बंद। अब काँग्रेस की छवि का सवाल है तो वह भाजपा पर पिल पड़ी है। उसे भी कुछ कर के दिखाना होगा। इसलिए उनके नेता भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं, कि वह धरना-प्रदर्शन करके लाखों रुपए खर्च कर रही है। यह पैसे की बर्बादी है। अरे भाई प्रदेश भर से लोग आएँगे तो क्या उनके लिए कुछ व्यवस्था ही न हो। बरसात का मौसम है। अगर पानी से बचने की व्यवस्था कर ली गई तो इसे फिजूलखर्ची नहीं कहा जा सकता। सच्चाई तो यही है कि काँग्रेसी भी बेचारे असहज महसूस कर रहे हैं। पेट्रोल,डीजल और यहाँ तक कि केरोसीन के भाव बढ़ गए। इसका असर तो हर चीज पर दीख रहा है।&amp;nbsp; काँगे्रसी बेबस हैं। करें तो क्या करें? &lt;br /&gt;&lt;i style="color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;और चलते-चलते..&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: blue;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;डीजीपी के बयान से बवाल....&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;i&gt;छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन कवि भी हैं। लोग यह मान कर चलते हैं, कि वे एक लेखक हैं, तो संतुलित व्यवहार करेंगे। लेकिन नक्सली हिंसा के कारण उनका तनाव कुछ ज्यादा&amp;nbsp; बढ़ गया है इसलिए उनके बयानों पर असर पडऩे लगा है। फिर भी उन्हें धैर्य से काम लेना चाहिए। ऐसा लोगों का कहना है। आखिर वे पुलिस के मुखिया है। पिछले दिनों उन्होंने सीआरपीएफ वालों के लिए कह दिया कि हम उन्हें चलना थोड़े न सिखाएँगे। फिर मीडियावाले बात करना चाह रहे थे, तो वे बोले, नहीं, मैं पहले सिगरेट पीऊँगा। लोगों को आश्चर्य हुआ कि ये क्या हो रहा है। इसके पहले भी डीजीपी महोदय अपने बयानों के कारण सुर्खियों में रहे हैं। बहरहाल, सीआरपीएफ के खिलाफ डीजीपी के बयान को गृह मंत्रालय ने गंभीरता से लिया है। वह नाराज है। डीजीपी की संवेदनशीलता के अनेक उदाहरण भी हैं लेकिन इस बार उनके एक-दो बयान नकारात्मक नंबर वाले हो गए। उनके चहेते लोग यही चाहते हैं, कि भविष्य में फूँक-फूँकर चलें, संभल-संभल कर बोलें ताकि वे विश्वरंजन ही रहें, लोग उन्हें विवादरंजन न बनाएँ।&lt;/i&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-307543372509745351?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/307543372509745351/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=307543372509745351' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/307543372509745351'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/307543372509745351'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='छ्त्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-5070932341273875519</id><published>2010-06-26T23:18:00.000-07:00</published><updated>2010-06-26T23:18:19.486-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छ्त्तीसगढ़ की डायरी/ गिरीशपंकज'/><title type='text'>छ्त्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;छत्तीसगढ़ में नम्बर दो के &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;पैसेवाले नेताओं की बाढ़.... &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में पैसे वाले नेताओं की बाढ़-सी आई है। और लोगबाग कहते हैं,कि यह ठीक भी है। राजनीति अब निर्धनों की चीज भी नहीं रही। बिन पैसा सब सून। अनेक राजनीतिक दलों में धनपतियों की संख्या बढ़ रही है। सामान्य कार्यकर्ता इनके जिंदाबाद में लगा रहता है। इसलिए अब पैसेवाले अनेक नेता धंधे के साथ-साथ राजनीति भी कर रहे हैं। इसका फायदा पार्टी को और बड़े नेताओं को मिलता है। कुछ निर्धन कार्यकर्ताओं का भी भला हो जाता है। बिना फायनेंस के अब कोई काम सधता नहीं। राजनीति भी ऐसा काम है,जहाँ पैसा लगता है। या यूँ कहें कि लोग इन्वेस्ट करते हैं। जैसे धंधे में किया जाता है। पहले राजनीति खाली पेट और खाली जेब से भी होती थी। इसलिए यह जरूरी है, कि अब पेट भरा हो और जेब भी। तब देखिए, कितनी जोरों से नारे लगते हैं। पिछले दिनों लोगों ने यही देखा। राजधानी में जब महंगाई विरोधी रैली निकली तो इसमें अनेक भयंकर धनवान नेता भी शामिल हुए जिनका महंगाई से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं रहा।&amp;nbsp; इस दृश्य को लोगों ने एक प्रहसन की तरह भी लिया। दुखी जनता का मनोरंजन ऐसी घटनाएँ करती रहती हैं.&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;छत्तीसगढ़ की शान, ये धनवान...&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;जी हाँ, छत्तीसगढ़ की शान बनते जा रहे हैं यहाँ के धनवान। और इसमें शामिल हो रहे हैं, यहाँ के प्रशासनिक अफसर, रेलवे के बड़े अफसर, बिल्डरर्स, फायनेंसर, व्यापारी और नेता आदि-आदि। इन सब लोगों के घर लगातार छापे पड़ रहे हैं और करोड़ों की अघोषित संपत्ति सामने आ रही है। अब ग्लोबल मीडिया का दौर है। कोई भी बड़ी खबर देखते ही देखते दूर-दूर तक फैल जाती है। अभी कुछ दिनों से रायपुर में आयकर छापों का सिलसिला जारी है। बाहर रहने वाले लोग छत्तीसगढ़ फोन करके बधाइयाँ दे रहे हैं,कि भाई, छत्तीसगढ़ में तो बड़ी दौलत है। नक्सल समस्या तो खैर अपनी जगह है लेकिन यह धनवालों की भी भरमार है। कौन कहता है, कि छत्तीसगढ़ गरीब है। अमीर धरती में अब अमीर लोग बढ़ रहे हैं। अब बाहर वालों को यह बात कौन समझाए कि यह कमाई उन गरीबों के जेब से ही निकल कर तिजोरियों तक पहुँच रही है, जिसके हिस्से केवल यही एक नारा बचा है-छत्तीसगढिय़ा, सबले बढिय़ा। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;नक्सलगीरी के विरुद्ध विकास की लड़ाई&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह बहुत जरूरी है कि विनाश के विरुद्ध विकास का ढाँचा खड़ा किया जाए। बस्तर में नक्सलगीरी के चलते काफी बर्बादी हुई है। जन-धन और अमन-चैन की भयंकर हानि हुई है। इसकी भरपाई बंदूकें कभी भी नहीं कर सकतीं। केवल विकास योजनाएँ और विकास कार्य ही क्षतिपूर्ति कर सकते हैं। योजना आयोग ने अभी हाल ही में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए करोड़ों की विकास योजनाएँ मंजूर की हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने भी बस्तर के लिए जरूरी प्रकल्पों का प्रारूप तैयार कर लिया है। अब विनाश से निपटने के लिए विकास की गंगा बहनी चाहिए। ऐसा करके ही हम नक्सलगीरी का मुँहतोड़ जवाब दे सकते हैं। हिंसा को हिंसा से दबाने की कोशिश अपनी जगह हो सकती है, लेकिन हिंसा और विनाश से मुकाबला करने के लिए विकास योजनाएँ ज्यादा ारगर हो सकती हैं। बस्तर में जिस ईमानदारी के साथ विकास कार्य होनें थे, नहीं हो सके। अब अगर तंत्र जागा है तो उसका स्वागत होना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;एकजुट होते आदिवासी...&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आदिवासी अब अपनी महत्ता, अपनी ताकत को समझने लगे हैं इसलिए कभी गोष्ठी करके, कभी सम्मेलन कर के तो कभी रैली निकाल कर अपनी एकजुटता और ताकत का भी प्रदर्शन कर रहे हैं। बहुत हो गया आदिवासियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार। अब विकास की धारा के साथ बहने का समय आ गया है। आदिवासी भी बेचैन है। बस्तर में उद्योग लगाए जा रहे हैं, लेकिन वहाँ के आदिवासियों के पुनर्वास की दिशा में कोई ध्यान नहीं दिया जाता। यह एक बड़ी समस्या है। उद्योगपतियों की नजर भी आदिवासी क्षेत्रों में लगी रहती है। वे मान कर चलते हैं, कि वहाँ के लोगों को ेबहला-फुसला कर उद्योग लगाए जा सकते हैं। कुछ मामलों में वे सफल भी हुए हैं, लेकिन अब नहीं हो पाएँगे। इसी को बताने आदिवासी एकजुट हो रहे हैं। इसे अच्छे संकेत के रूप में ही देखा जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;औद्योगिक अशांति का विकल्प&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों राजधानी के पास एक कारखाने में एक मजदूर की मृत्यु हो गई। यह स्वाभाविक था,कि वहाँ कार्यरत कर्मियों में गुस्सा आता। उनके एक साथी की लापरवाही केकारण मौत हो गई। उन्होंने तोडफ़ोड़ कर के भारी नुकसान पहुँचाया। हालांकि&amp;nbsp; यह नहीं होना चाहिए था। शांति के साथ मुआवजे और अन्य माँगें रखी जा सकती थीं। लेकिन कई बार आक्रोश का फायदा कुछ गलत तत्व उठा लेते हैं। फिर भी उद्योगपतियों को सावधानियाँ बरतनी चाहिए। कारखाने में हादसे के बाद कारखाने के मालिक ने कुछ सकारात्मक निर्णय किए, उससे अच्छा संकेत गया है। मृत व्यक्ति के परविार को मुआवजे के साथ-साथ पत्नी को आजीवन पेंशन और बच्चे को नौकरी देने की घोषणा सराहनीय है। निजी क्षेत्रों में इसी तरह के निर्णय लिए जाने चाहिए। औद्योगिक अशांति से निपटने का एक यही विक्लप है जिसकी अब शुरूआत हुई है। श्रमिकों की एकजुटता और समाजिक दबाव के कारण भी ऐसा हुआ है। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;फिर गौमाता की बात..&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;यह स्तंभकार अकसर गो माता की दुर्दशा पर लिखता ही रहा है क्योंकि मीडिया वातावरण बनाने का काम करता है। गाय कोअगर हम माँ का दर्जा देते हैं तो उसके साथ वैसा कुछ व्यवहार करके भी दिखाना चाहिए। यह सुखद संकेत है कि प्रदेश के राज्यपाल भी गौ माता की चिंता करते हुए उसकी सेवा की अपील कर रहे हैं। पिछले दिनों राज्यपाल महोदय एक धार्मिक कार्यक्रम में गए और वहाँ उपस्थित श्रद्धालुओं से यही अपील की कि गौ माता की रक्षा करें। उसे भरपूर चारा-सानी दे। राज्यपाल की अपील सामयिक है। गौपालक दूध बेचकर कमाई में तो काफी आगे रहता है मगर गाय की देखरेख वह शहर के भरोसे छोड़ देता है। यही कारण है कि बहुत-सी गायें राजधानी में इधर-उधर भटकती नजर आती हैं। किसी न किसी मुक्कड़ में गायें कचरे को खंगालती मिल जाएँगी। गो पालक को पता नहीं शर्म आती है, कि नहीं, मगर राज्यपाल महोदय को दुख जरूर हुआ, इसीलिए उनको अपील करनी पड़ी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-5070932341273875519?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/5070932341273875519/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=5070932341273875519' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/5070932341273875519'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/5070932341273875519'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/06/blog-post_26.html' title='छ्त्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-265641600662883639</id><published>2010-06-18T23:17:00.000-07:00</published><updated>2010-06-18T23:17:35.607-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छ्त्तीसगढ़ की डायरी/ गिरीशपंकज'/><title type='text'>छ्त्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;b style="color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;समाजसेवियों का नक्सल-प्रेम&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt; ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;नक्सलियों के पक्ष में हो जाना एक तरह का बौद्धिक फैशन-सा बन गया है। दिल्ली से लेकर रायपुर तक पहुत से बुद्धिजीवियों ने नक्सलियों के प्रति बड़ी सहानुभूति दिखाई देती हैं। इसका एक कारण यह है कि बुद्धिजीवी सामाजिक परिवर्तन चाहता है और नक्सली भी। लेकिन नक्सलियों का रास्ता हिंसक है इसलिए उनको समाज की मान्यता नहीं मिल पा रही। बुद्धिजीवी सीधे-सीधे नक्सल-समर्थक नहीं हो सकता इसलिए वह अप्रत्यक्ष रूप से खेल करता है। पिछले दिनों दिल्ली में रह कर सामाजिक कार्य करने वाले एक स्वामी रायपुर आए और जेल में बंद एक नक्सली नेता से मिले। इसके कुछ दिन पहले भी ये स्वामी रायपुर की एक शांति सभा में भाषण दे रहे थे। बीच एक उन्होंने एक लाइन यह भी बोली कि आपरेशन ग्रीनहंट बंद होना चाहिए। तभी लोगों का माथा ठनका था। यह ठीक है कि क्यों आदिवासी मरे या नक्सली भी क्यों मरें। सब जीवित रहें, लेकिन इस वक्त जो नक्सलीआम लोगों की निर्मम हत्याएँ कर रहे हैं, तब कोई समाजसेवी आपरेशन ग्रीन हंट बंद करने की बात करता है, तो समझ में आ जाता है, कि यह शख्स हिंसा के पक्ष में खड़ा है।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b style="color: blue;"&gt;पुलिस-बैठकों में राजनीतिक हस्तक्षेप...?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;जी हाँ, इन दिनों इस बात को लेकर बहस हो रही है, कि पुलिस वाले जो बैठकें करते हैं, उनमें जनप्रतिनिधियों को बुलाया जाना चाहिए कि नहीं। गृह मंत्री ने पुलिस को आदेश दिया है, कि उनकी बैठकों में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए। इनके सुझाव से अपराधों पर नियंत्रण हो सकता है। गृहमंत्री ठीक फरमाते हैं। पुलिस पर दबाव बना रहे, वरना वह निरंकुश हो सकती है। इस दृष्टि से यह बहुत जरूरी है। लेकिन बहस तब शुरू होती है, जब हमंारे कुछ जनप्रतिनिधि अपने अधिकारों का दुुरुपयोग करने की कोशिशें करते हैं। अपराधियों को छुड़वाने की कोशिश एक बड़ा अपराध है। सब नहीं करते लेकिन कुछ नेता ऐसा करते हैं। बस, पुलिस इनकी आड़ में यह प्रचारित करती है, कि हम पर दबाव बनाया जाता है। पुलिस पर दबाव बना ही रहना चाहिए ताकि वह गलत काम न कर सके। लोकतंत्र में पुलिस पर लाके का अंकुश जरूरी है। किसी के साथ अन्याय न हो सके। इस दृष्टि से यह जरूरी है, कि पुलिस और राजनीति का तालमेल बना रहे। पुलिस स्वच्छ सामाजिक छवि के कार्यकर्ताओं को भी अपने साथ जोड़े ताकि उसे दिशा-निर्देश मिलता रहे। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: purple; font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;आदिवासी अस्मिता की एकजुटता..&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;पिछले दिनों राजधानी में आदिवासियों का एक बड़ा सम्मेलन हुआ। किसने कराया, कितने लोग पहुँचे, किसके गुट का था यह सम्मेलन यह कुछ लोगों के लिए चर्चा का हो सकता है,लेकिन यह चर्चा इस बात की होगी कि अब आदिवासी अस्मिता जाग उठी है। खैर, जगी तो पहले भी थी, लेकिन अब वह हस्तक्षेप की स्थिति में भी है। सम्मेलन में पाँचवीं अनुसूची को लागू करने पर जोर दिया गया तो आदिवासियों के लिए आरक्षण बढ़ाने की मांग भी उठी। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से हजारों की संख्या में आदिवासी गायब है, इनका अता-पता नहीं चल रहा है। इस पर भी चिंता व्यक्त की गई। कुल मिला कर आदिवासियों ने अपने विरुद्ध हो रहे व्यवहार को लेकर नाराजगी भी व्यक्त की। यह सिलसिला जारी रहे और आदिवासी समाज राजनीतिज्ञों की हाथ की कठपुतली न बन कर अपने अधिकार के लिए इसी तरह आवाज बुलंद करते रहेतो आदिवासियों का कोई शोषण नहीं कर सकेगा&lt;/span&gt;।&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #b45f06; font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;बस्तर में एक और सत्याग्रह...&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;गाँधीजी ने आजादी की लड़ाई के दौरान जो प्रयोग किए, वे आज तक अपना असर दिखा रहे हैं। इनमें एक है सत्याग्रह। 19 जून से अमित जोगी अपना सत्याग्रह शुरू कर रहे हैं। अमित पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र हैं। इस अभियान से अमित की छवि को निखर सकती है। वे बस्तर की बदहाली के विरुद्ध सत्याग्रह शुरु कर रहे हैं। 19 जून महत्वपूर्ण तारीख है। सौ साल पहले आज ही के दिन महान सेनानी और मसीहा गुंडाधूर के धूमकाल ने आदिवासी अस्मिता को बचाने&amp;nbsp; के लिए इतिहास रचा था। अमित और उनके एक सौ आठ साथी पच्चीस जून तक दंतेवाड़ा से सुकुमा तक पद यात्रा करेंगे और लोगों से मिल कर नक्सलवाद एवं अन्य समस्याओं के विरुद्ध लोकजागरण का काम करेंगे। यह एक रचनात्मक एवं साहसिक पहल है। ऐसे दौर में जब नक्सलवाद का आतंक है, बस्तर में पदयात्रा करना निसंदेह सराहनीय पहल है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #6aa84f; font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;गायों की तस्करी रोकना जरूरी&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;छत्तीसगढ़ में गो वध पर रोक है। यहाँ कोई कसाईखाना भी नहीं है। यहाँ गौ सेवा आयोग भी कार्यरत है। फिर भी चोरी-छिपे कुछ शातिर लोग गायों की तस्करी करते रहते हैं। आज भी गायों की तस्करी जारी है। लोग ज्यादा चालाक हो गए हैं। वे पत्थलगाँव और जशपुर आदि क्षेत्रों से गायों को चराते हुए राँची तक ले जाते हैं। फिर ये गायें कसाइयों को सौंप दी जाती हैं। इसलिए यह जरूरी है, कि रायगढ़ जिले की पुलिस और वहाँ काम करने वाले गौ भक्त सतर्क हो कर देखें कि गाय चराने के नाम पर गायों को कहाँ ले जाया जा रहा है। गायों को ट्रक में ले जाने से शक हो जाता है और गायें जब्त कर ली जाती हैं इसलिए गो माफियाओं ने एक रास्ता निकाला है, कि वे गायें चराते हुए सीमा पार कर जाते हैं। भले ही गाय भूखी-प्यासी रहे, उनको क्या फर्क पड़ता है। इसलिए यह जरूरी है कि राज्य की सीमा पर वनोपज की जाँच की तरह यह जाँच भी होनी चाहिए कि जो गायें दूसरी ओर ले जाई जा रही है, वे चराने के लिए ले जाई जा रही है, काटने के लिए।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: magenta; font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;स्वाद के मारे मनुष्य बेचारे...&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;स्वाद जो न कराए थोड़ा है। स्वाद के चक्कर में लोग गाय, बकरी, सुअर, मुर्गी, तीतर-बटेर, चूहा और न जाने क्या-क्या हजम कर जाते हैं। अब तो राजधानी के कुछ होटलों में जीव-जंतुओं को व्यंजनों की तरह परोसा जा रहा है। लोग-भाग अब केंकड़े भी स्वाद से खाने लगे हैं। दरअसल मनुष्य प्रयोगधर्मी है। उसे शाकाहार खाते-खाते बोरियत होने लगती है, तो वह मांसाहार की ओर लपकता है। और अपनी फितरत भूल कर माँसाहार चाव से करता है। मानव की इसी कमी का फायदा उठा कर होटल वाले भी एक कदम आगे बढ़ जाते हैं और केकड़े को भी एक डिश की तरह प्रचारित करके परोस देते हैं। बहुत से लोग नाक-भौं सिकोड़ सकते हैं, कि ये भी क्या डिश है। लेकिन नहीं, इस नए दौर में यह भी एक डिश है। इसे खाने के लिए लोग घर का स्वादिष्ट खाना छोड़ कर होटलों या ढाबों की ओर भागते हैं। &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-265641600662883639?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/265641600662883639/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=265641600662883639' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/265641600662883639'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/265641600662883639'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/06/blog-post_18.html' title='छ्त्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-7046087148786150098</id><published>2010-06-12T00:36:00.000-07:00</published><updated>2010-06-12T00:41:25.541-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छ्त्तीसगढ़ की डायरी/ गिरीशपंकज'/><title type='text'>छ्त्तीसगढ़ की डायरी</title><content type='html'>&lt;div style="background-color: #f4cccc;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt;सेना के हवाले नहीं होगा बस्तर&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;बस्तर और अन्य राज्यों के लिए सेना के इस्तेमाल को लेकर आखिर दिल्ली में सहमति नहीं बन पाई। यह निर्णय किया गया, कि पुलिस और अर्ध सैनिक बलों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस निर्णय की सराहना ही की जानी चाहिए, क्योंकि सेना को बस्तर कोसेना के हवाले करने के बाद जो कुछ होता, वह भी अपने किस्म की एक नई समस्या ही हो जाती, जिसे लेकर अभी पूर्वोत्तर के कुछ राज्य जूझ रहे हैं। दरअसल सेना जब किसी अभियान में उतरती है, तो वह यह नहीं सोचती कि कम से कम नुकसान हो। उसका लक्ष्य तो होता है वह शत्रु, जिसको खलास करने के लिए वह आगे बढ़ती है। फिर रास्ते में कोई दोस्त आया, कि सामान्यजन आए, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता: सबका सफाया होता रहता है। इसलिए सेना के इस्तेमाल के पहले सौ बार सोचना चाहिए। बस्तर के लोग राहत की साँस ले रहे हैं, कि सैन्य कार्रवाई टल गई। अब पुलिस बल और अर्ध सैन्यबल प्रशिक्षित हो कर नक्सलियों से मुकाबला करे और बस्तर की शांति बहाल करने के धर्म का निर्वाह करें। यह हमारा आंतरिक मामला &lt;span style="font-size: small;"&gt;है, जिससे निपटने में हमारी पुलिस सक्षम है, लेकिन वह पहले दृढ़ संकल्पित तो हो। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;अफसरों के आगे मंत्रियों की नहीं चलती? &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आए दिन ऐसी बातें सामने आती रहती हैं। भुक्तभोगी यही चर्चा करते हैं, कि मंत्री ने कह दिया, आदेश कर दिया, लेकिन अफसर ने काम को लटका दिया। बेशक यह सब लोकतंत्र की सेहत के लिए अच्छे लक्षण नहीं हैं। लोग जनप्रतिनिधियों के पास जाते हैं। अपने काम के लिए उनका आदेश ले कर इधर-उधर भटकते रहते हैं, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी काम नहीं होता। अफसर नियम-कायदे में उलझा देते हैं। जबकि लोकतंत्र में मंत्री का आदेश ही कई बार नियम के रूप में दर्ज हो जाता है। लेकिन यह भी सच है कि जब जनप्रतिनिधि को कोई काम टालना होता है, तो वह अफसरों से साँठगाँठ करके आमजन को बुदधू बनाने का खेल करते हैं। नेता-अफसर एक-दूसरे पर आरोप लगा कर जनता को ठगने का काम करते रहते हैं। यह एक तरह का अपराध है,लेकिन यह अपराध निरंतर जारी है... क्योंकि अंतत: अफसर ही मंत्री पर... भारी है। लोग प्रतीक्षारत है, कि ये शातिर अफसर हल्के पड़ेंगे। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;लुटेरे समान की रखवारी करेंगे ...?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सरकार जब पर्यावरण के संरक्षण के लिए उद्योपतियों से अपील करती नजर आती है, तो लोगों को यही लगता है, कि कोई लुटेरों से यह कहे कि भाई, हमारे सामान की हिफाजत करना। जो कारखाने हमारे पर्यावरण की हत्या कर रहे हैं, उनसे अपील करने से बात नहीं बन सकती। उनसे तो निर्देशित और दंडित करने की भाषा ही बोलनी होगी। आज रायपुर,बिलासपुर, कोरबा से लेकर रायगढ़ तक औद्योगीकरण का भयंकर असर देखा जा रहा है। इन इलाकों के साथ अन्य क्षेत्रों में भी पेड़ साफ हो गए, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं। इसलिए अब यह कड़े आदेश जारी हों कि उद्योगपति अपने आसपास पेड़ों की भरमार करे। पेड़ लगाए और उसे संरक्षित करने की जिम्मेदारी ले। वरना यहाँ पर्यावरण अभियान एक फैशन की तरह चलता है। लोग फोटू-शोटू खिंचवा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री करने में माहिर हैं। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;समाजसेवा के पाखंड को भोगते हुए &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;समाजसेवा जब दिखावे और अपनी सामाजिक छवि चमकाने का सबब बन जाती है, तब ऐसा ही होता है। दो साल के शिशु के शव को उसके गंतव्य तक पहुँचाने के लिए कोई एंबुलेंस नहीं मिलती क्योंकि शिशु के परिजन के पास पर्याप्त पैसे नहीं होते। पिछले दिनों राजधानी में ऐसा ही हुआ। अंबेडकर अस्पताल में इलाज हेतु लाया गया एक शिशु मर गया। उसे गाँव ले जाना था, लेकिन माता-पिता के पास पाँच रुपए किलोमीटर दर से एंबुलेंस को देने के लिए पैसे ही नहीं थे। आखिर बेचारे बस से ले गए। यह नियम विरुद्ध था, फिर भी करना पड़ा। सामाजिक संस्थाओं का यह दायित्व है कि जब उन्होंने एंबुलेंस सेवा शुरू की है, तो ऐसी स्थिति आने पर वे नि:शुल्क सेवा दें। वरना अपने आप को समाजसेवी कहने का ढोंग न करें। वे साफ-साफ कहें,कि समाजसेवा हमाराधंधा है। जिसे परता पड़े वो आए, वरना नमस्ते...&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;जेलों में सत्साहित्य..&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;गायत्री परिवार देश में युगनिर्माण योजना का काम वर्षों से कर रहा है। उनका नारा सबको अच्छा लगता है-हम बदलेंगे, युग बदलेगा। लोग बदलें या न बदलें, अभियान जारी है। अब गायत्री परिवार ट्रस्ट छत्तीसगढ़ की जेलों में अपना सत्साहित्य पहुँचा रहा है, ताकि वहाँ कैदी इन्हें पढ़ें और अपने जीवन को बेहतर बना कर बाहर निकलें। जेल में कैदी बेहतर बनें और जेल के बाहर रहने वाले अनेक बुराइयों की कैद में रहने वाले सामान्यजन तक भी ऐसे साहित्य को पहुँचाना चाहिए ताकि जेल जाने की नौबत ही क्यों आए। सचमुच इस दौर को भले साहित्य की जरूरत है। फिर चाहे वह लिखित साहित्य हो या फिर टीवी के चैनलों के माध्यम से पहुँचे। जिस तेजी के साथ राजधानी में या छत्तीसगढ़ में अपराध बढ़ रहे हैं, उन्हें देखकर लगता है, कि अब उत्कृष्ट साहित्य के जरिए ही समाज को जागृत किया जा सकता है लेकिन वैसे आधुनिक साहित्य से लोगों को बचाना चाहिए, जो आदमी को आधुनिक बनने के लिए कपड़े उतारने की सलाह देता है। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;सुंदरीबाई पर हमें गर्व है..&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;सरगुजा की सुंदरीबाई ने पूरी दुनिया में अपना और अपने छत्तीसगढ़ का नाम रौशन करने का काम किया है। सुंदरीबाई भित्ति चित्रकला के जरिए छत्तीसगढ़ का नाम रौशन कर रही हैं। अभी उन्होंने फ्रांस में अपनी कला का प्रदर्शन किया। वे जब दीवारों को अपनी कला से जीवंत करती हैं, तो लोग अभिभूत हो जाते हैं। अनेक देशों में सुंदरी ने अपनी कला को पहुँचाया है,लेकिन अफसोस यही है, कि अपनी ही धरती पर उसे पूरा सम्मान नहीं मिला। उनके पहले सोनाबाई ने सरगुजा का सिर ऊँचा किया। उसी परम्परा को सुंदरी आगे बढ़ा रही है। छत्तीसगढ़ में ऐसी अनेक प्रतिभाएँ हैं। इन्हें प्रोत्साहित और संरक्षित करने की जरूरत है। अगर राज्य में ललित कला अकादेमी जैसी संस्था बन जाए तो उसके माध्यम से यहाँ के कलाकारों को आगे बढ़ाया जा सकता है। सुंदरीबाई जैसे लोगों को भरपूर सम्मान (और मानधन भी...) दे कर किसी पद पर बिठाया जाना चाहिए और उनकी देखरेख में भित्तिकला जैसी अनेक कलाओं को लोकव्यापी बनाने की पहल होनी चाहिए।&amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-7046087148786150098?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/7046087148786150098/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=7046087148786150098' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/7046087148786150098'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/7046087148786150098'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/06/blog-post_12.html' title='छ्त्तीसगढ़ की डायरी'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://2.bp.blogspot.com/_Gliz_kAecLI/TUJfhcU4U2I/AAAAAAAAAaw/5v85Rq2XdcI/s220/07012011211.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5381782517240871129.post-3648022596245918117</id><published>2010-06-04T11:32:00.000-07:00</published><updated>2010-06-04T11:34:28.842-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छ्त्तीसगढ़ की डायरी/ गिरीशपंकज'/><title type='text'>अरुंधती राय द्वारा खुलेआम हिंसा का समर्थन...?</title><content type='html'>मैं नक्सलियों और उनकी पैरोकार अरुंधती राय को अब क्या कहूं. दोनो की हरकतों पर रोना ही आता है. पहले नक्सलियों कि बात. इनके कारण पिछले दिनों ज्ञानेश्वरी रेल हादसा हुआ। इस हादसे में छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों के अनेक लोग मारे गए। नक्सलियों ने ट्रेन उड़ाई दी थी। अब कह रहे हैं कि भूल हो गई। माफी दई दो। हम मालगाड़ी को उड़ाना चाहते थे। अब हम खुद ट्रेनों की रक्षा करेंगे। हमें दुख है कि हमारे कारण सैकड़ों लोग मर गए। नक्सलियों की बात सुनकर लोग कह रहे हैं, वाह रे नक्सलियो, तुमने तो बड़ी मासूमियत के साथ खेद व्यक्त कर दिया, लेकिन उन परिवारों की भरपाई कैसे होगी, जिनके परिवार के लोग बेवजह जान गवाँ बैठे? और आखिर ऐसे काम करने ही क्यों जिससे बाद में दुख हो। ये रक्तपात, ये हिंसा,ये ब्लास्ट तुम लोग छोड़ क्यों नहीं देते? और उधर इन लोगों की खैरख्वाह लेखिका अरुंधती राय की हिम्मत देखो। डंके की चोट पर कह रही है, कि मैं नक्सली हिंसा की वकालत करती रहूँगी क्योंकि वर्तमान समय में गाँधीवादी तरीके से समस्याएँ नहीं सुलझ सकती। मुझे भले ही जेल में डाल दो, लेकिन मैं नक्सलियों के साथ हूँ। वाह रे अरुंधती, अकल से पैदल महिला...अगर बुद्धिजीवी भी बुद्धिहीन हो कर हिंसा का साथ देने लगेंगे तो देश का भगवान ही मालिक है। ये कैसा सामाजिक आंदोलन है,जिसमें मासूम बच्चों की भी हत्या कर दी जाती है&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;. &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;आई पुलिस की जान में जान &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;रायपुर में पुलिस साइंस काँग्रेस के दो दिवसीय सम्मेलन ने लगता है, पुलिस में नई जान फूँक दी है। सम्मेलन के बहाने यहाँ की पुलिस को राष्ट्रव्यापी सपोट्र्र मिला है। लेकिन ऐसा भी न हो कि राज्य की पुलिस अपनी इस सफलता पर कुप्पा हो जो और केंद्र को ही हड़काने की कोशिश करने लगे। इसे हिम्मत ही कहेंगे न, कि हमारा केंद्रीय गृहमंत्री जो कहते हैं, उसको राज्य की पुलिस गंभीरता से नहीं लेती। राज्य की पुलिस केंद्र को समझा रही है कि वो नक्सली समस्या की गंभीरता को नहीं समझ रहा है। चिदंबर साहब तो हौसला बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन यहाँ की पुलिस पहले से ही हौसले में है। अगर यही रफ्तार रही तो केंद्र से हम किस आधार पर मदद माँगेंगे? अकड़ कर बात नहीं हो सकती। केंद्र की अनुशंसाओं को गंभीरतापूर्वक लिया जाना चाहिए, और उन्होंने जो निर्देश दिए हैं, उनके अनुपालन की कोशिश भी होनी चाहिए। जब यह मान लिया गया है, कि नक्सल समस्या राष्ट्रीय समस्या है तो केंद्र की बात सुननी चाहिए। केंद्र के मार्गदर्शन पर चलना ही पड़ेगा। केंद्र तो अब बस्तर में सब एरिया खोलने की मानसिकता भी बना रहा है। ऐसे समय में अगर यहाँ की पुलिस केंद्र को नासमझ करार दे तो यह उचित नहीं। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;बाल न बाँका कर सके....&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के बारे में अगर यह बात कही जाए तो गलत न होगा कि अकसर इनका बाल बाँका नहीं होता। भले ही जग बैरी हो जाए। ठीक है कि कभी-कभार ये बेचारे किसी घोटाले में, किसी बड़े भ्रष्टाचार में फँसते न•ार आते हैं, कभी-कभी फँस भी जाते हैं, लेकिन कुछ दिन बाद साफ-साफ बच निकलते हैं। कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ के एक आईएएस अधिकारी बाबूलाल अग्रवाल करोड़ों-अरबों रुपए के भ्रष्टाचार में फँसे, निलंबित भी किए गए लेकिन चार महीने बाद वे बहाल कर दिए गए। तर्क दिया गया कि आयकर विभाग ने पुख्ता दस्तावेज नहीं सौंपे। लोग चर्चा कर रहे हैं, कि आखिर ये पुख्ता दस्तावेज क्या होता है। जो कुछ था, पानी की तरह साफ तो था। कितने सबूत मिले थे। वैसे सरकार कह रही है, कि विभागीय जाँच चलती रहेगी। पता नहीं इस जाँच से इस अधिकारी को कोई आँच आएगी या नहीं लेकिन साँच तो यह है कि इस अधिकारी को राजस्व मंडल का सदस्य बनाया गया है। अब लोग उम्मीद कर रहे हैं कि इनके अनुभव से राज्य के राजस्व में कुछ न कुछ तो इजाफा होगा ही। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;गर्भवती गाय की अकाल मौत&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;गाय की मौत हो जो तो वह कोई खबर नहीं बन पाती। पिछले दिनों एक गर्भवती गाय न्यू पंचशील इलाके में मर गई। सड़क में गहरा अंधेरा था। गाय का दूध पी कर मुटाने वाले गोपालक ने अपनी गाय को यूँ ही आवार घूमने के लिए छोड़ दिया था। खुद तो गाय के लिए चारा-पानी का बंदोबस्त नहीं करते, लोगों की दया पर छोड़ देते हैं। या तो लोग कुछ देदें या गाय कचरे में से कुछ खाने लायक खोज ले। तो ऐसे किसी महान गोपालक की गाय अंधेरे में देख नहीं पायी और एक गहरी नाली में जा गिरी। कुछ लोगोंने उसे जैसे-तैसे बाहर निकाला, लेकिन तब तक बेचारी की हालत खराब हो चुकी थी। उसकी टाँग टूट चुकी थी। उसके पेट का बच्चा भी मर चुका था। कुछ देर बाद गाय भी चल बसी। राजधानी में इन दिनों बहुत-सी गायें रात को घूमती फिरती हैं। अब यह बहुत जरूरी हो गया है कि नगर निगम का रात्रिकालीन उडऩ दस्ता ऐसी गायों को पकड़े और गौ शालाओं में भिजवा दे। और गोपालक से जुर्माने के रूप में मोटी रकम भी वसूले। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;भू माफियाओं से बचाओ...&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;बहुत पहले एक गाना बजता था- मुझे मेरी बीवी से बचाओ। अब रायपुर शहर को गाना पड़ रहा है, मुझे भू माफियाओं से बचाओ। इनका बस चले तो पूरे रायपुर को उजाड़ कर एक नई टाउनशिप ही बसा दें। पेड़ काट दें, तालाब पाट दें। स्कूल गिरा दें। खेल मैदान पर मकान-दूकान या व्यावसायिक परिसर खड़ा करे दें। शॉपिंग मॉल बना दें। लेकिन बेचारों का जोर भी चल नहीं पा रहा है। वैसे कोशिश कर कर के अनेक तालाबों को पाट ही चुके हैं। और अब रायपुर के खो-खोपारा के तालाब को हजम करने की तैयारी कर रहे थे। उन्तीस एकड़ का तालाब सिमट कर नौ एकड़ का रह गया, तब नगर निगम और लोगों की आँखें खुलीं। इसी तरह सूरजबाँधा तालाब पर भी कब्जा करने की साजिश हो रही थी। लोगों की जागरूकता से ये तालाब कब्जामुक्त हुए। जरूरी है कि इन तालाबों का गहरीकरण हो ताकि बरसात में ये लबालब हो सके। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;राजधानी में चिपको आंदोलन&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मैं सुंदरलाल बहुगुणा के चिपको आंादेलन को याद कर रहा हूँ। उन्होंने टिहरी-गढ़वाल तरफ पेडों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन चलाया था। आज भी चला रहे हैं। अब कुछ लोगों ने यहाँ भी चिपकों आंदोलन शुरू किया है। रायपुर और आसपास जिस तेजी के साथ पेड़ कट रहे हैं, उसे देखकर लगता है, कि कुछ लोग पेड़ों से पिछले जनमम् का कोई बदला भँजा रहे हैं। सड़क चौड़ी करनी है तो पेड़ काट दो। अरे भाई, पेड़ों को सलामत रहने दो और पेड़ों के हिसाब से यातायात को एडजस्ट करने की कोशिश करो। अगर नहीं कर सकते और पेड़ काटना बहुत ही जरूरी है तो पेड़ को उठाकर शिफ्ट करने की कोशिश करो। यह भी नहीं कर सकते तो एक पेड़ काटो और बदले में सौ पौधे लगाओ और उसकी देखभाल करो। यह नहीं कर सकते तो घर बैठो। छुट्टी की जाए ऐसे अफसर की, जिसने पेड़ काटे और बदले में हमें धूप दी, गरमी दी। छाँव का एक टुकड़ा भी न दिया। चिपको आंदोलन वालों से आग्रह है कि वे इस आंदोलन से चिपके रहें, वरना होता यह है कि बहुत से आंदोलन शुरू होते हैं और अखबारों में छपने के बाद दम तोड़ देते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5381782517240871129-3648022596245918117?l=girish-pankaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/feeds/3648022596245918117/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5381782517240871129&amp;postID=3648022596245918117' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/3648022596245918117'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5381782517240871129/posts/default/3648022596245918117'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://girish-pankaj.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='अरुंधती राय द्वारा खुलेआम हिंसा का समर्थन...?'/><author><name>girish pankaj</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16180473746296374936</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' 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तक उसे बुरी तरह पीटा जाता है। उसे पानी भी नहीं पीने दिया जाता। भाई खाना लेकर आता है तो उसे भगा दिया जाता है। दो दिन बाद बेचारा जमानत पर छूटता है और एसपी से मिल कर शिकायत करता है। एसपी उसका मुलाहिजा कराते हैं। इसके बाद होना तो यह चाहिए कि दोनों सिपाही निलंबित हों। उन पर और कड़ी कार्रवाई हो। वर्दी का मतलब यह नहीं कि किसी को भी राह चलते रोक दिया और पिटाई सुरू कर दी। ऐसी शिकायतें मिलने पर दोषी लोगों पर फौरन कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन ऐसा कम होता है। किसी पुलिस का कोई अपराध सामने आता है तो पुलिस विभाग लीपापोती करने में भिड़ जाता है। और यहीं से लोगों के मन में आक्रोश पनपता और सीधा-सादा आदमी भी अपराध की दिशा में मुड़ जाता है। अगर भगवानदास जैसे मजदूर अगर प्रतिशोध लेने के लिए कल को अपराधी या जंगल जा कर नक्सली बनते हैं, तो दोष किसका है, यह सोचने की बात है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;ये काले कारनामे वाले लेखक... &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों रायपुर में एक साहित्यिक कार्यक्रम में दिल्ली से पधारे एक लेखक जो जन्मजात ही शोक-मुक्त है, यानी 'अशोक' हैं, ने भाषण देते-देते कहा कि मुझे एक व्यक्ति का नाम नहीं याद आ रहा था तो मैं उस दिन कुछ ज्यादा ही दारू पी गया। उनके भाषण के इस अंश की जमकर चर्चा हुई। हो भी क्यों न। आजकल बहुत-से लेखकों की यह बीमारी हो गई है, कि वे अपने गलत-सलत कारनामों को इस तरह पेश करते हैं गोया उन्होंने बहादुरी का काम कर दिया है या फिर वे गाँधी की तरह सत्य के प्रयोग कर रहे हैं। अपनी लम्पटताओं को बताना सत्य का प्रयोग नहीं होता। एक लेखक ने एक बार एक तथाकथित बड़ी पत्रिका में अपने पापों का शान से जिक्र किया करते हुए बताया था, कि कैसे उसने बस्तर, रायपुर और बिलासपुर में औरतों के साथ मुँह काला किया। अपने घटिया कारनामों को उजागर करके ये लेखक सोचते हैं, कि हमने बड़े साहस का काम किया लेकिन वे भूल जाते हैं, कि उनकी इन गलत हरकतों को नये लेखक एक परम्परा की तरह भी लेते हैं, कि वो कर रहा है, तो हम क्यों नहीं कर सकते। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;ये लाल रंग कब हमें छोड़ेगा?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हर दूसरे-चौथे दिन नक्सलियों द्वारा खून बहाने का सिलसिला जारी है। सामान्य जन की हत्याएँ भी ये लोग करने लगे हैं। आखिर ये कैसी क्रांति है जो लगातार खून माँग रही है। निरीह लोगों का खून बह रहा है और क्रांति करने वाले लोग अंधेरे में कहीं छिप कर अट्टहास कर रहे हैं। सरकार की विफलता पर हँस रहे हैं। म•ााक उड़ा रहे हैं। उन्हें चुनौती दे रहे हैं। हम अपने तंत्र को आखिर कब इतना मजबूत करेंगे कि नक्सली नाकाम हो जाएँ। पिछले दिनों पुलिस ने एक नक्सली को पकड़ा। इसी तरह सक्रियता के साथ काम करें तो और भी गिरफ्त में आएँगे। जरूरत इस बात की है कि पुलिस और अर्धसैनिक बल जुझारू तरीके से काम करे। बस्तर को एक चुनौती के रूप में लें, सजा के तौर पर नहीं। वहाँ जाने का मतलब है कि हम एक मिशन में जा रहे हैं। सरकार नक्सलियों से जूझने वाले लोगों के लिए और बेहतर पैकेज लाए। मनुष्यता विरोधी नक्सलियों की हरकतें देख कर लगता नहीं कि ये इतनी आसानी से लाल रंग को छोड़ेंगे। हमें ही उनसे मुकाबला करने के लिए तैयार रहना होगा। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;महिला मुक्ति का ये चेहरा..&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों एक गाँव की एक महिला सरपंच को पिछले दिनों सिर्फ इसीलिए सरेराह पीटा गया, कि वह अवैध कब्जे हटा कर अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रही थी। ऐसी कुछ और घटनाएँ सामने आई हैं, जब महिला सरपंच या अध्यक्ष के कार्यों को लोगों ने पसंद नह
